प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष अष्टमी (आज मासिक दुर्गाष्टमी और पार्वती जयंती का विशेष संयोग ) विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८१७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९९
अपने भीतर रामत्व पल्लवित करने का प्रयास प्रारम्भ कर दें और रावणत्व के निरसन का मार्ग खोज लें l
रामत्व और रावणत्व का संघर्ष केवल एक युग की कथा नहीं है l देवासुर संघर्ष आज भी निरन्तर चल रहा है। यह संघर्ष हमारे अपने शरीर में, मन में, परिवार में, समाज में, राष्ट्र में और सम्पूर्ण विश्व में उपस्थित है। रामत्व सत्य, धर्म, मर्यादा, करुणा, शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है, जबकि रावणत्व अहंकार, अन्याय, स्वार्थ और अधर्म का स्वरूप है।
हमारा कर्तव्य है कि हम समय की परिस्थितियों की भयानकता को पहचान लें, कालनेमियों के छल कपट को जान लें और धर्म की रक्षा के लिए उचित प्रहार करना सीख लें । केवल समस्याओं पर शोक करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके मूल कारणों को समझकर उन पर विवेक,तप, त्याग, समर्पण, शौर्य, पराक्रम और संगठन के साथ प्रहार करना ही रामत्व का मार्ग है। अकबर के शासन की विषम परिस्थितियों में वीरत्व की उपासना में सदैव रत रहने वाले गोस्वामी मार्गदर्शक राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी तुलसीदास जी ने यही संदेश श्रीरामचरितमानस की कथा के माध्यम से देने का प्रयास किया है l यह कथा हमारे आध्यात्मिक जीवन के साथ भौतिक जीवन में भी कल्याणकारी है l इस कथा का मर्म अत्यन्त गहन है l
कुम्भकर्ण युद्धक्षेत्र में प्रवेश कर चुका है उसका भयानक स्वरूप हर क्षण प्रकट हो रहा है
पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥
चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥5॥
इसके बाद कुम्भकर्ण ने नल और नील को भी भूमि पर पटक दिया। वह वीर वानरों को पकड़-पकड़कर चारों ओर पटकने लगा। उसके इस प्रचण्ड पराक्रम से वानर-सेना भागने लगी। सब अत्यन्त भयभीत और आतंकित हो गए; किसी में भी रुककर सेना को संगठित करने का साहस नहीं रहा।
जब रावणत्व की शक्तियाँ प्रबल होती हैं, तब अच्छे और पराक्रमी लोग भी कुछ समय के लिए विचलित हो सकते हैं।परिस्थितियाँ इतनी भयावह हो जाती हैं कि संगठन टूटने लगता है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी रक्षा में लग जाता है।ऐसे समय में केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं होता; धैर्य, नेतृत्व, संगठन और भगवान् पर अटूट विश्वास ही विजय का मार्ग प्रशस्त करते हैं यही कारण है कि आगे श्रीराम और उनके महान् सेनानायकों के नेतृत्व में वही बिखरी हुई सेना पुनः संगठित होकर अधर्म पर विजय प्राप्त करती है।
सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।
मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥67॥
कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥
प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टंकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥1॥
श्रीराम ने हाथ में अपना दिव्य धनुष धारण किया, कमर में बाणों का तरकस बाँधा और शत्रु-सेना का विनाश करने के लिए आगे बढ़े। युद्ध आरम्भ करने से पहले उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर ऐसा प्रचण्ड टंकार किया कि उसकी गर्जना सुनकर शत्रु-सेना मानो स्तब्ध और बधिर-सी हो गई।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,भावार्थ रामायण और अध्यात्म रामायण का उल्लेख क्यों हुआ, परस्पर के शुद्धीकरण के लिए आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें l