30.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९६ वां* सार -संक्षेप

 सदा संकल्प को साथी बनाकर पग बढ़ाना है, 

विकल्पों से भरी गलियों में केवल गुनगुनाना है। 

स्व को जबतक नहीं पहचान पाया भटकता घूमा, 

पुरुष हूँ  हर समय उत्साह का उत्सव मनाना है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७८

 हम क्षुद्र स्वार्थों से बचने का प्रयास करते रहें, आत्मनिरीक्षण करें, पर्यावरण और परिवेश का परीक्षण करें, हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म और प्रत्येक संकल्प समाज तथा राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित हो। हम समान विचारधारा के व्यक्तियों का संगठन करें और उसके माध्यम से राष्ट्रभक्त समाज को आश्वस्त करें कि अंधकार ही व्याप्त नहीं है l



हमारा सनातन धर्म अद्भुत और अनुपम है। हम संपूर्ण वसुधा को अपना कुटुम्ब मानते हैं l एकात्म भाव भारतवर्ष की एक विलक्षण निधि है l हमारी शिक्षा-पद्धति केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं,अपितु मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के निर्माण का दिव्य साधन है। वह हमें सिखाती है कि शिक्षा प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग है; अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; सूचना नहीं, बल्कि आत्मप्रकाश है।


भारतीय परम्परा में गुरु और शिष्य दोनों सत्य के साधक हैं। गुरु ज्ञान के प्रदाता मात्र नहीं, अपितु जीवन के पथ-प्रदर्शक हैं  और शिष्य केवल श्रोता नहीं, बल्कि श्रद्धा, जिज्ञासा तथा साधना के द्वारा सत्य का अन्वेषी है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—ज्ञान के माध्यम से आत्मोन्नति, चरित्र-निर्माण, समाज और देश के लोकमंगल की स्थापना। इसी महान आदर्श का उद्घोष वैदिक शान्तिमन्त्र "ॐ सह नाववतु..." करता है, जिसमें गुरु और शिष्य साथ-साथ संरक्षण, पोषण, पुरुषार्थ, तेजस्विता तथा परस्पर सद्भाव की प्रार्थना करते हैं। यह सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है l इसी प्रकार के शाश्वत संदेशों को लोकभाषा में जन-जन तक पहुँचाने का दिव्य कार्य राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाजसेवी गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के माध्यम से किया। आइये प्रवेश करें मानस की इस दिव्य कथा में 


अच्छे से अच्छा उपदेश, उत्कृष्ट शिक्षा तथा श्रेष्ठ संगति भी उस व्यक्ति  जैसे रावण का सुधार नहीं कर सकती, जिसकी नीयत दूषित हो अथवा जो अपनी मूर्खता, अहंकार और हठधर्मिता का परित्याग करने के लिए तैयार न हो l

फूलहिं फरहिं न बेत, जदपि सुधा बरसहिं जलद।

मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम॥

 

मन्दोदरी रावण को अत्यन्त विनयपूर्वक समझा रही है कि श्रीराम को साधारण मनुष्य समझने की भूल मत करो। वे समस्त चराचर जगत के स्वामी, परमब्रह्म और धर्म के अधिष्ठाता हैं। उनसे वैर करने में किसी का कल्याण नहीं है। तुम अहंकार का परित्याग कर सीताजी को ससम्मान लौटा दो और श्रीराम की शरण ग्रहण कर लो l

आगे आचार्य जी ने अंगद का उल्लेख करते हुए कथा में क्या बताया,आचार्य जी ने किस प्रकार मधु कैटभ जो भगवान की रज और तम शक्तियां हैं से संबन्धित कथा बताई, सनातन धर्म की शोभा के रूप में प्रतिष्ठित दिव्य कथाओं का आनन्द प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए, भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

29.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९५ वां* सार -संक्षेप

 रामं भजन्ति निपुणा मनसा वचसाऽनिशम्।

अनायासेन संसारं तीर्त्वा यान्ति हरेः पदम्॥


"जो विवेकी, तत्त्वज्ञ और कुशल साधक निरन्तर मन से तथा वाणी से भगवान श्रीराम का भजन करते हैं, वे सहज ही इस जन्म-मरणरूपी संसार-सागर को पार करके भगवान हरि के परम पद (मोक्ष) को प्राप्त हो जाते हैं।"


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७७

हम रामात्मक भाव लेकर सांसारिक कर्मों में लिप्त हों अर्थात् अपने विचार, वाणी और आचरण में भगवान श्रीराम के गुणों को धारण करें जब हम इस भाव के साथ अपने पारिवारिक, सामाजिक, व्यावसायिक तथा राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वाह करेंगे तब हमारे कर्म  धर्ममय और लोककल्याणकारी बन जाएंगे l



संसार में रहकर कर्म करना हमारा स्वाभाविक कर्तव्य है किन्तु उन कर्मों के पीछे यदि स्वार्थ, अहंकार और आसक्ति के स्थान पर मर्यादा, सत्यनिष्ठा, सेवा, करुणा और कर्तव्यपरायणता का भाव हो, तो वही रामात्मक भाव है।

राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥


लंका कांड में एक प्रसंग उस समय का है जब मंदोदरी अपने पति रावण को समझा रही हैं।

सजल नयन कह जुग कर जोरी।सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥कंत राम बिरोध परिहरहू।जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥


मन्दोदरी अश्रुपूर्ण नेत्रों से हाथ जोड़कर कहती हैं—"हे मेरे प्राणप्रिय स्वामी! मेरी विनती सुनिए। श्रीराम से वैर त्याग दीजिए। उन्हें केवल साधारण मनुष्य समझकर अपने मन में हठ मत कीजिए। वे साधारण मानव नहीं, परम दिव्य शक्ति हैं।"

बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।

लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥ 14॥


भगवान श्रीराम सीमित मानवीय देह में प्रकट होकर भी अनन्त, सर्वव्यापक और विश्वस्वरूप परमात्मा हैं। उनका अवतार केवल मानव-लीला है; वास्तविक स्वरूप समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।


मन्दोदरी गीता क्या है  तुलसीदास जी ने चौपाई 

"सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥" कहां से प्रेरित होकर  लिखी,खलनायक प्रायः शास्त्रवचन नहीं कहता  इसे आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया, साहस शब्द का अर्थोत्कर्ष न होता तो वास्तव में इसका क्या अर्थ है जानने के लिए सुनें l

28.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९४ वां* सार -संक्षेप

 अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।

रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥ 13 (ख)॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७६

सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों को विस्मृत या उपेक्षित न करें l सनातन धर्म अद्भुत है l

शिक्षा का आधार त्याग है अतः शिक्षा को व्यवसाय बना देना उसकी गरिमा और उद्देश्य—दोनों के प्रतिकूल है।



यह हमारा सौभाग्य है कि आचार्य जी इन गम्भीर तात्त्विक एवं सदाचार-प्रेरक प्रवचनों के माध्यम से हमें सद्विचारों को आत्मसात् करने, उत्साह और प्रफुल्लता के साथ राष्ट्र तथा समाज के कल्याण में प्रवृत्त होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। साथ ही वे अद्भुत सनातन धर्म की दिव्य परम्परा तथा विविधताओं में एकता से अनुप्राणित भारत की अद्भुत सांस्कृतिक महिमा का भी साक्षात्कार कराते हैं।रावणत्व आज भी समाज में विद्यमान है। इसलिए हम प्रतिवर्ष रावण-दहन कर उसके अहंकार, अधर्म, अन्याय और दुराचार के प्रतीक स्वरूप का परित्याग करने का संकल्प लेते हैं। यही सनातन धर्म की समन्वयवादी दृष्टि है। सनातन धर्म किसी व्यक्ति के प्रति द्वेष नहीं, अपितु उसके दुर्गुणों के परित्याग का संदेश देता है। जो व्यक्ति भयानक भौतिकवादी रावण की पूजा या महिमा का भाव रखता है, वह वस्तुतः उसके दोषों अहंकार, दम्भ, स्वेच्छाचार और अधर्म को अपने भीतर स्थान दे रहा होता है।किन्तु हमारा लक्ष्य दुर्गुणों का उन्मूलन और सद्गुणों का विकास है। तो आइये प्रवेश करें सद्गुणों को आत्मसात् करने के लिए श्रीरामचरित मानस में 


समुद्र पर सेतु निर्माण के उपरान्त भगवान श्रीराम अपनी वानर-सेना सहित सुवेल पर पहुँचे हैं रावण के साथ युद्ध करने की स्थितियां बन रही हैं l

छत्र मुकुट तांटक तब हते एकहीं बान।

सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥ 13 (क)॥

सुवेल पर्वत पर स्थित भगवान श्रीराम ने एक ही बाण से रावण का छत्र, उसका मुकुट तथा मन्दोदरी के ताटङ्क (कर्णाभूषण) काट गिराए। यह सब सबके देखते-देखते हुआ, किन्तु यह रहस्य कोई भी नहीं समझ सका कि यह कैसे हुआ।

यह घटना केवल भगवान श्रीराम के अद्भुत धनुर्विद्या-कौशल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि एक मौन चेतावनी भी है। भगवान बिना युद्ध आरम्भ किए ही रावण को यह संकेत देते हैं कि यदि वे चाहें तो एक ही बाण में उसका अन्त कर सकते हैं।तथापि वे उसे सुधरने और धर्म का आश्रय लेने का अवसर देते हैं। यह श्रीराम की शक्ति के साथ-साथ उनकी मर्यादा, धैर्य और करुणा का भी परिचायक है।

इसके अतिरिक्त  श्री चुन्नीलाल कुरील के साथ 'रावण और उसकी लंका' पुस्तक की चर्चा क्यों हुई राधामाधव चिन्तन पुस्तक का उल्लेख क्यों हुआ भैया आशीष जोग का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया जानने के लिए सुनें

27.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७५


 हम सनातनधर्मी समाज को धर्म, नीति, कर्तव्य, आदर्श और चरित्र का पाठ पढ़ाकर उसे जाग्रत करने का प्रयास करें उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की महत्ता से अवगत कराएं l



शिक्षा हमारे सनातन धर्म का एक अद्भुत एवं जीवन-निर्माणकारी संस्कार है। हमारे शास्त्रों में गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक मानव-जीवन को पवित्र और परिष्कृत बनाने के लिए विविध संस्कारों का विधान किया गया है। इन सभी संस्कारों में शिक्षा का स्थान अत्यन्त विशिष्ट है l शिक्षा केवल ज्ञानार्जन और जीविकोपार्जन का माध्यम नहीं, अपितु साधना भी है और सिद्धि भी। वह हमारे भीतर संस्कारों का बीजारोपण करती है, श्रेष्ठ विचारों का विकास करती है तथा हमारे व्यक्तित्व को संयम, अनुशासन और सदाचार की दिशा में प्रेरित करती है। शिक्षा हमारे अंतःकरण में सात्त्विक शक्ति का जागरण कर हमें लोकमंगल के पथ पर अग्रसर करती है। सौभाग्य से हमें इस महान शिक्षा-परम्परा का जो कुछ भी अंश दीनदयाल विद्यालय से प्राप्त हुआ है, उसी के आधार पर हम राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को शिक्षा के इस वास्तविक स्वरूप का अनुभव कराएं l समाज यह समझे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, व्यक्तित्व-विकास और राष्ट्र-निर्माण है।

यही वह शिक्षा थी जो हमारे प्राचीन गुरुकुलों में प्रदान की जाती थी—जहाँ विद्या के साथ विनय, ज्ञान के साथ आचरण और बौद्धिक विकास के साथ नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान का भी समन्वय होता था।


सन्त, विचारक, ध्यानी, ज्ञानी, समाजसेवी,चिन्तक, आंदोलनकर्ता, विद्वान, स्वामी दयानन्द के अनुयायी  तथा सनातन धर्म के पोषक स्वामी श्रद्धानन्द जिनका जन्म मुंशी राम विज के रूप में हुआ था ,द्वारा सन् १९०२ में स्थापित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार आज भी भारतीय गुरुकुल परम्परा की गौरवशाली शिक्षा-पद्धति को जीवंत रखते हुए वैदिक संस्कृति, भारतीय दर्शन तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के समन्वित शिक्षण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है l गोस्वामी तुलसीदास जी ने शिक्षा, संस्कार और लोकजागरण का महान कार्य श्रीरामचरितमानस के माध्यम से किया। उन्होंने सनातनधर्मी समाज को धर्म, नीति, कर्तव्य, आदर्श और चरित्र का पाठ पढ़ाकर उसे जाग्रत करने का प्रयास किया। आइए, हम भी उसी लोकमंगलकारी ग्रन्थ जो भक्ति के साथ शक्ति की भी अनुभूति कराता है श्रीरामचरितमानस की पावन कथा में प्रवेश करें और उसके दिव्य संदेशों का श्रवण कर अपने जीवन को आलोकित करें।

इस समय हम लंका कांड में प्रविष्ट हैं 


प्रहस्त रावण के चरण पकड़कर विनम्रतापूर्वक कहता है—

नाथ चरन गहि कहउँ दससीसा।

सुनहु बचन मम परिहरि दीसा॥

जेहि देखेँ कुसल जाहि तोरी।

सो सीता देहु, करहु पुनि प्रीती॥



"हे नाथ! हे दशानन! मेरे वचनों को हितकर समझकर सुनिए। जिस उपाय से आपका कल्याण हो, वही कीजिए। सीताजी को श्रीराम को लौटा दीजिए और उनसे पुनः मैत्री स्थापित कर लीजिए।"

और उधर समुद्र पर सेतु बाँधकर लंका पहुँचने के पश्चात् भगवान श्रीराम ने लंका के समीप स्थित सुबेल पर्वत पर अपनी सेना के साथ पड़ाव डाल रखा है । वहीं से लंका का निरीक्षण हो रहा है और आगे की युद्ध-रणनीति बनाई जा रही है । यही वह स्थान है जहाँ विभीषण, सुग्रीव, हनुमान जी आदि के साथ युद्ध-संबंधी मंत्रणा चल रही है l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

26.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९२ वां* सार -संक्षेप

 समस्त जीव मात्र का बस एक मित्र है, 

कि सच कहूँ मनुष्य सिर्फ शिव चरित्र है, 

मनुष्य का विकास दिव्य देव से बड़ा, 

मनुष्य जग जहान के लिए सदा खड़ा,....


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७४

धर्माधारित जीवन अपनाएं क्योंकि यह किसी का अनिष्ट नहीं करता l इसी के अनुसार अपने कार्यों को संशोधित करें l देश और समाज के हित के कार्य अवश्य करें l



आज समाज में जो नैतिक पतन, भ्रष्टाचार, हिंसा, पर्यावरण संकट, पारिवारिक विघटन और सामाजिक असंतुलन दिखाई देता है, उसका मूल कारण शिक्षा की दिशा और स्वरूप है। यदि शिक्षा केवल आजीविका का साधन बनकर रह जाए और चरित्र, संस्कार, कर्तव्यबोध तथा राष्ट्रभाव का निर्माण न करे, तो वही शिक्षा अनेक समस्याओं को जन्म देती है। मैकाले द्वारा थोपी गयी यही शिक्षा इस समय चल रही है इसके विपरीत यदि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का समग्र विकास हो—उसमें ज्ञान के साथ विवेक, कौशल के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्य और विज्ञान के साथ मानवीय मूल्य भी हों जैसी हमारी वैदिक शिक्षा थी तो वही शिक्षा सभी समस्याओं का स्थायी समाधान बन जाती है।

इसीलिए शिक्षा को केवल प्रशासनिक विषय न मानकर राष्ट्र-निर्माण का विषय समझना होगा। शिक्षा-नीति के निर्माण और संचालन में शिक्षाविदों, आचार्यों तथा शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घ अनुभव रखने वाले व्यक्तियों की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। शिक्षा की दिशा और स्वरूप का निर्धारण मुख्यतः शिक्षा-जगत के अनुभवी मनीषियों के हाथों में होना चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास ने शिक्षा को केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि जीवन-निर्माण का साधन माना l उनके समय में समाज निराशा, विभाजन, नैतिक पतन और सांस्कृतिक संकट से जूझ रहा था क्योंकि अकबर का शासन था l श्रीरामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने पूरे समाज को धर्म, कर्तव्य, मर्यादा, सेवा और आदर्श जीवन का पाठ पढ़ाया और जाग्रत करने का प्रयास किया ठीक उसी प्रकार जैसे भगवान् राम विषम परिस्थितियों में धर्म, विवेक, साहस और कर्तव्य के साथ खड़े रहे l

 आजीवन भोग का भोगी कामान्ध रावण व्याकुल है किन्तु अपनी व्याकुलता प्रदर्शित नहीं कर रहा है मन्दोदरी से वह प्रेम करता है किन्तु उससे भयभीत भी रहता है इस कारण उसका असम्मान कभी नहीं करता l 


रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ।सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥

श्रीसीताजी सहित भगवान श्रीराम के चरणकमलों में अपना मस्तक झुकाकर सब कुछ उन्हें समर्पित कर दीजिए। तत्पश्चात अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में जाकर भगवान श्रीरघुनाथ का भजन कीजिए।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया शुभेन्दु शेखर जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों किया, प्रहस्त ने रावण से क्या कहा,बाँस के रोग "घमोई" की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l