आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।
जैसे सम्पूर्ण नदियों का जल चारों ओर से जल द्वारा परिपूर्ण समुद्र में आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादा में अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्ति को प्राप्त होता है, भोगों की कामना वाला नहीं।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८६६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४८
हम केवल युगभारती सदस्य न रहें अपितु सजग, सक्रिय और भावनात्मक रूप से जुड़े हुए सहयात्री बनें। हमारा सहयोग ही संगठन की शक्ति है और संगठन की शक्ति ही हमारे सामूहिक संकल्प की शक्ति है।
प्रातःकाल कुछ क्षणों के लिए यदि मन समस्त विकल्पों और द्वन्द्वों से ऊपर उठकर इस भाव में स्थित हो जाए—
“अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो, विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥”
तो समझना चाहिए कि यह केवल हमारा प्रयास नहीं, हनुमान जी की कृपा का स्पर्श है।
परमात्मा श्रीराम ने कलियुग में हमारे बीच हनुमान जी को इसलिए छोड़ रखा है कि वे हमारी दुर्बलताओं में बल दें, संकटों में धैर्य दें, भ्रम में विवेक दें और जीवन की कठिनाइयों में हमारा मार्ग प्रशस्त करें। हनुमान जी यह कार्य करते भी हैं l
अतः प्रातःकाल के इन कुछ क्षणों को साधारण न समझें। यदि मन क्षणभर के लिए भी अहंकार, चिन्ता और द्वन्द्व से मुक्त होकर अपने चिदानन्द स्वरूप की ओर लौटता है, तो उसे पवनपुत्र हनुमान जी का करुणामय संकेत मानकर कृतज्ञ होना चाहिए। हनुमान जी हमें प्रभुराम की ओर उन्मुख कर देते हैं जिनका राज्य अत्यन्त प्रेरक है l
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥29॥
अयोध्या की वास्तविक संपदा स्वयं श्रीराम हैं। उनके रहते अयोध्या केवल एक नगरी नहीं रहती, बल्कि धर्म, मर्यादा, सुख, शान्ति और लोकमंगल की आदर्श भूमि—रामराज्य बन जाती है।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, संसार अतृप्त कैसे रहता है,व्याकुल नदियां कहां विलीन होना चाहती हैं, संसार में विकार क्यों आवश्यक हैं, कैरव क्या है जानने के लिए सुनें l