23.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६३

 इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥

मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥ ( बाल कांड )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६३

इन सदाचार वेलाओं को सुनकर हमारे भीतर तप त्याग संयम सेवा परोपकार शौर्य पराक्रम का भाव अवतरित हो l 



वर्तमान शिक्षा, जिसका उद्देश्य केवल जीविका अर्जित करना ही है, से इतर हमारी शिक्षा केवल जीविका का साधन नहीं, जीवन के अन्तर्निहित सामर्थ्य को जाग्रत करने की साधना थी, जहाँ गुरु केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं, वह शिष्य को शक्ति,शौर्य, पराक्रम, संयम,तप,त्याग, परोपकार  जैसे भावों की अनुभूति कराता था, वह जीवन का निर्माता और संस्कारों का प्रदाता था,इस शिक्षा के आधार पर विद्या से विनय, विनय से विवेक, विवेक से शौर्य और शौर्य से लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त होता था; हमने प्रकृति को पढ़ा, आकाश को नापा, गणित को साधा, औषधि को जाना, शब्द और दर्शन में सत्य की खोज की और अध्यात्म में जीवन के परम तत्त्व का साक्षात्कार किया; हमारी शिक्षा ने ज्ञान और कर्म, विज्ञान और अध्यात्म, शौर्य और सेवा को एक सूत्र में पिरोकर हमें केवल विद्वान नहीं, सम्पूर्ण मनुष्य बनाया और इसी जीवन-दृष्टि के बल पर भारत विश्व के लिए ज्ञान, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का मार्गदर्शक बना; हमारे यहां ज्ञान केवल अपने उत्कर्ष के लिए नहीं, अपितु समष्टि के कल्याण के लिए था l

हमें ऐसी शिक्षा की पुनर्स्थापना करनी होगी जो जीविका का सामर्थ्य तो दे ही, साथ ही जीवन-दृष्टि, संस्कार, स्वावलम्बन, शौर्य, सेवा और लोकमंगल की चेतना भी जगाए। इसी पुनर्स्थापना के प्रयास के लिए हम अधिवेशन करने जा रहे हैं l 


विश्वास करो हम उसी विप्रकुल के  सुअंश, 

जिसने धरती को अंतरिक्ष का ज्ञान दिया। 

देवों से भी ऊँचा क्षितिगति युत् कर्म धर्म का मान दिया। 

हम सुधाविन्दु के दानी हैं अभिमानी हैं, 

हम देव दुर्लभा जग की "राम कहानी" हैं ॥

आज कल हम लोग इसी राम कहानी के उत्तर कांड में रमे हुए हैं

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥

देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥1॥


हे तात! सुनिए, मैं जिस कारण से आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गए। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह संदेह और अनेक प्रकार के भ्रम सब जाते रहे॥1॥



गरुड़ जी की विनम्र, सरल, सुंदर प्रेमयुक्त, सुप्रद और अत्यंत पवित्र वाणी सुनते ही भुशण्डिजी के मन में परम उत्साह हुआ और वे श्री रघुनाथजी के गुणों की कथा कहने लगे l


इसके अतिरिक्त भैया आशीष जोग जी, भैया अरुण चौधरी जी का उल्लेख क्यों हुआ,शिक्षा वेदों की नासिका किस कारण है जानने के लिए सुनें l