19.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५९ आगामी अधिवेशन की तैयारी में जुटे रहें l हम जिज्ञासु श्रोता बनकर इन सदाचार वेलाओं का लाभ उठाने की सतत चेष्टा करें। यहाँ व्यक्त होने वाले विचारों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। यदि इनके माध्यम से प्राप्त जीवन-दृष्टि हमारे अन्तर्मन को दृढ़ बनाती है , विवेक को जाग्रत करती है और कर्म के प्रति हमें निरन्तर प्रेरित करती है तब जीवन-यात्रा में आने वाली विषम परिस्थितियाँ हमें विचलित या व्याकुल करने के स्थान पर हमारे धैर्य, पुरुषार्थ और आत्मविश्वास को और अधिक पुष्ट करेंगी तथा हम प्रत्येक परिस्थिति को स्वीकार करते हुए प्रसन्नता, संतुलन और आनन्द के साथ अपनी जीवन-यात्रा चलाने में समर्थ होंगे। हम सनातन धर्म में अटूट विश्वास रखते हैं हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसमें मानव जीवन शैली का दिव्य विधान निहित है, जो जड़ में चेतन का बोध कराता है, असार के साथ सार का ज्ञान प्रदान करता है, सद्भाव समन्वित जीवन को उचित ठहराता है,संयम, तप, त्याग, दान, परोपकार,संतोष,शक्ति, शौर्य इस धर्म के आभूषण हैं l इसी सनातन जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सहज, सरस और जीवन्त स्वरूप हमें रामचरितमानस में दिखाई देता है। रामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को आलोकित करने वाली ज्ञान-गंगा है। यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥ तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥1॥ मां भवानी प्रश्न कर रही हैं हे कृपालु प्रभु! श्रीराम का यह पवित्र और अत्यन्त मनोहर चरित्र काकभुशुण्डि जी को कहाँ से प्राप्त हुआ? हे कामदेव के शत्रु भगवान शिव! आपने यह अद्भुत रामकथा काकभुशुण्डि जी से किस प्रकार सुनी? यह प्रसंग मेरे लिए अत्यन्त कौतूहल और जिज्ञासा का विषय है। अतः कृपापूर्वक मुझे विस्तार से बताइए। इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, नारदमुनि का उल्लेख क्यों हुआ,भैया विनय वर्मा जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें l

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७७ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५९

आगामी अधिवेशन की तैयारी में जुटे रहें l


हम जिज्ञासु श्रोता बनकर इन सदाचार वेलाओं का लाभ उठाने की सतत चेष्टा करें। यहाँ व्यक्त होने वाले विचारों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। यदि इनके माध्यम से प्राप्त जीवन-दृष्टि हमारे अन्तर्मन को दृढ़ बनाती है , विवेक को जाग्रत करती है और कर्म के प्रति हमें निरन्तर प्रेरित करती है तब जीवन-यात्रा में आने वाली विषम परिस्थितियाँ हमें विचलित या व्याकुल करने के स्थान पर हमारे धैर्य, पुरुषार्थ और आत्मविश्वास को और अधिक पुष्ट करेंगी तथा हम प्रत्येक परिस्थिति को स्वीकार करते हुए प्रसन्नता, संतुलन और आनन्द के साथ अपनी जीवन-यात्रा चलाने में समर्थ होंगे।

हम सनातन धर्म में अटूट विश्वास रखते हैं हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसमें मानव जीवन शैली का दिव्य विधान निहित है,  जो जड़ में चेतन का बोध कराता है, असार के साथ सार का ज्ञान प्रदान करता है, सद्भाव समन्वित जीवन को उचित ठहराता है,संयम, तप, त्याग, दान, परोपकार,संतोष,शक्ति, शौर्य इस धर्म के आभूषण हैं l


इसी सनातन जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सहज, सरस और जीवन्त स्वरूप हमें रामचरितमानस में दिखाई देता है। रामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को आलोकित करने वाली ज्ञान-गंगा है।


यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥

तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥1॥

मां भवानी प्रश्न कर रही हैं 

हे कृपालु प्रभु! श्रीराम का यह पवित्र और अत्यन्त मनोहर चरित्र काकभुशुण्डि जी को कहाँ से प्राप्त हुआ? हे कामदेव के शत्रु भगवान शिव! आपने यह अद्भुत रामकथा काकभुशुण्डि जी से किस प्रकार सुनी? यह प्रसंग मेरे लिए अत्यन्त कौतूहल और जिज्ञासा का विषय है। अतः कृपापूर्वक मुझे विस्तार से बताइए।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,

नारदमुनि का उल्लेख क्यों हुआ,भैया विनय वर्मा जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें l