15.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी /पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  चतुर्थी /पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७३ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५५

हम अहं ब्रह्मास्मि की अनुभूति करें, प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें l


संगठन एक ऐसा जीवन्त उपक्रम है, जिसमें यदि परिवार जैसी आत्मीयता और प्रेम का भाव समाहित हो जाए, तो वह स्वर्ग और अपवर्ग से भी श्रेष्ठ अनुभूति देने वाला बन जाता है। वहाँ व्यक्ति स्वयं को अलग नहीं, बल्कि समष्टि का अभिन्न अंग अनुभव करता है।

किन्तु जब संगठन में व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार अथवा व्यक्तिगत प्रदर्शन प्रमुख हो जाता है, तब अपनत्व की अनुभूति समाप्त होने लगती है। ऐसा संगठन देखने में कितना ही बड़ा क्यों न हो, भीतर से वह उस मेले से भी तुच्छ हो जाता है, जहाँ भीड़ तो बहुत होती है, पर आत्मीयता नहीं होती।

अतः संगठन की वास्तविक शक्ति उसकी संख्या या प्रदर्शन में नहीं, बल्कि परस्पर प्रेम, आत्मीयता, विश्वास और समर्पण में निहित होती है। रामकथा में  संगठन की इसी महत्ता को व्यक्त किया गया है l


गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥

राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥1॥



हमारे सनातनधर्मी देशवासियों के जीवन में प्रेम और आत्मीयता के इस भाव का क्षीण होना कदाचित् हमारी विकृत शिक्षा-पद्धति का ही परिणाम है। इसी शिक्षा के कारण उन्हें  पराभव का इतिहास पढ़ाया गया जब कि अपने देश का इतिहास पावनतम रहा है l शिक्षा यदि केवल आजीविका अर्जित करने और व्यक्तिगत उन्नति का साधन बन जाए, तो वह व्यक्ति को अपने स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की परिधि में सीमित कर देती है।

भारतीय दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान या कौशल प्रदान करना नहीं, बल्कि मनुष्य में आत्मीयता, संवेदना, कर्तव्यबोध और समष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का संस्कार करना है। 

इसलिए यदि हमें सशक्त और आत्मीय समाज का निर्माण करना है, तो शिक्षा को पुनः संस्कार, चरित्र और आत्मीयता से जोड़ना होगा।


भावना का गारा क्या है, भैया वीरेन्द्र जी,भैया मोहन जी, भैया प्रदीप वाजपेयी जी,भैया मनीष कृष्णा जी, भैया आशुतोष द्विवेदी जी , भैया डा प्रवीण सारस्वत जी का उल्लेख क्यों हुआ, किस संगठन मन्त्र के जापक का आचार्य जी ने नाम लिया जानने के लिए सुनें l