5.3.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 05/03/2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है अनन्यचेतस् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 05/03/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in


https://t.me/prav353


गहनता की ओर उन्मुख नित्य की इस सदाचार वेला को हम मात्र सुनने तक ही सीमित न रखें अपितु  इसके मूल विषय को खोजकर चिन्तन भी करें


रशिया यूक्रेन युद्ध, उ प्र चुनाव की ओर संकेत करते हुए आचार्य जी ने बताया कि कुछ लोगों का  चिन्तन व्यापक न होकर सीमित हो जाता है जिसके कारण वे भ्रमित रहते हैं और मनुष्यत्व उनसे कोसों दूर रहता है


आचार्य जी ने रशिया यूक्रेन युद्ध और महाभारत युद्ध में अन्तर बताया l महाभारत में युद्धभूमि ऐसे स्थान पर तय की गई थी जहां केवल युद्धरत व्यक्तियों ने ही विजय पराजय का भोग भोगा l बालक, वृद्ध,स्त्री, रोगी आदि युद्ध से दूर थे 

अठारह दिन बाद जब युद्ध समाप्त हुआ उसके बाद का महाभारत भी पढ़ने वाला है


सृष्टि में धर्म का पतन होता ही है लेकिन फिर



परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।


धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।


मनुष्य और ईश्वर का संबंध बहुत पहले से ही एक ही मानवीय भूमि पर प्रतिष्ठित है जहां एक का उत्क्रमण होता है दूसरे का अवतरण होता है


अवतार का क्षेत्र बहुत व्यापक है


एक ही भावभूमि पर उद्भूत होने के कारण भगवान् और भक्त में एकरूपता दिखाई देती है

अपने उपास्य पर साधक का अधिक से अधिक भावारोपण होता है



योगी मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपुर ,अनाहत,विशुद्ध,आज्ञा, सहस्रार चक्र तक की यात्रा करते हैं भक्त  अश्रुपात करते हैं विवेचक अनुसंधान में रत हो जाते हैं

मार्ग अनेक हैं गंतव्य एक है


यह हमारे यहां की शिक्षा का आधारभूत तत्त्व रहा है


इस तरह की शिक्षा हमें स्वावलम्बी बनाती है दूसरे को संरक्षण प्रदान करने का भाव उत्पन्न करती है आत्मानुसंधान के लिये प्रेरित करती है और आनन्द की अनुभूति देती है


हममें से प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र -सेवा कर सकता है लोगों को अपने भाव, विचार, ज्ञान -गरिमा से विषम परिस्थितियों में हौसला दे सकता है

संकट का समय हमारी परीक्षा लेकर यह प्रकट कर देता है कि हम कौन हैं

EMERGENCY से भारत उबर गया

और संकटों से उबर ही जायेगा 

यह उथल पुथल उत्ताल लहर पथ से न डिगाने पाएगी। 

पतवार चलाते जाएंगे, मंजिल आएगी आएगी। 


लहरों की गिनती क्या करना, कायर करते हैं करने दो, 

तूफानों से सहमें हैं जो, पल-पल मरते हैं मरने दो। 

चिर नूतन पावन बीज लिए, मनु की नौका तिर जाएगी।।1।। 

मंजिल आएगी आएगी ………।

यह विश्वास हमें नहीं त्यागना चाहिये इसके लिये अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन आवश्यक है

4.3.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 04/03/2022 का सदाचार संप्रेषण

 .जाति पाँति पूछै ना कोई।

हरि को भजै सो हरि का होई।


प्रस्तुत है अञ्जस आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 04/03/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in


https://t.me/prav353


जीवन एक निबन्ध है जो निबंध लेखक इस निबन्धात्मक जीवन को भूमिका से लेकर उपसंहार तक बहुत अच्छी तरह से लिख देता है उसे परीक्षक अच्छे अंक दे देता है  और जो विद्यार्थी उस निबन्ध को अच्छी तरह से पढ़ लेता है उसे भी अच्छे अंक मिल जाते हैं

नित्य प्रातःकाल जागकर हम दिनभर के जीवन की भूमिका लिखते हैं मध्याह्न तक उसे शीर्ष पर पहुंचाकर रात्रि आते आते उपसंहार लिखने लगते हैं अध्यात्म की भाषा में यह नित्य प्रलय है


अनुभव की बात है कि हम सब के भीतर परमात्मा विद्यमान है और यदि ध्यानपूर्वक समझने का प्रयास करें तो लगता है सब कुछ अवतरित है

बीच बीच में ऐसे व्यक्तित्व आ जाते हैं जिनमें इतना शक्ति सामर्थ्य होता है कि लगता है स्वयं वो ही परमात्मा हैं


हमारे पास जितना धन है हम यदि उससे संतुष्ट हैं तो हम लोभ मोह मद मत्सर से दूर रहेंगे


और ऐसा भी हो सकता है अपार धन होने पर भी हम संतुष्ट न रहें और परेशान रहें


भौतिक दृष्टि से सर्वत्यागी, आध्यात्मिक दृष्टि से महासंग्रही, विचारक, संत, भक्त  रामानुजाचार्य   दक्षिण में जन्मे   थे और परम्परा देते हुए रामानंदाचार्य तक आये


वैष्णव भक्तिधारा के महान संत रामानन्दाचार्य ने  उत्तर भारत में वैष्णव सम्प्रदाय को पुनर्गठित किया और वैष्णव साधुओं को उनका आत्मसम्मान वापस दिलाया। स्वामी रामानंदाचार्य का जन्म सन् 1299 में माघ माह की कृष्ण सप्तमी को हुआ था।


आठ वर्ष की उम्र में उपनयन संस्कार के बाद उन्होंने वाराणसी पंच गंगाघाट के स्वामी राघवानंदाचार्यजी से दीक्षा प्राप्त की।



वे संत अनंतानंद,संत सुखानंद, सुरासुरानंद, नरहरीयानंद,  योगानंद,  पीपानंद, संत कबीरदास,  संत सेजान्हावी, संत धन्ना, संत रविदास, पद्मावती और संत सुरसरी के गुरु थे।


उनके काल में मुस्लिम बादशाह गयासुद्दीन तुगलक ने हिंदू जनता और साधुओं पर हर तरह की पाबंदी लगा रखी थी। इन सबसे छुटकारा दिलाने के लिए रामानंद ने बादशाह को योगबल के माध्यम से मजबूर कर दिया था और अंतत: बादशाह ने हिंदुओं पर अत्याचार करना बंदकर उन्हें अपने धार्मिक उत्सवों को मनाने तथा हिंदू तरीके से रहने की छूट दे दी ।


रमानन्दाचार्य, कबीर, रैदास, तुलसीदास आदि ने जीवन के निबन्धों को ऐसा लिखा कि उनको जांचने वाला संसार में कोई नहीं मिला

भारत राष्ट्र परमात्मा की एक निर्मिति है और इस राष्ट्र को न नष्ट होने वाला वरदान मिला है 

हम अपनी हरिभक्ति राष्ट्रभक्ति के रूप में देख सकते हैं हम अपना राग खोजें और यह राग इतना अधिक हो कि विराग में भी विस्मृत न हो


इसके अतिरिक्त आचार्य जी से मिलने कल कौन गया था जानने के लिये सुनें

3.3.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 03/03/2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है युगबाहु आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 03/03/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in


https://t.me/prav353

हमारे यहां अवतारों का विस्तार से वर्णन है यूं तो हम सभी अवतार हैं पूरी सृष्टि ही अवतार है

 भारत भूमि को आधार बनाकर बहुत से चिन्तक विचारक मनीषी जो यहां से लेकर परमात्मा तक अपने सूत्र जोड़े हुए हैं संपूर्ण सृष्टि को संचालित कर रहे हैं


रशिया यूक्रेन युद्ध की ओर संकेत करते हुए आचार्य जी ने कहा भारत में उस विचारधारा की बहुलता होनी चाहिये जिससे भारत पूरे विश्व का आधार बन सके

यूक्रेन और रशिया दोनों ही हमारे प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की ओर इस विश्वास से देख रहे हैं कि वो ही इस युद्ध को शान्त करा सकते हैं

सदाचार वेला एक मन्दिर की तरह है जहां भ्रम भय दुविधा हताशा का कोई स्थान नहीं है


जब आचार्य जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे तो वे हमीरपुर जिले में विद्यामन्दिर इंटर कालेज विशेष अतिथि के रूप में बुलाये गये

उस कार्यक्रम की अध्यक्षता वहीं के RETIRED PRINCIPAL विद्यार्थी जी ने की थी

विद्यार्थी जी ने कहा जब इस देश में अत्याचार बहुत बढ़ जायेगा तो परमात्मा का अवतरण होगा ही क्योंकि वो सर्वत्र रहता है 


यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।


तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।9.6।।


(गीता में )


महाभारत में द्रौपदी चीरहरण की चर्चा करते हुए आचार्य जी ने कहा इस धरती ने बहुत से ऐसे भयावह दृश्य देखे हैं और फिर उद्धार भी हुआ है


हमें निराश नहीं होना चाहिये हमारे शरीर में ही बहुत से तत्त्व आदि हैं जिनको पहचानने की आवश्यकता है

आत्मस्थ हों स्वस्थता का अनुभव करें ध्यान धारणा का अभ्यास करें


आने वाले युगभारती के वर्ष प्रतिपदा के कार्यक्रम की समीक्षा अवश्य करें रामनवमी पर भी अपने गांव सरौंहां में कार्यक्रम की योजना  है


ये कार्यक्रम अपने अन्दर की शक्ति बुद्धि विचार उत्साह की अभिवृद्धि के लिये होते हैं

इसके अतिरिक्त किन भट्ट जी की आचार्य जी ने चर्चा की छात्रावास में रहे स्व द्विवेदी जी का हमीरपुर के विद्यामन्दिर से क्या संबन्ध था वैराग्यशतक किसने लिखा आदि जानने के लिये सुनें

2.3.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 02/03/2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है मञ्जुगिर् आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 02/03/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in


https://t.me/prav353


भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।।

कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ।।


भर्तृहरि


समय कभी रुकता नहीं यह चलता रहता है जैसे समुद्र चलायमान है समुद्र का स्वभाव है लहराते रहना समय का स्वभाव है संचरित होते रहना


समय के हिसाब से हमारा शरीर हमारी भौतिक स्थिति परिवर्तित होती रहती है पशु पक्षी सब चल रहे हैं इस बात की जिज्ञासा कि ये क्यों चल रहे हैं ये कौन हैं कहां से आये हैं हमारे अध्यात्म के द्वार खुलने लगते हैं

लेकिन जिज्ञासा स्थायी होनी चाहिये

मनुष्य में आध्यात्मिकता  भौतिक जगत से अलगाव के उपरान्त ही उपजती है।

अध्यात्म एक गूढ़ विषय है

यह अनुभूति का विषय है


सामान्य व्यक्ति को यह असत्य ही लगेगा कि हनुमान जी ने सूर्य निगल लिया था लेकिन यदि हम योगमार्ग में जाने के बाद सूर्य के प्रकाश की ऊष्मा की अनुभूति भीतर करने का अभ्यास कर लेते हैं तो हमें उसकी ऊष्मा की अनुभूति होने लगती है


हमारे यहां कहा गया है

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥

चित्त अर्थात् अन्त:करण की वृत्तियों का निरोध सर्वथा रुक जाना योग है ।


यह योगमार्ग एक स्थान पर पहुंचाने वाला है अध्यात्म में रुचि रखने वाले हम भारतीयों को अनुभव होता है कि परमात्म का अंश लेकर जो आते हैं वे वास्तव में परमात्म के अंश की अनुभूति करते हुए रहते हैं


तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्‌। नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम्‌।। 1।।


वाल्मीकि के मन में आया कि मैं किसी के बारे में लिखूं जिसमें सोलह गुण हों तो नारद से पूछते हैं


को न्वस्मिन्‌ साम्प्रतं लोके गुणवान्‌ कश्च वीर्यवान्‌। धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः।। 2।।

चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः। विद्वान्‌ कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः।। 3।।


तो नारद कहते हैं 


इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्‌ धृतिमान्‌ वशी।। 8।।

बुद्धिमान्‌ नीतिमान्‌ वाग्ग्मी श्रीमाञ्छत्रुनिबर्हणः। विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ।। 9।l

महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः। आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः।। 10।।


समः समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्ण ः प्रतापवान्‌ । पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः।। 11।


.....

आचार्य जी नेआठवें से अठारहवें छंद तक पढ़ने का  परामर्श दिया ये छंद प्रभु राम के गुणों का वर्णन करते हैं


यह महापुरुषत्व ही वृद्धि करता करता ईश्वरत्व हो जाता है स्वयं परमात्मा हो जाता है न मनुष्य के पतन की सीमा है न विकास की


रशिया यूक्रेन युद्ध की ओर संकेत करते हुए आचार्य जी ने महाभारत की भी चर्चा की  संसार में सृजन और प्रलय का क्रम चलता रहता है

1.3.22

आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 01/03/2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है नीतिनिष्ण आचार्य श्री ओम शंकर जी का आज दिनांक 01/03/2022

  का  सदाचार संप्रेषण 




https://sadachar.yugbharti.in


https://t.me/prav353


यदि गम्भीर विषय न हो सामान्य बातचीत हो तो भी उसमें से तत्त्व निकाले जा सकते हैं

रशिया यूक्रेन युद्ध की ओर संकेत करते हुए आचार्य जी ने बताया कि ये सब अध्यात्म से इतर व्यवहार जगत् का कोप है जो मनुष्य को भस्मीभूत कर रहा है


इन विषयों में हमें  सामञ्जस्य बैठाते हुए चिन्तन मनन कार्यान्वयन करना चाहिये


आज शिव रात्रि का पुनीत पर्व है 

 शिव अद्भुत देवता हैं 

आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम लोग राम मनोहर लोहिया की पुस्तक पढ़ें

शिव की तरह तरह की पूजा होती है  जैसे लोधेश्वर के लिये  उमड़ती भीड़ का तो क्या कहना


शिव के साथ साथ राम और कृष्ण का इतना गहरा प्रभाव हमारी इस धरती पर है जिस पर चिन्तन किया जा सकता है


अठारह पुराणों 


1. ब्रह्म पुराण 10. ब्रह्म वैवर्त पुराण

2. पद्म पुराण 11. लिङ्ग पुराण

3. विष्णु पुराण 12. वाराह पुराण

4. शिव पुराण 13. स्कन्द पुराण

5. भागवत पुराण 14. वामन पुराण

6. नारद पुराण 15. कूर्म पुराण

7. मार्कण्डेय पुराण 16. मत्स्य पुराण

8. अग्नि पुराण 17. गरुड़ पुराण

9. भविष्य पुराण 18. ब्रह्माण्ड पुराण

में शिव पुराण तो है लेकिन वायु पुराण नहीं है कुछ विद्वानों के अनुसार वायुपुराण शिवपुराण का ही अंश है


आचार्य जी ने भैया (डा )प्रशान्त मिश्र जी सहित हम सबको परामर्श दिया कि शिव पुराण का अध्ययन करें

इसके विस्तार के लिये अलग अलग संहिताएं हैं


नर्मदेश्वर मूर्ति की तो प्राणप्रतिष्ठा की भी आवश्यकता नहीं होती


व्रत उपवास पूजन पाठ सभी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इनकी महत्ता समझने के लिये हमें चिन्तन भी करना होगा

इनका महत्त्व इसलिये भी है ताकि मनुष्य अपने मरणधर्मा शरीर के सत्य और तथ्य को भी समझे अजरता अमरता का भी चिन्तन करे

कृष्ण अर्जुन को समझा रहें हैं कि देह और देही में अन्तर है


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।


न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।2.23।।


यदि हम  लोग मानस गीता का अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन करें तो हमें व्याकुलता नहीं सतायेगी


हम स्वयं ही समाधानकर्ता हो जायेंगे


हमारा जन्म उस देश में हुआ है जहां हर समस्या का समाधान भी उपलब्ध है


किन्हीं कारणों से हम अध्यात्म और शौर्य का सामञ्जस्य नहीं कर सके इसलिये शौर्य प्रमंडित अध्यात्म अत्यन्त आवश्यक है