5.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६३ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४५

शिक्षा के स्वरूप में परिवर्तन आज की महती आवश्यकता है।

वर्तमान शिक्षा केवल ज्ञान और रोजगार तक सीमित न रह जाए, बल्कि वह मनुष्य के भीतर चरित्र, संस्कार, विवेक, आत्मविश्वास, कर्तव्यबोध और राष्ट्रबोध का निर्माण करे—इस दिशा में गम्भीर चिन्तन आवश्यक है।

इसी महत्वपूर्ण विषय पर आगामी अधिवेशन में व्यापक चर्चा और विचार-मंथन होने जा रहा है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के पुनर्निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर है।

अतः हम सभी उत्साह, उमंग और सकारात्मक मनोभाव के साथ अधिवेशन में भाग लेने के लिए सज्ज हो जाएँ।



सनातन जीवन-दृष्टि अत्यन्त संतुलित और संयमित जीवन का मार्ग दिखाती है। मनुष्य के भीतर भी समय-समय पर अनेक विकार उत्पन्न होते हैं। जब ये विकार धीरे-धीरे बढ़ते हुए एकत्रित और प्रबल हो जाते हैं, तब वही विकार रावणत्व का रूप धारण कर लेते हैं।

रावण के जीवन का मूल भाव भोग था और उसमें भी कामासक्ति का अत्यन्त विकृत रूप दिखाई देता है। कामना जब मर्यादा और संयम की सीमा को लाँघ जाती है, तब वह मनुष्य को इतना व्याकुल और विवेकहीन बना देती है कि उसका आचरण पशु से भी अधम हो सकता है। इसलिए मनुष्य के भीतर रावणत्व का जितना अधिक निराकरण होगा, समाज उतना ही अधिक स्वस्थ, सुरक्षित और व्यवस्थित रहेगा।

इसी संदर्भ में बहुविवाह की प्रवृत्ति पर भी विचार करने की आवश्यकता है। भारतीय जीवन-दृष्टि ने दाम्पत्य को केवल भोग का साधन नहीं माना, बल्कि उसे निष्ठा, उत्तरदायित्व, संयम और पारस्परिक समर्पण का सम्बन्ध माना है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में रामराज्य की व्यवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है—

सब उदार सब पर उपकारी।

बिप्र चरन सेवक नर नारी॥

*एकनारि ब्रत रत सब झारी।*

ते मन बच क्रम पति हितकारी॥

इसका भाव है कि रामराज्य में सभी नर-नारी उदार और परोपकारी हैं। पुरुष एक-पत्नी-व्रत का पालन करते हैं और स्त्रियाँ मन, वचन तथा कर्म से पति के हित में समर्पित रहती हैं। यहाँ दाम्पत्य जीवन में संयम, निष्ठा और कर्तव्य को सामाजिक व्यवस्था का आधार माना गया है। जब कि  कुछ अन्य पंथों में ऐसा नहीं हैं l 

रामराज्य केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन और समाज की एक आदर्श व्यवस्था है। इसलिए रामराज्य पर गम्भीर चिन्तन, मनन, विचार, अध्ययन और स्वाध्याय की आवश्यकता है। इन सबमें यदि भावनाओं और जीवन-मूल्यों का समावेश नहीं होगा, तो हमारा अध्ययन केवल बौद्धिक अभ्यास बनकर रह जाएगा और हम अनेक प्रकार के भ्रमों में पड़ सकते हैं।

मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे विकार कुछ-न-कुछ मात्रा में रहते हैं। इनका होना ही मनुष्य को पतित नहीं बनाता; समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इनमें से कोई एक विकार हमारे मन और व्यवहार पर प्रमुख रूप से अधिकार कर लेता है। तब व्यक्ति का विवेक कमजोर पड़ने लगता है और उसका जीवन संतुलन खो देता है।

मनुष्य होने का वास्तविक अर्थ ही यह है कि हम अपने भीतर उठने वाली प्रवृत्तियों के बीच संतुलन, संयम और विवेक बनाए रखें। भगवान श्रीराम के जीवन में यही अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे शक्ति रखते हुए भी संयमित हैं, अधिकार रखते हुए भी मर्यादित हैं, संकटों के बीच भी धैर्यवान हैं और विजय प्राप्त करने के बाद भी अहंकाररहित हैं।

इसी मर्यादा, संयम, निष्ठा, कर्तव्य और संतुलन ने हमारे जीवन-मूल्यों को सुरक्षित रखा है। इन्हीं जीवन-मूल्यों ने हमारी सनातन जीवन-दृष्टि को युगों की अनेक चुनौतियों के बीच जीवन्त बनाए रखा है।

आज आवश्यकता है कि हम रामराज्य को केवल एक आदर्श शासन-व्यवस्था के रूप में न देखें, बल्कि उसे अपने व्यक्तिगत जीवन, परिवार, समाज और राष्ट्र के आचरण का मार्गदर्शक बनाएँ। अपने भीतर के रावणत्व को पहचानें, उसे सीमित करें और अपने भीतर के रामत्व—विवेक, मर्यादा, संयम, करुणा, कर्तव्य और संतुलन—को निरन्तर विकसित करें। यही इन वेलाओं का उद्देश्य है कि हम अपना चैतन्य जाग्रत करें l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया कृपा शंकर जी का नाम क्यों लिया,श्री ओमेन्द्र रत्नु की चर्चा  क्यों हुई, हल्दी घाटी, जौहर का उल्लेख क्यों हुआ, घरवापसी क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l