4.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९२ वां* सार -संक्षेप

 मानव-जीवन का कर्म धर्म की शोभा है, 

कर्मानुराग ही उसकी पूर्ण प्रतिष्ठा है। 

ईश्वर ने कर्म हेतु ही मानव को सिरजा, 

मानव की कर्मोहेतु सहज ही निष्ठा  है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९२ वां* सार -संक्षेप



श्री रामचरित मानस एक अद्भुत ग्रंथ है यह पापों का नाश करने वाला, सदा कल्याणकारी,माया,भ्रम,मोह,भय  का नाश करने वाला है l जो मनुष्य श्रीराम के चरित्र, आदर्शों और उपदेशों में अपने मन को निमग्न करते हैं वे सांसारिक प्रपंचों में उलझने से बच जाते हैं l यह ग्रंथ ज्ञान वैराग्य और भक्ति के भाव को जाग्रत कर देता है l


निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई ll


काकभुशुण्डि जी केवल शास्त्र का उपदेश नहीं दे रहे हैं, बल्कि भक्ति में पूर्णतः रमकर अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर गरुड़ जी से कह रहे हैं।

—हे पक्षीराज गरुड़! अब मैं आपको अपने जीवन का अनुभूत सत्य बताता हूँ। संसार में मनुष्य अनेक प्रकार के उपाय करता है, किन्तु हरि-भजन के बिना अन्तःकरण के क्लेश,भय, मोह और अशान्ति का स्थायी निवारण नहीं हो सकता। भगवान श्रीराम की भक्ति ही मन को वास्तविक शान्ति प्रदान करती है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कोरोना काल का उल्लेख क्यों किया,

दक्षिणेश्वर मूर्ति की चर्चा क्यों हुई,हम रामत्व की अनुभूति कैसे कर सकते हैं और इससे किस प्रकार लाभान्वित हो सकते हैं जानने के लिए सुनें l