31.7.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 31 जुलाई 2023 का सदाचार संप्रेषण 732 वां सार -संक्षेप

 श्री गनेस सुमिरन करूं,

  उपजै बुद्धि प्रकास। 


सो चरित्र बरनन करूं,

जासों दारिद नास  l l



प्रस्तुत है अनुयोगकृत् ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 31 जुलाई 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  732 वां सार -संक्षेप


 1: Spiritual Teacher


(यदि हम संसार के सत्य को समझ लेते हैं तो मृत्यु के समय निराश नहीं होते )


अपनी पत्नी को ज्ञान के सामने धन की महत्त्वहीनता  बताते हुए सुदामा कहते हैं


सिच्छक हौं सिगरे जग के तिय‚ ताको कहां अब देति है सिच्छा।

जे तप कै परलोक सुधारत‚ संपति की तिनके नहि इच्छा।

मेरे हिये हरि के पद–पंकज‚ बार हजार लै देखि परिच्छा

औरन को धन चाहिये बावरि‚ ब्राह्मन को धन केवल भिच्छा

भिक्षा का अर्थ भीख नहीं है यह मधुकरी अद्भुत है राजा का पुत्र भी मधुकरी मांगने में संकोच नहीं करता था

ऐसा था हमारे यहां का शिक्षा का स्वरूप 



भारतीय संस्कृति के रक्षक आचार्य जी ने भी धन कमाने के लिए कभी शिक्षा नहीं देनी चाही शिक्षक का वर्तमान स्वरूप आपको पीड़ा पहुंचाता है

शिशुपन से गौमुखी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों के सान्निध्य में आपके संस्कार पल्लवित हुए 

आचार्य जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य और व्यवहार को शिक्षा में सम्मिलित कर लिया

यह नित्य की सदाचार वेला संघ की शाखा जैसी ही है

परिस्थिति और परिवेश के अनुसार संस्कृति में परिवर्तन संभव है लेकिन संस्कृति संस्कृति ही रहती है


त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्

शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।


राष्ट्र के प्रति हमें निष्ठावान होना ही चाहिए

राष्ट्र -निष्ठा की भावना हमारे अन्तःकरण में जलती रहे संघठन के महत्त्व को समझते हुए संगठित कार्यशक्ति हमारे सनातन धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने में समर्थ हो ऐसा प्रयास हम करें  कर्मपथ के पंथी आचार्य जी हमसे बार बार यही कहना चाहते हैं

आपके मन में यह भाव लगातार दहकता रहता है

हमारे मन में कायरता नहीं आनी चाहिए गीता में भी यही संदेश है सफलता के लिए युद्ध भी आवश्यक है अपनी आत्मज्योति जाग्रत करें और ज्योति को ज्वाला बना दें




इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अपनी रचित एक कविता सुनाई 


हूं कर्मपथ का पंथी फिर अपनी परिभाषा क्या......

आचार्य जी ने लगभग बीस वर्ष पहले यह कविता लिखी थी

श्री ठाकुर साहब और एक अभिभावक से संबन्धित क्या प्रसंग था जानने के लिए सुनें

30.7.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 30 जुलाई 2023 का सदाचार संप्रेषण *731 वां* सार -संक्षेप

 प्रभा प्रकीर्ण हो रही निशा विदीर्ण रो रही

करो मनस्मरण कि शक्ति शौर्य युक्त हो रही।


प्रस्तुत है हारीत -रिपु ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 30 जुलाई 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  *731 वां* सार -संक्षेप


 1: हारीतः =धूर्त



प्रेम, आत्मीयता, परिवार- भाव अपनी शक्ति का संवर्धन करता है काल्पनिक समस्याओं को भुला देता है मन प्रसन्न कर देता है आनन्दमयी वातावरण निर्मित कर देता है इसलिए हमारे यहां समूह, संगठन महत्त्वपूर्ण है


शरीर मन बुद्धि विचार आदि का संयुक्त चिन्तन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और इसकी महत्ता को हमने जितना समझा है वह अन्य किसी देश ने नहीं समझा है  हमारे यहां इसके चिन्तन के साथ इसके व्यावहारिक स्वरूप की प्रस्तुति अद्भुत रही है

आइये आज हम प्रेम आत्मीयता श्रद्धा परिवार- भाव आदि सद्गुणों को ग्रहण करने का संकल्प लें क्योंकि प्रेम के अभाव में समस्याएं और अधिक ऊर्ध्वगामी हो जाती हैं, अपने विचारों को स्थिर बनाएं, भय और भ्रम का त्याग करें,दुरध्व पर चलने से बचें सुकृत्यों का पवित्र उद्यान बनाकर धनदौलत की वृद्धि करें

ज्ञान कर्म उपासना के त्रिकोण के महत्त्व को समझें 

शान्ति और सद्व्यवहार का वातावरण निर्मित करें 

सामाजिक ढांचे को मजबूत करें 

इसी ढांचे को तुलसीदास जी ने  प्रेम के प्रवाह मानस में मजबूत किया है जिसे उस समय की परिस्थितियों से संयुत कर यह संकेत दिया कि संगठन महत्त्वपूर्ण है आपसी मतभेदों को भुलाना अनिवार्य है क्योंकि दुष्ट अकबर के कारण  अपना धर्म सुरक्षित नहीं है 

मां कैकेयी द्वारा परिवार विखंडन की बाध्यता एक अलग विषय है लेकिन जो उन्होंने वरदान मांगे



होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।

मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥33॥


यदि प्रातःकाल होते ही मुनि का वेष धारण कर  राम वन को नहीं जाते हैं तो   समझ लीजिए कि मेरा मरना निश्चित है जिससे आपका अपयश ही होगा




भरत राजमुकुट धारण कर प्रसन्न होंगे लेकिन


चहत न भरत भूपतहि भोरें।


भरत भरत हैं तुलसीदास जी बहुत सी वृत्तियों के साथ भरत के भीतर प्रविष्ट हो गए हैं

भरत राम जी को वापस लाने का संकल्प ले लेते हैं

भरत -निषाद मिलन में


करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।

मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥193॥


देवता अच्छे काम की सराहना करते ही हैं इसलिये सत्कर्म हमारे लिए आवश्यक हैं

मानस में उठे हरेक विषय की गहराई में हम लोग जाने का प्रयास करें

तुलसीदास जी कथा में क्या कहना चाहते थे और सिद्धान्त में क्या कहना चाहते थे

उलझनों में यदि हम हैं तो मानस का पाठ करें समस्याएं सुलझती चली जाएंगी 

संसार से विदा होने वाले मार्ग पर जब हम चलते हैं तो हमारा स्वभाव भिन्न हो जाता है 

इसके अतिरिक्त भैया अरविन्द जी, करपात्री जी, सुदर्शन चक्र जी का नाम क्यों आया हेलिन चाची कौन थीं आदि जानने के लिए सुनें

29.7.23

औजस्य ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 29 जुलाई 2023 का सदाचार संप्रेषण 730 वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है औजस्य ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 29 जुलाई 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  730 वां सार -संक्षेप

(सार -संक्षेप के दो वर्ष पूर्ण )

1 : बल और स्फूर्ति का संचारक


भगवान की अत्यन्त कृपा है कि एक बहुत अच्छा कार्य इस सदाचार संप्रेषण के रूप में चल रहा है जो हमारे भय और भ्रम का निवारण करने में सक्षम है हमें सदाचारमय विचारों को ग्रहण करने के लिए प्रेरित करता है मनुष्यत्व  की अनुभूति कराता है राष्ट्र के  प्रति निष्ठावान बने रहने का हौसला देता है समाज के प्रति कर्तव्य की याद दिलाता है बाह्य परिस्थितियों से व्याकुल न होने की हिम्मत देता है कभी कालनेमियों से जूझने तो कभी कालनेमियों की उपेक्षा करने की प्रेरणा देता है

 हमें शक्तिमय बनाना उत्सहित करना संगठित रहने की आशा देना इसका उद्देश्य है  यह बार बार हमें अपने लक्ष्य अखंड हिन्दू राष्ट्र की याद दिलाता है 

यह अवचेतन मन की शक्ति की पहचान कराता है 

अवचेतन मन की शक्ति बताने के लिए आचार्य जी करपात्री जी महाराज का उदाहरण दे रहे हैं 

अद्भुत सन्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ,दशनामी परम्परा के संन्यासी,परम विद्वान, ज्ञान -विग्रह शिवोपासक 

धर्मसम्राट स्वामी करपात्री (करपात्री = हाथ ही बर्तन हैं जिसके) (१९०७ - १९८२)    मूल नाम हरि नारायण ओझा   दीक्षोपरान्त  नाम 'हरिहरानन्द सरस्वती'

अस्वस्थ हो गए उनका पूजा का इतना अधिक अभ्यास था कि बेहोशी की हालत में भी शिवार्चन के समय उनका दाहिना हाथ जल   चढ़ाने के लिए उठ जाता था

ऐसी होती है अवचेतन मन की शक्ति



हम भी अपने अवचेतन मन की शक्ति को पहचाने

हमने  इस  पवित्र धरती पर जन्म लिया है

यहां की गंगामयी यज्ञमयी संस्कृति अद्भुत है

हम संयम के साथ अपनी शक्ति जगाएं

संयम न होने पर व्याकुलता की वृद्धि होती है

संयम का व्यापक अर्थ है उसे भांपना और उसका समय पर सदुपयोग करना


भगवान् राम घोर युद्ध में संलग्न हैं भक्त विभीषण साथ में है  भगवान राम ने दुविधाग्रस्त विभीषण को धर्मरथ अर्थात् रामगीता का उपदेश दिया है


रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥1॥


रावण रथ पर और श्री राम को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गए। प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया कि बिना रथ के रावण को  मेरे प्रभु कैसे जीत सकेंगे


अविश्वास हमें हानि पहुंचाता है

उस लंका कांड की हम आज के वैचारिक प्रजातांत्रिक युद्ध से तुलना कर सकते हैं

प्रेम और संदेह के कारण हमारा कार्य प्रायः बाधित होता है

धर्मरथ  जीवन में अभ्यास में लाने के लिए है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने डा जी एन वाजपेयी,जी डा संकटा प्रसाद जी,कैप्ट. शिवेन्द्र सिंह, गुरु जी का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें

28.7.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 28 जुलाई 2023 का सदाचार संप्रेषण 729 वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है षट्प्रज्ञ ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 28 जुलाई 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  729 वां सार -संक्षेप

1 : जो छः विषयों अर्थात् चार पुरुषार्थ लोकप्रकृति ब्रह्मप्रकृति से सुपरिचित हो




इन सदाचार संप्रेषणों अर्थात् आर्ष परम्परा की कथाओं के माध्यम से आर्ष परम्परा को विस्तार देते हुए आचार्य जी हमें संकेत     यत् स्वल्पमपि तद्बहु    करते हैं कि हम आत्मबोध जाग्रत रखें आत्मविश्वासी बने रहें अपनी परम्पराओं और आदर्श सिद्धान्तों का अनुसरण करें

और सात्विक चिन्तन को व्यक्त करते, व्यवहार और सिद्धान्त के समन्वय को दर्शाते अपने आधार ग्रंथों का अध्ययन अवश्य करें


आज के समय में भी इस प्रकार के ग्रंथों को रचने वाले  अपने यहां बहुत सारे रचनाकार हैं लेकिन वे चर्चित नहीं हैं

जो चर्चित हैं वे तो अपना प्रचार कर हमें लाभ पहुंचा ही रहे हैं लेकिन जो एकांत में बैठे हुए हैं उनके तत्व से पूर्ण गहन चिन्तन को प्राप्त करने की  भी हमें चेष्टा करनी चाहिए


हमें गहराई और विस्तार दोनों से संपर्कित रहना है

श्रीराम की कथा अत्यन्त तत्वपूर्ण और गूढ़ है


बालकांड में बहुत से विचार हैं  व्यवहार हैं कथाओं के संकेत हैं तुलसीदास जी ने अयोध्या कांड में कथा का सूत्र    पकड़ लिया और उस कथा को एक ऊंचाई पर पहुंचा दिया


धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥

पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥3॥



धर्मधुरीण प्रभु रामजी ने धर्म की गति को जानकर माता से अत्यंत कोमल वाणी में कहा- हे माता! पिताजी ने मुझको वन का राज्य दिया है, जहाँ हर तरह से मेरा  बहुत बड़ा काम बनने वाला है


यह भारतवर्ष का आदर्श उदाहरण है


निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥

यह हमारा सिद्धान्त सूत्र है निशाचर अपना रूप बदल बदल कर भारतभूमि को दूषित करते रहे हैं 

और इनसे हमारा संघर्ष हमारा कर्म है हमारा धर्म है 

भरत जी महाराज का खड़ाऊं  वाला प्रसंग अद्भुत है ऐसी आदर्श रही है हमारी परम्परा


भगवान् राम ने आर्ष परम्परा का सम्मान करते हुए अपना उद्देश्य पूरा किया

आर्ष परम्परा व्यवस्था के संशोधन की परम्परा है


साधुशीलवान् अंग के अत्यन्त दुष्ट पुत्र वेन के अत्याचारों से तंग आकर ऋषियों ने हुंकार-ध्वनि से  उसे मार डाला था।


आर्ष परम्परा चिन्तन को गहराई  और विस्तार देती है

इसे विस्मृत करने पर हम मार्गान्तरित हो गये और हमारा विस्तार संकुचित हो गया 


लेकिन हमें इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए आज भी अनेक लोग साधनारत हैं

शौर्यप्रमंडित अध्यात्म आज की आवश्यकता है हमें आज भी अस्त्र,शस्त्र और बाहुबल की आवश्यकता है

सही दिशा में अपना संघर्ष जारी रखें

इसके अतिरिक्त मोहब्बत की दुकान से भ्रमित न होने का आशय क्या है डा सैफ़ुद्दीन जिलानी कौन हैं भोजनालय में चार दिन कौन रहा था सरभंगा का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

27.7.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष दशमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 27 जुलाई 2023 का सदाचार संप्रेषण 728 वां सार -संक्षेप

 साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥

जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥4॥


प्रस्तुत है हितान्वेषिन् ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज अधिक श्रावण मास शुक्ल पक्ष दशमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 27 जुलाई 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  728 वां सार -संक्षेप

1 : कुशलाभिलाषी



इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत भवन में टिक रहना


किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं ।


 महाकवि जयशंकर प्रसाद (३० जनवरी १८८९ – १५ नवंबर १९३७)की यह कविता मनुष्य को साहसिक अभियान पर चलने के लिए प्रेरित करती है। मनुष्य को मनुष्यत्व का अनुभव करने की प्रेरणा देती है l

जीवन एक लम्बी यात्रा है लेकिन यदि यह सुखद हो निरापद हो आनन्दमयी हो तो यह बात अलग है 

निर्विघ्न यात्रा के लिए हमें शौर्य प्रमंडित अध्यात्म का आश्रय लेना होगा और इसके लिए  बलशाली लोगों के एक मजबूत संगठन की आवश्यकता है जिसका इतना भय हो कि दुश्मन आंख उठाने से पहले एक बार सोचे और वह आक्रमण करे विघ्न डाले तो हम उसको परास्त कर दें समस्याएं आती रहती हैं लेकिन हमारे पास समाधान भी रहते हैं समस्या न सुलझे तो व्याकुल नहीं होना चाहिए हमें आशान्वित रहना चाहिए 

यात्रा के   पड़ावों के मंगल आयोजन होने चाहिए

मानस में व्याकुलता के पश्चात् भरत जी महाराज ने एक यात्रा का आयोजन किया है  उनके मित्र निषादराज शंकाग्रस्त हैं


जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी॥

भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी॥3॥

और कहते हैं


राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥

जीवन पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥1॥

भगवान् रामजी के प्रताप से और आपके बल से हम लोग भरत की सेना को बिना वीर और बिना घोड़े की कर देंगे । जीते जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वी को सिर और धड़ से सजा देंगे l




ऐसा हौसला हम सबको रखना चाहिए  हमारे अन्दर भी अद्भुत विचार आ सकते हैं और हम   बड़े से बड़े काम कर सकते हैं इस ईश्वरीय लीला का अनुभव हम भी कर सकते हैं और इस पर विश्वास करें तो यह प्रतिफलित भी होती है

निषादराज को पता चलता है कि भरत तो श्री रामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं।

और 

दण्डवत करते देखकर भरत जी  महाराज ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। जैसे स्वयं लक्ष्मण जी से भेंट हो गई हो


ये द्रवित करने वाले प्रसंग हैं

ये हमें  यदि द्रवित कर देते हैं तो इसका अर्थ है मानस हमारे अंदर प्रवेश कर रहा है

इसी कथा का विस्तार करते हुए आचार्य जी कहते हैं भक्त भगवान् से कम नहीं है भक्त और भगवान् जब एक हो जाते हैं तो भक्ति की रचना होती है

हमारे क्रान्तिकारियों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने भारत की भक्ति की

जैसे भरत के मन में राम हैं ऐसे ही इन क्रान्तिकारियों के मन में भारत समाया था जैसे चन्द्रशेखर आजाद शौर्यप्रमंडित अध्यात्म का एक ज्वलंत उदाहरण

ऐसे महापुरुष भारत की धरती पर थे हैं और आगे भी रहेंगे


अखंड भारत का संकल्प हमारा रहेगा ही

हम नित्य अपनी समीक्षा करें

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार। 


रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया नीरज जी भैया अमित अग्रवाल जी का नाम क्यों लिया खली का नाम क्यों आया आदि जानने के लिए सुनें