30.6.25

प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 30 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४३२ वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार  30 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४३२ वां सार -संक्षेप



प्रचंड शक्ति से प्रहार सत्य का प्रचार हो,

अखंड राष्ट्रभक्ति युक्ति बुद्धि से विचार हो,

न हार का न वार का प्यार का विकार हो,

असीम भीमशक्ति शौर्य वृत्ति का उभार हो ।


अखंड हिंदुराष्ट्र का सुचित्र चित्त धार लो,

समग्र हिंदु जाति पंथ ग्रंथ को दुलार लो,

हिमाद्रि बिंध्य सिंधु हिंदुभूमि को निहार लो,

निजी चरित्र शौर्य शक्ति भक्ति से निखार लो ।


कि संघबद्धता बढ़े सुकीर्ति शीर्ष पर चढ़े,

निजात्महीनता कढ़े सुशक्ति बुद्धि पर मढ़े,

समग्र हिंदु बंधु बीच प्रेम-भावना बढ़े,

विरोध द्रोह मोह कोह व्यक्ति व्यक्ति से कढ़े।


स्वयं पुरुषार्थ और पराक्रम का वरण करते हुए और भौतिकता के साथ शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की ओर उन्मुखता बनाए रखते हुए भावी पीढ़ी को पुरुषार्थ पराक्रम से युक्त करना  और उसे यह बताना कि मात्र भौतिक ज्ञान प्राप्त कर अर्थसंचय का उपकरण बनना उचित नहीं है हम युगभारती के सदस्यों का कर्तव्य है

हम जो भी कार्य करें उसे ईश्वरार्पित करें इससे हमारे भीतर दंभ नहीं आएगा क्योंकि जो कुछ भी संसार में हो रहा है वह ईश्वरीय व्यवस्था के अन्तर्गत हो रहा है  

हम इस पर भी ध्यान दें कि हम युगभारती के कितने सदस्यों के परिवार टूट रहे हैं ऐसे परिवार टूटने न पाएं इसका अभियान चलाने की आवश्यकता है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया डा अमित जी भैया डा उमेश्वर जी भैया डा प्रदीप त्रिपाठी जी भैया डा पङ्कज जी भैया दिनेश प्रताप जी भैया संतोष मल्ल जी का नाम क्यों लिया भैया विजय गर्ग जी के पास कौन पहुंचा १२ जुलाई  तक का क्या लक्ष्य है जानने के लिए सुनें

29.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 29 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४३१ वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार  29 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४३१ वां सार -संक्षेप

मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह अपने भीतर किसी श्रेष्ठ लक्ष्य का संकल्प करे और फिर उसे सिद्धि तक पहुँचाने के लिए समर्पण, अनुशासन और निरंतर अभ्यास के साथ कार्यरत रहे। लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए जब हम बाधाओं से टकराते हैं, तब हमारे धैर्य, साहस और विवेक की परीक्षा होती है। यही संघर्ष का सौंदर्य है — जहाँ हर बाधा, हर विपरीत परिस्थिति हमें और अधिक सक्षम बनाती है।संसार में रहकर भी जो व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति सजग और जागरूक रहता है, वही सच्चे अर्थों में आनन्द की अनुभूति करता है।

संसार की समस्याओं के सामने हमारे मन में निराशा और अशक्तता का भाव न आए यदि यह अकेले संभव न हो तो किसी और का भी साथ लें

सङ्घे शक्तिः कलौ युगे

अर्जुन के भीतर लक्ष्य के प्रति दृढ़ता,साधना और दक्षता तो थी ही वह संसार के महानतम धनुर्धरों में से एक था। किंतु युद्धभूमि में जब अपने ही संबंधी, गुरु और बंधु-बांधव सामने खड़े दिखाई दिए, तो उसका मन संशय और मोह से आच्छादित हो गया।भगवान् श्रीकृष्ण ने विवेक, धर्म और कर्तव्यबोध के माध्यम से उसका संशय दूर किया l लक्ष्य चाहे कितना भी स्पष्ट हो, यदि मन में संशय है तो कर्म रुक जाता है। जब संशय मिटता है, तभी आत्मा स्थिर होता है, और वही क्षण है जब कर्म योग में परिणत होता है। अर्जुन का रूपांतरण इस बात का प्रतीक है कि स्पष्ट लक्ष्य, गुरु का मार्गदर्शन और मन की निर्मलता — इन तीनों से ही सच्चा कर्म संभव है।

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।


स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।18.73।।


अर्जुन बोले -- हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देह भ्रम भय कुशंका रहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपके आदेश का पालन करूँगा।

ऐसा अद्भुत है गीता ज्ञान 

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।


तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।18.78।



जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।

जहां इस प्रकार का गुरुत्व और शिष्यत्व होता है वह राष्ट्र कभी पराजित नहीं हो सकता कुछ समय के लिए व्याकुल हो सकता है

कभी विलीन नहीं हो सकता अतः निराशा का भाव कभी न लाएं 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने किसे जुनूनी कहा भैया मोहन जी का उल्लेख क्यों किया श्री मां का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें

28.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 28 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४३० वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार  28 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४३० वां सार -संक्षेप

आचार्यजी नित्य प्रयास करते हैं कि हम लोक दृष्टि के साथ दिव्य दृष्टि की गहनता को समझें

दिव्य दृष्टि है

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो


मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।


वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो


वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।

भगवान् कृष्ण कहते हैं

मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य वस्तु हूँ तथा वेदान्त का, वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।।


रावण की भोगदृष्टि अर्थात् लोक दृष्टि और उसकी सत्ता की रक्षा के लिए ऋषियों पर किए गए अत्याचारों का वर्णन अनेक ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। रावण जानता था कि यदि ऋषि यज्ञ, तप, ध्यान, धारणा और साधना में लीन रहेंगे, तो वे ऐसी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर सकते हैं जो उसकी राक्षसी सत्ता के लिए हानिकारक हो सकती है।रावण के हस्तक जैसे खर, दूषण, त्रिशिरा आदि ऋषियों के आश्रमों पर आक्रमण करते थे, उन्हें यज्ञ करने से रोकते थे और उनका वध करते थे। ऋषियों ने श्रीराम से प्रार्थना की:


एहि पश्य शरीराणि मुनीनां भावितात्मनाम्।  हतानां राक्षसैः घोरैः बहूनां बहुधा वने॥ 

वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड

यह स्पष्ट करता है कि रावण की नीति थी कि ऋषियों को भयभीत कर उनके तप, ध्यान और यज्ञ को बाधित किया जाए, जिससे वे आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त न कर सकें

रावण की दृष्टि भोगप्रधान थी। उसका उद्देश्य था कि संसार में केवल उसकी सत्ता और भोग की संस्कृति बनी रहे। वह नहीं चाहता था कि कोई भी व्यक्ति तप, ध्यान या यज्ञ के माध्यम से आत्मिक उन्नति करे। इसलिए वह ऋषियों के आश्रमों को नष्ट करता, यज्ञों को विध्वंस करता और तपस्वियों को मारता था।

रावण की भोगदृष्टि और ऋषियों पर अत्याचार उसके पतन का कारण बने। उसने जो भय और आतंक का वातावरण बनाया, वह अंततः धर्म और सत्य के समक्ष टिक नहीं सका। श्रीराम ने रावण के इस अधर्म का अंत कर धर्म की पुनः स्थापना की।

आइये प्रवेश करें अरण्य कांड में 

भगवान् राम सिद्धि के बिना वापस नहीं लौटना चाहते थे यद्यपि भरत जी महाराज तो प्रयास कर ही रहे थे वह परमात्म शक्ति तो एक सिद्धि के लिए आई थी 

यदा यदा हि धर्मस्य.....

मां अनुसूया से मां सीता को दिव्य वसन प्राप्त हो गए हैं भगवान् राम शरभंग के आश्रम में पहुंचते हैं 

पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥4॥


शरभंग कहते हैं मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा हूँ। अब (आज) प्रभु को देखकर मेरी छाती शीतल हो गई। हे नाथ! मैं सब साधनों से हीन हूँ। आपने अपना दीन सेवक जानकर मुझ पर कृपा की है इस प्रकार (दुर्लभ भक्ति प्राप्त करके फिर) चिता रचकर मुनि शरभंगजी हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उस पर जा बैठे शरभंग ने योगाग्नि से अपने शरीर को जला डाला और राम की कृपा से वे बैकुंठ को चले गए। मुनि भगवान में लीन इसलिए नहीं हुए कि उन्होंने पहले ही भेद-भक्ति का वर ले लिया था।

पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे॥

अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥3॥



इसे देखकर रामत्व बोलता है 

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥

ऐसी अद्भुत है राम कथा 

यही हमारे जीवन से संयुत है हम इसकी अनुभूति करें राष्ट्र के जाग्रत पुरोहित के रूप में अपने कर्तव्य को जानें भ्रमित न हों 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने १०० के लक्ष्य के बारे में क्या बताया  श्री कृष्णगोपाल जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें

27.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 27 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४२९ वां सार -संक्षेप

 जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥4॥


प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार  27 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४२९ वां सार -संक्षेप

डॉ. हेडगेवार का उद्देश्य था कि संघ एक संगठन मात्र न रहकर, एक जीवनशैली, एक संस्कारधारा बन जाए, जो समाज के हर स्तर पर परिलक्षित हो  बिना किसी अलग पहचान के।  संघ स्वयं को कोई आंदोलन नहीं मानता, अपितु राष्ट्र जीवन के पुनरुत्थान का एक माध्यम मानता है।डॉ. हेडगेवार ने कहा था: संघ को इतना व्याप्त करो कि वह अलग से दिखाई न दे, लेकिन उसके संस्कार पूरे समाज में दिखें।संघ की कार्यशैली मौन, अनुशासित और गृहकार्य के समान है जहां स्वयंसेवक समाज के भीतर रहकर समाज को ही सजग और संगठित करते हैं।

 हिन्दू राष्ट्र का अर्थ संघ के अनुसार कोई राजनीतिक राज्य नहीं,यह राष्ट्र सभी के लिए समान है, लेकिन इसका मूल आत्मा सनातन हिन्दू संस्कृति है।संघ का उद्देश्य ही है कि समाज में यह भाव जागे कि उसका हर व्यक्ति यह सोचे कि वे सब हिन्दू राष्ट्र के अंगभूत नागरिक हैं

हिन्दुत्व ही सनातनत्व है और वही संपूर्ण विश्व की प्राणरक्षा का संकल्प है

इसी भाव और विचार के साथ असंख्य कार्यकर्ता समाजहित राष्ट्रहित में जुटे रहे हैं

ऐसा अद्भुत है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसके पूर्णकालिक कार्यकर्ता प्रचारक कहे जाते हैं जो अपनी क्षमताओं में विशेष होते हैं उनका दायित्व बढ़ता जाता है

ऐसे ही एक विशिष्ट क्षमतासंपन्न पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं श्री कृष्णगोपाल जी जो इस समय संघ के सह सरकार्यवाह हैं कल प्रान्त प्रचारक कौशल जी के साथ सरौंहां आए जहां उनका भव्य स्वागत हुआ उसके पश्चात् एक बैठक हुई जिसमें उनके विचार सुने गए बैठक में आचार्य जी, भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया मलय जी भैया प्रवीण सारस्वत जी भैया आलोक जी भैया प्रदीप जी भैया अरविन्द जी भैया नरेन्द्र शुक्ल जी सपत्नीक भैया संपूर्ण सिंह जी  श्री हरमेश जी भैया मुकेश जी  उपस्थित रहे

कृष्णगोपाल जी युगभारती से प्रभावित हुए 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि भगवान् की कृपा के बिना हम एक कण एक क्षण आगे नहीं बढ़ सकते 


निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई॥3॥


हे पक्षीराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ। (वह यह है कि) भगवान के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते। हे पक्षीराज! सुनिए, श्री रामजी की कृपा बिना श्री रामजी की प्रभुता नहीं जानी जाती ॥3॥

इसके विस्तार में आचार्य जी ने और क्या बताया  १३ जुलाई को क्या है जानने के लिए सुनें

26.6.25

प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 26 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४२८ वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार  26 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४२८ वां सार -संक्षेप


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  ने अपने स्थापना काल से ही राष्ट्र निर्माण को एक सकारात्मक, अनुशासित और अहिंसक प्रक्रिया के रूप में देखा है। संघ का दृष्टिकोण रहा है कि देश की प्रगति और समस्याओं का समाधान संगठन, सेवा और आत्मबल के माध्यम से किया जाए, न कि तोड़फोड़ या अराजकता फैलाकर।

२५ जून १९७५ को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित कर दिया और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बावजूद, संघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक संगठित और अहिंसक आंदोलन में भाग लिया। संघ के स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन किया, जिसमें लगभग डेढ़ लाख स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी दी। संघ ने इस संघर्ष को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 'लोक संघर्ष समिति' के माध्यम से चलाया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संघ ने देश की बिगड़ी हालत को सुधारने के लिए संगठन और सेवा का मार्ग अपनाया, न कि अराजकता का 

संघ ने सदैव संविधान और लोकतंत्र के प्रति अपनी निष्ठा को प्राथमिकता दी है।

आपातकाल में ही अपने विद्यालय का हाई स्कूल का  प्रशंसनीय परिणाम निकला जिसमें भैया शशि शर्मा जी की प्रदेश में नवीं पोजीशन आई 

आचार्य जी आपातकाल में समाचारपत्र निकालते थे नाम था जनता समाचार जिसके ब्लाक आनन्द आचार्य जी बनाते थे भैया दुर्गेश रस्तोगी जी उसे फेयर करते थे और प्रकाशन करते थे शिवदयाल जी 

बाद में आपातकाल पर १७ व्यक्तियों ने पुस्तकें लिखीं जिसमें एक लेखक आचार्य जी थे 

पुस्तक का नाम था मुक्ति -यज्ञ

इसके बाद एक और पुस्तक आचार्य जी ने लिखी 

युग-पुरुष 

आपातकाल में MISA कानून भी आया 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन ने अपनी शक्ति दिखा दी ऐसी अद्भुत है संगठन की शक्ति 

इसी संगठन के हम घटक हैं इसी संगठन पर विचार करने के लिए आज सरौंहां में एक कार्यक्रम होने जा रहा है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने ज्ञानेन्द्र आचार्य जी का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें