प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१९०० वां* सार -संक्षेप
हमारे अध्ययन के लिए विपुल साहित्य उपलब्ध है। यद्यपि आक्रान्ताओं और विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण हमारे साहित्य का बहुत बड़ा भाग नष्ट हो गया, तथापि आज भी हमारे पास प्रचुर मात्रा में ज्ञान का भण्डार है, जो जीवन को उचित दिशा देने और हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करने में समर्थ है।
भगवान ने हमें शक्ति, बुद्धि, विवेक और चैतन्य प्रदान किया है। इनका सदुपयोग करते हुए यदि हम अपने समय को चिन्तन-मनन, अध्ययन, स्वाध्याय और सत्संगति में लगाएंगे , तो हमारी अन्तःशक्ति जाग्रत होगी और जीवन के प्रति हमारी दृष्टि अधिक स्पष्ट होगी। ऐसा करने पर संकट तो आएंगे, किन्तु उनकी उपस्थिति में भी व्याकुलता हमें विचलित नहीं कर पाएगी l इसके अतिरिक्त देश और समाज के प्रति भी हमारा कर्तव्य है l हम जिस समाज में जन्म लेते हैं, जिस समाज में पलते-बढ़ते हैं और जिससे हमें संस्कार, शिक्षा, सुरक्षा, सहयोग तथा जीवन जीने की दृष्टि प्राप्त होती है, उस समाज के प्रति हमारा ऋण है। हमारा व्यक्तित्व केवल हमारे अपने पुरुषार्थ का परिणाम नहीं है; उसमें परिवार, गुरुजन, पूर्वजों और सम्पूर्ण समाज का योगदान समाहित है l समाज से जो कुछ प्राप्त हुआ है, उसे सेवा, सदाचार, संस्कार और लोकमंगल के माध्यम से समाज को लौटाना ही सामाजिक ऋण से उऋण होने का मार्ग है।भारतीय जीवन-दृष्टि हमें यही सिखाती है कि व्यक्ति और समाज परस्पर पूरक हैं। व्यक्ति का उत्कर्ष समाज के उत्कर्ष से जुड़ा है और समाज की उन्नति में ही व्यक्ति के जीवन की सार्थकता निहित है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी समाज की उन्नति के लिए ही श्रीरामचरितमानस की रचना की l इस कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया, बलरामपुर अस्पताल की चर्चा क्यों हुई, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l