5.3.23

¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी /चतुर्दशी विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 05-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 हनुमान जी महाराज! हमको शक्ति दो निज भक्ति दो, 

निज देश भारतवर्ष के प्रति सहज शुचि अनुरक्ति दो, 

विश्वास दो निज पर कि जिससे कभी भी विचलित न हों 

निर्लिप्तता ऐसी कि हम इस जगत में प्रचलित  न हों।



प्रस्तुत है छिदुर -रिपु ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी /चतुर्दशी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 05-03- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  584 वां सार -संक्षेप

1 छिदुर =बदमाश


आजकल हम लोगों को रामकथा सुनने का सौभाग्य मिल रहा है रामकथा अत्यन्त लाभकारी है इससे हम सांसारिकता में व्याकुल नहीं होते समस्याएं कैसी भी हों हमें उनके हल मिल जाते हैं

हमें तो रामकथा में रमना ही चाहिये


जब रामकथा में हम रमने लगेंगे तो हमें आनन्द प्राप्त होगा आनन्द और सुख में अन्तर है सुख इन्द्रियजन्य है और आनन्द इन्द्रियातीत मन से संबन्धित है


आइये चलते हैं रामकथा के उत्तर कांड में


अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥

राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥1॥



अयोध्या बहुत ही सुंदर सजाई गई। देवताओं ने फूलों की वर्षा की झड़ी लगा दी। प्रभु रामजी ने सेवकों से कहा कि तुम लोग जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान आदि करा दो

सेवक आदेश का  तुरन्त पालन करने लगे जब किसी काम का उत्साह होता है तो थकान  नहीं होती मन महामन से मिल जाए तो आनन्द ही आनन्द है 

पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे॥2॥



फिर श्रीरामजी ने भरत जी को बुलाया और उनकी जटाओं को अपने हाथों से सुलझाया

राम जी बच्चों जैसा व्यवहार कर रहे हैं

आज बहुत ज्यादा प्रेम जागा है राम जी छोटे भाइयों को नहला रहे हैं

अयोध्या भावमय हो रही है


पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥


फिर प्रभुराम जी ने अपनी जटाएँ खोल लीं

 गुरु जी की आज्ञा लेकर स्नान किया।

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।


रामदरबार के इस स्वरूप का आनन्द लीजिये

प्रभु राम के बायीं ओर रूप और गुणों की खान सीता जी शोभित हो रही हैं।

इसके आगे कथा बताते हुए आचार्य जी कहते हैं कि इस देश का राजतिलक भोग हेतु न होकर प्रजातांत्रिक था

भारत में लोकतन्त्र बहुत पहले से है


जिस दिन देश-काल के दो-दो,

विस्तृत विमल वितान तने,

जिस दिन नभ में तारे छिटके,

जिस दिन सूरज-चांद बने,

तब से है यह देश हमारा,

यह अभिमान हमारा है।


आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं और उन्होंने शोभन सरकार के बारे में क्या बताया जानने के लिये सुनें

4.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 04-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका॥

अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै॥4॥


प्रस्तुत है छान्दस ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 04-03- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  583 वां सार -संक्षेप

1 वेदज्ञ

आचार्य जी की परिस्थितियां कैसी भी हों इन सदाचार संप्रेषणों का नित्य संप्रेषण एक अत्यन्त आश्चर्य का विषय है हमारे जीवन में ये अत्यन्त उपयोगी हैं हमें इनका लाभ उठाना चाहिये

विषय कोई भी हो उसका अध्ययन करें उसका मनन करें और उसकी भावभूमि पर जायें तो यह हमें आनन्द प्रदान करेगा 


यह सृष्टि परमात्मा की ऐसी एक संरचना है जो अनादि काल से आरंभ विलय का विषय रही है

 परमात्मा बार बार विविध शरीर धारण कर कभी कृष्ण बनकर कभी राम बनकर कभी कोई अन्य बनकर सज्जनों के कष्टों का निवारण करने आये हैं और आते रहेंगे

यह सत्य है



सच वह है नहीं जिसको निजी आंखें निरखती हैं

नहीं  वह है कि जिसको स्वयं की मेधा परखती है


हम स्वयं भी अवतार हैं हम स्वयं भी बड़े से बड़े काम कर सकते हैं गीता मानस ऐसे ग्रंथ हैं जो यही प्रेरणा देते हैं

आइये चलते हैं मानस के उत्तरकांड में


उस मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रामत्व का शतांश प्राप्त करने के लिये जिनका राज तिलक होने जा रहा है


उत्तरकांड ज्ञान का भण्डार है उस ज्ञान को पाने के लिये उसके प्रति हमारा आकर्षण होना चाहिये


कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए॥

गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।2॥


सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥

मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥3॥


पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान। 9 ख॥

भगवान् राम कहते हैं अब आप लोगों को  कोई चिन्ता नहीं करनी है 


मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥3॥


वशिष्ठ मुनि के सुन्दर वचन सारे ब्राह्मणों को बहुत ही अच्छे लगे



आचार्य जी ने एक बहुत रोचक प्रसंग बताया कि क्योंकि दुःखी होने के कारण कैकेयी अभी राजसिंहासन के योग्य नहीं हैं इसलिये उन्हें यह भार नहीं सौंपा जा सकता

तब राजदंड की रक्षा में रत कुश द्वारा अयोध्या की रक्षा हुई

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिये सुनें

3.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल द्वादशी विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 03-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है ज्ञान -अम्बुभृत् ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल द्वादशी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 03-03- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  582 वां सार -संक्षेप

1 अम्बुभृत् =समुद्र



परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।


धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।


जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

ये छंदों के रूप में व्यक्त अद्भुत भाव हैं और यह कवित्व सबको प्राप्त नहीं होता लेकिन हम सौभाग्यशाली हैं कि इस भारतवर्ष की धरती पर जन्मे हैं यहां तो ऐसे कवित्व को प्राप्त कवियों की बहुत लम्बी सूची है

सूर्य की तरह प्रकाश बिखेरने वाले ये कवि हमारे मार्गदर्शक हैं जो 

हमें अंधकार में भटकने से बचाते हैं

रोम रोम में रमे परमात्मा राम की कथा कहने वाले अनेक ऋषियों मनीषियों कवियों ने भी यही प्रयास किया है कि किस प्रकार भगवान् राम, जिनके सामने तो विकट समस्याएं आईं, से प्रेरणा लेकर  हम अपने पौरुष को जाग्रत कर सकते हैं समस्याओं के समाधान के लिए निर्भय होकर जूझते रह सकते हैं


वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः के भाव के साथ शौर्य की उपासना हमारा उद्देश्य है

आइये चलते हैं इन्हीं भावों को धारण करते हुए तुलसीदास जी की अत्यन्त मोहक रामकथा में

उत्तर कांड में आगे



अयोध्या में सबको सबके अनुकूल सम्मान मिल रहा है प्रेम आत्मीयता से लबरेज वातावरण है


कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।

आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥8 क॥



फिर नल नील विभीषण सुग्रीव आदि ने मां कौशल्या के चरणों में मस्तक नवाए। मां जी ने हर्षित होकर आशीषें दीं और कहा तुम मुझे राम के समान प्रिय हो क्योंकि तुम लोगों ने 

राम की सुरक्षा सेवा की है 

पूरे अयोध्या में हर्ष का वातावरण है हर जगह सजावट हो रही है



प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥

ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥1॥


सबसे पहले मां कैकेयी के घर  राम जी गये

उस समय मां कैकेयी का ज्ञान जागा था जब उन्होंने राम जी को वन भेजा था क्योंकि उन्हें तो मालूम था कि प्रभु का जन्म  पूरे संसार को आतंकित करने वाले रावण के साथ अन्य राक्षसों को मारने के लिये हुआ है

इस समय राम और कैकेयी का बहुत मार्मिक मिलन है



आचार्य जी ने यह भी बताया कि राम जी मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहे जाते हैं

अपने दर्द मैं दुलरा रहा हूं की कौन सी कविता आचार्य जी ने सुनाई जानने के लिये सुनें

2.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल एकादशी विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 02-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 किमुक्त्वाबहुधाचापिसर्वथाविजयीभवान् ।


निमित्तानिचपश्यामिमनोमेसम्प्रहृष्यति ।।6.2.25।।



प्रस्तुत है संस्कृत ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल एकादशी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 02-03- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  581वां सार -संक्षेप

1 =विद्वान्



भारतवर्ष की धरती में कुछ ऐसा आकर्षण है कि कुछ लोग इसे आशाभरी नजर से कुछ लोग लालचभरी नजर से देखते हैं कुछ ऐसे भी हैं जो विकृत नजरों से देखते हैं

यहां आकर्षण के लिये बहुत कुछ है

हमारी संस्कृति का स्वर है 


वयम् अमृतस्य पुत्राः


 हम कहते हैं



वासांसि जीर्णानि यथा विहाय


नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।


तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-


न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।।

इसलिये हम संकट के क्षणिक अवरोध को अत्यन्त उत्साह के साथ समाप्त करने के लिये सदा उद्यत रहते हैं


शरीरों को शरीरी की सदा अनुभूति जब रहती, 

सुमंगल गान गाती प्राण की भागीरथी  बहती, 

मनों में शौर्य का शृंगार मय  उत्सव रचा रहता, 

मरणधर्मा जगत में भी अमर स्वर-सुख बचा रहता ।।

हमें यही सिखाया गया है कि हमारा कर्म में तो मन लगे लेकिन उसके फल की इच्छा हम न करें

हम संघर्षों में समाधान खोजते हैं

इस धरती पर जन्मे ऐसे महापुरुषों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने अपना लक्ष्य बनाया कि हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक हमारा समाज हमारा परिवेश आनन्दमय नहीं होगा

अन्तःकरण के सुख के लिये रामकथा रचने वाले 

तुलसीदास जी भी ऐसे ही महापुरुष थे जिनमें समाज को जाग्रत करने की चाह थी


आइये उसी रामकथा

जिसे  पढ़कर हमें विश्वास से भर जाना  चाहिये कि हमारा देश अमरत्व की उपासना करने वाला देश है



 के उत्तरकांड में प्रवेश करते हैं



लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥

हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥1॥




भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥

देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती॥2॥


वे सब लोग भरत जी के प्रेम त्याग आदि की आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं और नगरवासियों की प्रेम, शील और विनय से परिपूर्ण रीति देखकर  प्रभु के चरणों में उनके प्रेम की सराहना कर रहे है


अयोध्या स्वर्ग से भी महान है


फिर भगवान राम ने सब साथियों को बुलाया और कहा कि मुनि के चरणों में लगो। ये गुरु वशिष्ठ जी हमारे  पूज्य हैं जिनकी कृपा से राक्षस मारे गए हैं

यह रामत्व है

कि गुरुदेव को भी उन सखाओं का  परिचय दिया जिन्होंने अपनी जान की भी परवाह नहीं की थी

1.3.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का फाल्गुन शुक्ल दशमी विक्रम संवत् 2079 तदनुसार 01-03- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है विवर्ण -रिपु ¹आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज 

फाल्गुन शुक्ल दशमी विक्रम संवत्  2079

तदनुसार 01-03- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  580 वां सार -संक्षेप

1 विवर्ण =दुष्ट


हम आत्मस्थ होकर इन सदाचार संप्रेषणों को सुनें तो इनसे हमें बहुत लाभ होगा


अध्यात्म रामायण में एक वक्ता शिव जी और एक श्रोता पार्वती जी हैं जब कि मानस में चार वक्ता और चार श्रोता हैं


अध्यात्म रामायण में एक प्रसंग है

दशरथ जी राम जी से कहते हैं मैं वरदान से बंधा हूं तुम मुझे बन्दी बना लो इससे मेरी प्रतिज्ञा भंग भी नहीं होगी और तुमको वनवास भी नहीं करना होगा


स॑स्कॖत काव्य शास्त्र के एक महान आचार्य आo विश्वनाथ के ' साहित्य दर्पण ' ग्रंथ " के अनुसार

रसात्मक॑ वाक्य॑ काव्यम् रसात्मक वाक्य ही काव्य होता है


हम लोग संघर्षों के साथ रसात्मकता भी अपने जीवन में लाएं

रामचरित मानस में यह रसात्मकता बहुत है जिसके उत्तर कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं

अन्य से तुलना करें तो

तुलसीदास जी की कथा बहुत मोहक है


मानस में ऐसे बहुत से प्रसंग हैं जो अश्रुपात करा देते हैं अश्रु इसलिये आते हैं क्योंकि केवल वाणी से ही भाव व्यक्त नहीं हो पाते


लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ।

कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥6 ख॥


लक्ष्मणजी  तीनों माताओं से मिले और आशीर्वाद पाकर खुश हुए। वे  कैकेयी मां से बार-बार मिले, परंतु उनके मन का क्षोभ  नहीं जाता था कि मां मेरे मुख से ऐसा गलत निकल गया


सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लाग हरषु अति तेही॥

देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥1॥


सीता जी सब माताओं से मिलीं और उनके चरणों में लगकर उन्हें अत्यंत खुशी हुई । माताएं कुशल पूछकर आशीष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो


कैकेयी कैसा अनुभव कर रही होंगी


आचार्य जी ने अध्यात्म रामायण का वह प्रसंग बताया जब कैकेयी सीता जी को वल्कल वस्त्र देती हैं तो वशिष्ठ जी डांटते हैं


हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥


माताएं तब गर्व से अभिभूत हो जाती हैं जब वे देखती हैं कि मेरा पुत्र केवल सुन्दर ही नहीं वीर पराक्रमी शक्तिसम्पन्न और विवेकी भी है


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने रानी दुर्गावती की मूर्ति स्थापना के सम्बन्ध में बताया 


भारतवर्ष की संस्कृति के द्वार पर   खड़े होने के लिए हमें क्या करना होगा आइये सुनें यह संप्रेषण