17.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष षष्ठी / सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५७

 नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होई धर्म ब्रतधारी॥

धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥1॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  षष्ठी / सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५७

हम अपने प्रयास करें उसमें सफलता असफलता का आकलन न करें प्रयास मनुष्य करता है और उसको सफलीभूत परमात्मा करता है l चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करें l



संसार का यह शाश्वत सत्य है कि जो चाहिए, उसके लिए पुरुषार्थ करें और जो प्राप्त है, उस पर विश्वास रखें। प्रयास भविष्य को सँवारने का साधन है और विश्वास वर्तमान को स्वीकार करने की शक्ति देता है। संसार का जीवन इसी संतुलन पर चलता है।

यही अध्यात्म का चिन्तन भी हमें सिखाता है—कर्म में पुरुषार्थ और परिणाम में विश्वास। जो हमारे हाथ में है, उसके लिए पूरी निष्ठा से प्रयत्न करना और जो हमारे वश में नहीं है, उसे ईश्वर के विधान पर छोड़ देना ही जीवन की सहजता है।

किन्तु अध्यात्म का अर्थ संसार से विमुख हो जाना नहीं है। अध्यात्म के साथ संसार के साथ चलना भी आवश्यक है। जीवन की वास्तविक साधना यही है कि भीतर से हम सत्य, संयम, संतोष और विश्वास से जुड़े रहें तथा बाहर से समय, परिस्थिति और देश,समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप कर्मशील बने रहें। भारत की सात्विक मनीषा इसी का अनुमोदन करती है l श्रीरामचरितमानस इसी समन्वित जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सजीव और प्रेरणादायी स्वरूप हमारे सामने रखता है।


गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥

राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥1॥

 हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल पवित्र कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी की वैसी पूरी वर्णित कर डाली। श्री राम जी के चरित्र अनन्त हैं। वेद और मां सरस्वती भी उनका वर्णन भी नहीं कर सकते॥1॥

अबोध बालक, पागल और  सात्विक भक्त में क्या कोई अन्तर है? कलियुग का वेद कौन सा है? श्रद्धा और भक्ति कैसे जाग्रत करें? जानने के लिए सुनें l