नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा॥
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥3॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्थी /पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८८८ वां* सार -संक्षेप
भारतीय चिन्तन अद्वितीय है। वह सम्पूर्ण मानवता को एक उदात्त जीवन-दृष्टि प्रदान करता है “कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्”, अर्थात् समस्त विश्व को आर्य बनाने का संकल्प। आर्य श्रेष्ठ आचरण, उदात्त विचार और संस्कारित जीवन का बोधक है। हम आर्य बाहर से नहीं आये l अपने विषय में हमें अनेक प्रकार के भय, भ्रम और मोह से मुक्त होकर सत्य को समझना होगा। अपनी सभ्यता और संस्कृति के सम्बन्ध में ऐसे अनेक मत प्रस्तुत किए गए हैं जिन पर गम्भीरता से विचार करना आवश्यक है। हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने इतिहास, परम्परा और सांस्कृतिक निरन्तरता को समझना चाहिए।
भारतीय अध्यात्म हमें इससे भी आगे ले जाता है। वह कहता है कि मनुष्य केवल शरीर और भौतिक सत्ता नहीं है; उसके भीतर परमात्मतत्त्व का प्रकाश विद्यमान है। इसलिए असंतोष,दीनता,भय, भ्रम और मोह से ऊपर उठना ही आत्मबोध की दिशा में पहला चरण है। हम स्वकर्म को अपना धर्म मानकर चलें l भगवान श्रीराम ने भी अपने जीवन में व्यक्तिगत सुख-सुविधा से ऊपर उठकर कर्तव्य और धर्म को प्रधानता दी।उन्हीं की कथा के उत्तर कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥ 72 क॥
आचार्य जी ने विषयानुराग को किस प्रकार स्पष्ट किया,राहुल सांकृत्यायन का उल्लेख क्यों किया, भैया डा अमित गुप्त का नाम क्यों लिया, विद्यालय के छात्रावास का हमारे अधिवेशन से क्या सम्बन्ध हो सकता है,
अरविन्द त्रिवेदी (1938–2021) जिन्होंने रामानन्द सागर के धारावाहिक ‘रामायण’ में लंकापति रावण की भूमिका निभाई थी, का उल्लेख आचार्य जी ने क्यों किया जानने के लिए सुनें