पदचिह्न बनाते राह,
रास्ते अपने आप नहीं बनते।
राहें संसार सजाती हैं,
मोहक वितान जिनपर तनते ॥
राहें ही नहीं अगर होंगी ,
भटकेंगे कहाँ किधर व्याकुल।
हर बियाबान भरमाएगा,
दहलाएगा ढीला दलदल ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष सप्तमी /अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८७६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५८
हम सद्चिन्तन कर संगठन सूत्र तैयार करें, कुंठा निराशा भय भ्रम व्यामोह का त्याग करें, भारत में वैदिक लोकतन्त्र स्थापित हो इस दिशा में अपने प्रयास करते रहें l
अद्भुत है यह भारतभूमि, जहाँ युग-युग में अनेक तत्त्वज्ञ ऋषि-महर्षि, मनीषी, ज्ञानी, वीर और पराक्रमी पुरुष जन्मे, जिन्होंने अपने तप, ज्ञान, साधना और पुरुषार्थ से इस भूमि को आलोकित किया। किन्तु समय-समय पर अनेक दुष्प्रयास इस पवित्र भूमि के जीवन-मूल्यों को कालुष्य से भरने, उसकी मौलिक चेतना को दुर्बल करने और उसकी सनातन जीवन-दृष्टि से समाज को विमुख करने के होते रहे हैं। किंतु भारत की विशेषता ही यह है कि प्रत्येक संकट के बीच उसकी अन्तर्निहित चेतना जाग्रत होती रही है और किसी न किसी महापुरुष, मनीषी या लोकनायक के माध्यम से समाज को पुनः अपनी मूल दिशा का बोध होता रहा है।
आज की दिशाविहीन शिक्षा शक्ति, शौर्य और पराक्रम का बोध नहीं कराती, जबकि हमारी परम्परागत शिक्षा मनुष्य के भीतर ऐसी जीवनदृष्टि का निर्माण करती थी जिसमें ज्ञान के साथ शक्ति शौर्य , विनय के साथ स्वाभिमान और भक्ति के साथ कर्मशीलता का समन्वय होता था। वह केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने वाली साधना थी; उसमें विद्यार्थी अपने सामर्थ्य को पहचानता, उसे अनुशासन में ढालता और राष्ट्र तथा समाज के हित में लगाने का संकल्प ग्रहण करता था। भगवान राम हमारे लिए मर्यादा के साथ शौर्य के भी आदर्श हैं ।अध्यात्म भी व्यवहार के रूप में भगवान राम ने किस प्रकार दिखाया है वह अद्भुत है
जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने ओमेन्द्र रत्नु का नाम क्यों लिया, राणा लाखा, राणा कुम्भा का उल्लेख क्यों हुआ,प्रेम का प्रकाश किसे देना चाहिए,भारत के लोकतन्त्र को एक कविता में आचार्य जी ने किस प्रकार परिभाषित किया जानने के लिए सुनें l