6.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९४ वां* सार -संक्षेप

 एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥106 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९४ वां* सार -संक्षेप

श्रीरामचरितमानस एक अद्भुत काव्यग्रंथ भी है। इसकी महिमा जितनी कही जाए, उतनी ही कम है। इसे पढ़कर और सुनाकर असंख्य लोगों ने यश प्राप्त किया है आजीविका अर्जित की है; आज भी अनेक लोग इसके माध्यम से यश और धन दोनों प्राप्त कर रहे हैं श्रीरामचरितमानस एक ऐसा जीवनोपयोगी ग्रंथ है, जिससे हमें लोकव्यवहार की शिक्षा, कर्तव्य-बोध, मर्यादा, नीति, विवेक और जीवन जीने की कला प्राप्त होती है। इसके प्रत्येक प्रसंग में मनुष्य के जीवन को दिशा देने वाला कोई न कोई संदेश निहित है,इसका व्यावहारिक परामर्श अद्वितीय है l

श्रीरामचरितमानस का श्रवण, मनन और अनुशीलन अमंगल का नाश करने वाला तथा मंगल का संवर्धन करने वाला है। इसकी कथा और श्रीराम के चरित्र का चिंतन करते ही मन को तत्काल आनन्द प्राप्त होता है। यह आनन्द केवल क्षणिक मनोरंजन का नहीं, बल्कि अन्तःकरण को शान्ति, आश्वस्ति और प्रसन्नता प्रदान करने वाला है।


कागभुशुण्डी जी कहते हैं

हे पक्षीराज! सुनिए, अब मैं अपने प्रथम जन्म के चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभु के चरणों में प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं॥


पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।

नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥96 ख॥

किन्तु यह भी एक सिद्धान्त है कि अनेक विकारों के मध्य  सद्विचारों का भी अस्तित्व रहता है l

तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में शैव और वैष्णव परम्पराओं का अद्भुत समन्वय किया। उन्होंने भगवान शिव को भगवान राम का अनन्य भक्त और भगवान राम को भगवान शिव का परम आराध्य दिखाकर दोनों सम्प्रदायों के बीच सेतु बनाया।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मम्मट का नाम क्यों लिया, अहंकारी भक्त कौन है जानने के लिए सुनें l