5.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 5 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है अरण्येचरारि आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 5 अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

सार -संक्षेप 2/68


अरण्येचर = जंगली



मनुष्य जीवन बहुत अद्भुत है अद्वितीय भी है  यह कर्मयोनि देवताओं की भोगयोनि से बहुत आगे है  इस जीवन को हम व्यर्थ न जाने दें सकारात्मक सोच के साथ हम सन्मार्ग की ओर चलने का अभ्यास करें 



आचार्य जी का प्रयास रहता है कि हमें इन वेलाओं से शक्ति बुद्धि समय पर  सर्वथा उचित निर्णय लेने की क्षमता आदि प्राप्त हो हम जल में कमल की तरह रहते हुए संसार में सारे कार्य करें लेकिन उनमें लिप्त न हों


पूर्णावतार धर्मज्ञ सर्वज्ञ शास्त्रज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।


सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48।।


आज विजयादशमी के पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं



आजकल हम लोग रामकथा के अरण्यकांड में  प्रविष्ट हैं इस कांड में घटनाओं का वैविध्य देखने को मिलता है परिस्थितियां क्षण क्षण में परिवर्तित होती रहती हैं


बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा॥

सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी॥3॥



भगवान् को मेरी यह विपत्ति कौन सुनायेगा यज्ञ के अन्न (पुरोडाशः ) को गधा ( रासभः )खाना चाहता है।

 सीतामइया का भारी विलाप सुनकर जड़-चेतन सारे जीव दुःखी हो गए




गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥

अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥4॥

जटायु में बल संयम विचार शक्ति समर्पण जूझ मरने का जज्बा था इसी कारण वो आश्वासन दे रहे हैं


सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा॥

धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें॥5॥


रे रे दुष्ट ठाढ़ किन हो ही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही॥

आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना॥6॥


सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा॥

तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू॥8॥


धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा॥

चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही॥10॥

यह वीर का भाव होता है



जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।

सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम॥29 ख॥


ध्यान जब सिद्ध हो जाता है तो बहुत शक्ति देता है इसी ध्यानसिद्धि के आधार पर शक्ति बुद्धि संयम समर्पण की प्रतीक मां सीता लङ्का में बहुत दिन तक निवास करते हुए रावण का प्रतिकार करते हुए अपनी साधना को फलीभूत कर पाईं



कथा में आगे राम का विलाप है


हम भक्त हैं और राम भगवान् हैं इसी सत्य को स्वीकारते हुए कथा का आनन्द हम लोग लें

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कवि चोंच का नाम क्यों लिया कौन किसका चेहरा धूमिल करता है आदि जानने के लिये सुनें

4.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 4 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥5॥


बुरे रास्ते पर पैर रखते ही शरीर में तेज, बुद्धि,शक्ति सामर्थ्य बिल्कुल भी  शेष नहीं बचता

और जिसके अन्तरचक्षु बन्द हैं वह गलत काम कर ही जाता है हाल की घटना देखें तो वनन्त्रा रिजार्ट कांड है




मनीष कृष्णा जी आपके लिये प्रश्न है

खगेस का क्या अर्थ है?



प्रस्तुत है शारद आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 4अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

सार -संक्षेप 2/67


शारद = निपुण


तन मन बुद्धि का बहुत अच्छा सामञ्जस्य हो तो विचार पल्लवित होने लगते हैं और उन विचारों के पल्लवन के साथ जब वाणी का व्यवहार दिखता है तो वह प्रभावशाली होती है



आइये अरण्यकांड में प्रवेश करते हैं आज के समय में व्यावहारिक परिस्थितियां उत्पन्न करने की प्रेरणा देती है रामकथा


प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥

तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥7॥


कभी प्रकट होता हुआ और कभी छिपता हुआ  बहुत प्रकार के छल करता हुआ मारीच भगवान् राम  को दूर ले गया। तब रामजी ने निशाना लगाकर कठोर बाण मारा और वह चिल्लाता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा


भगवान् तो उसे पहले ही मार सकते थे दूर जाना ही नहीं पड़ता लेकिन यही लीला है



लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥

प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥8॥


पहले लक्ष्मण का नाम लिया ताकि सीता को भ्रम हो जाये कि वे संकट में हैं फिर भगवान् राम का नाम लिया प्राण त्यागते समय उसने अपना राक्षसी रूप प्रकट किया और प्रेम के साथ भगवान् राम का स्मरण किया।


सर्वज्ञ राम ने उसके  प्रेम को जानकर उसे वह गति  दी जो मुनियों को भी दुर्लभ है।



खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा॥

आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता॥1॥


मारीच को मारकर श्री राम तुरंत लौट पड़े। हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभायमान हैं इधर जब सीताजी ने दुःखभरी वाणी  सुनी तो वे बहुत ही भयभीत हो गईं


सांसारिक सीता जी को भय होगा जब कि साक्षात् सीता तो अग्नि में प्रवेश कर गई हैं

*प्रश्नोत्तर वेला की योजना बनाकर इसे विस्तार दिया जा सकता है*



जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता॥

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई॥2॥



मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला॥

बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू॥3॥


लक्ष्मण को माया प्रभावित नहीं कर रही है जब कि सीता को कर रही है

लेकिन मर्मस्थल को चुभ जाने वाले सीता जी के वचनों से लक्ष्मण जी का मन डोल गया मति नहीं डोली



सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥

जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं॥4॥


सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं॥

इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥5॥



क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।

चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ॥28॥


बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा॥

सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी॥3॥


गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी॥

अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई॥4॥



जटायु ने सीताजी की दुःखभरी वाणी सुनते ही पहचान लिया कि ये रामजी की पत्नी हैं। उसने देखा कि नीच  इनको इस तरह लिए जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के हाथ आ गई हो



चर अचर जीव सब दुःखी हो गये


यदि जटायु ऐसा कर सकते हैं तो हम भी बहुत कुछ कर सकते हैं



सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा॥

धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें॥5॥


ऐसा आत्मविश्वास होना चाहिये आज के समय में तो इसकी बहुत आवश्यकता है

3.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी कादिनांक 3अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है ज्ञातृत्व - सागर आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 3अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

सार -संक्षेप 2/66


ज्ञातृत्व =ज्ञान



माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।

बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥15॥




रामकथा के माध्यम से अपनी व्यथाएं शमित करें

अपने को दीन हीन बेचारा न समझें  संसार में संयोग एक अदृश्य शक्ति का लीला क्रम है इस दिव्यता का अनुभव करते हुए संसार सागर  में उलझें नहीं देखा जाये तो हम सब अवतार हैं इसका अनुभव करने के लिये आवश्यकता है आत्मबोध की

अपने पास बैठने का प्रयास करें यह अनुभव करें कि मैं केवल संसार नहीं हूं कुछ और भी हूं इस आनन्द का अनुभव करें



लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।

जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥ 23॥



सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥1॥



पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली सीता जी से भगवान् राम कह रहे हैं कि मैं अब कुछ मनोहर मनुष्य लीला करूँगा


...

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥


..

, इसलिए मेरे द्वारा राक्षसों के विनाश  तक तुम अग्नि में निवास करो

अर्थात् अपने अन्दर के अग्नि तत्व को अन्य तत्वों आकाश पृथ्वी जल वायु की अपेक्षा प्रबल करने का कार्य 

इस पंचतत्व को ब्रह्मांड में व्याप्त लौकिक एवं अलौकिक वस्तुओं का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारण और परिणति माना गया है।



जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥

निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥2॥



लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥

दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥3॥


(यह दशानन रावण षड्विकारों से ग्रस्त है

उसमें से एक काम विकार के कारण मां सीता पर वह मुग्ध हो गया था )


नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥

भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥4॥




नीच व्यक्ति की नम्रता भी अत्यन्त दुःखदायी  है

 जैसे अंकुश, धनुष, साँप और बिल्ली का झुकना

दुष्ट की मीठी वाणी भी भय देने वाली होती है

मारीच तो भगवान् राम को समझ चुका था लेकिन रावण को समझ में नहीं आया


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने FLAME TEST, LICENCE, शिक्षावल्ली का उल्लेख किस कारण किया भैया पङ्कज का नाम क्यों लिया जानने के लिये सुनें

2.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 2 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 अबलौं नसानी, अब न नसैहौं। राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं॥ पायेउँ नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहों। स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं॥ परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं। मन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद-कमल बसैहौं॥




प्रस्तुत है राम-सात्वत आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 2 अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

सार -संक्षेप 2/65


सात्वत =भक्त



अबलौं नसानी, अब न नसैहौं........



अब तक तो यह उम्र बेकार चली गई लेकिन अब इसे नष्ट नहीं होने दूँगा। भगवान् राम की कृपादृष्टि से संसार रूपी रात बीत गई है, अब जागने के बाद पुनः (मायामय) बिस्तरा नहीं बिछाऊँगा। मुझे राम नाम की अतिसुंदर चिंतामणि प्राप्त हो गई है। उसे हृदयरूपी हाथ से कभी नहीं गिरने दूँगा। राम जी का जो पावन श्यामसुंदर रूप है उसकी कसौटी पर अपने चित्तरूपी सोने को कसूँगा। जब तक मैं इंद्रियों के अधीन था, तब तक  मुझे मनमाना नाच नचाकर मेरी बड़ी हँसी उड़ाई गई , लेकिन अब इंद्रियों को जीत लेने पर उनसे अपनी हँसी नहीं कराऊँगा। अब तो प्रण करके अपने मनरूपी भौंरे को राम जी के चरण-कमलों में लगा दूँगा।


भारत की मनीषा संघर्षों से कभी डरकर रुकी नहीं और अपने जीवन के सोपानों पर चढ़ती चली जा रही है


यदि हम सांसारिक प्रपञ्चों से हटकर कुछ समय इस सदाचार वेला के लिये निकाल लेते हैं तो यह हमारे लिये अत्यन्त लाभकारी है


राम जी के संघर्षों समस्याओं सफलताओं पर   दृष्टिपात कर हम उनसे प्रेरणा लें इसी मनुष्यत्व इसी रामत्व की अनुभूति इस वेला का उद्देश्य भी है

कठिन समय आने पर बुद्धि का मालिन्य न रहे इसकी प्रार्थना करें और महसूस करें कि हम बहुत क्षमतावान हैं हर समस्या का समाधान खोजने में सक्षम हैं



आइये राम -कथाप्रबन्ध में प्रवेश करते हैं

कथा के बोधतत्व में प्रवेश करके इसका रसपान करते हुए आनन्द प्राप्त करें और अपने अन्दर की शक्ति को तत्व को जाग्रत करें


अरण्य कांड में आगे


हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।

अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥ 20(ख)॥


सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥

पंचबटीं बसि श्री रघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥2॥

इस  मोक्ष देने वाली पंचवटी का कवि हृदयराम ने बहुत अच्छा वर्णन किया है


आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम लोग गीतावली भी पढ़ें


धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥

बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥3॥


अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥

सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥4॥


सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।

गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति॥22॥


सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥

खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥1॥


सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥

तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥2॥


देव समूह को आनंदित करने वाले और इस धरा का भार हरण करने वाले भगवान ने  यदि अवतार ले लिया है तो मैं  उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और उनके बाण  से प्राण त्यागकर इस भवसागर से तर जाऊँगा


रावण को कर्म के स्वभाव घेरे रहते हैं लेकिन था तो वह ऋषि का पुत्र ही

इसलिये जन्म के स्वभाव के कौंधने से उसका ज्ञान कभी कभी खुलता है



सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥1॥



पावक अर्थात् अग्नि में निवास करने का भौतिक अर्थ है अपने अन्दर का तेजस जाग्रत करना


जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥

निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥2॥

1.10.22

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का दिनांक 1 अक्टूबर 2022 का सदाचार संप्रेषण

 बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं।

गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं॥

जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं।

नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं॥2॥


प्रस्तुत है राष्ट्र -विच्छाय आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज दिनांक 1 अक्टूबर 2022

 का  सदाचार संप्रेषण 


 

 

https://sadachar.yugbharti.in/


https://youtu.be/YzZRHAHbK1w

सार -संक्षेप 2/64


विच्छायः =रत्न


इन सदाचार संप्रेषणों का उद्देश्य यही है कि 

इन्हें सुनकर गुनकर विचारकर चिन्तनकर  हम अपनी शक्ति बुद्धि  कौशल का अनुभव करें 

....

कठिन है नापना इस अटपटे संसार की राहें

बची है हाथ में सीपी लहर में गुम हुई मोती



और इसी मोती की खोज गम्भीर महायोगी आदि शंकराचार्य ने अद्वैत सिद्धान्त के माध्यम से की

 उन्होंने कहा सत्ता के चार प्रकार हैं


मिथ्या, प्रातिभषिक, व्यावहारिक, पारमार्थिक


आचार्य जी ने इनकी व्याख्या की

हमें भी इसी प्रकार की अनुभूतियों में प्रवेश करना चाहिये जिसके लिये हम लोग कुछ समय निकालें ताकि हमारी आत्मशक्ति आत्मविश्वास बढ़े



भगवान् राम के चरित्र में सब प्रकार के सद्गुणों का समावेश कर तुलसी ने  अद्भुत कौशल प्रदर्शित किया है

आइये एक बार पुनः अरण्यकांड में प्रवेश करते हैं



जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥

देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥3॥

के उत्तर में राम जो कहते हैं वैसे ही उत्तर हमारे अन्दर से उद्भूत होने चाहिये 


हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥

रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥5॥

तुम्हारे जैसे दुष्ट जानवर हम लोग खोजते हैं काल से भी युद्ध कर सकते हैं



जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक॥

जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू॥6॥


यद्यपि हम मनुज हैं लेकिन दैत्यों का नाश करने वाले और मुनियों की रक्षा करने वाले हैं, हम बालक  दिखते हैं किन्तु दुष्टों को दण्ड देने वाले। यदि बलहीन हो तो वापस लौट जाओ। युद्ध में पीठ दिखाने वाले किसी व्यक्ति को मैं नहीं मारता



तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥

कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥1॥



अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥

भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥2॥



तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥

आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥3॥


रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥

छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥4॥


महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।

सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥

सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्‌यो।

देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मर्‌यो॥4॥

(ऐसे संमोहास्त्र छोड़ दिये  जाते हैं जैसे यहां कि राम समझकर वे दुष्ट आपस में ही मरने कटने लगे )




इस रामकथा के माध्यम से आचार्य जी यही संदेश देना चाहते हैं कि हम राम का रामत्व जानें


सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।

जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ॥ 31॥



हे तात! सीता हरण की बात पिताजी से न कहिएगा। यदि मैं राम हूँ तो दशानन परिवार सहित वहाँ आकर स्वयं ही कहेगा

ये हैं राम




अनुशासन प्रेम आत्मीयता आत्मविश्वास हमारे यहां घर घर में व्याप्त रहा है इसी कारण अनेक प्रहारों के बाद भी हम अक्षयवट के समान खड़े रहे