प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८१६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९८
जो मनुष्य संसार में लिप्त होकर केवल सांसारिक भोगों की प्राप्ति के लिए आजीवन योजनाएँ और प्रबन्ध करता रहता है, उसे क्षणभर भी वास्तविक शान्ति प्राप्त नहीं होती। जितनी अधिक उसकी आसक्ति बढ़ती है, उतना ही उसका मन विक्षिप्त, चंचल और अशान्त होता जाता है।
इसलिए आवश्यक है कि हम अपना जीवन शौर्य से विभूषित आध्यात्मिक चिन्तन की ओर मोड़ें। कर्म अवश्य करें, किन्तु उसके फल की आकांक्षा में स्वयं को न बाँधें।
जब भगवान् श्रीराम अपनी अवतार-लीला पूर्ण कर वैकुण्ठधाम को पधारने लगे, तब उन्होंने धर्म की रक्षा,हम सत्पुरुषों के पालन तथा दुष्टों के दमन का दायित्व अपने परमप्रिय भक्त श्रीहनुमान जी को सौंप दिया। श्रीहनुमान जी ने भी प्रभु के आदेश को अपने जीवन का परम धर्म मानकर स्वीकार किया।
तभी से वे इस पृथ्वी पर चिरंजीवी रूप में विराजमान हैं। जहाँ कहीं भी श्रीराम के नाम का स्मरण होता है, धर्म संकट में पड़ता है अथवा कोई भक्त निष्कपट भाव से उन्हें पुकारता है, वहाँ पवनपुत्र हनुमान उसकी रक्षा के लिए उपस्थित हो जाते हैं।
हम सब अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि आज भी श्री हनुमान जी जैसे जाग्रत देव हमारे रक्षक, मार्गदर्शक और संकटमोचक बने हुए हैं।
शिक्षित होना और अक्षरज्ञानी होना—दोनों में गहरा अन्तर है।
अक्षरज्ञान केवल पढ़ना-लिखना सिखाता है, जबकि वास्तविक शिक्षा मनुष्य के भीतर विवेक, चरित्र, आत्मबोध और धर्मनिष्ठा का जागरण करती है।
वह शिक्षा ही सार्थक है जो हमें अध्यात्म की अनुभूति कराए, सत्य के मार्ग पर चलना सिखाए और अन्याय के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े होने का शौर्य भी प्रदान करे। भगवान् राम ने जहाँ धर्म की रक्षा आवश्यक हुई, वहाँ निर्भय होकर शस्त्र उठाए l
आइये प्रवेश कर जाएं कथा में
संजीवनी बूटी के प्रभाव से जब लक्ष्मण जी पुनः सचेत हुए, तब सम्पूर्ण वानर-सेना में हर्ष की लहर दौड़ गई। श्रीराम ने हनुमान जी को हृदय से लगाकर उनके अद्वितीय पराक्रम, भक्ति और सेवा की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की। इसके पश्चात् युद्ध पुनः आरम्भ हुआ।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया अनुराग तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l