19.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९७

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९७


सांसारिक अहंकार से बचना और तात्त्विक अहंकार की अनुभूति करना — यही आध्यात्मिक जीवन का सार है।

सांसारिक अहंकार कहता है— "मैं शरीर हूँ, मैं धनवान हूँ, मैं विद्वान हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।" यही अहंकार बन्धन, राग-द्वेष और दुःख का कारण बनता है।

तात्त्विक अहंकार के अनुसार — " मैं शुद्ध, बुद्ध, नित्य आत्मा हूँ; परमात्मा का अंश हूँ।" यह आत्मस्वरूप का बोध है। इससे विनय, समता, करुणा और परमात्मा के प्रति समर्पण उत्पन्न होता है।




भगवान श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं, अपितु स्वयं परम तत्त्व हैं। वे इस जगत से परे होते हुए भी अपनी इच्छा से इसी संसार में अवतरित हुए। जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि हुई, तब उन्होंने मानव रूप धारण कर इस सृष्टि के सत्त्व में स्वयं को प्रकट किया। उनका अवतार असुरों के संहार, सज्जनों की रक्षा, धर्म की पुनः स्थापना तथा मानव जीवन के लिए आदर्श मर्यादा स्थापित करने के लिए हुआ l उन्होंने भारत के जन जन में रामत्व प्रसारित कर दिया l हमें उसी रामत्व की अनुभूति करनी चाहिए l इसी की  अनुभूति कराने का प्रयास विषम काल में तुलसीदास जी ने अद्भुत श्रीरामचरितमानस  काव्य रचकर किया जिसमें कथा, ज्ञान, उपदेश है , विषम परिस्थितियों से निकलने का उपाय बताया गया है l

एक अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है 


काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।

सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥

यह श्लोक आचार्य मम्मट कृत काव्यप्रकाश (प्रथम उल्लास) का प्रसिद्ध श्लोक है, जिसमें काव्य के प्रयोजनों यश की प्राप्ति,धन की प्राप्ति,लोकव्यवहार का ज्ञान,अशुभ का निवारण,तत्काल आनन्द की प्राप्ति और मधुर रीति से उपदेश देना,का वर्णन किया गया है। काव्य का अर्थ भी अत्यन्त गम्भीर होता है l

आजकल हम लोग मानस की कथा में प्रविष्ट हैं


भरतजी की  बात सुनकर एक बार तो भक्त हनुमान जी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा? किन्तु इसके पश्चात्  प्रभु श्री राम जी के प्रभाव का विचार करके वे भरतजी के चरणों की वंदना करने लगे 

भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।

मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥60 ख॥


जिस भरतजी की शक्ति पर एक क्षण के लिए हनुमान जी को संदेह हुआ था, उसी भरतजी के सामर्थ्य और भक्ति का अनुभव होते ही उनका हृदय श्रद्धा से भर गया। वे समझ गए कि सच्चा बल शरीर का नहीं, भगवान के चरणों में अनन्य प्रेम का होता है।

और वहाँ लक्ष्मणजी को देखकर श्री रामजी साधारण मनुष्यों के समान अत्यन्त व्याकुल हैं भगवान राम कहते हैं 

पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार- ये जगत में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, गीतावली का उल्लेख क्यों हुआ, हमने समस्याओं के निरसन हेतु जन्म लिया है या उन्हें भोगने के लिए, जानने के लिए सुनें l