13.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१९०१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१९०१ वां* सार -संक्षेप


निर्मल भाव से निकले विचार हमें अच्छे कामों और समाज के हित की ओर ले जाते हैं। किन्तु जब विचारों का उद्देश्य केवल भौतिक शक्ति पाना, अपना स्वार्थ सिद्ध करना या दूसरों पर प्रभुत्व जमाना हो जाता है, तब भाव की निर्मलता समाप्त होने लगती है। निर्मल भाव बनाए रखने के लिए हमें अपने विचारों और कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। नियमित स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन और आत्मनिरीक्षण से हम अपने भावों को शुद्ध रख सकते हैं। जब हम अपने ज्ञान और शक्ति का उपयोग केवल अपने लाभ के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित और समाज के कल्याण के लिए करते हैं, तब हमारे भावों में पवित्रता बनी रहती है। बुद्धि, विचार और कर्म जब भक्ति आधारित होते हैं तो मनुष्य सामान्य मनुष्य नहीं रहता वह दिव्यत्व को प्राप्त होता है l हमें इसी दिव्यत्व की अनुभूति करनी चाहिए l हम कौन हैं?  हम वही हैं l यह निश्चित रूप से हमें शक्ति प्रदान करेगा और इससे भक्ति जिसमें अद्भुत ऊर्जा होती है का भी प्रादुर्भाव भी होगा l


आचार्य माधवेन्द्र पुरी जी का उल्लेख क्यों हुआ, निवरता ही क्या नवरात्र है,"जहां भक्ति का आधार होता है वहां अवतारत्व फलीभूत होता है" इसे आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया,सृष्टि के नियन्त्रक के रूप में किस पर कटाक्ष हुआ,भैया विवेक भागवत जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l