प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१९०२ वां* सार -संक्षेप
ज्ञान की गरिमा जब भक्ति में समाहित हो जाती है, तब जीवन में एक अद्भुत आश्वस्ति का अनुभव होता है। ज्ञान हमें सत्य का बोध कराता है और भक्ति उस सत्य के प्रति विश्वास तथा समर्पण का भाव जगाती है। भक्त को यह दृढ़ विश्वास रहता है कि उसका इष्ट ही सब कुछ करने वाला है और वही उसके जीवन का वास्तविक आधार है। इस विश्वास के कारण वह परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, अपितु प्रत्येक परिस्थिति में अपने इष्ट की कृपा का अनुभव करते हुए निश्चिन्त भाव से अपना कर्तव्य करता रहता है। हम भी राष्ट्रहित और समाजहित के कार्य इसी प्रकार करें l
गरुड़ जी को अपने ज्ञान और सामर्थ्य का बोध था, किंतु भगवान् श्रीराम की मानवीय लीला देखकर उनके मन में संशय उत्पन्न हो गया था। काकभुशुण्डि जी ने उन्हें यह समझाया कि भगवान् की लीला को केवल तर्क और बुद्धि से नहीं समझा जा सकता; उसके लिए श्रद्धा और भक्ति भी आवश्यक हैं।
सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥3॥
(शिव जी कहते हैं-) हे भवानी! भुशुण्डि जी के वचन सुनकर गरुड़ जी हर्षित होकर कोमल वाणी से बोले-
हे प्रभु! आपकी कृपा से अब मेरे हृदय में संशय, शोक, मोह और भ्रम शेष नहीं रह गए हैं।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, स्वास्थ्य शिविर की चर्चा क्यों हुई आदि जानने के लिए सुनें l