31.12.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८१ (कालयुक्त संवत्सर ) 31 दिसंबर 2024 का सदाचार सम्प्रेषण *१२५१ वां* सार -संक्षेप

 बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥

प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥1॥


प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८१  (कालयुक्त संवत्सर ) 31 दिसंबर 2024  का  सदाचार सम्प्रेषण 

  *१२५१ वां* सार -संक्षेप


हमारा सौभाग्य है कि आजीवन भारत माता की सेवा में सन्नद्ध होने का संकल्प लेने वाले आचार्य जी का १८ जुलाई १९७० से प्रारम्भ हुआ  दाम्भिक अनुभूति से इतर भावना पर आधारित  संकल्पबद्ध शिक्षकत्व सदैव हमें शिक्षित प्रेरित उत्साहित संस्कारित करता रहा है हमारा मार्गदर्शन करता रहा है तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में 


आचार्य जी  परामर्श दे रहे हैं कि हम इस भाव के साथ कि 


" प्रचण्ड तेजोमय शारीरिक बल, प्रबल आत्मविश्वास युक्त बौद्धिक क्षमता एवं निस्सीम भाव सम्पन्ना मनः शक्ति का अर्जन कर अपने जीवन को निःस्पृह भाव से भारत माता के चरणों में अर्पित करना ही हमारा परम साध्य है l "

संकल्पी जीवन जीने का प्रयास करें और यह अनुभूति करें कि 

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपः विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्। सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः

हम तो 

चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्


मानस एक अद्भुत ग्रंथ है इसे हम यदि अपने मानस में उतार लें तो इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता इस ग्रंथ की जितनी चर्चा की जाए उतनी कम है यदि हम खोजने का प्रयास करें तो इसके प्रत्येक कांड में ज्ञान, वैराग्य, शक्ति की उपासना और आत्मस्वरूप के दर्शन होते हैं

आइये भगवान् राम का स्मरण इस प्रकार करें ताकि हम शौर्य पराक्रम शक्ति तप त्याग संयम सेवा की अनुभूति कर सकें 

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं

शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्‌।

पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं।

नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्‌॥1।


मयूर के कण्ठ की आभा के समान  नीलवर्ण, सुरों में श्रेष्ठ, ब्राह्मण भृगुजी के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीत वस्त्रधारी, सरसिज अर्थात् कमल के नेत्र,  (नरलीला करते समय दुःख व्यक्त करने वाले अन्यथा) सदा ही अत्यन्त प्रसन्न, हाथों में बाण और धनुष धारण किए हुए जो शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराता है , वानर समूह से युक्त, लक्ष्मण जी से सेवित, स्तुति किए जाने योग्य,सीता जी के पति, रघुकुल श्रेष्ठ, पुष्पक विमान पर सवार श्री राम जी को मैं निरंतर नमस्कार करता हूँ


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया मनीष कृष्णा जी भैया पंकज जी भैया यज्ञदत्त जी का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें

30.12.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८१ (कालयुक्त संवत्सर ) 30 दिसंबर 2024 का सदाचार सम्प्रेषण *१२५० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८१  (कालयुक्त संवत्सर ) 30 दिसंबर 2024  का  सदाचार सम्प्रेषण 

  *१२५० वां* सार -संक्षेप

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः को चरितार्थ करते हुए राष्ट्र -जागरण का महान् कार्य करने वाले  और यह अनुभव करने वाले कि दुष्टों के व्याघात से भारतवर्ष सदैव मुक्त हो जाए हविर्याजी आचार्य जी का प्रयास रहता है कि उनकी दृष्टि में हम जो पं दीनदयाल के अंश के अंश के रूप में हैं उनमें  ज्ञान बुद्धि विवेक प्रेम आत्मीयता शक्ति कूट कूट कर भर जाए हम भावसम्पन्न हो जाएं 

कल सम्पन्न हुए कार्यक्रम में प्रेम आत्मीयता की अद्भुत झलक देखने को मिली इसी प्रेम आत्मीयता का विस्तार संसार का आनन्द है

मनुष्य के जीवन में एक सहज प्रवाह चल रहा होता है पर्व उत्सव समुत्सव कार्यक्रम उस सहज प्रवाह को गति देने का कार्य करते हैं ये पर्व आदि मति देने का काम भी करते हैं


ये हमारे यहां संस्कार की एक विधि व्यवस्था रही है इसे हम विचारपूर्वक करते रहें इस तरह के संस्कारी जीवन से हमें उत्साह मिलता है


यदि कोई व्यक्ति उत्साह, तत्पर,

व्यापार करने में निपुण, व्यसनों से मुक्त, बहादुर,कृतज्ञ, अपने व्यवहार में दृढ़ है और मैत्रीपूर्ण व्यवहार करता है, तो धन की देवी महालक्ष्मी स्वयं उसके निवास में निवास करती हैं

लक्ष्मी और सरस्वती में बैर भी नहीं है जो व्यक्ति सरस्वतीवान् होता है लक्ष्मी के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता है किन्तु उसके प्रति अतिलालायित नहीं रहता है उससे सम्पन्न कोई नहीं है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया 

भगवान् राम का जीवन आदर्श जीवन  है हमें इसका अनुभव करना चाहिए 

मानस के अयोध्या कांड में लक्ष्मण गीता का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने बताया कि ८९ वें दोहे से ९८ वें दोहे तक के बीच की चौपाइयों को बार बार देखें 

पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।

चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि॥95॥

आप जाकर पिताजी के चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कार के साथ ही हाथ जोड़कर निवेदन करिएगा कि हे तात! आप मेरी किसी बात के लिए चिन्तित नहीं हों

भैया आलोक सिंह जी सतना वाले और भैया विकास मिश्र जी का उल्लेख क्यों हुआ फरवरी के किस कार्यक्रम की चर्चा हुई जानने के लिए सुनें

29.12.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८१ (कालयुक्त संवत्सर ) 29 दिसंबर 2024 का सदाचार सम्प्रेषण *१२४९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८१  (कालयुक्त संवत्सर ) 29 दिसंबर 2024  का  सदाचार सम्प्रेषण 

  *१२४९ वां* सार -संक्षेप


नाम रूपात्मक जगत्  एक बहुत ही गहरा और दार्शनिक विचार है

 हमारा जगत् नाम और रूप से बना हुआ है। यह विचार हमें यह स्मरण कराता है कि इस जगत् में सब कुछ नाम और रूप से जुड़ा हुआ है नाम के साथ भाव संयुत है जैसे भारत नाम आते हमारे भाव उससे संयुत हो जाते  हैं 

 इस जगत् में भारत का अपना वैशिष्ट्य है  आचार्य जी की भावभूमि के जाग्रत स्वरूप के रूप में विद्यमान हम लोगों को उसी वैशिष्ट्य के दर्शन कराने का प्रयास आचार्य जी करते हैं

भारत भगवान् राम की कर्मभूमि है मानस में एक प्रसंग है अयोध्या कांड का 

 प्रसंग है भगवान राम के लिए निषादराज से लक्ष्मण कहते हैं कि इन्हें मात्र अपना मित्र न समझें 


भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।

करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल॥93॥


वही कृपालु प्रभु श्री राम भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गाय और देवताओं के कल्याण हेतु मनुष्य शरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं, जिनके सुनने मात्र से जगत् के जंजाल मिट जाते हैं

यही हमारे सबके मन में भी आना चाहिए हम उन्हीं के अंश हैं समय समय पर रामत्व प्रकट भी होता है 

हमें समाज और देश के लिए कुछ करना है यह भाव रखें आत्मीयता का विस्तार करें 


उठें प्रात: सभी उत्साह का उत्सव मनाने को

निशा में नींद के पहले कि कुछ यह गुनगुनाने को 

बड़ा सौभाग्य है अपना कि भारतभूमि में जन्मे 

स्वयं की कर्मनिष्ठा शौर्य नवयुग को सुनाने को




फल की आकांक्षा किए बिना हम कर्म करने में विश्वास करते हैं हम यह भी मानते हैं कि हम अक्षर हैं अविनाशी हैं चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् 



इसी तरह दीनदयाल विद्यालय का नाम आते ही हमारे भाव उससे संयुत हो जाते हैं 

पं दीनदयाल उपाध्याय जी का जीवन कर्म और चैतन्य एक एक स्वयंसेवक में अत्यन्त मार्मिक स्वरूप में विद्यमान था क्योंकि दुष्टों ने उनकी हत्या कर दी थी और तब विचार आया कि अनेक दीनदयाल खड़े किए जाएंगे और इस तरह दीनदयाल विद्यालय प्रारम्भ हो गया जिसके हम छात्र रहे हैं यह विद्यालय आत्म का विस्तार है शक्ति की संकल्पना है


आज इसी विद्यालय के हम पूर्वछात्रों द्वारा संचालित संस्था युगभारती का एक विशेष कार्यक्रम है जिसमें आप सभी सादर आमन्त्रित हैं 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने श्री अशोक सिंघल जी का नाम क्यों लिया जब विद्यालय में labs बन गईं तो एक छात्र ने क्या कहा था जानने के लिए सुनें

28.12.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८१ (कालयुक्त संवत्सर ) 28 दिसंबर 2024 का सदाचार सम्प्रेषण *१२४८ वां* सार -संक्षेप

 न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:


न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥3॥


प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८१  (कालयुक्त संवत्सर ) 28 दिसंबर 2024  का  सदाचार सम्प्रेषण 

  *१२४८ वां* सार -संक्षेप


इन सदाचार संप्रेषणों को हम वेदमार्ग के अनुयायी लोग ध्यान से सुनें चिन्तन करें और उसके पश्चात् यदि अपने जीवन में कार्यान्वित करेंगे तो हमें लाभ पहुंचेगा

इन्हें सुनकर हम शक्ति अर्जित करें असार संसार से इतर भी अपना चिन्तन रखें हम विभु आत्मा के अंश हैं यह अनुभूति करते हुए मनुष्यत्व की राह पकड़ें प्रेम आत्मीयता का पल्लवन करें अपने जीवन का तिमिर भगाएं प्रशंसा और निन्दा दोनों को पचाना सीखें देने का भाव रखें 

देवताओं में देने का भाव होता है वे अपने अपने भागों को प्राप्त कर संतुष्ट रहते हैं  यही दैवीय चिन्तन है इसी चिन्तन के आधार पर हम मानते हैं जो कुछ इस संसार में है वह सब ईश्वर का है 

देने का भाव न रख उससे इतर भाव रखेंगे तो कष्ट में रहेंगे व्यथित रहेंगे 


संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।

 हम सब एक साथ चलें; एक साथ बोलें; हमारे मन एक हों। प्राचीन काल में देवताओं का  आचरण ऐसा ही रहा इसी कारण से वे वन्दनीय हैं।

हम  अपनी संवेदनाओं विचारों विश्वासों के साथ एक दूसरे से संयुत रहें एक दूसरे से बोलें 

अपनी भुजाओं की शक्ति को पहचानते हुए हम यह अनुभूति करें कि कभी हम विश्व गुरु थे 

हम हैं वही जिन्होंने सागर पर पत्थर तैराए थे....


इसके अतिरिक्त हम लोगों के गांव सरौंहां में स्थित वाटर फिल्टर कैसे सही हुआ हरमेश जी का उल्लेख क्यों हुआ

जानने के लिए सुनें

27.12.24

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का पौष कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८१ (कालयुक्त संवत्सर ) 27 दिसंबर 2024 का सदाचार सम्प्रेषण *१२४७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज पौष कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८१  (कालयुक्त संवत्सर ) 27 दिसंबर 2024  का  सदाचार सम्प्रेषण 

  *१२४७ वां* सार -संक्षेप


हमारा लक्ष्य यूं तो वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः है ही हम अपना लक्ष्य यह भी बनाएं कि हमें अपने संगठन युगभारती को आजीवन जीवित जाग्रत रखना है और यह जाग्रत तब रहेगा जब हम स्वयं जाग्रत रहेंगे अपने विकारों को दूर करते चलेंगे इन सदाचार संप्रेषणों का उद्देश्य भी यही है कि आचार्य जी के हम भावांश अपने विकार दूर करें सामाजिक चिन्तन का चाव  रखें,भारतीय संस्कृति, मूल्यों और परंपराओं में योगदान करें राष्ट्र के लिए जाग्रत पुरोहित बनें, कुटुम्ब आधारित भारत में अपने कुटुम्बी के शारीरिक मानसिक भौतिक आध्यात्मिक कष्ट को दूर करें  इन वेलाओं के हर क्षण का आनन्द लेते हुए अपनी शक्ति शौर्य पराक्रम का संवर्धन करें किन्तु विनम्रता का त्याग किए बिना 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने

१७ सितम्बर​ १९५७ को एक मध्यवर्ग गुजराती ब्राह्मण परिवार में दिवंगत श्री वैकुंठनाथ जी नागर और श्रीमती लक्ष्मी नागर के घर, प्रयाग में गंगा नदी के तट पर बसे दारागंज में जन्मे सुन्दर कांड के अद्भुत वाचक श्री अजय याज्ञिक की चर्चा क्यों की भैया पुनीत श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ भैया नीरज मैली चादर वाले क्या सहायता चाहते हैं भैया नीरज कुमार जी  १९८१ का नाम क्यों आया १९७५ बैच के अगले वर्ष ५० वर्ष पूर्ण हो रहे हैं तो हमें क्या करना है भैया मुकेश जी का जनरेटर से संबन्धित क्या प्रकरण था भैया विकास जी का फरवरी वाला क्या कार्यक्रम है जानने के लिए सुनें