11.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९९ वां* सार -संक्षेप

अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥
मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥3॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
  *१८९९ वां* सार -संक्षेप


भारतीय जीवन-दर्शन में ‘सत्’ का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है l उपासना का अर्थ है इसी सत् की ओर स्वयं को प्रवृत्त करने की साधना,अपने आपको जगत्-स्रष्टा, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की ओर उन्मुख करना। जब हम अपने मन, बुद्धि और अन्तःकरण को उस परम सत्ता की ओर प्रवृत्त करते हैं, तब धीरे-धीरे हमारे भीतर ईश्वर के गुणों का जागरण होने लगता है l जब हमारे भीतर ईश्वरीय गुणों का प्रकाश प्रकट होने लगता है, तब हमारा जीवन आनन्द, शान्ति, प्रेम, करुणा और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होने लगता है। इस प्रकार उपासना केवल पूजा-पद्धति नहीं, अपितु ईश्वर की ओर उन्मुख होकर अपने भीतर ईश्वरत्व को जाग्रत करने और उसकी अनुभूति प्राप्त करने की साधना है। यही अनुभूति हमें बाह्य परिस्थितियों से विचलित हुए बिना आनन्दमय जीवन जीने की प्रेरणा देती है। आज नवरात्र प्रारम्भ हो रहे हैं इसमें हम लोग जितना अधिक सरल, सहज, सात्विक बन सकें उतना बनने की चेष्टा करें जितना संगठित रहने का प्रयास कर सकें उतना करें l संगठन का सूत्र मनुष्य का स्वाभाविक गुण है उसका सात्विक स्वभाव है l वह असंगठित रह ही नहीं सकता l 

कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया, लोमश ऋषि के क्रोध से क्या घटना हुई,मां दुर्गा जो दुर्गति दुर्भाग्य  से बचाती हैं का भगवान श्रीकृष्ण से क्या संबन्ध है,उपवास का क्या महत्त्व है, भैया अजय कृष्ण जी, भैया अरविन्द जी,भैया उमेश्वर जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l