जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥1॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८६४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४६
आगामी अधिवेशन के लिए सज्ज हो जाएं
ये सदाचार वेलाएं अद्भुत हैं इन वेलाओं के श्रवण से हमें शान्ति प्राप्त होती है यह हमारे इष्ट हनुमान जी, जो इस कलिकाल में भी हर स्थान पर छाए हुए हैं,जो आज भी श्रीराम के कार्य और धर्म की रक्षा के लिए उपस्थित हैं,की कृपा है l जब हमारे साथ पवनपुत्र हनुमान जी का आश्रय है, तब हमें भय कैसा?
आगामी अधिवेशन की तैयारी अभी से प्रारम्भ कर दें। ये अधिवेशन हम नहीं कर रहे हैं हमसे करवाया जा रहा है हम तो मात्र पात्र हैं जब हम यह विचार करेंगे तो व्याकुल,निराश और हताश नहीं होंगे । हमारे सामने जो समस्याएँ दिखाई दे रही हैं, वे हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाली हैं। हम मिलकर उनका समाधान खोजेंगे।
जब हम सभी वहाँ एकत्र होंगे, तो अपने-अपने प्रश्नों और जिज्ञासाओं को लेकर आएँगे और सामूहिक चिन्तन एवं मार्गदर्शन से अपने अनेक प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करेंगे। साथ बैठना, विचारों का आदान-प्रदान करना और एक-दूसरे से प्रेरणा लेना—यह सामूहिक आनन्द वास्तव में अवर्णनीय होगा।
और सबसे महत्त्वपूर्ण बात—जब हम अधिवेशन से वापस लौटेंगे, तो केवल स्मृतियाँ लेकर नहीं लौटेंगे, बल्कि एक सुस्पष्ट लक्ष्य, नई ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और अपने कर्तव्य की स्पष्ट दिशा लेकर लौटेंगे।
अतः अभी से स्वयं को तैयार करें—मन से भी, विचार से भी और कर्म से भी आगामी अधिवेशन हमारे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आगे की यात्रा के लिए दिशा-निर्धारण का अवसर है।
ऐसा ही सुस्पष्ट लक्ष्य भगवान राम के सामने था जो पूर्ण हो चुका है और वो राजा के रूप में विद्यमान हैं राम- राज्य चल रहा है
बाज़ार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।
जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।
सब सुखी सब सच्चरि सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥
अयोध्या के बाजार इतने सुंदर और समृद्ध हैं कि उनका वर्णन करते नहीं बनता। वहाँ आवश्यक वस्तुएँ सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति भगवान श्रीराम राजा के रूप में विराजमान हों, वहाँ की संपत्ति और समृद्धि का भला किस प्रकार वर्णन किया जा सकता है?
वहाँ बजाज अर्थात् वस्त्रों का व्यापार करने वाले, सराफ अर्थात् धन-आभूषण आदि का व्यवसाय करने वाले तथा अनेक प्रकार के वणिक (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो वे अनेक कुबेर हों।
रामराज्य में अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल धन का संचय नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का सुख और सदाचार था। बालक से लेकर वृद्ध तक और स्त्री से लेकर पुरुष तक—प्रत्येक व्यक्ति उस व्यवस्था में अपने जीवन को सुरक्षित, सुखी और सार्थक अनुभव करता था।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों की चर्चा क्यों हुई, भैया अरविन्द जी का उल्लेख क्यों हुआ, उन्नाव के बाजार का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l