2.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४२

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६० वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४२


आचार्य जी अध्यात्म के गहन ज्ञाता हैं। उनके अनुभव, चिंतन और मार्गदर्शन से हमें निरन्तर सीखने का अवसर मिलता है। अतः हमें उनके सान्निध्य और ज्ञान का अधिक-से-अधिक लाभ उठाना चाहिए। उनके द्वारा बताए गए तथ्यों, विषयों को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक लाभ है। अतः हम संकल्पित हों कि हम अपने भीतर विद्यमान सत्त्व, श्रेष्ठ विचार, दृढ़ विश्वास और संयम जैसे जीवन-मूल्यों को साधना के माध्यम से जाग्रत और परिष्कृत करेंगे

और कामना करेंगे कि 

परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्।।



हमारी शिक्षा की समस्याएँ आज अत्यन्त गम्भीर हैं। इसका एक बड़ा कारण शिक्षा के मूल उद्देश्य में आई विकृति है। शिक्षा का लक्ष्य केवल पढ़ना-लिखना, परीक्षा उत्तीर्ण करना और रोजगार प्राप्त करना नहीं हो सकता। यदि वर्षों की शिक्षा के बाद भी व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित, बेरोजगार, तनावग्रस्त और जीवन के प्रति निराश अनुभव करे, तो हमें अपनी शिक्षा-पद्धति पर गंभीरता से विचार करना होगा।

आज शिक्षा मनुष्य को मनुष्यत्व से जोड़ने के बजाय अनेक बार उसे केवल धन और भौतिक सफलता की ओर दौड़ना सिखा रही है। परिणाम यह है कि ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन विवेक घट रहा है; साधन बढ़ रहे हैं, लेकिन संतोष कम हो रहा है; प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, लेकिन संवेदना और आत्मीयता घट रही है।

शिक्षा वही सार्थक है जो व्यक्ति को केवल कमाने योग्य नहीं, बल्कि जीने योग्य बनाए; उसे कुशल ही नहीं, चरित्रवान बनाए; उसे अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध कराए और उसे अपने परिवार, समाज, राष्ट्र तथा समस्त मानवता के प्रति उत्तरदायी बनाए।

ऐसे ही कर्तव्य का बोध कराने का कार्य गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया l भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में आने वाले अनेक संकटों और बाधाओं का धैर्य, शौर्य, संयम और धर्म के बल पर सामना किया। वनवास के समय उन्होंने ऋषियों-मुनियों को राक्षसों के अत्याचार से मुक्त करने का आश्वासन दिया और अपने संकल्प को कर्म में परिणत करते हुए कहा—

“निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह।”

उन्होंने अपने पराक्रम से राक्षसी शक्तियों का विनाश किया, ऋषियों को निर्भय किया और धर्म की रक्षा की। आगे चलकर लंकाधिपति रावण का वध कर अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित की। वनवास की अवधि पूर्ण होने पर श्रीराम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ।

अब अयोध्या में ऐसा रामराज्य स्थापित है कि 

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥

खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥1॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया शुभेन्दु जी का नाम क्यों लिया, रामदेश क्या है, अधिवेशन के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

1.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्थी / पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४१

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्थी / पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४१

मानस का अवगाहन करें निश्चित रूप से लाभ होगा l

इसके सिद्धान्तों की चर्चा करें l


शुचिता हमारे जीवन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मूल्य है। इसे केवल स्वच्छ वस्त्र, स्वच्छ शरीर या स्वच्छ परिवेश तक सीमित नहीं किया जा सकता। वास्तविक शुचिता तब है, जब हमारे विचार पवित्र हों, वाणी मधुर और सत्य हो, व्यवहार निष्कपट हो तथा हमारे कर्म लोकहितकारी हों।

हमें शुचिता को केवल एक आदर्श के रूप में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव का सहज अंग बनाना चाहिए। जिस प्रकार स्वच्छता के लिए हमें बार-बार प्रयास नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार जीवन में ऐसी संस्कार-संपन्नता विकसित हो कि शुद्ध विचार और पवित्र आचरण हमारे स्वभाव से स्वतः प्रकट हों।

शुचितापूर्ण मन में ही सद्विचार जन्म लेते हैं और सद्विचारों से ही श्रेष्ठ कर्मों का निर्माण होता है। इसलिए यदि हम अपने जीवन को वास्तव में श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं, तो शुचिता को बाहर से अपनाने के स्थान पर भीतर से विकसित करना होगा। शरीर कोई हो परिस्थितियां कैसी भी हों इस शुचिता से हम भ्रमित, भयभीत नहीं रहते हैं अपितु आनन्दित रहते हैं जिस प्रकार विद्या अविद्या के ज्ञाता काकभुशुण्डि जी आनन्द का अनुभव करते हैं l मोहग्रस्त गरुड़ जी का काकभुशुण्डि जी से रामकथा सुनना एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है 


राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।

काल कर्म सुभाव गुन कृत दु:ख काहुहि नाहिं॥

श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत् में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते l

रामराज्य एक मन्त्र है l

हम इस कथा में भावों के साथ प्रवेश करें तो निश्चित रूप से हमें इससे शक्ति भी प्राप्त होगी l शिक्षा में ऐसी कथाओं का प्रवेश आवश्यक है वर्तमान शिक्षा बोझिल करती है हम पैकेज देखते हैं माता पिता के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं इन्हें विस्मृत कर जाते हैं हमारा मातृभूमि के प्रति क्या धर्म है इसका भान नहीं रहता l



इसके अतिरिक्त विप्रत्व क्या है, राजा रन्तिदेव का उल्लेख क्यों हुआ, बहुविवाह के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, अधिवेशन के लिए अब हमें क्या करना है, इन्द्रप्रस्थ क्या है जानने के लिए सुनें l

31.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया /चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 31 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४०

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया / चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 31 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५८ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४०


आचार्य जी प्रयास करते हैं कि हम  बिना दंभ और पाखंड के यशस्विता प्राप्त करें  l अतः इन वेलाओं का श्रवण कर हम दंभ, पाखंड आदि विकारों का निरसन करते रहें l



परमात्मा की असीम कृपा है कि हम भारतवर्ष जैसे अद्भुत और अप्रतिम परिक्षेत्र में जन्मे हैं। अनन्त देवी-देवताओं का वरदहस्त हम पर है और ऋषियों-मुनियों की यज्ञमयी परम्परा की विरासत हमें प्राप्त हुई है।

विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत और अपनी-अपनी विशिष्ट रुचियों एवं प्रतिभाओं को धारण करने वाले हम युगभारती के सदस्यों के हृदय में भारतमाता के प्रति एक गहरा आत्मीय भाव है। हमारी विविधता के बीच हमें एक सूत्र में बाँधने वाली शक्ति है—राष्ट्र के प्रति समर्पण और भारत की सनातन जीवन-दृष्टि के प्रति आस्था।

इसी आत्मीय भावभूमि पर पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों के पल्लवन और प्रसार की एक उदात्त परिकल्पना हमारे सामने है। हमारा उद्देश्य केवल उनके विचारों का अध्ययन करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन, व्यवहार और सामाजिक कार्यों में उतारते हुए समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाना है।

हम मानते हैं कि विचार तभी सार्थक होते हैं, जब वे जीवन का हिस्सा बनें और समाज के लिए प्रेरणा तथा परिवर्तन का आधार बनें। युगभारती इसी भाव से विविध क्षेत्रों में सक्रिय व्यक्तियों को आगामी अधिवेशन में एक साथ लाकर राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति अपनी भूमिका को अधिक सार्थक बनाने का प्रयास करने जा रही है


भारत में समय-समय पर ऐसे महापुरुष अवतरित हुए हैं जिन्होंने भारत की आत्मा को शब्द, विचार और आचरण के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस,  जिसमें ज्ञान की गरिमा भक्ति की गहराई और चिन्तन का उत्तुंग शिखर है,के माध्यम से इसी भारत-चिति को लोकभाषा में अभिव्यक्ति दी l


दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥

सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥1॥


रामराज्य केवल अच्छी शासन-व्यवस्था का नाम नहीं है। वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति स्वस्थ और सुखी हो,समाज प्रेममय हो, 

प्रकृति संतुलित हो और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन करे।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने और क्या बताया,कल सम्पन्न हुए  कार्यक्रम के विषय में क्या बताया, एक दिन जागने का एक दिन सोने का किन भैया का होता है,जानने के लिए सुनें l

30.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया /तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३९

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया /तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५७ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३९

समाज-सेवा का वास्तविक अर्थ केवल दूसरों के लिए कार्य करना नहीं, बल्कि आत्मबोध, आत्मबल, आत्मज्ञान और आत्मतत्त्व के परिचय से प्राप्त आनन्द में निरन्तर अपने व्यक्तित्व को ऊर्ध्वगामी बनाना है। जब व्यक्ति स्वयं को भीतर से विकसित करता है, तभी उसकी सेवा समाज के वास्तविक उत्थान का माध्यम बनती है।साथ ही हम लोग शिक्षा पर भी ध्यान केन्द्रित करें l आज 

शिक्षा उचित रीति से देने की आवश्यकता है ताकि व्यक्ति व्यक्ति 

चिन्तनशील बने l




आचार्य जी ने आज शक्ति-सम्पन्न होने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि आज के युग का धर्म शक्ति -उपासना है। जिसके पास शक्ति होती है, उसकी बात प्रभावी होती है; अशक्ति को समाज महत्त्व नहीं देता, बल्कि वह उपहास का विषय भी बन सकती है।

जब-जब भारत शक्ति-सम्पन्न रहा, तब-तब विश्व ने उसे गुरु के रूप में स्वीकार किया। किन्तु जब हमारी शक्ति खण्डित हुई, तब हमारा प्रभाव भी क्षीण हुआ। आचार्य जी ने यह भी स्पष्ट किया कि अध्यात्म को भुजबल और सामर्थ्य की शक्ति से अलग कर देना हमारी बड़ी भूल रही है। जब अध्यात्म और शक्ति का संतुलन टूटा, तब अनेक समस्याओं ने हमें घेर लिया।

अतः आज आवश्यकता है कि हम आत्मबल, संगठन-शक्ति, ज्ञान-शक्ति और भौतिक सामर्थ्य—सभी का विकास करें तथा शक्ति का उपयोग लोककल्याण और धर्मरक्षा के लिए करें।

 गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामकथा के माध्यम से शौर्यप्रमंडित अध्यात्म का महत्त्व समझाया l

आज कल हम लोग उत्तरकांड के रामराज्य वाले प्रसंग में प्रविष्ट हैं l रामराज्य तो अद्भुत था आपस में सभी परस्पर प्रेम करते थे समाज में विषमता नहीं थी किसी प्रकार के कष्ट नहीं थे l 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज उन्नाव विद्यालय में होने वाले कार्यक्रम की चर्चा करते हुए हम सभी को उसमें पधारने के लिए स्नेहपूर्वक आमन्त्रित किया। उन्होंने कार्यक्रम के उद्देश्य और उसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए सभी से सक्रिय सहभागिता का आग्रह किया।

कथा में आचार्य जी ने और क्या बताया परमगति क्या है जानने के लिए सुनें l

29.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष प्रतिपदा /द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३८

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष प्रतिपदा /द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३८


मानस का अध्ययन कर हम अपने भीतर विवेक, मर्यादा, करुणा, धैर्य, त्याग, कर्तव्यबोध, शौर्य, पराक्रम जैसे सद्गुणों का विकास करें 


मनुष्य का जीवन केवल वर्तमान जन्म की कथा नहीं है। उसके व्यक्तित्व, परिस्थितियों और जीवन में घटित होने वाली अनेक घटनाओं के पीछे पूर्वजन्मों के कर्मों और संस्कारों की भी भूमिका मानी गई है। पूर्वकृत कर्म समयानुसार फलित होते हैं और मनुष्य को अपने कर्मों के माध्यम से निरन्तर अपनी भावी गति का निर्माण करने का अवसर मिलता है। हमें जीवन को एक अखंड यज्ञ की तरह समझना चाहिए l इस यज्ञ में हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक वचन और प्रत्येक कर्म एक आहुति है। 

रामकथा हमें यही सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, मनुष्य अपने धर्मपूर्ण कर्म, त्याग, संयम और सदाचार की आहुति देकर अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। भगवान राम का चरित्र अवर्णनीय है l उनका व्यवहार अद्भुत है l

रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी॥3॥



श्री रघुनाथ जी का यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुख की राशि श्री रामचंद्रजी धन्य हैं॥अब भगवान राम का राज्य चल रहा है रामराज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति  में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं l

इसके अतिरिक्त शम्बूक, जो आज की भाषा में paediatrician 

 था,

के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, शास्त्रानुसार शूद्र कौन हैं, राहुल सांकृत्यायन (केदारनाथ पांडेय ),जो हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार, घुमक्कड़, इतिहास-अध्येता, बौद्ध दर्शन के विद्वान और बहुभाषाविद् थे, का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l