5.6.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आषाढ़ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा,विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 05 -06- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।


मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।4.11।।


प्रस्तुत है सुरभि ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष

प्रतिपदा,विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 05 -06- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  676 वां सार -संक्षेप

1=विद्वान्



इस सदाचार वेला से प्रेरणा लेकर अपने प्रयास से हम लोग अधिक से अधिक मानसिक शक्ति प्राप्त करने की चेष्टा करें इसका लाभ हमें  मिल रहा है यह परिलक्षित भी होना चाहिए 

परस्पर का हम लोगों का विश्वास अद्भुत है और इसी के बल पर हम लोग राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित होने की  भी चेष्टा करें

हमारा लक्ष्य भी यही कहता है

राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष



हमारा कर्म संपूर्ण प्रामाणिकता (authenticity ) के साथ फलप्रद और समाज के हित में होने वाला हो


हम जहां हैं वहीं समाज है अकर्मण्यता का त्याग करें और कर्म करें 

व्यक्तिवादिता कम हो



राजनैतिक विषय,सामाजिक कार्य,धार्मिक कार्यक्रम या अन्यत्र कुछ हो हर जगह राष्ट्रोन्मुखता समाजोन्मुखता झलकनी चाहिए

वैवाहिक कार्यक्रमों में भी आदर्श प्रस्तुत करें



मोहान्धता से बचें

भक्ति और भाव अपने व्यक्तित्व को समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी बनाने का मार्ग है 


अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः । 

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ||


 कोई कामना हो या ना हो और सारी कामनाओं की इच्छा हो अथवा मोक्ष की इच्छा हो तो तीव्र भक्ति योग से भगवान श्रीकृष्ण की उपासना करें


आचार्य जी ने श्री हरिकृष्ण सेठ जी का एक प्रसंग बताया जिसमें उन्होंने Clients को भगवान कहा था और अस्वस्थ होने के बाद भी उनकी सेवा हेतु तत्पर थे 

ऐसे लोग संसार में यश पाते हैं षड् विकारों से दूर रहते हैं

उन्हें मानस रोग नहीं सताते हैं


धर्म के दस लक्षणों में एक भी  हम अपना लें तो हमारे दोष जाने लगेंगे और एक दोष को भी अपनाने की चेष्टा करेंगे तो बाकी दोष भी आने लगेंगे


श्रीरामचरित मानस के पाठ से अधिक से अधिक हमें लाभ प्राप्त करना चाहिए

इस मानस की समीक्षा करते हुए  पुस्तक मानस भूषण तिलक में  गुरु के लक्षण बताते हुए श्री बैजनाथ दास जी कहते हैं


गुरु बाह्य इन्द्रियों का दमन करने वाला शुद्ध वेश वाला विनीत शुद्ध आचरण वाला सुबुद्धिमान कुलीन सुप्रसिद्ध आदि होता है

इसी प्रकार शिष्य के भी गुण हैं


हम आत्मनिरीक्षण करते रहें



एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥

मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥1॥



इस तरह जगत् में सारे जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति,वियोग के दुःख द्वारा और भी अधिक दुःखी हो रहे हैं। मैंने ये कुछ ही मानस रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परंतु इन्हें  विरले ही जान पाए हैं


विषयवासनाओं की अति नहीं होनी चाहिए


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें

4.6.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 04 -06- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 बारि मथें घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल। 


बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धांत अपेल॥



प्रस्तुत है प्रतिसृष्ट ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 04 -06- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  675 वां सार -संक्षेप

1=प्रसिद्ध



हमारे लिए  अत्यधिक अनुकूल और उपादेय सदाचारमय विचारों के साथ लेकर आचार्य जी एक बार पुनः उपस्थित हैं

हमारे अन्दर शक्ति बुद्धि विचार कर्मकौशल संगठन का भाव कितना विकसित हुआ इसकी समीक्षा भी करते रहें

मानस का प्रारम्भ और अन्त दोनों का पाठ अवश्य करें

तो इस मानस की रचना  तत्त्व दर्शन और विचार का बोध हो जाएगा बीच की कथा सांसारिक संबन्धों कर्मों को किस प्रकार किया जाए बताती है दिशा दृष्टि देती है लेकिन भक्ति के भाव के साथ  इसका पाठ करें 


सांसारिक प्रपंचों से मुक्ति और उनमें लिप्तता चलती रहती है

संसार सागर तुल्य है कभी हमें ऊपर ले जाता है कभी नीचे ढकेल देता है

कोई भी दुर्घटना संवेदनशील व्यक्ति को बहुत व्यथित करती है

ऐसी ही एक दुर्घटना परसों 

घटी जिसने हम सबको झकझोर दिया

ओडिशा के बालासोर में तीन Trains के आपस में टकराने से भीषण हादसा हुआ है यह एक साजिश भी हो सकती है जिसमें अभी तक लगभग 300 लोगों की मौत हो गई है जबकि 900 से अधिक लोग घायल हैं


 परमात्मा से यही प्रार्थना है कि हम सबको इस असहनीय आघात को सहन करने की शक्ति दे 

ॐ  शान्तिः  शान्तिः  शान्तिः

संसार के कर्म सकाम और सकारण होते हैं सकाम सकारण होते हुए भी इनके प्रति यदि हमारी दृष्टि और दिशा सुस्पष्ट रहती है तो संसार में सारे कर्मों को करते हुए भी संसार को समझते रहते हैं और इसीलिए हम सम्मानित चर्चित होते हैं कष्ट में भी आनन्द की खोज कर लेते हैं

हमें साजिशों से सावधान भी रहना है और अन्य को करना भी है

भावुकता और ज्ञान हमारा संबल बने

विनय पत्रिका में



मनोरथ मनको एकै भाँति । 

चाहत मुनि-मन- अगम सुकृत फल, मनसा अघ न अघाति ॥ १ ॥


करमभूमि कलि जनम,कुसंगति, मति बिमोह-मद-माति । करत कुजोग कोटि, कयों पैयत परमारथ-पद सांति ॥ २ ॥


 सेइ साधु-गुरु, सुनि पुरान श्रुति बूझ्यो राग बाजी ताँति । तुलसी प्रभु सुभाउ सुरतरु-सो, ज्यों दरपन मुख-कांति ॥ ३ ॥



मन का मनोरथ भी विलक्षण है। वह इच्छा तो करता है कि पुण्यों का फल मिले जो मुनियों के मन को भी दुर्लभ है, किंतु पाप करने से उसकी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती 


कर्म-भूमि धर्मक्षेत्र पवित्र भूमि भारतवर्ष में होने पर भी कलियुग में जन्म, दुष्ट लोगों की संगति, अज्ञान  घमंड से भ्रमित बुद्धि एवं अनेक बुरे कर्मों के कारण परम पद  शान्ति कैसे संभव है

संतों और गुरु की सेवा करने तथा वेद और पुराणों के श्रवण से परम शान्ति का  निश्चय हो जाता है जैसे सारंगी बजते ही राग जान लिया जाता है।

 हे तुलसी! प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का स्वभाव तो अवश्य ही  इच्छित फल वाले कल्पवृक्ष के समान है  किन्तु, ऐसा भी है कि जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब (जिस प्रकार अच्छा या बुरा  मुँह बनाकर दर्पण में देखा जायेगा) वह वैसा ही दिखाई देगा इसी प्रकार भगवान् भी हमारी भावना के अनुसार ही फल देंगे

सिद्धग्रंथ मानस के चार श्रोता और चार वक्ता हैं इन्हें तुलसीदास जी ने अद्भुत ढंग से बांधा है 


विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।

हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥122 ग॥



मैं आपसे भली-भाँति निश्चित  सिद्धांत कहता हूँ

मेरे वचन असत्य नहीं हैं

 जो मनुष्य श्रीहरि का भजन करते हैं वे अत्यंत कठिन संसार सागर को आसानी से पार कर जाते हैं

आचार्य जी ने बताया कि रत्नावली और तुलसी जी कैसे ज्ञान और भक्ति के संगम हो गए

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें

3.6.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 03 -06- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥।

नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥1॥


(सप्त प्रस्न :सब ते दुर्लभ कवन सरीरा

,बड़ दु:ख कवन,कवन सुख भारी,संत असंत सहज सुभाव,कवन पुन्य  बिसाला,

कवन अघ परम कराला

,मानस रोग कहहु समुझाई)


प्रस्तुत है मुख्यरख्य ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 03 -06- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  674 वां सार -संक्षेप

1=पथ -प्रदर्शक



साहित्य के साथ कथा में इतिहास को पिरोना श्रीरामचरित मानस की अद्वितीय लोकप्रियता का कारण है सहृदय लोगों के लिए  तो अत्यन्त सहज और प्रिय विशेषतः हम उत्तरभारतीय लोगों के लिए 

आइये प्रवेश करते हैं इसी अद्भुत कृति के उत्तरकांड में


सात प्रश्नों के उत्तर मिलने प्रारम्भ हो चुके हैं कागभुशुंडी कहते हैं


सबसे दुर्लभ मनुष्य का शरीर है


भगवान् राम ने भी तिलक होने के बाद प्रजा को उपदेश देते समय कहा था



बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥4॥



दरिद्रता के समान कोई दुःख नहीं संत मिलन के समान कोई सुख नहीं

धन आवश्यक तो है लेकिन धन ही आवश्यक है संतुष्टि के लिए यह जरूरी नहीं




मन, वचन एवं शरीर से परोपकार करना ही संतों का सहज स्वभाव है

प्रदर्शन के लिए नहीं, वास्तव में  उनके मन में एक भाव रहता है कि दूसरे का कल्याण हो


भूर्ज तरू सम  संत को सदैव अनुभव होता रहता है कि संपूर्ण संसार दुःख का आगार है संत शान्त भी होते हैं 


श्रीवाल्मीकि रामायण में पक्षीराज और कागभुशुंडी जी का संवाद नहीं दिया गया है


मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥

काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥15॥


आचार्य जी ने प्रेम और मोह में अन्तर स्पष्ट किया

प्रेम अन्धा नहीं होता मोह अन्धा होता है प्रेम ही ईश्वर है

प्रेम में समर्पण है त्याग है

राधा कृष्ण के बीच , राम सीता  के बीच अप्रतिम आदर्श प्रेम है

अनुरक्ति भक्ति में परिवर्तित हो जाती है तो त्याग का प्रतीक हो जाती है

षड्विकारों में मोह है प्रेम नहीं


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भैया शीलेन्द्र जी, धीरेन्द्र शास्त्री का नाम क्यों आया आदि जानने के लिए सुनें

2.6.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 02 -06- 2023 का सदाचार संप्रेषण

 जब असमय कोई सुमन वृक्ष का झर जाता, 

आहत वह शाखा मन मसोस कर रह जाती, 

पत्तियाँ सिसकतीं रह रह कर पूरे जीवन, 

फलहीन वृक्ष की व्यथा जिंदगी सँग जाती।



प्रस्तुत है ज्ञान -अभिधानकोश ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 02 -06- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  673 वां सार -संक्षेप

1=ज्ञान का शब्दकोश


हमारे लिए अनुकूल और उपादेय सदाचारमय विचारों को लेकर आचार्य जी एक बार फिर से उपस्थित हैं

सांसारिक प्रपंचों से मुक्त होना और उनमें लिप्त होना चलता रहता है

संसार सागर के समान है कभी हमें ऊपर ले जाता है कभी नीचे ढकेल देता है

कोई भी प्रतिकूल घटना संवेदनशील व्यक्ति को बहुत व्यथित करती है

ऐसी ही कल एक दुर्घटना में अपने विद्यालय की 2023 बैच की बहन ईशा पटेल का आकस्मिक निधन हो गया

इस घटना ने हम सबको झकझोर दिया क्योंकि हमारी भावनाएं विद्यालय से संयुत हैं ऐसी कोई भी सूचना व्यथित करती है


 परमात्मा से यही प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करे और परिवार को इस असहनीय आघात को सहन करने की शक्ति दे 

ॐ  शान्तिः  शान्तिः  शान्तिः


प्रार्थना ही भक्ति का आधार है ज्ञान में दम्भ हो जाता है भक्ति में समर्पण विश्वास है

ज्ञान में चिन्तन है ज्ञानी संकटों से भी गुजरता है भक्त का भावनाओं से विश्वास से योग रहता है भक्ति योग अद्भुत है

यह नर तन में ही संभव है इस नर को विप्रत्व भी चाहिए


आचार्य जी ने दरिद्रता और निर्धनता में  कल अन्तर बताया था

कागभूशुंडी जी पूर्व जन्म की चर्चा करते हुए कहते हैं

तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस।

परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस॥104 ख॥

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी॥

दारिद्र्य अर्थाभाव नहीं है

आचार्य जी ने सुदामा जी का प्रसंग बताया पत्नी के आग्रह पर गए सुदामा विरक्ति भाव से ही रहते हैं  यद्यपि हमें भ्रम है क्योंकि नरोत्तम दास जी की स्वयं की कल्पना से उपजा सुदामा चरित श्रीमद्भागवत से भिन्न है


सुदामा जी कर्म के लिए ही जन्मे थे सुदामा दरिद्र नहीं थे निर्धन थे आचार्य जी ने कवि प्रमोद तिवारी जी की भी चर्चा की जिन्होंने सुदामा पर लेख लिखा था


दरिद्रता वहां होती है जहां संतुष्टि नहीं होती है


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें

1.6.23

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 01 -06- 2023

 धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥

बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥4॥


प्रस्तुत है आप्यान ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रम संवत् 2080

  तदनुसार 01 -06- 2023

का  सदाचार संप्रेषण 

 

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  672 वां सार -संक्षेप

1=संतुष्ट


सदाचारमय विचारों को ग्रहण करने के लिए अपने भावों को विस्तारित करने के लिए आइये उपस्थित हो जाएं सदाचार वेला में


श्री रामचरित मानस इतिहास -ग्रंथ, भक्ति -ग्रंथ, ज्ञान -ग्रंथ, मार्गदर्शक -ग्रंथ  और जीवन को शक्ति,आश्रय ,विश्वास,अनेक विघ्नों के आने पर भी मर्यादा में रहते हुए जीवन को जीने की प्रेरणा देने वाला ग्रंथ है

यह अद्भुत ग्रंथ हमें भाव विह्वलित कर देता है



अब हम इसी ग्रंथ के पक्षीराज और कागभुशुंडी जी के बीच चल रहे संवाद वाले अंश में प्रवेश करने जा रहे हैं



गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर




पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥।

नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥1॥


सब ते दुर्लभ कवन सरीरा


बड़ दु:ख कवन


 कवन सुख भारी


संत असंत सहज सुभाव 


कवन पुन्य  बिसाला


  कवन अघ परम कराला


मानस रोग कहहु समुझाई




सबसे दुर्लभ शरीर मनुष्य का है हमें यह भी समझना चाहिए कि परमात्मा हमारे प्रति कितना भावमय है जिसके कारण हमारा मनुष्य रूप में जन्म हुआ और उसमें भी यदि   अद्भुत पर्यावरण परिवेश वातावरण वाले धर्मक्षेत्र भारत में जन्म हो जाए तो क्या कहना


इस मनुष्य को भगवद्भक्ति में लगना चाहिए ऐश्वर्यवान भगवान का भजन क्या है आचार्य जी ने इसे स्पष्ट किया


जहां भाव शक्ति शौर्य तप त्याग आनन्दमय परिस्थितियों का ऐश्वर्य हो उसका भजन करना चाहिए

भारत मां पर न्यौछावर तक हो जाने वाला सैनिक भगवद्भक्ति ही करता है


जो अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो जाए वही भगवद्भक्त है

दरिद्रता के समान कोई दुःख नहीं है आचार्य जी ने अपनी लिखी एक कविता सुनाई...

....

गरीबी सत्य के संधान का सोपान होती है

मगर वह धैर्यहीनों के लिए तूफान होती है.....

आचार्य जी ने गरीब और दरिद्र में अंतर स्पष्ट किया

गरीबी और पुरुषार्थ एक साथ नहीं चलते 

जिसने मनुष्य का शरीर पा लिया वो दरिद्र नहीं है आचार्य जी ने इसी पर बैरिस्टर साहब का एक प्रसंग बताया यह प्रसंग क्या था

सबसे  बड़ा सुख कौन सा है आदि जानने के लिए सुनें