प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८७८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६०
आगामी अधिवेशन में कमियों की ओर ध्यान न देकर हम कर्मयोद्धा आनन्द की अनुभूति करें l संगठन के प्रति सुदृष्टि रखें सुविधाओं के प्रति विरक्ति रखें l
हमारा देश भारत नित्य नई-नई समस्याओं से घिरता रहता है। पहले भी ऐसा ही होता रहा है, किंतु उनकी समस्याओं के समाधान के लिए सपूत सदैव तत्पर रहते हैं। हम वही राष्ट्र भक्त सपूत हैं l हमारा लक्ष्य ही है
राष्ट्र - निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष l
भारत की धरती ही ऐसी है कि यहां जन्म लेने वाला मनुष्य पशु पक्षी भक्ति अर्थात् विश्वास की दिशा में प्रेरित होते हैं l भक्त को कभी ऐसा अनुभव नहीं होता कि उसका भगवान पराजित हो सकता है
किन्तु गरुड़ जी को कुछ और ही अनुभव हुआ l
जब गरुड़ जी ने युद्धभूमि में जाकर श्रीराम और लक्ष्मण को मेघनाद के नागपाश से मुक्त कराया, तो उनके मन में एक सूक्ष्म अहंकार और संदेह आ गया। उन्होंने सोचा—"श्रीराम तो स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी और भगवान हैं। भला साक्षात भगवान एक साधारण मेघनाद के सर्पों के बंधन में कैसे बंध सकते हैं? और अगर वे भगवान हैं, तो उन्हें मुक्त कराने के लिए मुझ जैसे एक पक्षी की सहायता की आवश्यकता क्यों पड़ी?" यही विचार गरुड़ जी का मोह (अज्ञान) बन गया। तो
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुण्डा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥
देखि सैल प्रसन्न मन भयउ। माया मोह सोच सब गयऊ॥1॥
इसके अतिरिक्त औरास की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की, भैया मोहन जी, भैया विवेक गुप्त जी, भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ, कम पुआल का कौन सा प्रसंग था जानने के लिए सुनें l