प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८८३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६५
आत्मशक्ति, आत्मबोध, आत्मविश्वास पुञ्जीभूत स्वरूप में अपने पास लाने की हम चेष्टा करें l
हर मनुष्य के भीतर एक अपौरुषेय तत्त्व विद्यमान है,उसके अन्तःकरण में परमात्मा का निवास है। इस सत्य का बोध तब होने लगता है, जब मनुष्य अध्यात्म की तलहटी तक पहुँचकर अपने भीतर की उस दिव्य सत्ता का साक्षात्कार करने का प्रयास करता है। यही विद्या है अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप और परमात्म-तत्त्व को जानना।
किन्तु जीवन केवल अध्यात्म-बोध तक सीमित नहीं है। इसके साथ हमें अविद्या अर्थात् भौतिकता को भी जानना आवश्यक है l अध्यात्म जब जीवन में उतरता है तो वह कर्मयोग का रूप ग्रहण करता है अर्थात् आत्मबोध के साथ अपने कर्तव्य का सम्यक् निर्वाह करना ।
इसलिए भारतीय जीवन-दृष्टि हमें विद्या और अविद्या—दोनों को भली-भाँति जानने की प्रेरणा देती है। इन दोनों का समन्वय ही जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है।
इसे हम उचित शिक्षा के माध्यम से जान सकते हैं l वर्तमान शिक्षा ऐसी नहीं है हम यदि उचित शिक्षा द्वारा शिक्षित हैं तो व्याकुल व्यथित नहीं रह सकते l यह उचित शिक्षा एक योग्य शिक्षक ही दे सकता है l
शिक्षक स्वभाव से सहज स्वतंत्र विचारशील,
संयमित स्वाध्यायी श्रमशील तपस्वी है।
उत्साह उमंगों भरा भावनाओं का स्वर,
निर्लिप्त मनस्वी आजीवन तेजस्वी है ll
गोस्वामी तुलसीदास जी ऐसे ही शिक्षक रहे हैं उनका रचित श्रीरामचरितमानस सारी समस्याओं का उत्तर प्रदान कर देता है l समय समय पर प्रकट होने वाले इसी शिक्षकत्व के कारण हमारा सनातन धर्म नष्ट नहीं हुआ l
आजकल हम लोग मानस के उत्तरकांड में प्रविष्ट हैं l
श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास।
पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥69 ख॥
हे उमा! सुंदर बुद्धि वाले सुशील, पवित्र कथा के प्रेमी और हरि के सेवक श्रोता को पाकर सज्जन अत्यंत गोपनीय रहस्य को भी प्रकट कर देते हैं॥
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,पक्षियों की बोली जानने वाले ने राजा को क्या समझाया,भैया शशि शर्मा जी १९७५, भैया देवर्षि जी की चर्चा क्यों हुई, अधिवेशन के विषय में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें l