4.1.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष अष्टमी / नवमी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 4 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण *८८९ वां* सार -संक्षेप

 यशस् की प्राप्ति करना है अगर तो शुद्ध हो पहले,

मनस् के लोभ लाभी भाव भी अवरुद्ध हों पहले,
कुपथ चारी जनों से पूर्णरूप विरुद्ध हो पहले,
किसी भी देशद्रोही से विजय का युद्ध हो पहले।

प्रस्तुत है स्थिरमति ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष अष्टमी / नवमी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 4 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण
  *८८९ वां* सार -संक्षेप

 1 विचार या संकल्प का पक्का

आचार्य जी का नित्य प्रयास रहता है कि हमारे अन्दर भाव भक्ति भाषा उत्पन्न हों हम जल्दी जागें जल्दी सोएं खानपान सही रखें हम अपनी समीक्षा करें कि इन वेलाओं का श्रवण कर हमने अन्दर का कौन सा तत्व जाग्रत किया
हम अपने लक्ष्य की ओर भी ध्यान रखें

विश्व अद्भुत है भगवान् ने इस जड़ चेतन विश्व को गुणमय दोषमय रचा है

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥

सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥2॥

हे गोसाईं ! वह माया के वशीभूत हो तोते और बन्दर की भाँति स्वयं ही बँध गया। इस तरह जड़ और चेतन में मिथ्या गाँठ पड़ गई। यद्यपि वह मिथ्या ही है फिर भी उसका छूटना कठिन है


चेतन आत्मा का पर्याय है चेतना रखने वाला चैतन्य कहा जाता है अर्थात् चित्
इसी चित् के साथ सत् और आनन्द से मिलकर सच्चिदानन्द बना है सत् का अर्थ है जो यथार्थ है चित् का अर्थ है जो चैतन्य है अर्थात् जाग्रत है और आनन्द का अर्थ है जो सतत आनन्दित है
वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत कहता है परमात्मा में ये तीनों तत्व हैं जीवात्मा में सत् और चित् दोनों का आविर्भाव है किन्तु आनन्द का तिरोभाव है
जड़ में केवल सत् है

यह नाना प्रकार का जगत परमात्मा के सामर्थ्य से उत्पन्न हुआ है
आचार्य जी ने यह भी बताया कि जड़ में सुप्त चैतन्य है
आचार्य जी ने हमारे सनातन धर्म में चेतन से संबन्ध रखने वाले जात कर्म संस्कार की चर्चा की जिसका एक भाग है
मेधाजनन या प्रज्ञाजनन और दूसरा आयुष्य
जिसमें पिता दीर्घायु की कामना करते हुए कहता है

अङ्गादङ्गात्संभवसि हृदयादधिजायसे।
आत्मा त्वं पुत्र माविध स जीव शरदः शतमसाविति नामास्य गृह्णाति।
अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव तेजो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतमसाविति
...
 हे पुत्र! तुम नरक से पार करने वाले हो। तुम मेरे अंग-प्रत्यङ्ग से उत्पन्न हुए हो। मेरे हृदय से तुम्हारा प्राकट्य हुआ है। तुम स्वयं मेरे ही आत्म स्वरूप हो। तुमने ही हमारे वंश की रक्षा की है। हे पुत्र! तुम शतायु हो’। तुम्हारा शरीर पत्थर की भांति सुगठित, बलवान्, स्वस्थ एवं नीरोग बने। तुम कुठार के सदृश शत्रुओं का दमन करने वाले तथा सुवर्ण राशि की तरह सभी के प्रिय बनो......


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया मुकेश जी भैया त्रिलोचन जी का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें

3.1.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 3 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण *८८८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है स्थिरबुद्धि ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 3 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण

  *८८८ वां* सार -संक्षेप

 1 विचार या संकल्प का पक्का


आचार्य जी का नित्य प्रयास रहता है कि हमारे सुप्त भावों को जाग्रत करें क्योंकि हम अपने लिए सुख शान्ति यश शक्ति की कामना करते हैं
हम स्वयं तो इन सबकी कामना करें अगली पीढ़ी को भी इसे संप्रेषित करें
इस यशस्विता को गौरवमय बनाने हेतु पुरुषार्थ पराक्रम करने के लिए हम उद्यत तो होते हैं लेकिन परेशान हो जाते हैं इन सदाचार संप्रेषणों में हमें इन्हीं परेशानियों के समाधान प्राप्त होते हैं

मनुष्य ने जीवन को इतना अधिक भोगमय बना लिया है कि प्रकृति भी कुपित रहने लगी है
प्रकृति के संसाधनों का अनुचित दोहन हो रहा है जब कि हमारी आर्ष परम्परा कहती है कि त्यागपूर्वक उपभोग करें


ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥

इसी उपनिषद् का दूसरा छंद है

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥

ईश्वर द्वारा रचित इस संसार में कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए । हे मानव! तुम्हारे लिए इससे भिन्न विधान नहीं है, इस प्रकार कर्म करते हुए ही

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।


 जीने की इच्छा करने से मानव में कर्म का लेप नहीं होता है
ईशावास्योपनिषद् के दूसरे छन्द को युगभारती की प्रार्थना में सम्मिलित किया जा सकता है
गीता के दूसरे अध्याय में

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।

तस्माद्योगाय युज्यस्व *योगः कर्मसु कौशलम्*।।2.50।।
पूर्णरूप से भगवद्भक्ति में लीन रहते हुए हम लोग कुशलतापूर्वक काम करते चलें योग का अर्थ है परमात्म तत्त्व से संयुत होना
हम गीता को अपने कार्य व्यवहार में अवतरित करने का प्रयास करें हमें लाभ मिलेगा

समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं
महत्पदं पुण्ययशो मुरारेः ।
भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं
पदं पदं यद् विपदां न तेषाम् ॥ ५८


जिन्होंने पुण्यकीर्ति मुकुन्द मुरारि के पदपल्लव की नौका का आश्रय लिया है,क्योंकि वह सत्पुरुषों का सर्वस्व है,उनके लिए यह भव-सागर बछड़े के खुर के गढ़े जैसा है । उन्हें परमपद मिल जाता है और उनके लिए यह संसार कष्टों का निवासस्थान नहीं रहता है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी का नाम क्यों लिया बैरिस्टर साहब ने कश्मीर से आ रही सूचनाओं पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की आचार्य जी ने
 गांधी जी के विषय में क्या कहा आदि जानने के लिए सुनें

2.1.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष षष्ठी/सप्तमी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 2 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण *८८७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है स्थिरधी ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष षष्ठी/सप्तमी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 2 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण

  *८८७ वां* सार -संक्षेप

1 विचार या संकल्प का पक्का

(कल सोनी ऐंटरटेनमेंट चैनल पर स्वस्तिक प्रोडक्शन्स के बैनर तले श्रीमद् रामायण धारावाहिक प्रारम्भ हुआ
कल इसमें दिखाया गया कि राजा नेमी कैसे दशरथ हुए

केकेय देश के राजा अश्वपति और शुभलक्षणा की कन्या वीराङ्गना ' कैकेई ' राजा नेमी के साथ शम्बर के विरुद्ध युद्ध में इन्द्र की सहायतार्थ गई थींl युद्ध में नेमी के रथ का धुरा टूट गया उस समय कैकेई ने धुरे में अपना हाथ लगाकर रथ को टूटने से बचाया और नेमी युद्ध करते रहे और विजयी हुए)

वाणी परमात्मा का प्रसाद है यदि वैखरी वाणी प्रभावकारिणी हो तो यह सौभाग्य की बात है अतः संयम के साथ इसका प्रयोग करना चाहिए हमें वाणी की वन्दना भी करनी चाहिए
मां सरस्वती की वन्दना में मां सरस्वती

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
 
शुक्लवर्ण वाली,संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों को दूर करने वाली, अज्ञान के अंधेरे को मिटाने वाली

हैं

ये वाणी हमारे विवेक की अभिव्यक्ति है
यूट्यूब के एक वीडियो का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने बताया कि निश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज के एक शिष्य, जिन्हें अद्भुत वाणी प्राप्त है,बार बार एक ही बात कह रहे थे कि जो शास्त्रसम्मत नहीं है वह नहीं मानना चाहिए

पुराणं सर्व शास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणां स्मृतम् ।

यह शास्त्र ईश्वरप्रदत्त ज्ञान का पल्लवन है इसी ज्ञान का नाम वेद है इसी कारण वेद को अपौरुषेय कहा गया है

हमारे पास शास्त्रीय ग्रंथों का भण्डार है इनमें बहुत से विधि विधान हैं लेकिन
हम इन्हीं अनुसंधानों में रत रहे और शक्ति का संवर्धन नहीं किया तो दुष्ट हावी हो गए इसी कारण अध्यात्म शौर्य प्रमंडित होना ही चाहिए
इस सृष्टि में सत्य के साथ असत्य भी है विकास के साथ विनाश भी है यह सृष्टि एक लीलाभूमि ही है व्यक्ति की कल्पनाओं का विस्तार अनन्त है इसी कारण कहा भी जाता है जो परमात्मा का चिन्तन है वही जीवात्मा का चिन्तन है
परमात्मा को सहयोग नहीं चाहिए लेकिन जीवात्मा को चाहिए
आचार्य जी सदैव यही कामना करते हैं कि हम समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी जीवन जिएं शक्ति भक्ति विश्वास संयम की अनुभूति करते रहें शुद्धि का भी ध्यान रखें जैसे हमारा खानपान शुद्ध हो
शुद्धि हमारे अन्दर शक्ति का प्रवेश करा देती है
हमें मनुष्य का जीवन मिला है हम इसके वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए कुछ समय तो निकालें ही आत्मस्थ होने की चेष्टा करें ध्यान धारणा करें

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने श्री बालेश्वर जी का कौन सा प्रसंग बताया विद्यालय में वार्षिकोत्सव का विस्तार किसके कहने पर हुआ आदि जानने के लिए सुनें

1.1.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 1 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण *८८६ वां* सार -संक्षेप

 नववर्ष नहीं यह रामवर्ष उल्लास उमंगों वाला है

हर राष्ट्र -भक्त उल्लसित आज निशचर कुल का मुंह काला है
-आचार्य श्री ओम शङ्कर जी

युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

प्रस्तुत है स्थिरचेतस् ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रम संवत् २०८० तदनुसार 1 जनवरी 2024 का सदाचार संप्रेषण
  *८८६ वां* सार -संक्षेप

 1 विचार या संकल्प का पक्का

समय आये तो इसका लाभ उठाते हुए शक्ति का उल्लास, भक्ति का विश्वास और आत्मशक्ति का विकास होना ही चाहिए ऐसे अवसर को चूकना नहीं चाहिए

इन सदाचार संप्रेषणों के रूप में हमें ऐसा ही समय मिला है हमें इसका लाभ उठाकर आत्मबोधोत्सव मनाना चाहिए अग्नि के अङ्गारे शान्त नहीं बैठते
प्राणिक ऊर्जा के प्रकाश से जीवन-पथ का तिमिर हटाएँ ।
सम्मोहन के घटाटोप से
आत्मज्योति को मुक्त बनाएँ। ।
समय पौरुष पुरुषार्थ की परीक्षा लेता है जिसमें भारतवर्ष सदैव सफल रहा है

मैंने छाती का लहू पिला पाले विदेश के क्षुधित लाल।
मुझ को मानव में भेद नहीं, मेरा अंतस्थल वर विशाल।
जग के ठुकराए लोगों को, लो मेरे घर का खुला द्वार।
अपना सब कुछ लुटा चुका, फिर भी अक्षय है धनागार l

मैं तेज पुंज, तमलीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश।
जगती का रच करके विनाश, कब चाहा है निज का विकास?
शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन दे कर।
विश्वास नहीं यदि आता तो साक्षी है यह इतिहास अमर।

ऐसा अद्भुत है इतिहास हमारा

तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ।

माँगि कै खैबो, मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ॥
मसीत अब पुनः मंदिर के रूप में हमारे सामने है
राम मंदिर बन जाने से संपूर्ण भारत की अस्मिता का भावावेग जाग गया है

राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे ।
 घोर-भव नीर-निधि नाम निज नाव रे ll

 
राम मंदिर हेतु श्रद्धेय अशोक सिंघल जी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता उन पर लिखी आचार्य जी की ये पंक्तियां देखिए
जय श्रीराम" शौर्य-स्वर देकर जिसने देश जगाया था ,
जिस स्वर ने हिंदुत्व धार को खरतर कर चमकाया था ,
जिसने भाव भक्ति को विक्रम का उद्बोध कराया था,
जिसने दंभी राजतंत्र को घुटनों बल बैठाया था....

साधकों की साधना सतत चलती रहती है
हम लोग भी गांव गांव जाएं और दीप जलाएं
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने श्री गुलाब सिंह परिहार जी का नाम क्यों लिया एक शिक्षा मन्त्री की चर्चा क्यों हुई
 आदि जानने के लिए सुनें