प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८८६ वां* सार -संक्षेप
परिवार का बोध भारतवर्ष की एक अमूल्य संपदा है अनमोल धरोहर है किन्तु आज परिवार का भाव कहीं-कहीं कुंठित होता दिखाई दे रहा है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि हम अपनी मूल जीवन-दृष्टि से भ्रमित हो गये हैं और पाश्चात्य प्रभावों की ओर आकर्षित होते हुए अपनी परम्परा और जीवन-मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। हमें,जो भारतभूमि में जन्मे हैं, ज्योतिपुरुष बनकर प्रयास करना है कि यह परिवार का भाव कुंठित न रहे l भारतभूमि में जन्म लेने वाले मनुष्य धन्य हैं ऐसा देवता भी मानते हैं । यह भूमि स्वर्ग और मोक्ष—दोनों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली है, यहाँ जन्म लेकर मनुष्य देवत्व को भी प्राप्त कर सकता है।
यही परिवार का भाव कल संपन्न हुए दिल्ली के अधिवेशन को अत्यन्त सफल बना गया l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम इस कार्यक्रम की समीक्षा करें l
आचार्य जी ने यह उद्बोधन कहां से किया, अधिवेशन को आचार्य जी ने कितने अंक प्रदान किए जानने के लिए सुनें l