23.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०१

 ताहि कि संपति सगुन सुभ, सपनेहुँ मन बिश्राम।भूतद्रोह रत मोहबस, राम बिमुख रति काम॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०१


जब-जब सत्य संकट में पड़ता है, तब-तब त्याग, शौर्य, पराक्रम और संकल्प से युक्त महापुरुष उठ खड़े होते हैं और इतिहास की दिशा परिवर्तित कर देते हैं। हम भी इसी प्रकार बनने का प्रयास करें l


जब महाराणा प्रताप और उनके छोटे भाई शक्ति सिंह के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों स्वातियां खींचकर आमने-सामने आ गए, तब उनके कुलपुरोहित पंडित नारायणदास ने यह देखकर कि यदि दोनों भाइयों में से किसी एक की मृत्यु हुई तो मेवाड़ की अपूरणीय क्षति होगी, उन्हें रोकने का भरसक प्रयास किया।

जब दोनों नहीं माने, तब पुरोहित ने कहा कि राजपूतों का रक्त आपस में नहीं, राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए बहना चाहिए। अंततः दोनों को रोकने के लिए उन्होंने स्वयं अपनी कटार अपने वक्ष में भोंक ली और प्राण त्याग दिए। उनके इस आत्मबलिदान से दोनों भाइयों का क्रोध शांत हुआ और युद्ध टल गया।

यह प्रसंग इस तथ्य का उत्कृष्ट उदाहरण है कि भारतीय परंपरा में "पुरोहित" केवल कर्मकाण्ड कराने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि धर्म, नीति, समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शक था। इसी भावना को वेद का यह मंत्र व्यक्त करता है

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। हम राष्ट्र में जागृति उत्पन्न करने वाले, मार्गदर्शक और धर्मरक्षक बनें l

हमारा भी यही लक्ष्य है  ऋषितुल्य पण्डित दीनदयाल जी की स्मृति में स्थापित विद्यालय में हम अध्ययन कर चुके हैं और यह हमारे लिए गौरव का विषय है किन्तु हमारा एक उत्तरदायित्व भी है। उस पावन विद्यालय से प्राप्त संस्कारों का ऋण हमें केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने चरित्र,व्यवहार,समाजोन्मुखता और राष्ट्रनिष्ठ जीवन से चुकाना ही चाहिए l परिस्थितियां इस समय भी अत्यन्त विषम हैं देव और असुर का संघर्ष आज भी चल रहा है l


भावों का ज्वालामुखी मचलता जब उर में

 हर शब्द दहकता अंगारा बन जाता है

 सुधियों में उतरा करता है इतिहास अमर

संकल्प अकल्पित मानस में ठन जाता है । 


उपहास सत्य का जब दर-दर होने लगता

 गूँजता गगन में वृत्रासुर का अट्टहास

देवता दीन-दुर्बल हो पन्थ भटकते हैं


तब युग-दधीचि आकर अड़ जाते अनायास

यह देवासुर संग्राम सत्य है 'सत्ता' का 

चिन्तन कहता है इस पर विवश विधाता है


इसके अतिरिक्त सरौंहा निवासी भैया प्रभाकर जी उपाख्य रौनक जी, भैया प्रतीक मालवीय जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें