16.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५६

 भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥

बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७४ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५६

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ये सदाचार संप्रेषण देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा देने हेतु भी रहते हैं । मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। अतः मनुष्य के रूप में जन्म पाना केवल जीवन प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाने का अवसर है।

हमारे जीवन की प्रत्येक श्वास कर्मशीलता की प्रेरणा बने। हमारा जीवन उत्साह, उमंग, कल्पनाशीलता और सृजनशीलता की गाथा बने। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हम निराशा में न हों , बल्कि अपने सामर्थ्य को पहचानकर राष्ट्र और समाज के लिए सतत कुछ करने का प्रयत्न करते रहें।

वास्तव में मनुष्य-जीवन आजीवन कर्मशीलता का शपथ-पत्र है—अपने लिए भी, समाज के लिए भी और राष्ट्र के लिए भी। जीवन का प्रत्येक क्षण हमें यह स्मरण कराए कि हम केवल परिस्थितियों के दर्शक नहीं, बल्कि उन्हें सकारात्मक दिशा देने वाले कर्मयोगी हैं।

आइए, मनुष्यत्व को अनुभव करें, अपनी अन्तर्निहित शक्ति को जाग्रत करें और उत्साह-उमंग के साथ निरन्तर कर्म करते हुए अपने जीवन को राष्ट्रहित और समाजहित के लिए समर्पित करें l जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने राष्ट्र और समाज के लिए समर्पण दिखाते हुए मानस की रचना कर डाली जिसके उत्तरकांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं


राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥

जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥1॥


श्री राम जी के चरित्र का श्रवण कर जो तृप्त हो जाते हैं , वे तो उसके विशेष रस को जान ही नहीं पाए । जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान के गुण निरंतर सुनते रहते हैं l 


इसके अतिरिक्त भैया शुभेन्दु जी, भैया डा अमित गुप्त जी, भैया प्रदीप श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ, हनुमान अंश की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l