बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥89 क॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८९६ वां* सार -संक्षेप
“सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।
बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥”
हमारे जीवन में गुरु
( शान्तो दान्तः कुलीनश्च विनीतः शुद्धवेशवान्।
शुद्धाचारः सुप्रतिष्ठः शुचिर्दक्षः सुबुद्धिमान्॥
आश्रमी ध्याननिष्ठश्च मन्त्रतन्त्रविशारदः।
निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते॥ ) का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय सनातन परम्परा में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य, रामानन्दाचार्य, चैतन्य महाप्रभु, ज्ञानेश्वर, नामदेव, रैदास, कबीर, दादूदयाल, गुरु नानक, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, समर्थ रामदास, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि गुरुओं की एक दीर्घ परम्परा रही है। इन गुरुओं ने समय - समय अपने ज्ञान, साधना और लोकमंगलकारी विचारों से समाज का मार्गदर्शन किया तथा भारत को भ्रम, अज्ञान और सांस्कृतिक विस्मृति से बचाते हुए सनातन जीवन-दृष्टि को सुदृढ़ बनाए रखा।
गुरु हमारे जीवन में केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि पथप्रदर्शक और पथरक्षक होता है। वह हमें पथभ्रष्ट होने से बचाता है, उचित-अनुचित का विवेक कराता है और जीवन को उचित दिशा देता है।
किन्तु आज नई पीढ़ी को प्रभावित करने वाले अनेक विचार और प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं, जिनके कारण यह धारणा बनती जा रही है कि जीवन में गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है—स्वयं ही सब कुछ जाना और समझा जा सकता है। यह स्थिति चिन्तनीय है। नई पीढ़ी के लिए भी गुरु आवश्यक है क्योंकि
"गुरु" गौरव शक्ति प्रदाता है,
गुरु प्रेम भक्ति का दाता है।
गुरु आत्मबोध का ज्ञाता है,
गुर-शिष्य अखण्डित नाता है ॥
हमें ही अपने गुरुत्व को निःस्वार्थ भाव से जाग्रत करना होगा और शिष्यों को भय भ्रम कुंठा से बचाना होगा l
कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया? भगवान शिव कैसे महागुरु हैं ? शिव जी की लाट क्या है? जानने के लिए सुनें l