प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८६० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४२
आचार्य जी अध्यात्म के गहन ज्ञाता हैं। उनके अनुभव, चिंतन और मार्गदर्शन से हमें निरन्तर सीखने का अवसर मिलता है। अतः हमें उनके सान्निध्य और ज्ञान का अधिक-से-अधिक लाभ उठाना चाहिए। उनके द्वारा बताए गए तथ्यों, विषयों को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक लाभ है। अतः हम संकल्पित हों कि हम अपने भीतर विद्यमान सत्त्व, श्रेष्ठ विचार, दृढ़ विश्वास और संयम जैसे जीवन-मूल्यों को साधना के माध्यम से जाग्रत और परिष्कृत करेंगे
और कामना करेंगे कि
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्।।
हमारी शिक्षा की समस्याएँ आज अत्यन्त गम्भीर हैं। इसका एक बड़ा कारण शिक्षा के मूल उद्देश्य में आई विकृति है। शिक्षा का लक्ष्य केवल पढ़ना-लिखना, परीक्षा उत्तीर्ण करना और रोजगार प्राप्त करना नहीं हो सकता। यदि वर्षों की शिक्षा के बाद भी व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित, बेरोजगार, तनावग्रस्त और जीवन के प्रति निराश अनुभव करे, तो हमें अपनी शिक्षा-पद्धति पर गंभीरता से विचार करना होगा।
आज शिक्षा मनुष्य को मनुष्यत्व से जोड़ने के बजाय अनेक बार उसे केवल धन और भौतिक सफलता की ओर दौड़ना सिखा रही है। परिणाम यह है कि ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन विवेक घट रहा है; साधन बढ़ रहे हैं, लेकिन संतोष कम हो रहा है; प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, लेकिन संवेदना और आत्मीयता घट रही है।
शिक्षा वही सार्थक है जो व्यक्ति को केवल कमाने योग्य नहीं, बल्कि जीने योग्य बनाए; उसे कुशल ही नहीं, चरित्रवान बनाए; उसे अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध कराए और उसे अपने परिवार, समाज, राष्ट्र तथा समस्त मानवता के प्रति उत्तरदायी बनाए।
ऐसे ही कर्तव्य का बोध कराने का कार्य गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया l भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में आने वाले अनेक संकटों और बाधाओं का धैर्य, शौर्य, संयम और धर्म के बल पर सामना किया। वनवास के समय उन्होंने ऋषियों-मुनियों को राक्षसों के अत्याचार से मुक्त करने का आश्वासन दिया और अपने संकल्प को कर्म में परिणत करते हुए कहा—
“निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह।”
उन्होंने अपने पराक्रम से राक्षसी शक्तियों का विनाश किया, ऋषियों को निर्भय किया और धर्म की रक्षा की। आगे चलकर लंकाधिपति रावण का वध कर अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित की। वनवास की अवधि पूर्ण होने पर श्रीराम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ।
अब अयोध्या में ऐसा रामराज्य स्थापित है कि
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥1॥
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया शुभेन्दु जी का नाम क्यों लिया, रामदेश क्या है, अधिवेशन के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l