5.11.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 5 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 829 वां सार -संक्षेप

 अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।


प्रस्तुत है प्राभञ्जनि -भक्त ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 5 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  829 वां सार -संक्षेप


 1  प्राभञ्जनिः =हनुमान्



वेद का मूल अर्थ ज्ञान है वेद के अलग अलग ऋषि हैं देवता हैं छन्द हैं

जिस ऋषि के द्वारा जो मन्त्र प्रकाशित हुआ है वह उस मन्त्र का ऋषि कहा जाता है जैसे गायत्री मन्त्र के ऋषि ऋषि विश्वामित्र हुए


वेदों में कम से कम १५ प्रकार के छंद प्रयुक्त हुए हैं। गायत्री छंद इनमें सबसे प्रसिद्ध है जिसके नाम से ही एक मंत्र का नाम गायत्री मंत्र पड़ा है। इसके अलावा अनुष्टुप, त्रिष्टुप,  धृति, पङ्क्ति,प्रगाध, विराट्  इत्यादि छंद हुए हैं।


जिस मन्त्र से भगवान के जिस रूप की उपासना की जाती है वह उस मन्त्र का देवता कहा जाता है


प्रत्येक वैदिक मन्त्र की शक्ति अलग अलग होती है


इसलिए उस मन्त्र के छंद के परिज्ञान से उस मन्त्र की आदिभौतिक शक्ति का पता चलता है


गीता में भगवान् कहते हैं


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।


निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।2.45।।


वेदों का विषय अजूबा नहीं है यह सांसारिक विषय है

आचार्य जी ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म एक है वह है सनातन धर्म शेष पंथ हैं

सनातन धर्म अनादि अनन्त है


जल तत्त्व वायु तत्त्व अग्नि तत्त्व पूजा के तत्त्व हैं

वैदिक परम्परा अद्भुत है और ऐसी अद्भुत परम्परा के हम वाहक हैं जब हम इस ज्ञान में प्रवेश करते हैं तो संसार का विकार बोझ नहीं लगता


बल बुद्धिविद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार ॥



हनुमान जी हमारे जाग्रत देवता हैं स्थान स्थान पर हनुमान जी की हमें मूर्तियां मिल जाती हैं



शिवा जी के गुरु समर्थ गुरु रामदास ने समाज के युवा वर्ग को यह समझाया कि स्वस्थ एवं सुगठित शरीर के द्वारा ही राष्ट्र की उन्नति संभव है। इसलिए युवाओं के लिए व्यायाम एवं कसरत  नितांत आवश्यक है।इसके साथ ही उन्होंने शक्ति के उपासक हनुमानजी की मूर्ति की स्थापना की। समस्त भारत का उन्होंने पद-भ्रमण किया। जगह-जगह पर हनुमान जी की मूर्तियां स्थापित की ताकि सम्पूर्ण राष्ट्र में नव-चेतना का निर्माण हो सके



राक्षसी शक्तियां दैवीय शक्तियों से ही पराजित होती हैं यही सनातन धर्म का आधार चिन्तन है


मोह की कमी करके मनुष्यत्व की सार्थकता को आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें

4.11.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 4 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 828 वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है बद्धानुराग ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 4 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  828 वां सार -संक्षेप


 1  स्नेह से बंधा हुआ



सुख हरषहिं जड़ दु:ख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥

धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥4॥



अज्ञानी सुख में हर्षित होते और दुःख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। हे सबका हित करने वाले ! आप विवेक विचारकर धीरज धरिए और शोक का परित्याग कीजिए॥4॥

संकट के समय धैर्य आवश्यक है


संसार में प्रेम  आत्मीयता लगाव संसार को बांधता है यही संसार में रहने की हमें शक्ति और सामर्थ्य देता है

संसार में जीवित तत्त्वों में जितना अधिक ईश्वरत्व है उतनी ही उनमें संवेदनाएं हैं


हम आस्थावान् हैं हम भावनाओं की पूजा करते हैं उपासना के माध्यम से अपने पास बैठते हैं अपने तत्त्व को खोजने के लिए


एकोऽहं बहु स्याम


सिद्धान्त के अनुसार हम ही हम सर्वत्र हैं


हम भावों की अभिव्यक्ति करते हैं इसलिए गंगा को हम साक्षात् भगवती मानते हैं

अनास्थावादी ऐसे होते हैं कि जब उन पर कष्ट आता है तो वे खीझते हैं और दूसरे पर कष्ट आता है तो उनकी उपेक्षा करते हैं


अद्वैत सिद्धान्त में जो मिथ्या है वह भी कुछ है


कल  हम सबके प्रिय भैया मनीष कृष्णा जी के पिता जी इस संसार में नहीं रहे


उन्होंने अपनी देह दान करने की अंतिम इच्छा प्रकट की


मरणोपरांत भी किसी के काम आना यह भावना सर्वोत्तम है। 

स्वर्गीय चाचा जी को निश्चित ही वैकुण्ठ घाम की प्राप्ति होगी। 

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय


नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।


तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-


न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।

3.11.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 3 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 827 वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है विहस्त ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 3 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  827 वां सार -संक्षेप


 1  विद्वान्



सदाचारमय विचार कभी भी शिथिल नहीं होते वे ऊर्जा से भरे होते हैं और उनमें कल्याणकारी भावना निहित होती है हमें ऐसे विचारों को ग्रहण करने का यह  अद्भुत समय उपलब्ध  है हमें इसका लाभ लेना चाहिए और अपने उत्साह को उत्तरोत्तर उन्नति की ओर ले जाना चाहिए

हमें समस्याओं से मुक्ति दिलाने में ये विचार बहुत सहायक होते हैं

आइये विकृतियों को शमित करने के लिए प्रवेश कर जाएं आज की वेला में


जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥2॥


मां सीता कहती हैं लक्ष्मण तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकट में हैं। लक्ष्मण जी  हँसकर कहते हैं - हे माता! सुनो, जिनके भ्रृकुटि विलास (भौं के इशारे) मात्र से सारी सृष्टि का प्रलय हो जाता है, वे श्री रामजी क्या कभी सपने में भी संकट में पड़ सकते हैं?



प्रकृति विलास और प्रकृति लय के अनुसार परमात्मा के तीन भाव हैं अध्यात्म,अधिदैव और अधिभूत


अध्यात्म भाव में परमात्मा मायातीत और मन वाणी से अगोचर निर्गुण और निष्क्रिय है और यहां इसका नाम है परब्रह्म


अधिदैव भाव में परमात्मा माया का अधिष्ठाता है सृष्टि का कर्ता है उसकी स्थिति और प्रलय का संचालक है यहां इसका नाम ईश्वर है ईश्वर अर्थात् जिसमें ऐश्वर्य है

कार्य और व्यवहार का भावमय स्वरूप है

अधिभूत भाव में अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड विराट् का स्वरूप आता है यह कर्ममय स्वरूप है


इन तीनों भावों के अनुसार संसार भी त्रिगुणात्मक है संसार में सब कुछ है

कार्य और कारण का विस्तार संसार का रहस्यात्मक पक्ष है इस रहस्य को प्रयास करके समझा जा सकता है


कार्य को ब्रह्म की प्रकृति कहते हैं पुरुष की लीला का पर्यवसान गुण और भावों की लीला के रूप में होता है



प्रकृति पुरुष को आधार मानने वाले मुक्तिकामी साधक को प्रत्येक वस्तु में त्रिगुण और त्रिभाव देखना होता है


ज्ञान की राशि तभी पूर्ण है जब उसमें तीनों भाव अध्यात्म अधिदैव अधिभूत हों


वेदों में इन तीनों का सन्निवेश है


वेदों को समझने से पहले वेदांगों को समझना आवश्यक है


आचार्य जी ने यह भी स्पष्ट किया कि वेदाध्ययन का अधिकारी कौन है


विवेकानन्द जी का कश्मीर यात्रा वाला क्या प्रसंग है

आचार्य जी की तुलसीदास जी पर रचित कविता कौन सी है जानने के लिए सुनें

2.11.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 2 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 826 वां सार -संक्षेप

 मैंने छाती का लहू पिला पाले विदेश के क्षुधित लाल।

मुझ को मानव में भेद नहीं, मेरा अंतस्थल वर विशाल।


प्रस्तुत है विसंवादिन् -रिपु ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 2 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  826 वां सार -संक्षेप


 1  विसंवादिन् =धूर्त



सदाचारमय विचार कभी भी कमजोर विचार नहीं होते वे ऊर्जा से भरे होते हैं और उनमें कल्याणकारी भावना निहित होती है हमें ऐसे विचारों को ग्रहण करने का यह प्रतिदिन अद्भुत समय उपलब्ध हुआ है हमें इसका लाभ लेना चाहिए और अपने उत्साह को उत्तरोत्तर उन्नति की ओर ले जाना चाहिए

सांसारिक प्रपंचों में ये विचार बहुत काम आते हैं और हमें समस्याओं से मुक्ति दिलाने में सहायक होते हैं

ये विचार विकृतियों को शमित करने के लिए आवश्यक हैं आइये सुप्त रामत्व (रामत्व जब सो जाता है तो व्यक्ति मात्र शरीर रहता है उसे मनुष्यत्व की अनुभूति नहीं होती )को जाग्रत करने के लिए प्रवेश कर जाएं आज की वेला में


भगवान राम कंटकों को साफ करने के लिए अवतरित हुए थे इसके लिए उन्होंने संगठन किया लोगों के सोए रामत्व को जाग्रत किया

शौर्य प्रमंडित अध्यात्म का यह अद्भुत उदाहरण है

शौर्य प्रमंडित अध्यात्म के व्यापक अर्थ में जाएं तो केवल शौर्य का प्रदर्शन ही इसका अर्थ नहीं है

अपितु समय पर कौन सी बात कहनी कष्ट सहकर भी सत्य को न त्यागना आदि भी है


जब जब इस देश के ऊपर आपदाएं आईं हैं तब तब रामत्व जाग्रत हुआ है

आपातकाल कौन भूल सकता है


25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक  की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति मा फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की अनुच्छेद 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी थी


आचार्य जी ने उस समय के प्रसंग बताए आचार्य जी ने जनता समाचार का संपादन किया था

तुलसीदास जी के समय में भी विषम परिस्थितियां थीं जब तुलसीदास ने रामत्व जाग्रत करने का अद्भुत कार्य किया


मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥

प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी

भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥

राम की कथा में केवल कथा नहीं है तुलसीदास ने अध्यात्म का सही अर्थ बता दिया

अध्यात्म का अर्थ है हम जहां रह रहे हैं जिन परिस्थितियों में रह रहे हैं अपने पुरुषत्व को जाग्रत करते हुए अपने तेजस से सबको,पर्यावरण को प्रकाशमय बनाएं


आचार्य जी ने इसे भी स्पष्ट किया कि परम्परा का विस्मरण रामत्व का विलोपन कैसे है

हमें अपनी परम्परा को नहीं भूलना है



जग के ठुकराए लोगों को, लो मेरे घर का खुला द्वार।

अपना सब कुछ लुटा चुका, फिर भी अक्षय है धनागार।

इसके अतिरिक्त भैया अरविन्द जी की चर्चा क्यों हुई एक सज्जन विष्णु जी क्या करते थे आदि जानने के लिए सुनें

1.11.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 1 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 825 वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है विमार्गप्रस्थित -रिपु ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 1 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  825 वां सार -संक्षेप


 1  विमार्गप्रस्थित =असदाचारी

प्रस्तुत है विमार्गप्रस्थित -रिपु ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 1 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  825 वां सार -संक्षेप


 1  विमार्गप्रस्थित =असदाचारी


मनुष्य का शरीर अद्भुत है

हमारा शरीर से बहुत मोह होता है यही शरीर संसार तत्त्व को समझने का माध्यम होता है और संसार के भोगों को भोगने का भी माध्यम है

इसे जिस तरह संपोषित किया जाता है वह उसी तरह का  प्रभाव डालता है सन्ध्योपासन में हम अपने शरीर अपने संसार की शुद्धि की प्रार्थना करते हैं

मनुष्य के ही शरीर में श्रुति स्मृति चिन्तन मनन विचार और सहज वैखरी की अभिव्यक्ति आदि बहुत कुछ है इसलिए मनुष्य जीवन अद्भुत हो जाता है


आचार्य जी का  उद्देश्य रहता है कि हम शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की ओर से विमुख न हों हमारे अन्दर आत्मग्लानि न आये 

आचार्य जी चाहते हैं हम शरीर के साथ मन बुद्धि को भी संयमित करें

 सूर्योदय से पहले अवश्य जागें खानपान सही रखें  संसार में संसारी भाव रखते हुए शौर्य पराक्रम सेवा भाव के साथ सन्नद्ध रहे


हमारे यहां गुरु शिष्य का एक व्यवस्थित स्वरूप प्रस्तुत किया गया है



को वा गुरुर्यो  हि हितोपदेष्टा ।

शिष्यस्तु को यो गुरुभक्त एव ॥


भक्ति वहीं आती है जहां विश्वास होता है विश्वास के लिए मन का स्थिर होना आवश्यक है

इसलिए इन वेलाओं का विशेष महत्त्व है जो हमारे अन्दर विश्वास भक्ति समर्पण आदि गुण विकसित करती हैं मनुष्यत्व की अनुभूति कराती हैं


हनुमान जी, जो कलियुग में हमारे संरक्षक हैं,की कृपा हमारे ऊपर बनी रहे हम इसकी प्रार्थना करते रहें


कितने ही ऋषियों मुनियों पर भगवान् की कृपा रही तुलसीदास जी पर भी उनकी विशेष कृपा रही


अपनी प्रतिभा से उन्होंने शेष सनातन को भी मुग्ध कर दिया था


मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।

समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥ 30(क)॥


तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥

भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥



काव्य की भाषा उस समय संस्कृत थी जब कि तुलसीदास जी ने अवधी बोली में मानस की रचना की

लेकिन यही मानस सबको भा गई


दूसरे का काम अच्छा लगे इसके उदाहरण कम देखने को मिलते हैं हर जगह मैं व्याप्त रहता है

भक्ति में यह मैं विलीन हो जाता है

जैसे तुलसीदास जी के लिए


जाना राम प्रभाव तब पुलक प्रफ़ुल्लित गात।

जोरि पानि बोले बचन हृदय न प्रेमु समात॥


इसके अतिरिक्त भैया विनय जी का नाम किस प्रसंग में आया तुलसीदास जी किसके मानस पुत्र थे आदि जानने के लिए सुनें