5.9.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 5 सितम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण *768 वां*

 ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।


अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।12.6।।



प्रस्तुत है  परिणामदर्शिन् ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 5  सितम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *768 वां* सार -संक्षेप


 1:  =दूरदर्शी


संसार अद्भुत है इसमें जगह जगह तीर्थ हैं उनमें सबसे अद्भुत है भारत तीर्थ जहां हमने जन्म लिया है अनेक पवित्र नदियों का सान्निध्य हमें प्राप्त है गो गंगा गायत्री का अद्भुत देश, विश्व को राह दिखाने वाला देश है यह

यहां स्वयं भगवान अवतरित होते हैं 

हमारा सनातन धर्म ही वास्तविक धर्म है सर्वोत्तम धर्म है यज्ञमयी संस्कृति के हम उपासक हैं हम भोगमयी प्रवृत्ति के विरोधी हैं ब्रह्म को ही हम सब समर्पित करना चाहते हैं हमारा साहित्य दर्शन विज्ञान अद्वितीय है अब हम सूर्य की उपासना के लिए उसके पास तक जा रहे हैं उनसे प्रसादी प्राप्त कर संपूर्ण विश्व को वितरित करेंगे हमारा परमार्थ भाव ही है वसुधा ही हमारा कुटुम्ब है हमें भ्रमित करने के अनेक प्रयास हुए हैं और आज भी चल रहे हैं कोई सनातन धर्म को समाप्त करने की बात करता है  कोई कुछ

अनेक राक्षसी प्रयास चल रहे हैं देवासुर संग्राम संसार का सत्य है इस सत्य को समझने के लिए सदाचार का आश्रय लेना अनिवार्य है यह हनुमान जी का वरदान है हमारे मार्गदर्शन के लिए इससे उचित और क्या हो सकता है इसी लिए आइये प्रवेश करते हैं इस सदाचार वेला में


जब हम अपने परिवेश के कारण उद्वेलनों के भंवर में फंस जाते हैं तब हम असीमित शक्ति वाली भक्ति का आश्रय लेते हैं जब हम उद्वेलनों  उलझनों का अनुभव नहीं करते तो शरीर मन बुद्धि वाली सीमित शक्ति का प्रयोग कर संघर्ष करते हैं

इसी पर आधारित गज ग्राह की एक अद्भुत कथा है



गज अर्थात् गजेन्द्र पूर्व जन्म में द्रविड़ देश का पांड्यवंशी राजा  इंद्रद्युम्न था । वह भगवान्‌ का एक श्रेष्ठ उपासक  था. एक बार वह राजपाठ त्यागकर मलय पर्वत पर रहने लगा 

एक बार परम यशस्वी अगस्त्य मुनि अपनी शिष्यमण्डली के साथ वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने देखा कि वह प्रजापालन का धर्म और गृहस्थ के लिए उचित आतिथ्य सत्कार भूल करके  एकान्त में  उपासना कर रहा है, अतः वे राजा  पर क्रुद्ध हो गये उन्होंने राजा को शाप दिया कि इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो


ग्राह पूर्व जन्म में हू हू नाम का एक श्रेष्ठ गन्धर्व था। एक बार जब देवल ऋषि सरोवर में खड़े होकर तपस्या कर रहे थे तो उसे  शरारत सूझी। उसने ग्राह रूप धारण कर उन ऋषि के पैर पकड़ लिए। क्रोधित ऋषि ने उसे शाप दिया कि तुम ग्राह की तरह अब रहो।



इसी गजेन्द्र को ग्राह ने एक बार  पकड़ लिया

वह भगवान् को याद करने लगा 

जब भगवान्‌ ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित हो रहा है, तब वे गरुड़ को  छोड़कर कूद पड़े और  गजेन्द्र के साथ ही ग्राह को सरोवर   से बाहर निकाल लाये। फिर  भगवान्‌  ने सुदर्शन चक्र से ग्राह का मुँह फाड़ डाला और गज़ेद्र को छुड़ा लिया ( गजेन्द्र मोक्ष )


मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।


श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।12.2।।


मुझमें मन को एकाग्र कर नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं


हमें सहज ध्यान करना चाहिए हम कौन हैं हमें अपने मनुष्यत्व की पहचान होनी चाहिए कर्म करने का अधिकार भगवान् ने हमें दिया है हमें  आभार व्यक्त करना चाहिए


यह मानव का शरीर स्रष्टा की दिव्य धरोहर है, 

शिव साधन कर्मों का धर्मावृत रूप मनोहर है, 

अन्याय न हो इसके प्रति जिम्मेदारी अपनी है, 

यह दिव्य रूप इसमें अनुपम आनन्द सरोवर है।




इसके अतिरिक्त किसने कहा चन्द्रमा पर बहुत सोना मिला है जानने के लिए सुनें

4.9.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 4 सितम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण *767 वां*

 हम देश के सेवक सदा रहते सतर्क हैं,

 बेशक प्रलापवादियों के अपने तर्क हैं। 

हम जानकर अनजान बनों को न छेड़ते,

लेकिन बचे सभी को कोशिशों से जोड़ते।



प्रस्तुत है  प्रवाहक -रिपु ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 4  सितम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *767 वां* सार -संक्षेप


 1:  प्रवाहकः =राक्षस



आचार्य जी प्रतिदिन  इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से हमें तत्त्व की कुछ बातें बताते हैं आचार्य जी हमें प्रेरित करते हैं ताकि हमें आध्यात्मिक भान हो सके

हम सभी शिक्षक हैं यह भान हो सके हम  नई पीढ़ी को भ्रमित होने से बचाने वाले मार्गदर्शक हैं यह सुस्पष्ट रूप से समझ सकें

आचार्य जी चाहते हैं कि हम शक्ति भक्ति विश्वास अर्जित कर समाज और राष्ट्र के लिए जाग्रत रहें अपने साध्य को  पवित्र साधनों से प्राप्त कर पाएं राक्षसों के तर्कों को नजर अंदाज कर उनसे सतर्क सचेत रहते हुए संगठित रहने के लिए बहुमुखी उपाय खोजते रहें 

हमारा अतुल साध्य है राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्



दिन भर ऊर्जस्वित रहने का आनन्दित रहने का यह सर्वोत्तम उपाय है



लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि



इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।

आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।।




से हम भ्रमित न हो जाएं और हमारा ज्ञान रूपी दीपक बुझ जाए आत्मानुभूति का प्रकाश





सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥1॥


'सोऽहमस्मि' ( अहं सः अस्मि =वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड  वृत्ति है, वही उस ज्ञान के दीपक की अत्यन्त प्रचंड दीपशिखा  है। इस तरह जब आत्मानुभूति   का सुंदर प्रकाश प्रसरित होता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का सर्वथा नाश हो जाता है


मिट जाए

इसके लिए प्राणायाम ध्यान अध्ययन स्वाध्याय लेखन उचित खानपान पर हम लोग ध्यान दें 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कल संपन्न हुए कार्यक्रम के विषय में क्या बताया जानने के लिए सुनें


3.9.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 3 सितम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण *766 वां*

 अपनेपन का विस्तार जगत का जीवन है, 

हे, गतिज शून्य संसार तेरा अभिनंदन है।


प्रस्तुत है  सत्यसङ्गर ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 3  सितम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *766 वां* सार -संक्षेप


 1:  वादे का पक्का



हम किसी के सद्गुणों को ग्रहण करने के लिए प्रयासरत हों और उनके दुर्गुणों से दूर रहें


राष्ट्र -धर्म ही विश्व- धर्म है  और यही परमार्थ -धर्म है

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः वाला सूत्र सदैव हम जाग्रत रखें

वाणी पर संयम रखें


फलाकांक्षा संसार की एक मौलिक समस्या है लेकिन हमारे धर्मक्षेत्र में समझाया जाता है

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।


मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।


मात्र कर्म करने  में ही तुम्हारा अधिकार है इसे ध्यान रखते हुए फलाकांक्षा की वृत्ति नहीं रखो । तुम कर्म के फल के हेतु वाले मत हो लेकिन अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।


फल की चिन्ता न करें लेकिन फल का निरीक्षण अवश्य करें


हमारे भीतर भगवान विद्यमान है यह अनुभूति ही विद्या है जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है  इस विद्या को प्राप्त करना कठिन है

हम अविद्या को विद्या समझ लेते हैं


ब्रह्मेतर ज्ञान को  अविद्या बतलाया गया है।विज्ञान भी अविद्या  है। ऐसा नहीं है कि भारतीय दर्शन में हर स्थान पर अविद्या को हीन ही कहा गया है हमने उसे विद्या का पूरक भी माना है

हमें सांसारिक कार्यों में भी सफलता चाहिए


*चन्द्रमा पर मानव ने पहली बार कदम रखे अंतरिक्ष में मनुष्य ने पहली बार चहलकदमी की*

इस तरह की उपलब्धियों से हमें लगता है कि हमने यह काम पहली बार किया है लेकिन गहनता से हम अपने ग्रंथों का अध्ययन करें तो देखते हैं कि यह तो पहले ही हो चुका है आचार्य जी ने इसके लिए मानस में हनुमान जी का चूडामणि और मुद्रिका वाला प्रसंग बताया



यह ऋषित्व जो यह विश्वास दिलाता है कि हर कल्प में राम होते हैं हर कल्प में रामकथा होती है अद्भुत है


यह सगुणोपासना का आधार है



हमें लगता है यह पहली बार हो रहा है

जब कि ऐसा नहीं है हमें निश्चिन्त रहना चाहिए

यह सब होता ही रहता है इसलिए व्याकुलता क्यों


कल उन्नाव विद्यालय में  कार्यक्रम सफल रहा इस कार्यक्रम में भैया विनय अजमानी जी और भैया सुनील जैन जी पहुंचे

आज कवि सम्मेलन है

जिसमें निम्नांकित कवि अत्यन्त उत्साह के साथ भाग ले रहे हैं


१. श्री अंसार कम्बरी जी कानपुर २. डॉ. सुरेश अवस्थी जी कानपुर ३. डॉ. कमल मुसद्दी जी कानपुर ४. श्रीमती व्याख्या मिश्र जी लखनऊ ५. श्री अतुल बाजपेयी जी लखनऊ ६. श्री प्रख्यात मिश्र जी लखनऊ ७. श्री कुमार दिनेश जी उन्नाव ८. डॉ. पवन मिश्र जी कानपुर

अपनेपन के विस्तार हेतु आप सब लोग इस कार्यक्रम के लिए आमन्त्रित हैं

इसके अतिरिक्त 

भैया मोहन कृष्ण जी भैया दीपक शर्मा जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

2.9.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 2 सितम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण *765 वां*

 प्रस्तुत है  फेरव -रिपु ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 2  सितम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *765 वां* सार -संक्षेप


 1:  फेरवः =राक्षस



अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥


हमारा राष्ट्र अद्भुत है


यह देश मेरा धरा मेरी गगन मेरा।

उसके लिये बलिदान हो प्रत्येक कण मेरा॥


हम राष्ट्रभक्त कर्मशील योद्धाओं के पथ को प्रशस्त बनाने के लिए आचार्य जी पुनः आज सदाचार वेला में उपस्थित हैं आइये समय का सदुपयोग करते हुए  उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर हम अपने कार्य और व्यवहार को समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी बनाने का प्रयास करें हम चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन सद्संगति निदिध्यासन में रत हों

सात्विक कर्म करने की इच्छा रखें अपने भाव विचार क्रिया का प्रकटीकरण

स्वदेशानुरागी होकर करें

विचारों की पूरी संपदा को राष्ट्र के लिए समर्पित करें

 नई पीढ़ी को भी उत्साह से भर दें उसे भ्रमित होने से बचाएं उसे संस्कृत और संस्कृति का महत्त्व समझाएं 

सात्विक कर्म में  अनुरक्ति अद्भुत अवस्था है  सात्विक कर्म करना कठिन तो है लेकिन हम सब लोग यह कर्म कर सकते हैं  और ऐसा कर्म करने से जो आनन्द हमें मिलेगा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता


गीता में



नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।


अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।18.23।।


कर्म के तीन भेदों में से सात्विक कर्म वह है जो शास्त्रविधि से नियत, आसक्तिरहित, बिना राग द्वेष के हो और जिसमें फल की इच्छा न की जाए


यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।


क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।18.24।।


परन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।


 आचार्य जी ने बताया कि 

सरस्वती विद्या मंदिर उन्नाव विद्यालय के ३६वें वार्षिक समारोह में आज रूप-सज्जा, रंगोली प्रतियोगिता, कला प्रतियोगिता, मेधावी अलंकरण, सांस्कृतिक कार्यक्रम है जिसमें शैक्षिक राजनीति में शुचिता के प्रतीक मुख्य अतिथि :मा. श्री राज बहादुर सिंह चन्देल जी सदस्य विधान परिषद आ रहे हैं और इस कार्यक्रम के 

मुख्य वक्ता हैं भैया 

 आशू शुक्ल जी 1982 बैच

आप सब लोग इस कार्यक्रम के लिए आमन्त्रित हैं

इसके अतिरिक्त मा गोविन्दाचार्य जी से संबन्धित क्या प्रसंग है बलिया वाले पंडित जी कौन हैं इस संप्रेषण की तुलना नर्मदा मैय्या से क्यों हुई आदि जानने के लिए सुनें

1.9.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 1 सितम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण *764 वां*

 हे ! आदिस्वरा कल्याणी संस्कृत नमो नमो,

हे! देवों की शुभ वाणी संस्कृत नमो नमो, 

हे ! आदिकाव्य की भाषा संस्कृत नमो नमो, 

हे ! संस्कृति की परिभाषा संस्कृत नमो नमो, 

हे ! तत्वशक्ति का अर्पण संस्कृत नमो नमो, 

मानवमूल्यों का दर्पण संस्कृत नमो नमो ,

हे! वैदिक ऋचा -मंत्र -उच्चारण नमो नमो, 

हे! सृष्टि सर्जना का शिव कारण नमो नमो।



कल विश्व संस्कृत दिवस था

आइये हम कृतसंकल्प हों कि विश्व की प्राचीनतम भाषा सभी भाषाओं की जननि देवों की शुभवाणी अपनी भारतीय संस्कृति की परिभाषा मानवमूल्यों का दर्पण मनुष्यत्व को जानने अपनाने की कुंजी संस्कृत भाषा को अवश्य सीखेंगे और इसका प्रयास आज से ही प्रारम्भ कर देंगे 


प्रस्तुत है  शुक्रशिष्य -रिपु ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 1  सितम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *764 वां* सार -संक्षेप


 1:  शुक्रशिष्यः =राक्षस



संसार अत्यन्त रहस्यात्मक और अद्भुत है यह अनौपचारिक रूप से प्रारम्भ होकर औपचारिक रूप ले लेता है स्रष्टा के मन में इच्छा अर्थात् विकार उत्पन्न हुआ वह अनौपचारिक था और फिर उसके मुख से ॐ का स्वर उद्भूत हुआ


यह उसके मुख से निकलने वाला पहला शब्द था और फिर सृष्टि की रचना हो गई


 अनौपचारिकता से औपचारिकता की यात्रा प्रारम्भ हो गई

परमात्मा अनौपचारिक से औपचारिक हो जाता है और स्वयं अवतार लेता है वह संसार की सांसारिकता से घिर जाता है और फिर मुक्त हो जाता है

उस अवतारी स्वरूप को जो सम्बन्ध मान लेते हैं वे दुःखी होते हैं 

हम अनौपचारिकता से औपचारिकता की यात्रा करते हुए  फिर से अनौपचारिक बनने का प्रयास करते हैं लेकिन सांसारिकता के आवरण में इतना लिपट जाते हैं कि अनौपचारिक बन नहीं पाते  बहुत से प्रपंचों से हमारा सामना होता है हम भूल जाते हैं कि हम कौन हैं

हम संसार के भंवरजाल में फंस चुके होते हैं 

बस यहीं पर अध्यात्म का महत्त्व समझ में आता है नहीं आता है तो आना चाहिए


होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥4॥


अध्यात्म का वह स्वरूप अपनाएं जो शौर्य को महिमामंडित करे शक्ति का गायन करे 

भारतवर्ष की जीवन पद्धति और विचार अत्यन्त अद्भुत है

हम ध्यान धारणा का अभ्यास करें शवासन महत्त्वपूर्ण है अध्ययन स्वाध्याय लेखन चिन्तन सद्संगति का अभ्यास लाभकारी है

उचित खानपान आवश्यक है 

कुछ समय अपने लिए अवश्य निकालें कुछ अधिक समय अपनों के लिए और उससे भी अधिक समय परमात्मा के लिए निकालें

अपने लिए निकले समय में हमारे परमात्मा से संयुत होने पर अद्भुत परिणाम सामने आते हैं यही आत्मविस्तार है


इसके अतिरिक्त आचार्य जी कल और परसों उन्नाव विद्यालय में होने वाले कार्यक्रमों के लिए हम सबको आमन्त्रित कर रहे हैं

और भैया आशुतोष द्विवेदी जी भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ आदि जानने के लिए सुनें