सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दु:ख गन॥
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥1॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८६५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४७
भैया मनीष कृष्णा जी,बैच १९८८ की माताजी का हमारे बीच न रहने का समाचार अत्यन्त पीड़ादायक है। इस दुःखद घड़ी में हम सभी की गहरी संवेदनाएँ उनके एवं समस्त परिवार के साथ हैं।
माताजी का सरल, संयमित और संस्कारमय जीवन सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्होंने अपने आचरण से सिखाया कि व्यसनों से दूर रहकर सादगी और शुचिता का जीवन जीना चाहिए तथा किसी के धन का लालच कभी नहीं करना चाहिए। ऐसे जीवन-मूल्यों की उनकी सीख सदैव प्रेरणास्रोत रहेगी।
ईश्वर दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा सभी परिजनों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करें।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏
मनुष्य के जीवन का एक अद्भुत विधान परमात्मा ने बनाया है—दुःख बाँटने से दुःख कम होता है और सुख बाँटने से सुख बढ़ता है। जब किसी के दुःख में हम अधिक संख्या में सम्मिलित होते हैं, उसके साथ खड़े होते हैं, तो उसका दुःख हल्का हो जाता है। और जब हम किसी के सुख में सम्मिलित होते हैं, तो उसका सुख और अधिक वृद्धिंगत हो जाता है।
यही मनुष्य-जीवन का सामाजिक और आध्यात्मिक सत्य है। परमात्मा ने मनुष्य को अकेला नहीं बनाया। मनुष्य मनुष्य से जुड़ता है, जीवात्माएँ संगठित होती हैं, तो उनमें परमात्म-भाव प्रकट होता है। संगठन केवल संख्या का नाम नहीं, बल्कि हृदयों के मिलन, परस्पर सहयोग और एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी होने का नाम है।
ईश्वर ने हमें इस संसार में मनुष्य बनाकर कर्म करने के लिए भेजा है। प्रत्येक व्यक्ति के कर्म अलग हैं, परिस्थितियाँ अलग हैं और उसके कर्तव्य भी अलग-अलग हैं। इसलिए हमें अपने कर्तव्य-पथ से विमुख नहीं होना चाहिए। संसार में रहते हुए अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति निर्धारित धर्म और कर्म का निर्वाह अवश्य करें,जीवन में अनेक व्यथाएँ आएँगी, अनेक कठिनाइयाँ आएँगी। हमें उन सबको सहते हुए, अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए आगे बढ़ना है। जीवन की कथा तब पूर्ण होती है, जब हम अपनी सारी व्यथाओं को पीकर भी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित न हों।
भगवान श्रीकृष्ण का अमर संदेश हमें इसी ओर प्रेरित करता है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
रामकथा भी यही संदेश देती है उस कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया जानने के लिए सुनें