29.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८७ वां* सार -संक्षेप

 संगठन महत्त्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं; व्यक्ति संगठन की शक्ति का एक माध्यम मात्र है।

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८७ वां* सार -संक्षेप

अधिवेशन संपूर्ण सफलता सहित हो गया ,

और कर्म के सद्विचार का बीज बो  गया। 

एक लक्ष्य को लेकर हम सब घर लौटे हैं, 

खरा स्वर्ण हम सभी नहीं सिक्के खोटे हैं ॥

उठो जलाओ आत्मज्योति का मंगल दीपक, 

दमके नभमंडल-प्रकाश नभ से अवनी तक। 

अब न राग कुंठित मानस का दुहरायेंगे, 

एक साथ मिलकर कर्मानुराग गायेंगे ॥



हम, जो भारत माता के पुत्र हैं,राग, कुण्ठा, निराशा, निष्क्रियता को त्याग कर कर्म के प्रति अनुराग, उत्साह और समर्पण के साथ आगे चलें , अपने सनातन धर्म की परम्परा को आगे बढ़ाएं, निःस्वार्थ भाव से भारत मां की सेवा में रत हों । यही हाल में भारत मां के सेवकों को सज्ज करने वाले महायज्ञ के उपक्रम  नई दिल्ली में सम्पन्न हुए अन्तरराष्ट्रीय अधिवेशन की वास्तविक सफलता और हमारे संकल्प की सार्थकता है।

ऐसा धैर्यवान् कौन है, जिसके शरीर में मनोरथ का कीड़ा न लगा हो? पुत्र, धन और लोक-प्रतिष्ठा की प्रबल इच्छाएँ मनुष्य की बुद्धि को मलिन कर देती हैं। जब मन इन मनोरथों में आसक्त हो जाता है, तब विवेक क्षीण होने लगता है और धैर्य भी डगमगाने लगता है। अतः आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हमें अपनी इच्छाओं पर संयम रखते हुए विवेकपूर्वक जीवन जीना चाहिए l


आचार्य जी ने किन श्वेतवेशधारी संन्यासियों की चर्चा की, भैया अरिन्दम जी और भैया प्रकाश शर्मा जी का उल्लेख क्यों हुआ,सनातन संस्कृति के अनन्य उपासक श्रद्धेय अशोक सिंघल जी का श्री चन्द्र भानु गुप्त जी से क्या सम्बन्ध था, सद्गुरु की दृष्टि के किस चित्र को आचार्य जी ने आज उकेरा जानने के लिए सुनें l