5.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९३ वां* सार -संक्षेप


संसार के प्रपंचों के कारण हम व्याकुल न रहें, इसका एक आधार है भक्ति। भक्ति अर्थात् विश्वास और विश्वास का गहनतम रूप है आत्मविश्वास।

जब हम अपने भीतर स्थित परमात्म-तत्त्व पर विश्वास करते हैं  उसकी शक्ति की अनुभूति करते हैं , तब हम बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होते हैं l प्रातःकाल इस प्रकार के विचारों से हमारे भीतर प्राणिक ऊर्जा भर जाती है l

संसार की गति और मति यदि समाज के हित में नहीं है, तो उसके प्रति उदासीन न रहें; उसके कारणों को समझकर, विवेकपूर्वक उसके निरसन का उपाय करें। हमारा चिन्तन केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित न हो, बल्कि उसमें समाज और राष्ट्र के हित का भाव भी समाहित हो।


भारत के शौर्य जगो निष्ठा जागो तप त्याग जगो

संपूर्ण समर्पण वाले हे अनुराग जगो



ओ जगो वेन कुलनाशी ऋषि के आक्रोश

वनवासी रघुकुल राम भरत के त्याग जगो....

भगवान राम का संसारी जीवन एक आदर्श प्रस्तुत करता है 

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥



रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥92 क॥


श्रीराम के गुण अनन्त हैं; संतों से जितना सुना और समझा, उतना ही विनम्रतापूर्वक दूसरों तक पहुँचाना ही साधक का सौभाग्य है l 

इसके अतिरिक्त कथा में आचार्य जी ने और क्या बताया,आचार्य जी ने डायरी लेखन प्रतिदिन करने पर क्यों बल दिया,अहंकार और पतन में क्या संबन्ध है, सिंगापुर में एक पहिए के वाहन का प्रसंग किस कारण उठा, संतुलन किसमें आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

4.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९२ वां* सार -संक्षेप

 मानव-जीवन का कर्म धर्म की शोभा है, 

कर्मानुराग ही उसकी पूर्ण प्रतिष्ठा है। 

ईश्वर ने कर्म हेतु ही मानव को सिरजा, 

मानव की कर्मोहेतु सहज ही निष्ठा  है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९२ वां* सार -संक्षेप



श्री रामचरित मानस एक अद्भुत ग्रंथ है यह पापों का नाश करने वाला, सदा कल्याणकारी,माया,भ्रम,मोह,भय  का नाश करने वाला है l जो मनुष्य श्रीराम के चरित्र, आदर्शों और उपदेशों में अपने मन को निमग्न करते हैं वे सांसारिक प्रपंचों में उलझने से बच जाते हैं l यह ग्रंथ ज्ञान वैराग्य और भक्ति के भाव को जाग्रत कर देता है l


निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई ll


काकभुशुण्डि जी केवल शास्त्र का उपदेश नहीं दे रहे हैं, बल्कि भक्ति में पूर्णतः रमकर अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर गरुड़ जी से कह रहे हैं।

—हे पक्षीराज गरुड़! अब मैं आपको अपने जीवन का अनुभूत सत्य बताता हूँ। संसार में मनुष्य अनेक प्रकार के उपाय करता है, किन्तु हरि-भजन के बिना अन्तःकरण के क्लेश,भय, मोह और अशान्ति का स्थायी निवारण नहीं हो सकता। भगवान श्रीराम की भक्ति ही मन को वास्तविक शान्ति प्रदान करती है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कोरोना काल का उल्लेख क्यों किया,

दक्षिणेश्वर मूर्ति की चर्चा क्यों हुई,हम रामत्व की अनुभूति कैसे कर सकते हैं और इससे किस प्रकार लाभान्वित हो सकते हैं जानने के लिए सुनें l

3.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९१ वां* सार -संक्षेप

 भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥

भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा॥3॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९१ वां* सार -संक्षेप


सांसारिक प्रपंचों में उलझे रहने पर भी जब कभी हमें स्वयं को संस्कारित करने का अवसर मिले, हमें उस अवसर को कदापि नहीं छोड़ना चाहिए।  यज्ञमयी भारतीय जीवन-दर्शन में आत्मपरिष्कार और संस्कारपूर्ण जीवन को विशेष महत्त्व दिया गया है। ये असामान्य सदाचार वेलाएं इसी भारतीय जीवन-दृष्टि के अनुरूप हमें भीतर से परिष्कृत करने, हमारे आचरण को श्रेष्ठ बनाने और जीवन को सार्थक दिशा देने का एक अमूल्य अवसर हैं। तो आइये इस अवसर का लाभ उठाएं l


हनुमान चालीसा भक्ति, शक्ति, सेवा, समर्पण और विवेक का अत्यन्त भावपूर्ण काव्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसमें भगवान श्रीहनुमान के स्वरूप, गुण, सामर्थ्य और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति का अत्यन्त सुंदर चित्रण किया है। इसकी प्रत्येक चौपाई साधक को अपने जीवन में शौर्य, पराक्रम , संयम, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता अपनाने की प्रेरणा देती है।हनुमान चालीसा में अत्यन्त गहन और भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसे अवधी भाषा में रचकर गूढ़ आध्यात्मिक भावों को अत्यन्त सरल और सहज बना दिया है। फ्लाईदुबई का विमान उड़ाते समय कैप्टन स्मित मच्छार हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे।


जै जै जै हनुमान गोसाईं ।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥


जो सत बार पाठ कर कोई ।

छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने स्वास्थ्य शिविर का उल्लेख क्यों किया,बाबा गोरखनाथ का नाम क्यों आया, रामकथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

2.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८९० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८९० वां* सार -संक्षेप


मनुष्य को अपने वास्तविक मनुष्यत्व की अनुभूति अवश्य होनी चाहिए और इसके लिए हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो केवल जीविका का सामर्थ्य प्रदान न करे, अपितु मनुष्य को संस्कारित करे उसे शक्तिसंपन्न बनाए उसे मनुष्यत्व की अनुभूति भी कराए। मनुष्यत्व का अर्थ केवल शरीर धारण करना नहीं, अपितु अपने भीतर निहित दिव्यता, कर्तव्यबोध, संवेदनशीलता,प्रेम,आत्मीयता तथा लोकमंगल की भावना को जाग्रत करना है।जब मनुष्य अपने स्वरूप को पहचानता है, तब वह आलस्य, प्रमाद और निराशा से ऊपर उठकर जीवन के उच्च उद्देश्यों की ओर अग्रसर होता है।अतः हमें अपने शैथिल्य, अकर्मण्यता और जड़ता का त्याग करना चाहिए। जीवन का सौन्दर्य कर्म में है, पुरुषार्थ में है और सतत प्रयत्न में है l समाज तथा राष्ट्र की उन्नति में योगदान देने हेतु  जागतिक व्यथा दूर करने हेतु भारत में जन्मे हम राष्ट्रभक्त कर्मरत हों l


भारत हिंदूराष्ट्र सनातन तत्व शक्ति का संगम है, 

इसका जन जन ज्ञान समन्वित शक्तिभक्ति भी अनुपम है। 

भारत है उत्साह उमंगों वाली अनुपम दिव्य कथा, 

भारत है अध्यात्म समन्वित नाशक है जागतिक व्यथा ॥

जागतिक व्यथा को दूर करने का भारतीय जीवन-दृष्टि के व्याख्याता साहित्यावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी प्रयास किया l


राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई॥

जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥1॥


गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—हे गरुड़ जी ! मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह मेरी अपनी बुद्धि या विद्वत्ता का परिणाम नहीं है; यह तो श्रीराम की कृपा है। मैं अल्पबुद्धि आपसे निवेदन करता हूँ कि ध्यानपूर्वक सुनिए।

जब-जब भगवान श्रीराम मनुष्य का शरीर धारण करके अवतरित होते हैं, तब वे अपने भक्तों के कल्याण, प्रेम और उद्धार के लिए अनेक प्रकार की दिव्य लीलाएँ करते हैं।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कथा में और क्या बताया, रामलाल का उल्लेख क्यों हुआ, किस शूटिंग में कौवा उपस्थित था जानने के लिए सुनें l

1.10.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 अक्टूबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८९ वां* सार -संक्षेप


श्रीरामचरितमानस में

ज्ञान-गरिमा से मण्डित व्यक्तित्व गोस्वामी तुलसीदास जी ने विविध प्रकार के प्रसंगों के माध्यम से हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को प्रेरणा दी है कि हम अपने भय,भ्रम, लोभ, लालच का त्याग करें, अपनी अन्तर्निहित क्षमताओं को पहचानें, अंधकार को भगाने के उपक्रम में रत हों और अपने जीवन के उद्देश्य को समझें।

मानस हमें यह बोध कराता है कि हम परमात्मा से पृथक् नहीं हैं; परमात्मा का अंश हमारे भीतर विद्यमान है। अतः अपने भीतर स्थित उस दिव्य शक्ति को जाग्रत करके हमें धर्म, सत्य और लोकमंगल के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

श्रीराम का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि जब-जब अधर्म और आसुरी प्रवृत्तियाँ बढ़ें, तब सज्जन शक्ति को  जाग्रत होकर उनका प्रतिकार करना चाहिए। हमारा उद्देश्य केवल अपने लिए जीवित रहना नहीं, अपितु धर्म की रक्षा, दुष्ट प्रवृत्तियों का विनाश और समस्त समाज के कल्याण के लिए अपने सामर्थ्य का उपयोग करना है।

आजकल हम लोग रामकथा में ही प्रविष्ट हैं 


निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोई।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होई॥ 73 ख॥



गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि निर्गुण, निराकार ब्रह्म का बोध अपेक्षाकृत सहज है, क्योंकि उसमें किसी विशेष रूप, गुण अथवा लीला का विचार नहीं करना पड़ता। किंतु सगुण-साकार भगवान के वास्तविक स्वरूप और उनकी दिव्य लीलाओं का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है।


भगवान के चरित्र कभी अत्यन्त सरल और सहज दिखाई देते हैं तो कभी इतने अगम और रहस्यमय कि बड़े-बड़े मुनियों के मन में भी उनके स्वरूप और लीलाओं को लेकर विस्मय उत्पन्न हो जाता है l



इसके अतिरिक्त बालभारती, किशोरभारती, तरुणभारती का उल्लेख क्यों हुआ, नये विद्यालय की योजना में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया, भैया शुभेन्दु जी का नाम क्यों आया, बुद्धि, प्रमा, प्रतिभा, मेधा, विवेक में क्या अन्तर है,आचार्य जी ने अपनी रचित कौन सी कविताएं सुनाईं जानने के लिए सुनें