12.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१८ वां* सार -संक्षेप

 संगठन के प्रति उदास रहो नहीं 

संगठन संसार का आधार है। 

संगठन सहयोग से ही सृष्टि है, 

संगठन ही मनुज का सुखसार है ॥

  है समाज वही सुखी जो संगठित

  हर अकेला भ्रमित पीड़ित दुखी है 

  शास्त्र अपना यही कहता आ रहा

  संगठित व्यक्तित्व ही मन्मुखी है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २००


जब पदाधिकारी अपने कार्यकर्ताओं पर अटूट विश्वास रखते हैं, तो कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास और उत्साह बढ़ता है। वे अपने दायित्वों को अधिक निष्ठा और समर्पण के साथ निभाते हैं। इसी प्रकार, साधारण सदस्य भी यदि एक-दूसरे पर विश्वास रखें, तो आपसी सहयोग और एकता शक्ति उत्पन्न करती है। हम आत्मविश्वासी भी बनें l 

आत्मोन्नाति के उपायों में डायरी लेखन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l

आगामी अधिवेशन के लिए उत्साह से संपन्न होकर कार्यों में सहयोग प्रारम्भ कर दें l 



अद्भुत है हमारा सनातन धर्म l इसका मूल स्वरूप अत्यन्त लचीला, व्यापक और जीवनोपयोगी है। इसमें कर्मकाण्ड केवल कठोर नियमों का बंधन नहीं, बल्कि साधना का मार्गदर्शन है। उदाहरणार्थ यदि पूजा में पुष्प उपलब्ध न हों, तो अक्षत अर्पित करने का विकल्प दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि धर्म बाहरी सामग्री से अधिक भाव और श्रद्धा को महत्व देता है। वस्तु का अभाव साधना में बाधा न बने, इसलिए विकल्प की व्यवस्था रखी गई है।

यह धर्म मनुष्य को शृंखला में नहीं बांधता, बल्कि उसे विचार करने की स्वतंत्रता देता है। वह यह सिखाता है कि परिस्थिति के अनुसार अपने आचरण को कैसे ढालना चाहिए। नियम मार्गदर्शक हैं, परन्तु उनका उद्देश्य जीवन को सरल और संतुलित बनाना है, न कि उसे कठिन बनाना। पूजन में बैठने का निर्देश अवश्य दिया जाता है वह इस कारण कि मनुष्य एकाग्र होकर अपने भीतर झाँक सके और उस परम सत्ता का स्मरण कर सके, जो इस सृष्टि की रचना करने वाली है। हम इस संसार में उपस्थित हैं, परन्तु हमारा अस्तित्व किसी उच्चतर शक्ति पर आधारित है। पूजन उसी शक्ति के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और स्मरण का माध्यम है।


भैया संजय गर्ग जी, भैया शुभेन्दु शेखर जी, भैया रमेश गुप्त जी,  न्यायमूर्ति भैया सुरेश गुप्त जी, भैया पुनीत जी, भैया अरविन्द जी, भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ,आज दिल्ली के कार्यकर्ताओं की बैठक में लगभग कितने लोग उपस्थित होने वाले हैं कल  गुरुग्राम के कार्यक्रम में कितने सदस्य उपस्थित रहे, आगामी अधिवेशन के कार्यक्रम स्थल की चर्चा क्यों हुई,  स्वामी प्रेमानन्द के गांव का नाम किस कारण आया, देशभक्ति क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

11.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१७ वां* सार

 गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥

जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥1॥

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९९

ब्रह्मवेला में जागरण मन को उत्फुल्ल करने का एक अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय है इस जागरण के साथ प्रकृति के दर्शन का भी प्रयास करें तो यह निश्चित रूप से आनन्द में वृद्धि करेगा l दंभ से बचें l आगामी अधिवेशन के लिए पूर्णरूपेण समर्पित होवें l 


इन सदाचार संप्रेषणों के माध्यम से जो कुछ व्यक्त किया जा रहा है, वह बौद्धिक जानकारी  या विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं है। यह आचार्य जी के हृदय से उत्पन्न अनुभूतियों, संवेदनाओं और अंतरंग भावों की अभिव्यक्ति है। हमें इन संप्रेषणों का लाभ उठाना चाहिए l


किसी भी कार्य के लिए हमें अच्छे से अच्छा प्रयास करना चाहिए अर्थात् पूर्ण समर्पण,मन, बुद्धि और सामर्थ्य के साथ कार्य करना चाहिए l ऐसा प्रयास हमारे भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है,हमारी क्षमताओं को विकसित करता है l यह भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रयास केवल परिणाम के लिए न हो, बल्कि स्वयं कर्म की उत्कृष्टता के लिए हो। जब हम अपने कर्म को श्रेष्ठ बनाते हैं, तो वह स्वयं ही एक साधना बन जाता है।साथ ही जीवन की अनिश्चितता को  भी हम स्वीकारें । संसार में हर परिणाम हमारे नियंत्रण में नहीं होता। अनेक बाहरी परिस्थितियाँ, समय, संयोग और अन्य लोगों के निर्णय भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। यदि हम केवल अच्छे परिणाम की अपेक्षा रखेंगे तो विपरीत होने पर टूट भी जाएंगे अतः जब हम पहले से ही यह समझ लें कि परिणाम कुछ भी हो सकता है, तो हमारा मन संतुलित रहता है। हम सफलता में अहंकार से नहीं भरते और असफलता में निराशा में नहीं डूबते ।

यह दृष्टिकोण हमें भयमुक्त भी बनाता है। जब हमें यह स्वीकार होता है कि हम हर परिणाम के लिए तैयार हैं, तब हम जोखिम लेने से नहीं डरते। हम नए कार्यों में आगे बढ़ते हैं, क्योंकि हमें असफलता का भय रोक नहीं पाता। यही भाव हमें सच्चे अर्थों में कर्मयोगी बनाता है l इस परिवर्तनशील क्षरणशील मरणधर्मा संसार में यही पौरुष की परिभाषा है l 


परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते। स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥

जो इस वंश, जो परमात्मा के अंश से उत्पन्न है, की चिन्ता करता है वह मानव वंश है l


भैया अरविन्द तिवारी जी, भैया मोहन जी, भैया प्रदीप जी का उल्लेख क्यों हुआ,आचार्य जी ने किस डेढ़ कदम की चर्चा की,पं दीनदयाल जी ने किस सूत्र पर भविष्य का बृहद् वितान ताना जानने के लिए सुनें

10.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१६ वां* सार -संक्षेप

 न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।

गृहं तु गृहिणीहीनं कान्तारादतिरिच्यते॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९८

अपने अंतःकरण के विचारों और व्यवहार को शुद्ध एवं पवित्र बनाए रखें आहार-विहार के संबंध में उचित-अनुचित का विवेक बनाए रखें और सदैव इस पर सजग दृष्टि रखें इसके लिए Society को इंगित न करें । अपने आचरण तथा वाणी में कटुता का परित्याग करें और मधुरता एवं विनम्रता को अपनाएँ।



यह हमारा सौभाग्य है कि हम प्रतिदिन इन वेलाओं से सदाचारमय विचार ग्रहण कर रहे हैं ताकि हमारा अंतःकरण शुद्ध एवं पवित्र बना रहे, विवेक जाग्रत हो और हमारा आचरण तथा वाणी सदैव मधुर, विनम्र और कल्याणकारी बनी रहे।

हमें चाहिए कि हम उन व्यक्तियों को अपने निकट स्थान दें, जो हमारे हित, उन्नति और कल्याण की भावना रखते हैं। ऐसे लोग न केवल सही मार्गदर्शन करते हैं, अपितु कठिन परिस्थितियों में भी सहायक बनकर जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने में योगदान देते हैं।

इसके विपरीत, जो व्यक्ति अहित की भावना रखते हैं, भ्रम उत्पन्न करते हैं या अनुचित मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं, उनसे यथासंभव दूरी बनाए रखना ही उचित है। ऐसे लोगों का संग न केवल विचारों को दूषित करता है, बल्कि जीवन की दिशा को भी विचलित कर सकता है l

हमारे राष्ट्र की शिक्षा अत्यन्त विलक्षण थी जिसके कारण आज भी हम जीवित हैं जाग्रत हैं उत्साहित हैं और चैतन्ययुक्त हैं l हम गृहस्थाश्रमी हैं और गृह में पत्नी के साथ रहते हैं। पत्नी का स्थान सर्वोपरि है l पत्नी को ‘गृह’ भी कहा गया है, क्योंकि वही घर की आधारशिला, व्यवस्था और जीवन-संवेदना का केंद्र होती है। उसके बिना घर केवल एक भवन मात्र रह जाता है, जिसमें न आत्मीयता होती है, न ही जीवंतता।“बिन घरनी घर भूत का डेरा”, अर्थात् पत्नी के बिना घर सूना, निर्जीव और शून्य-सा प्रतीत होता है।


इसके अतिरिक्त उपकुर्वाण ब्रह्मचारी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी में क्या अन्तर है, आचार्य जी दिल्ली क्यों जा रहे हैं, ज्येष्ठाश्रम क्या है द्विज क्या है अभिनन्दनीय कर्म क्या हैं श्वानवृत्ति क्या है जानने के लिए सुनें

9.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१५ वां* सार -संक्षेप

 तूफान कल था, आज मौसम साफ है ,

हर समर्थ सुशक्ति को सब माफ है ;

हर तरह कमजोर है आसक्त मन ?

दीनदुनिया का यही तो शाप है।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९७

स्वयं शुद्ध और जागरूक होने का प्रयास करें ताकि संसार के दुःख और अज्ञान को दूर करने की समर्थता आ सके



प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) आत्मचिंतन और ध्यान से सत्वगुण की वृद्धि होती है और मन शुद्ध होता है। ये सदाचार संप्रेषण गहन आत्मचिंतन और जीवन-दर्शन से भरपूर हैं हमें इनका लाभ उठाना चाहिए । इनमें तत्व, साधना, स्वदेशप्रेम और आत्मबोध की सुंदर अभिव्यक्ति होती है।

हमें यह भी समझना चाहिए कि जीवन में कठिनाइयाँ  अस्थायी हैं। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं l इस पर विश्वास रखना चाहिए l

आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम संस्कार सहित अपने मन को बुद्धि को विचार को एक दिशा और दृष्टि में लगाएं  जैसे अपने राष्ट्र  भारत, जिसकी रक्षा के लिए हनुमान जी सदैव सन्नद्ध हैं,के प्रति भक्ति भाव रखें भारत के सच्चे उपासक बनें 


जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। 

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

भगवान् राम ने भी अपने मन बुद्धि विचार को एक दिशा में लगाया उन्होंने  रावण के अंत के लिए साधना  की संगठन को महत्त्व देते हुए l 

हमने भी अपना उद्देश्य बनाया है और युगभारती के रूप में हमारा संगठन है हम सदस्यों में आपस में प्रेम आत्मीयता का विस्तार होना चाहिए हमारा एक एक सदस्य 

अपने अपने क्षेत्र में कुशल है हमें किसी सदस्य की उपेक्षा नहीं करनी है और न ही ईर्ष्या द्वेष कुंठा रखनी है 


इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी, भैया विनय जी का उल्लेख क्यों हुआ, भरत कैसे वन्दनीय हो गये, प्रेमानन्द का उल्लेख क्यों हुआ  जानने के लिए सुनें

8.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९६

उपासना के महत्त्व को समझें 


यह संसार नाम और रूप से बना हुआ है, लेकिन भारत का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है। वह अनन्त है, अनादि है, अक्षय है और अमर है। जब हम इस सत्य को अपने भीतर अनुभव करेंगे , तब हमारा दृष्टिकोण ही बदल जाएगा जिस क्षण यह भाव हमारे भीतर जाग्रत होता है, उसी क्षण निराशा, कुंठा, हताशा और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भाव समाप्त होने लगते हैं। मन स्थिर और शांत हो जाता है और जीवन में स्वाभाविक रूप से आनंद का अनुभव होने लगता है। चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति होने लगती है किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएं यह हमारे स्वभाव और उद्देश्य के विरुद्ध है। निष्क्रियता मनुष्य को जड़ता, निराशा और पतन की ओर ले जाती है, जबकि कर्म उसे उन्नति, आत्मविश्वास और संतोष की ओर ले जाता है। इस कारण हमारा कर्तव्य है कि हम कर्म करते रहें लेकिन केवल फल की चिंता में नहीं, बल्कि कर्तव्य भाव से।

ऐसा ही कर्तव्य निभाया  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम ने 

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।

दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने॥

अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दु:ख दहे।

जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥1॥


यह स्तुति भगवान श्रीराम के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों की महिमा का वर्णन करती है। वे अद्वितीय रूप वाले, राजाओं में श्रेष्ठ हैं l आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। आज की परिस्थितियों में भी भुजबल को एकत्र करना अत्यन्त आवश्यक है और उस भुजबल के आधार पर संगठन भी अत्यावश्यक है l इसके साथ ही हम अपना लक्ष्य सदैव ध्यान में रखें अखंड भारत हमारा लक्ष्य है l 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी के किस लेख की चर्चा की,११ अप्रैल को हम क्या करने जा रहे हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम और लीला पुरुषोत्तम में क्या भेद है, वेदों में सकाम मन्त्रों की संख्या कितनी है जानने के लिए सुनें

7.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९५

भाव के साथ विचार और क्रिया भी संयुत होनी चाहिए हम लोग आपस में ईर्ष्या, भ्रम, शंका आदि दोषों से बचें प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 

अधिवेशन की तैयारी प्रारम्भ कर दें 




हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें l मनुष्य केवल शरीर या बुद्धि नहीं है, बल्कि उसमें संवेदना, करुणा, विवेक, नैतिकता और आत्मचेतना होती है। जब व्यक्ति इन गुणों को जाग्रत करता है जैसे सत्य बोलना, दूसरों के दुःख को समझना, कर्तव्य निभाना तब वह वास्तविक अर्थ में मनुष्य बनता है। केवल जन्म से मनुष्य होना पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यवहार और विचार से मनुष्यत्व की अनुभूति आवश्यक है।

इसके पश्चात् हम “पुरुषत्व की ओर प्रयाण” करें अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर परम चेतना से एकत्व की ओर बढ़ना l 

श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम योग के प्रथम छंद 

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।


छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१५/१

के अनुसार इस संसार को अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष के समान कहा गया है, जिसका मूल ऊपर की ओर है और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं। जिसके पत्ते वेदों के छन्द हैं, और जो इस वृक्ष को जान लेता है, वही सच्चा वेदज्ञ होता है।


यह संसार एक उल्टे वृक्ष के समान बताया गया है। सामान्य वृक्ष में जड़ नीचे और शाखाएँ ऊपर होती हैं, लेकिन यहाँ जड़ ऊपर है। इसका संकेत यह है कि इस जगत का मूल परमात्मा है, जो ऊपर अर्थात् परम धाम में स्थित है। उसी परम सत्य से यह सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है, इसलिए उसे मूल कहा गया है।

नीचे की ओर फैली शाखाएँ इस संसार के विविध रूपों का प्रतीक हैं, जैसे विभिन्न लोक, जीव, कर्म, इच्छाएँ और भोग-वासनाएँ। ये सब परमात्मा से उत्पन्न होकर संसार में विस्तार पाते हैं।

इस वृक्ष को अश्वत्थ कहा गया है। अश्वत्थ का एक अर्थ यह भी है कि जो स्थायी नहीं है, अर्थात् यह संसार नित्य बदलने वाला है। आज जो है, वह कल नहीं रहेगा। इसके पत्ते वेदों के छन्द कहे गए हैं। जैसे वृक्ष के पत्ते उसे पोषण देते हैं, वैसे ही वेद इस संसार के ज्ञान और धर्म का आधार हैं। वेदों के माध्यम से ही मनुष्य को यह समझ में आता है कि इस संसार का स्वरूप क्या है और इससे पार कैसे जाया जा सकता है।

जो व्यक्ति इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, अर्थात् यह जान लेता है कि संसार का मूल परमात्मा है, यह जगत अनित्य है और वेद ही इसके ज्ञान का साधन हैं, वही सच्चा वेदज्ञ कहलाता है। केवल वेदों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके गूढ़ अर्थ को समझकर जीवन में उतारना ही वास्तविक ज्ञान है।



आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम अध्यात्म में प्रवेश के लिए उच्च कोटि के संत रामसुखदास जी की टीका साधक संजीविनी का अध्ययन करें

५ अप्रैल के कार्यक्रम की चर्चा क्यों हुई, भैया डा अमित जी भैया अजय शंकर जी का उल्लेख क्यों हुआ, सेवा का स्वरूप कैसा हो, कड़े जी कौन थे जानने के लिए सुनें

6.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१२ वां* सार -संक्षेप

 ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वम् ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९४

चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन में रत हों 


वर्तमान शिक्षा अपने मूल उद्देश्य व्यक्तित्व का समग्र विकास, विचारों की स्वतंत्रता तथा जीवन मूल्यों की स्थापना से हटकर केवल औपचारिकता और संकीर्णता तक सीमित हो गई है। परिणामस्वरूप उसमें अनेक दुर्गुण उत्पन्न हो गए हैं।

इन दुर्गुणों के कारण हमारा दृष्टिकोण व्यापक न रहकर संकीर्ण हो गया है। हमारी बुद्धि, मन और सोच का विस्तार रुक गया है और हम सीमित दायरे में सोचने लगे हैं।

हमारे भीतर जो स्वाभाविक जिज्ञासा, सृजनात्मक शक्ति और निरंतर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति होती है, वह दबकर रह गई है। यही कारण है कि हम भीतर से असंतुष्ट, अपूर्ण और कहीं न कहीं बेचैन अनुभव करते हैं। आवश्यकता है हमें अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति की l 

प्राचीन  शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का समग्र विकास था। इसमें शिक्षा आचरण आधारित होती थी और गुरु-शिष्य के बीच आत्मीय संबंध रहता था। शिक्षा प्रकृति के सान्निध्य में दी जाती थी, जिससे मन एकाग्र और शांत रहता था।

इस पद्धति में स्वावलंबन, अनुशासन, चिंतन, मनन और स्वाध्याय पर विशेष बल दिया जाता था। साथ ही नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का विकास किया जाता था। शिक्षा व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार तथा जीवनोपयोगी होती थी।


हमारा साहित्य अत्यंत विस्तृत और विविधतापूर्ण है, जो जीवन के हर क्षेत्र अध्यात्म, दर्शन, समाज, कला और व्यवहार को समाहित करता है। हमारा भारत राष्ट्र पृथ्वी का मूल राष्ट्र है यहीं वेद उद्भूत हुए l वेदों का अर्थ है वह दिव्य ज्ञान, जो जीवन, प्रकृति, धर्म और सत्य के बारे में सही मार्गदर्शन देता है। हम अपने इस ज्ञान को अपने  अद्भुत साहित्य को अध्यात्म को जब अनुभव करेंगे और इनको जितना जान लेंगे हम आनन्द में रहेंगे और इस आनन्द को बांटते हुए जब हम संगठन करेंगे तो वह संगठन अत्यन्त दिव्य होगा उसके सदस्यों में प्रेम आत्मीयता का विस्तार मिलेगा 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया आशीष जोग जी, उन्नाव विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य श्री स्वामीनाथ जी का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें l

5.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७११ वां* सार

 मानव जीवन अनुपम अद्भुत सौभाग्य सदन,

तब, जब हम होते हैं शान्त और उत्फुल्ल बदन ।




प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७११ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९३

प्रातःकाल उठकर आत्मबोध का प्रयास करें 


मनुष्य का शरीर मिलना अपने आप में एक दुर्लभ अवसर है। हमें केवल शरीर ही नहीं मिला, बल्कि मन, बुद्धि और विचार करने की क्षमता भी मिली है। यही क्षमताएँ हमें अन्य जीवों से अलग बनाती हैं। जब हम इस बात को अनुभव करते हैं कि हम सोच सकते हैं, निर्णय ले सकते हैं और अपने जीवन को दिशा दे सकते हैं, तब हमारे भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न होता है।

यह अनुभूति हमें यह विश्वास दिलाती है कि हम केवल परिस्थितियों के अधीन नहीं हैं, बल्कि अपने प्रयासों और सही विचारों के माध्यम से अपने जीवन को बदल सकते हैं। हमने अपना लक्ष्य बनाया है समाजोन्मुखी व्यक्तित्व  का उत्कर्ष l


जब हम समाजोन्मुखी कार्य करते हैं तो यदि हम यह भाव रख लें कि “यह कार्य मुझसे ईश्वर करवा रहे हैं, मैं तो केवल एक माध्यम हूँ”, तो हमारा मन विनम्र बना रहता है l यह भावना सेवा को पवित्र बनाती है और व्यक्ति को दंभ से बचाकर विनम्रता और आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।

आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम व्याकुलता से  भी बचें l

संपूर्ण सृष्टि परमात्मा की रचना है। परमात्मा ने मनुष्य को भी रचा और उसमें सत, रज तथा तम ये तीनों गुण स्थापित किए। साथ ही उसे स्वतंत्रता भी दी कि वह अपने जीवन का मार्ग स्वयं चुन सके।

मनुष्य इस स्वतंत्रता का कैसे उपयोग करता है, यही उसके जीवन की दिशा तय करता है

यदि वह इसका उपयोग दुष्टता में करता है, तो उसके भीतर विकार उत्पन्न होते हैं।और यदि वह इसे शिष्टता, सदाचार और सत्य के मार्ग में लगाता है, तो उसके भीतर विचार विकसित होते हैं। हमें सदाचारमय मार्ग चुनना है हम समाज और देश के लिए कार्य करते हुए यशस्वी होने का प्रयास करें l


इसके अतिरिक्त भैया आशीष जोग जी की चर्चा क्यों हुई, ब्रह्मानन्द सहोदर क्या है, किस वेद में पद्य और गद्य दोनों है जानने के लिए सुनें

4.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९२

इन संप्रेषणों को सुनकर एक अपनी रुचि का विषय चुन लें जैसे सेवा और सेवा इस प्रकार की करें कि 


सेवा में जितना प्रेम समन्वित होता है 

सेवक उतना भावों से अन्वित होता है 

भावना विहीन कर्म 

बस एक प्रदर्शन है 

मानव जीवन निज भावों का ही दर्शन है ॥

और कर्मरत हो जाएं l



यह हमारा सौभाग्य है कि हमें आचार्य जी के रूप में एक सक्षम गुरु का संरक्षण प्राप्त है हमें इसका लाभ उठाना चाहिए l आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि प्रतिदिन प्रातः थोड़ा समय हम आत्मचिंतन (आत्मदर्शन) के लिए निकालें अर्थात् हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें l हम शक्ति का अवबोध करें l इससे धीरे-धीरे हमारे भीतर सद्गुणों का विकास होगा और हमारा जीवन अधिक श्रेष्ठ बन जाएगा।


प्रातः प्रयास हो तनिक आत्मदर्शन के हित, 

हो जाएँगे जगती के सब सद्गुण अन्वित ॥


अद्भुत है भारत l हमारे देश में शिव, राम और कृष्ण का व्यापक प्रभाव है इनकी दिव्य लीलाएँ सतत चल रही हैं, जो मानव जीवन को दिशा और प्रेरणा दे रही हैं l सांसारिकता में जो बहुत लिप्त हैं उन्हें ये सब दिखाई नहीं देता l जब मन केवल भौतिक विषयों, इच्छाओं और मोह में उलझा रहता है, तब वह सूक्ष्म सत्य, भक्ति और दिव्यता को अनुभव नहीं कर पाता l इसी कारण हमें संसार से इतर भी अपना चिन्तन रखना चाहिए l आत्मदर्शन में हमें यही प्रतीत होता है कि जो हम हैं वही सब हैं l


राम कथा अद्भुत है 


जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई॥

कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥

रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥

नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥


जो ज्ञानीजन हैं, वे इस अलौकिक कथा को सुनकर आश्चर्य नहीं करते, क्योंकि वे इसके दिव्य स्वरूप को भली-भाँति जानते हैं।

उनके मन में यह दृढ़ विश्वास होता है कि राम की कथा की कोई सीमा नहीं है  अर्थात् उसकी महिमा अनंत है l

इसके अतिरिक्त सूक्ष्म भाव कब समझ में नहीं आते, कौन विपन्न हैं, रामायण धारावाहिक की चर्चा क्यों हुई,संगठन क्यों महत्त्वपूर्ण है जानने के लिए सुनें l

3.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०९ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९१

मानस का अध्ययन करें इससे हम चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करने लगेंगे 



इन सदाचारपूर्ण वचनों को सुनकर हमारे अंतःकरण में उत्तम भावों का जागरण होना चाहिए। हमें उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन में उत्साह का संचार करना चाहिए और केवल विचारों तक सीमित न रहकर सत्कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए।इससे हमारा जीवन सार्थक और समाज के लिए उपयोगी बन सकेगा l हम मनुष्य हैं हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होनी ही चाहिए अन्यथा हम मृग के समान हैं 

आहार निद्रा भय मैथुनं च

सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्

धर्मो हि तेषामधिको विशेष:

धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः

हमारे भीतर मनुष्यत्व की अनुभूति जितनी अधिक होगी  हम उतना ही परमात्मशक्ति से उद्दीप्त हो उठेंगे l जब हमारे भीतर परमात्मा किसी न किसी रूप में उपस्थित है तो हम दीन हीन मलिन कैसे हो सकते हैं अर्थात् नहीं हो सकते हैं l अध्यात्म और धर्म का सामञ्जस्य समझकर उसका व्यवहार करने लगेंगे तो हम आत्मानन्द को अनुभव करने लगेंगे l 

नियमित और भावपूर्ण नाम-जप से मन शुद्ध होता है और आत्मा अपने स्वाभाविक आनन्द अर्थात् आत्मानन्द का अनुभव करने लगता है 


भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥

तुलसीदास जी ने यह मार्ग निकाल दिया l 

नरहरिदास जी ने बचपन से ही तुलसीदास जी की अद्भुत बुद्धि और आध्यात्मिक रुचि को पहचान लिया था। वे चाहते थे कि तुलसीदास जी केवल भक्ति ही न करें, बल्कि वेद, पुराण, व्याकरण और दर्शन का भी गहरा ज्ञान प्राप्त करें, जिससे उनका ज्ञान पूर्ण और प्रामाणिक बने।चित्रकूट में नरहरिदास जी ने तुलसी जी को रामभक्ति की दीक्षा दी इसके बाद उन्होंने काशी के पंचगंगा घाट पर स्थित शेष सनातन जी (जो उनके मित्र और विद्वान् थे) के पास भेजा। वहाँ तुलसीदास जी ने लगभग १५-१६ वर्षों तक संस्कृत ग्रंथों का गहन विद्याध्ययन किया।


इसके बाद उन्होंने श्रीरामचरित मानस की रचना की जो केवल एक काव्य नहीं है, भक्ति से उत्पन्न, अनुभव से परिपक्व और लोककल्याण के उद्देश्य से रचित दिव्य ग्रंथ है। मानस को उन्होंने सामान्य भाषा में प्रस्तुत किया जिससे सामान्य जन भी उसका आनन्द ले सके एक ज्ञानी भी उसमें तत्त्व के दर्शन कर सके इसका भी उन्होंने ध्यान रखा l 


भैया अक्षय जी २००८, भैया यज्ञदत्त जी का उल्लेख क्यों हुआ, *उर्दू वाले* कौन कहते थे , मारीशस चर्चा में कैसे आया जानने के लिए सुनें

2.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९०

अपने भावों को परिशुद्ध करने के लिए नित्य चिन्तन आवश्यक है गीता और मानस को जीने की आवश्यकता है 


अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।


भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।।


इसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर में ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म का स्वरूप स्पष्ट किया है।

अविनाशी परम तत्त्व ब्रह्म है, जीव का आंतरिक स्वभाव अध्यात्म है  और सृष्टि के प्राणियों की उत्पत्ति कराने वाला त्याग या सृजनात्मक क्रिया कर्म  है

यह कर्म धर्म से संयुत है अध्यात्म और धर्म एक दूसरे के प्राण और शरीर हैं  जिसका अध्यात्म में प्रवेश है उसे धर्म की गतिविधियां भी पता हैं वेदों में इन दोनों का सामञ्जस्य किया गया है  गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार भगवान् राम अध्यात्मवादी भी हैं , धर्मवेत्ता भी हैं और कर्मकुशल तो हैं ही इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम कहा गया 

उनकी उपासना करने के लिए तुलसीदास जी ने नाम जप बताया 

राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे।

नाहिं तौ भव-बेगारि महँ परिहै ,छूटत अति कठिनाई रे।1।

किन्तु यह जप एकांगी नहीं होना चाहिए  जब ज्ञान कर्म से मुक्त हो जाता है तो व्यक्ति पुरुषार्थ से रहित हो जाता है जब कि पुरुष के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य है परिस्थितियां भांपकर हमें विचारपूर्वक कर्म करना है इसके लिए आपसी भेदभाव दूर कर हमें संगठित होना ही होगा l एक व्यक्ति चाहे कितना ही सक्षम क्यों न हो, लेकिन कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें सफल बनाने के लिए कई लोगों का साथ आवश्यक होता है 


संगठन संगठन संगठन


 शंकालु होकर संगठित नहीं हो सकते इसके लिए प्रेम और आत्मीयता का विस्तार भी करें  आज परिस्थितियां विषम हैं संकट टला नहीं है हमें सचेत रहना ही होगा 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने किस चित्र की चर्चा की, स्वामी रामतीर्थ ने किसे अपना बना लिया, अहं क्यों हानिकारक है, प्रातःकाल का जागरण क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें

1.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०७ वां* सार

 एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।

बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥ 29(ग)॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८९

लेखन एक योग है इसके महत्त्व को समझें चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन में रत हों 



तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥

भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥


गुरुदेव ने उस ज्ञान को बार-बार समझाया, फिर भी मेरी बुद्धि के अनुसार ही मुझे थोड़ा-बहुत समझ में आया। उसी को (श्रीरामचरित मानस  के रूप में )मैं अपनी भाषा (अवधी) में प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे मेरे मन को संतोष और ज्ञान की प्राप्ति हो सके।

आचार्य जी भी बार बार यही प्रयास कर रहे हैं कि हम इन सदाचार संप्रेषणों को सुनकर अपने भीतर सात्विक भाव लाएं, भक्ति में शक्ति की अनुभूति करें,सांसारिक बोझ को ढोने के लिए अपने भीतर आत्मशक्ति विकसित करें l 

इस नाम रूपात्मक जगत में नाम स्मरण करते ही उससे जुड़ा रूप प्रकट हो जाता है

जैसे भगवान् राम का नाम लेते ही उनका संकल्प, उनका धर्म और उनका पुरुषार्थ सामने आ जाता है 

भगवान् राम का अद्भुत संकल्प

*निसिचर हीन करहुँ महि, भुज उठाइ प्रण कीन्ह* हमें प्रेरित करने लगता है 

हम अपने भीतर गुरुत्व लाएं  और  भावी पीढ़ी को संस्कारित करें 


भैया ऋषि जी, भैया विनय अजमानी जी, भैया कवि पवन जी, भैया पवन पांडेय जी का उल्लेख क्यों हुआ आचार्य श्रीराम शर्मा की किन दो पुस्तिकाओं की चर्चा हुई , संगठन के क्या सूत्र हैं जानने के लिए सुनें l