3.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४३

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४३


हम अपने भीतर स्थित दिव्य तत्त्व को पहचानें, अपने जीवन को व्यवस्थित एवं मर्यादित करें और अपने प्रत्येक कर्म को लोकमंगल की भावना से जोड़ें l संगठन में व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा न रखें l


श्रीरामचरितमानस में अवगाहन करते हुए हम अपने जीवन को अधिक व्यवस्थित, संयमित, शान्त और आनन्दमय बनाने का सतत प्रयास करें। मानस केवल पढ़ने का ग्रन्थ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली अमूल्य साधना है। माया मनुष्य बनकर प्रभु राम ने जो सांसारिक लीला की उस पर हम विश्वास करें l  इस ग्रंथ के आदर्शों और शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारकर हम अपने भीतर शान्ति, सद्भाव, संयम, शौर्य, पराक्रम, तप, त्याग और आनन्द का विकास कर सकते हैं।

हम सबके जीवन में इस साधना का भाव जाग्रत हो और हम मानस के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक एवं मंगलमय बना सकें—इसी दिशा में आचार्य जी निरन्तर हमारा मार्गदर्शन और प्रयत्न कर रहे हैं।

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।

मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥23॥


चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से पृथ्वी को उसी प्रकार परिपूर्ण करता है, जितना उसके लिए आवश्यक है और सूर्य भी उतना ही तपता है, जितना आवश्यक है। बादल भी जब जल की आवश्यकता होती है, तभी माँगने पर पर्याप्त वर्षा करते हैं।

अर्थात् श्रीरामचन्द्र जी के राज्य में प्रकृति भी मर्यादा और संतुलन के अनुरूप कार्य करती है। न अधिक गर्मी, न अनावश्यक वर्षा और न ही जल का अभाव—सब कुछ आवश्यकता और लोककल्याण के अनुरूप है।




आचार्य जी नित्य हमें आगामी अधिवेशन के लिए  भी प्रेरित कर रहे हैं। हमें दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि वहाँ हमें व्यवस्थित, अनुशासित, संयमित, चिन्तनशील एवं प्रेममय वातावरण प्राप्त होगा, जो हमारे मन और जीवन को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

हम सभी अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में निरन्तर व्यस्त रहते हैं। दैनिक जीवन की भागदौड़ और एकरसता के कारण मन कभी-कभी ऊब और थकान का अनुभव करने लगता है। ऐसे समय में यह अधिवेशन हमारे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मीय मिलन, सामूहिक चिन्तन, आनन्द और आत्मशुद्धि का अवसर बनेगा।

वहाँ का अनुशासित वातावरण, आत्मीयता से भरे साथी , सार्थक संवाद और प्रेरणादायी चिन्तन निश्चित ही हमारे भीतर नई स्फूर्ति और उत्साह का संचार करेंगे। अतः हम पूर्ण उत्साह और सकारात्मक भाव के साथ इस अधिवेशन की प्रतीक्षा करें, अपना शुल्क प्रदान करें और वहाँ प्राप्त होने वाले आनन्द तथा प्रेरणा को अपने जीवन और कार्यक्षेत्र में भी साथ लेकर लौटें।


इसके अतिरिक्त ओशो की चर्चा क्यों हुई,भैया रवि जी, भैया संपूर्ण सिंह जी, भैया मोहन जी, भैया यज्ञदत्त जी के नाम क्यों आये, परिवार कैसे चलता है जानने के लिए सुनें l