9.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९७ वां* सार -संक्षेप


हममें से कदाचित् ही कोई ऐसा हो, जिसके हृदय में भारतमाता के प्रति प्रेम का भाव न हो l इसकी जड़ें हमारी सनातनधर्मी परम्परा, हमारी संस्कृति और हमारे पारिवारिक संस्कारों में गहराई तक समाई हुई हैं l मातृभूमि के प्रति प्रेम का भाव भी हमारे संस्कारों से पुष्ट होता है।

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” 

 हमारी सनातन जीवनदृष्टि हमें व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक आत्मीयता का विस्तार करना सिखाती रही है। ऐसी थी हमारी शिक्षा l जिस शिक्षा से आत्मबल, आत्मविश्वास और कर्तव्यबोध जाग्रत हो, जो भोग की अपेक्षा त्याग तथा पलायन की अपेक्षा पुरुषार्थ सिखाए, वही शिक्षा जीवन को सार्थक बनाने वाली शिक्षा है। ऐसी शिक्षा का उद्देश्य, मनुष्य के व्यक्तित्व को इस प्रकार विकसित करना  कि वह जीवन के उतार-चढ़ावों में व्याकुल न हो, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोए और अपने कर्तव्यों से विमुख न हो, है l शिक्षक को ऐसा ही होना चाहिए जो इस प्रकार की शिक्षा दे जो केवल पाठ्यक्रम पर ही ध्यान न दे अपितु शिष्य के जीवन को उचित दिशा दे l ऐसा ही शिक्षक कह रहा है 

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।

साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥108 घ॥



( जब काकभुशुण्डि जी अपने पूर्वजन्म में शिवजी के मंदिर में शिवनाम का जप कर रहे थे, तब उनके मन में अहंकार आ गया और उन्होंने मंदिर में आए अपने गुरु का सम्मानपूर्वक अभिवादन नहीं किया। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने उन्हें शाप दे दिया।

किन्तु उनके गुरु ने अपने शिष्य के कल्याण की कामना करते हुए भगवान शिव से प्रार्थना की कि उस पर कृपा करें और शाप को शीघ्र ही उसके परम कल्याण का साधन बना दें। )


हे कृपानिधान! अब वही कीजिए, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरे के हित में रत ब्राह्मण की वाणी सुनकर पुनः आकाशवाणी हुई- 'एवमस्तु' l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, विद्यालय का कौन सा प्रसंग चर्चा में आया जानने के लिए सुनें l