24.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी / एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०२

 ओ वीर वंशधर फिर अपना इतिहास पढ़ो।

अभिमंत्रित कर लो अपनी कुलिश-कृपाणों को।

आतंकी पारावार ज्वार पर इतराता,

संधान करो तरकश के पावक वाणों को।

आ गया समय फिर से अंगार उगलने का,

अरिदल से कह दो आओ काल बुलाता है।।६।।

*आओ काल बुलाता है*

पृष्ठ ६०, ६१, ६२

गीत मैं लिखता नहीं हूं

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी / एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०२

जब राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है, तब व्यक्तिगत आग्रह, अहंकार, मतभेद और विवाद स्वतः ही गौण हो जाते हैं। ऐसे समय हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म राष्ट्र, धर्म तथा संगठन की गरिमा को बढ़ाने वाला होना चाहिए।

आइए, हम स्वयं से एक प्रश्न करें—क्या हमारी चर्चा और हमारा व्यवहार राष्ट्र, धर्म तथा संगठन को सशक्त कर रहा है, या अनजाने में उनकी गरिमा को आहत कर रहा है ?

यदि आहत कर रहा है तो यही उचित समय है कि हम विवाद का नहीं, संवाद का मार्ग अपनाएँ, आग्रह का नहीं, समर्पण का परिचय दें  और व्यक्तिगत मतों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए आगे बढ़ें। यही हमारे वैदिक आदर्श *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः* की सच्ची साधना है।



*वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः*

यजुर्वेद का यह दिव्य मन्त्र केवल उच्चारण का विषय नहीं, अपितु हमारे जीवन का संकल्प है। यही हमारी शक्ति,भक्ति,तत्त्वचिन्तन, विचार, संयम और कर्तव्यबोध का आधार है। इसका भाव है कि हम राष्ट्र  के लिए सदैव जागरूक रहें, सनातनी राष्ट्रभक्त समाज को जाग्रत रखें तथा धर्म, संस्कृति और सदाचार के प्रकाश से राष्ट्र का पथ आलोकित करें। हम राष्ट्र का बोध प्रबल रखें और भ्रमित होने से बचें l कालनेमियों से सावधान रहें l प्रवाहपतित होने से बचें l राष्ट्रविरोधी शक्तियों के विरुद्ध दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हों l  अपने आत्मतत्व को हम जाग्रत करें l

ध्यान रखें 

"प्रचण्ड तेजोमय शारीरिक बल, प्रबल आत्मविश्वास युक्त बौद्धिक क्षमता एवं निस्सीम भाव सम्पन्ना मनः शक्ति का अर्जन कर अपने जीवन को निःस्पृह भाव से भारत माता के चरणों में अर्पित करना ही हमारा परम साध्य है l" 



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया ओम प्रकाश जी भैया,मोहन जी, प्रो रघुवंश जी जो जन्मजात विकलांग थे पर क्या आरोप लगा था, मुक्तियज्ञ और संघर्षगाथा की चर्चा क्यों हुई, प्रभाकर माचवे, निराला और अज्ञेय के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा, नरोस क्या है जानने के लिए सुनें