30.9.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 30सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं काञ्चनम्।

वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसम्भाषणम्।।

बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं, लङ्कापुरीदाहनम्।

पश्चाद् रावण कुम्भकर्णादि हननम् एतद्धि रामायणम्।।



प्रस्तुत है निधि आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 30सितम्बर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/63

निधिः =सद्गुणसंपन्न व्यक्ति


मनुष्य को  कल्पनालोक का आनन्द मिला है 

बहुत सी कल्पनाओं का चित्र स्मृतियों के साथ उसकी संबद्धता भावनाओं के साथ उसका विस्तार अभिव्यक्ति का आनन्द मनुष्य को मिला ईश्वरीय वरदान है


जिसे इसका आनन्द नहीं मिल पाता वह भाग्यहीन है

हम लोग भाग्यशाली हैं सत्कर्मों का प्रदेय है पूर्वजन्म के संस्कार हैं कि ये सदाचार संप्रेषण हमें सात्विक विचारों वाले समाजोन्मुखी जीवन जीते हुए सन्मार्ग की ओर चलने के लिये प्रेरित करते हैं 

और याद दिलाते हैं कि अध्यात्म भी शौर्य प्रमण्डित हो


सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुंदरं

*पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्‌*।

राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं

सीतालक्ष्मणसंयुतं *पथिगतं* रामाभिरामं भजे ॥2॥


*निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह*।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥



रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥

रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥



राम -कथा के बालकांड में तुलसी ने बहुत से चिन्तनपरक तात्विक विचार प्रस्तुत किये हैं तुलसी की रामकथा अद्वितीय है लिखी तो बहुत से लोगों ने

संवेदनशील व्यक्ति रामकथा के बिना रह ही नहीं सकते क्योंकि राम तो रोम रोम में बसे हैं 

राम -कथा शक्ति शौर्य उत्साह पराक्रम करुणा दया भक्ति प्रेम  सद्चरित्र संयम की एक सुंदर ताली है, जो संदेह रूपी पक्षियों को उड़ा देती है।  राम-कथा कलियुगरूपी तरु को काटने के लिए कुल्हाड़ी है

हे गिरिराजकुमारी! तुम इसे आदरपूर्वक सुनो




लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।

ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥17॥

अरण्य कांड में इसके आगे चलते हैं 


नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥

खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥1॥


तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥

धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥2॥


नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥

सूपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥3॥



लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥

रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥6॥




कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।

मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥

कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।

चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥


आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट।

जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥18॥



प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥

सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥1॥


नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥

हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥2॥


जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥

देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥3॥

इसके उत्तर में भगवान् राम कहते हैं (यही रामत्व हमें धारण करना चाहिये )

हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥

रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥5॥


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने गायत्री मन्त्र के विषय में क्या बताया भैया पङ्कज जी की चर्चा क्यों की जानने के लिये सुनें

29.9.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 29 सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है शौर्य -लिबिङ्कर आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 29 सितम्बर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/62


लिबिङ्कर=लेखक



संवादहीनता के कारण संसार हमें बहुत बड़े व्यामोह में डुबो देता है और तब हम शंकालु होकर अपनों पर और अपने पर शंका करने लगते हैं संसार का संवादात्मक स्वरूप रचनात्मक और विवेक की ओर उन्मुख संसारत्व है


हम लोगों का सौभाग्य है कि पूज्य गुरु जी,दीनदयाल जी, अशोक सिंघल जी, बैरिस्टर जी आदि के सान्निध्य से मिले बहुत सारे सद्गुणों के भण्डार आचार्य जी नित्य हमें सद्चिन्तन सद्विचारों सद्प्रयासों की ओर उन्मुख करते हैं



इसलिये निश्शंक भाव के साथ आशान्वित रहते हुए संघर्षों से बिना भयभीत हुए दम्भरहित होकर आत्मविश्वासयुक्त होकर राष्ट्र के प्रति निष्ठावान होते हुए हमें अपने लक्ष्य की ओर चलते रहना चाहिये ये ही रामत्व के लक्षण हैं



आइये इसी रामत्व की चिन्तना के साथ अरण्य कांड में प्रवेश करते हैं


भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥

प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥3॥



भगवान् राम सतत साधनारत लक्ष्मण को समझा रहे हैं कि तुम किसी गलत रास्ते पर नहीं चल रहे हो 

भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥

एहि बिधि कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥1॥


संघर्ष निकट है लेकिन  आत्मशक्ति के कारण परमात्मा के प्रति भक्ति का भाव बहुत प्रबल हो जाता है


जिनके मन में यह भाव अवतरित हो जाता है वो संघर्ष भी आनन्द के साथ करते हैं


मानस में केवल भक्ति नहीं है इसमें शक्ति शौर्य विश्वास संयम साधना आदि बहुत कुछ है

सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥

पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥2॥

रावण साधना भी भोग की सिद्धि के लिये करता है


वह दंभी विद्वान है


रावण ने पाताल लोक को जीतने के लिए अपनी बहन शूर्पणखा के पति विद्युत्जिह्व का वध कर डाला 

और फिर शूर्पणखा को भारत भेज दिया,रक्षा के लिये खर दूषण त्रिशरा को साथ भेज दिया

वह  स्वैराचारी बनी भारत में घूमने लगी


भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥

होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥3॥


रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥

तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥4॥


मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥

तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥5॥


सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥

गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥6॥



..


लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।

ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥17॥


आज के समय की बात करें तो राम रावण युद्ध कैसे सन्निकट है जानने के लिये सुनें

28.9.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 28 सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है विद्योतन आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 28 सितम्बर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/61


विद्योतन =प्रकाश करने वाला


स्थान :उन्नाव



ढोंग का इस समय बोलबाला है भ्रमित होकर संसार की सारी समस्याओं का हल खोजना लगातार जारी है


पढ़ने सीखने समझने मनन करने निदिध्यासन करने के बाद अभ्यस्त होकर सहज ढंग से जीवन के क्षेत्र में बिना दम्भ के विघ्नों को अपनी शक्ति सामर्थ्य के साथ हल करते चलने से जीवन के आनन्द की अनुभूति सहज प्राप्त होने लगती है

लोग रामचरित मानस में बाल कांड उत्तर कांड में तत्त्व ज्ञान चिन्तन के लिये, कथा के आनन्द के लिये अयोध्या कांड में ,शौर्य पराक्रम सफलता से उत्साहित होने के लिये सुन्दर कांड में ,लोक व्यवहार और समस्याओं के हल के लिये किष्किन्धा कांड में जाते हैं अरण्य कांड में

 बहुत उतार चढ़ाव हैं इस में भक्ति, संघर्ष, राम -गीता, नारद संवाद है

आइये इसी कांड में राम गीता भाग में प्रवेश करते हैं


पञ्चवटी अत्यन्त दिव्य और सुरम्य स्थान है भगवान् राम सुन्दर सी पर्णशाला में शान्ति से बैठे हुए हैं कवि का कौशल  देखिये कि ऐसे समय में ध्यान धारणा चिन्तन मनन की बात कर समय का सदुपयोग करने का प्रयास हो रहा है समय के क्षणांश का उपयोग शक्ति बुद्धि विवेक के सामञ्जस्य वाले सात्विक पुरुषों का लक्षण है


ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥

कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥4॥


ज्ञान वह है जिसमें  मान आदि दोष न हो एवं जो सबसे समान रूप से ब्रह्म को देखता है। परम वैराग्यवान वही है जो  समस्त सिद्धियों को,तीनों गुणों को तृण के समान त्याग चुका हो



(वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय-निग्रहस् तपः ।

अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते त्रिवृत्त-रागस्य गृहं तपोवनम् ॥ ९० ॥)


माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।

बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥15॥


धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥

जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥1॥


सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥

भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥2॥


हमारे ग्रन्थ हमारा साहित्य हमारा धर्म, दर्शन अद्भुत हैं हमें विद्या अविद्या दोनों को जानने की आवश्यकता है

इसी कारण आचार्य जी राम चरित मानस को पढ़ने के लिये परामर्श देते हैं


हमारे अन्दर से यदि तात्विक प्रश्नों के उत्तर निकलने लगें तो स्वाध्याय सफल हो जाता है


समाज इसी कारण संकट में है क्योंकि पूरा जीवन पैसे पर टिका है


इसी समाज में हम अपने अंदर के तत्व को शक्ति को सद्विचार को जान जायें इसी का आचार्य जी प्रतिदिन प्रयास करते हैं

आचार्य जी मोमबत्ती जलाये हुए हैं हम उस प्रकाश में सन्मार्ग की ओर उन्मुख हों तो हमारा कल्याण होगा

27.9.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 27 सितम्बर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है सुवेल आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 27 सितम्बर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

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सार -संक्षेप 2/60


सुवेल =विनम्र



सुविज्ञ होने के बाद भी अत्यन्त सुवेल आचार्य जी के विशुद्ध पावन भाव हमें मार्गदर्शन दे रहे हैं यह हम लोगों का सौभाग्य है


अपनी सांसारिक यात्रा में हम लोग दृश्यों का आनन्द लेते हुए  सांसारिक प्रपंचों से मुक्ति पाने के उपाय खोजते हुए  अपने पर परमात्मा पर विश्वास करते हुए सन्त्रास को पराजित करते हुए अपने सनातन धर्म पर पूर्ण विश्वास करते हुए शौर्य प्रमण्डित अध्यात्म को स्वीकारते हुए  सहयोग सामञ्जस्य स्वारस्य का अनुभव करते हुए इस धरा को निशाचरहीन करने का संकल्प लेते हुए आगे चलते रहें इसी का प्रयास आचार्य जी प्रतिदिन करते हैं


आचार्य जी अयोध्या कांड में लक्ष्मण गीता का उल्लेख कर रहे हैं


निषाद के प्रश्न और लक्ष्मण के उत्तर


कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपन कीन्ह।

जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥91॥

जब निषाद इष्टदेव को कष्ट में देख रहे हैं



भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥

भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥1॥

ऐसा भाव है राम के प्रति



तब

बोले लखन मधुर मृदु बानी।




काहु न कोउ सुख दु:ख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥2॥

जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥

जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू॥3॥


दरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥

देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥4॥



विवेक उत्पन्न हो और मोह भाग जाये यह है लक्ष्मण गीता



आइये अब राम गीता में प्रवेश करते हैं जहां लक्ष्मण के प्रश्न



(एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥)




सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥3॥

मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥

कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥4॥


ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।

जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥14॥


(ज्ञानी जब जिज्ञासु हो जाता है तो अत्यन्त अद्भुत स्थिति होती है)

 के उत्तर में राम जी कहते हैं 


थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥

मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥


जो नहीं है वह ही माया है 


गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥

तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥2॥


विद्या और अविद्या में अन्तर है आत्मज्ञान सहज प्राप्त नहीं होता है 


एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥

एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥3॥


ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥

कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥4॥

सारा संसार त्रिगुणात्मक है


माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।

बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥15॥


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने देवेन्द्र सिकरवार द्वारा लिखित अनसंग हीरोज इन्दु से सिन्धु तक पुस्तक की चर्चा की, 100 ग्राम के लिये क्या कटाजुज्झ हुआ जानने के लिये सुनें

26.9.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 26 सितम्बर 2022(नवरात्र प्रारम्भ ) का सदाचार संप्रेषण

 सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥

जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥2॥


प्रस्तुत है प्रत्ययकारक आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 26 सितम्बर 2022(नवरात्र प्रारम्भ )

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सार -संक्षेप 2/59


प्रत्ययकारकः =विश्वास पैदा करने वाला



आत्म का विस्तार जब व्यवहार में प्रकट होता है तब समाज की व्यवस्थाएं हमारे मनोनुकूल बनती हैं इसी मनोनुकूल वातावरण से हम उत्साहित होते हैं ऐसा वातावरण न हो तो हम कुंठित होते हैं 




सांकेतिक व्यवहार /कार्य भी अत्यन्त उपयोगी होते हैं इनसे सिलसिला संयुत रहता है जैसे

कल संपन्न हुआ वार्षिक अधिवेशन जिसे वार्षिक सम्मेलन कहा जाये तो ज्यादा उचित होगा क्योंकि यह अल्पकाल का था चिन्तन अभिव्यक्ति उत्साह का मिलाजुला स्वरूप अधिवेशन है इस सम्मेलन की समीक्षा बैठक अवश्य करें जो सदस्य नहीं आ पाये उनका कुशल क्षेम पूछें


हमारे यहां शिक्षार्थियों को कभी समाज  संपोषित किया करता था ज्ञान और व्यवहार का सामञ्जस्य हमारे देश की शिक्षा की थाती है



आइये अरण्य कांड में प्रवेश करते हैं


चले राम मुनि आयुस पाई, तुरतहि पंचवटी नियराई।



पंचवटी गोदावरी के उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर से लगभग  32 कि.मी.दूर है 


पंचानां वटानां समाहार इति पंचवटी'। ये पांच वट हैं अशोक अश्वत्थ आमलक वट और विल्ब


गङ्गे ! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति! नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जलेSस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

स्नान करते समय यह मन्त्र हम लोग बोलते हैं सन्ध्योपासन में संपूर्ण आर्यावर्त का चिन्तन करते हैं

ऐसी विलक्षण संस्कृति है हमारी , हम लोग अपने को पहचानने की कोशिश करें


गीधराज सै भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।

गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥13॥


जटायुं जी भगवान् राम को आश्वस्त करते हैं कि आप लोग मेरी छत्रछाया में सुरक्षित हैं अपने लोगों की छाया में परिवार भी सुरक्षित रहते हैं


जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥

गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥1॥


खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं॥

सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥2॥


एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥

सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥3॥



मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥

कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥4॥



ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।

जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥14॥



थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥

मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥


इसके बाद राम गीता प्रारम्भ होगी


भैया दृश्यमुनि, श्री योगेन्द्र भार्गव, भैया डा अमित गुप्त

भैया डा पङ्कज

 भैया मनीष कृष्णा, भैया विधुकांत का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया आदि भी जानने के लिये सुनें