5.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४०७ वां सार -संक्षेप

 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।


मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।।9.34।।

प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 5 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४०७ वां सार -संक्षेप


अनेक विकारों  जैसे क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, भय आदि  का मूल कारण प्रायः  भ्रमित विचार होते हैं। जब हम विचारशीलता, आत्मचिंतन और विवेक के साथ जीवन का अवलोकन करते हैं, तो ये विकार धीरे-धीरे कम हो जाते हैं।

विचारों की शक्ति से भ्रम नष्ट होता है,मन स्थिर होता है,विचार आन्तरिक शुद्धि का साधन हैं।  वैचारिक संकल्प से हमारे शरीर में अनेक परिवर्तन संभव हैं शारीरिक व्याधियां भी दूर हो सकती हैं 


 जब भी हमें अवसर मिले हमें विचार अवश्य ग्रहण करने चाहिए ये सदाचार वेलाएं  जो  हमें शक्ति और शान्ति प्रदान करने वाला अध्यात्म का वातावरण उपलब्ध कराती हैं हमें यही अवसर प्रदान करती हैं तो आइये इनका लाभ उठाएं और प्रवेश करें आज की वेला में



जब हम किसी अत्यन्त प्रिय और शक्तिसंपन्न व्यक्ति जिसके प्रति हमारा भाव पूर्णरूपेण आश्वस्त रहता है, दुविधाग्रस्त नहीं रहता है,की शरण में जाते हैं तो हम अपने को सुरक्षित अनुभव करते हैं 

जितनी दुविधा रहती है उतना ही सांसारिक क्लेश रहता है अर्जुन की इसी दुविधा को दूर करने के लिए भगवान् कृष्ण कहते हैं 


मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।


मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।18.65।।


तू मेरा भक्त हो जा, मुझमें ही मनवाला हो जा, मेरा पूजन करने वाला हो जा और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त हो जाएगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।


सब धर्मों का परित्याग करके तुम  मेरी ही शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक न करो।।


आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम अध्यात्म की विलक्षण शक्ति को पहचानने की चेष्टा करें हम अपनी संस्था के चारों आयामों को याद रखें, उठें जागें और लक्ष्य प्राप्ति तक रुके नहीं


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने

अध्यात्म के पारगामी तत्त्वदर्शी व्यक्तित्व श्री माधवराव सदाशिव गोलवलकर जी की किस हस्तरेखा के मिटने की बात बताई भैया मनीष कृष्णा जी से क्या हटाने के लिए आचार्य जी ने कहा भैया प्रवीण सारस्वत जी भैया विभास जी भैया सुनील शिवमङ्गल जी का नाम क्यों लिया अध्यात्म युवावस्था में ही सीखना चाहिए- किसने कहा था जानने के लिए सुनें

4.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४०६ वां सार -संक्षेप

 तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥

तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥2॥


प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 4 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४०६ वां सार -संक्षेप

जो व्यक्ति सूक्ष्म (आध्यात्मिक, अव्यक्त) और स्थूल (भौतिक, दृश्य) जगत् के रहस्यों को समझ लेते हैं, वे जीवन की वास्तविकताओं को गहराई से पहचान जाते हैं।  उन्हें यह पता रहता है कि क्या नश्वर है और क्या शाश्वत, क्या मेरे वश में है और क्या नहीं और जीवन का उद्देश्य क्या है।इसलिए वे मोह, भय और भ्रम से मुक्त होकर निश्चिन्त और शांतिपूर्वक जीवन जीते हैं

इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से यही बताने का प्रयास आचार्य जी करते हैं

हमारे यहां तीन प्रकार के तप बतलाए गए हैं

शरीर संबन्धी मन संबन्धी और वाणी संबन्धी

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।


स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।17.15।।



जो वाक्य उद्वेग न उत्पन्न करने वाला अर्थात् ऐसा वचन जो दूसरों को उद्विग्न,आहत न करे क्षुब्ध न करे,

सत्य, प्रिय और हितकारी हो

(सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन: ॥)

 तथा जो नियमित रूप से स्वाध्याय और अभ्यास से युक्त हो — वह वाणी का तप कहा गया है।  

देव, ब्राह्मण अर्थात् संसार के सारे कार्यों को एक किनारे कर ब्रह्म की उपासना में जो रत रहता है,गुरु और  परा विद्या को जानने वाले ज्ञानी जनों का पूजन,शुचिता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा अर्थात् किसी को कष्ट न पहुंचाना, यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।।

मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।


यह जीवन भी तपस्या है  तपस्या अर्थात् हमें आनन्द मिले और दूसरे को सुख मिले 


जनि आचरज करहु मन माहीँ। सुत तप तेँ दुर्लभ कछु नाहीँ॥

⁠तप बल तेँ जग सूजइ विधाता। तप बल बिष्नु भये परित्राता ॥१॥


तप बल सम्भु करहिँ सङ्घारा। तप तेँ अगम न कछु संसारा॥

भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहइ सो लागा ॥२॥

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने धैर्य को सुस्पष्ट किया

हम अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कौन से दो ग्रंथ पढ़ें 

आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें

3.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४०५ वां सार -संक्षेप

 मनुष्य को मनुष्यभाव का सदा विचार हो, 

प्रशंस्य कार्य का सदा समाज में प्रचार हो, 

न जीत का न हार का स्वशीष पर प्रभार हो 

स्वदेश बंधुओं से स्वार्थमुक्त दिव्य प्यार हो।

प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 3 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४०५ वां सार -संक्षेप


शरीर साधन है, साध्य नहीं।  यह कर्मयोग का एक अद्भुत विलक्षण अप्रतिम यंत्र है  जिससे सेवा,साधना और समाज के प्रति अपने कर्तव्य निभाए जाते हैं

हमें शरीर की चिन्ता अवश्य करनी चाहिए  हमें इसमें लिप्त नहीं रहना है किन्तु सचेत अवश्य रहना है  इसकी उपेक्षा भी नहीं करनी है क्योंकि हमें इस शरीर से समाज -देवता की बड़ी   पूजा करनी है

हम सनातनवादियों को राष्ट्र, जो हमारी तरह ही एक जीवन्त इकाई है, को वैभव के उच्चतम शिखर पर पहुँचाना है

हम अनुभव करें कि हम केवल जीव नहीं हम तो तत्व,शक्ति और शौर्य का प्रतीक हैं  किन्तु जब हम अपने मनुष्यत्व को भूल जाते हैं, तो उसी स्थान पर दरिद्रता, अज्ञान और पतन आ घेरते हैं।इसलिए हम अपने मनुष्यत्व को विस्मृत न करें 


मनुष्य एक तत्व शक्ति शौर्य का प्रमाण है, 

हरेक अंधकार बेधने में रामबाण है, 

मनुष्य निज मनुष्यता समझ सका नहीं जहाँ

जहान की दरिद्रता सिमट सिमट घिरी वहाँ।

हम स्वयं अपने भीतर गुरुत्व उत्पन्न करें और इस गुरुत्व के लिए हमें संयम और नियमों का पालन करना चाहिए

सात्विक मार्ग से आगे बढ़ें 

अपनी इकाई में लिप्त न हों

हमारे अन्दर परिवार भाव जाग्रत हो 

यह प्रयास करें कि परिवार प्रसन्न आनन्दित रहे हम युग भारती परिवार में किसी एक सदस्य को कष्ट हो तो सबको कष्ट होना चाहिए ऐसी अपेक्षा आचार्य जी हमसे कर रहे हैं 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने 

माधव ! मोह - फाँस क्यों टूटै ।

बाहिर कोटि उपाय करिय, अभ्यंतर ग्रन्थि न छूटै ॥१॥ का उल्लेख क्यों किया 

भैया मोहन भैया मनीष भैया संतोष मल्ल जी की चर्चा क्यों हुई 

विद्याभारती के श्री कृष्णगोपाल जी और दीनदयाल शोध संस्थान के श्री सुरेश सोनी जी किस प्रसंग में आए जानने के लिए सुनें

2.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४०४ वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४०४ वां सार -संक्षेप


भक्ति वास्तव में कोई दिखावा कोई ढोंग या केवल बाह्य आचरण नहीं, अपितु एक आंतरिक अनुभव है   

जब भक्ति अहंकार से मुक्त और सच्ची भावना से युक्त होती है, तभी वह भक्त को शक्ति देती है  वह आत्मबल, सहिष्णुता, करुणा और विवेक का एक अद्भुत स्रोत बन जाती है। इस कारण हमें भक्तिभाव की शरण में आ जाना चाहिए

मन का मृग भड़का फिरता हो 

बेतरह कुलाचें भरता हो

मेधा से तनिक न डरता हो 

डग ऊंचे ऊंचे भरता हो

तब भक्तिभाव की शरण गहो

हनुमत् चरणों को पकड़ कहो

हे महावीर हे भक्तराज है कठिन जगत का कौन काज

जो आप नहीं कर सकते हैं..

भक्तिभाव की शरण में आकर तुलसी कहते हैं


केसव! कहि न जाइ का कहिये।

देखत तव रचना बिचित्र हरि! समुझि मनहिं मन रहिये॥

सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे।


धोये मिटइ न मरइ भीति, दुख पाइय एहि तनु हेरे॥

रबिकर-नीर बसै अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं।


बदन-हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं॥

कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै।


तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै॥


भाव यह कि यह अद्भुत संसार सूरज की किरणों में जल के समान भ्रमजनित है अर्थात् मृगमरीचिका 

जैसे सूर्य की किरणों में जल समझकर उसके पीछे दौड़ने वाला हिरन जल न पाकर प्यासा ही मर जाता है, उसी प्रकार इस भ्रमात्मक संसार में सुख समझकर उसके पीछे दौड़ने वालों को भी बिना मुख का मगर यानी निराकार काल ग्रस लेता है। इस संसार को कोई सत्य कहता है, कोई मिथ्या  और कोई सत्यमिथ्या से मिला हुआ मानता है तुलसीदास के मत से तो जो इन तीनों भ्रमों से निवृत हो जाता है वही अपने असली स्वरूप को पहचान सकता है।

संसार को जितनी देर विस्मृत कर सार में जो निमग्न रहता है वह आनन्द में रहता है

किन्तु आत्मा की पूर्णता के लिए तपस्या और जीवन के आकर्षणों दोनों का समावेश आवश्यक है। केवल आत्मसंयम से आत्मा का विकास अधूरा रह जाता है; इसके लिए जीवन के विविध अनुभवों और भावनाओं का अनुभव भी आवश्यक है।

तभी कवि कहता है

तपस्वी आकर्षण से हीन कर सके नहीं आत्म-विस्तार


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया मोहन जी भैया मनीष जी भैया पंकज जी भैया मलय जी का आज उल्लेख क्यों किया भक्ति का सांसारिक स्वरूप क्या है जानने के लिए सुनें

1.6.25

आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष षष्टी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण १४०३ वां सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष षष्टी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 1 जून 2025 का सदाचार संप्रेषण

  १४०३ वां सार -संक्षेप

श्री रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, अपितु एक मानवजीवन-उद्धारक मार्गदर्शिका है।


राम की कथा संसार की व्यथाओं को निर्मूल करने का आधार है

 यह कथा मर्यादा, धर्म, कर्तव्य, त्याग और आदर्श का ऐसा संपूर्ण चित्रण है, जो मनुष्य को हर प्रकार की मानसिक, नैतिक और सामाजिक व्यथाओं से उबारने में सक्षम है।  

रामकथा में मनुष्य के जीवन के हर पहलू — संघर्ष, प्रेम, भ्रातृत्व, शत्रुता, वनवास, राजधर्म का समाधान है।  



इस कारण राम की कथा को सुनना, मनन करना और जीवन में उतारना — दुःखों से मुक्ति और आत्म-शांति का उपाय है कथा को सुनते समय हमें भावुक अवश्य होना चाहिए

मानस में चार वक्ता और चार श्रोता हैं

पहले वक्ता भगवान् शिव और श्रोता माता पार्वती हैं 

दूसरे वक्ता कागभुशुंडी और श्रोता पक्षीराज गरूड़ हैं 


एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥

जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥


तीसरे वक्ता याज्ञवल्क्य (जागबलिक) और श्रोता भारद्वाज मुनि हैं  याज्ञवल्क्य ऋषि जो मूलतः  शिव की नगरी काशी में रहते हैं यह कथा  यज्ञों की नगरी प्रयाग में सुना रहे हैं


तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा॥

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना ll

तब छह मुख वाले पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्होंने (बड़े होने पर) युद्ध में तारकासुर को मारा। वेद, शास्त्र और पुराणों में इनके जन्म की कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत् उन्हें जानता है।

उस समय भी असुर थे उनको मारने का सांसारिक विधान उस समय भी था

हम लोगों के साथ आज यही स्थिति है

हम सनातन धर्म को मानने वाले भी असुरों का संकट देख रहे हैं


चौथे वक्ता तुलसीदास और हम सब श्रोता हैं

श्री रामचरितमानस की रचना के समय धार्मिक सम्प्रदायों में अलगाव बढ़ रहा था।  मुगल शासन के तहत हिंदू समाज असुरक्षा और विघटन की स्थिति में था।  शैव-वैष्णव परस्पर वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा में लगे थे

शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच वैचारिक मतभेद था  उनमें कहीं-कहीं कटु संघर्ष भी देखा जाता था। 

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के माध्यम से न केवल रामभक्ति को सुदृढ़ किया, बल्कि शिव और राम की एकता को भी प्रकट किया।


सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥

बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥


शिव के चरण कमलों में जिनकी प्रीति नहीं है, वे राम को स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ शिव के चरणों में निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्त का लक्षण है।

  

तुलसीदास जी ने राम और शिव को अभिन्न बताते हुए साम्प्रदायिक समन्वय की स्थापना की और उस युग की धार्मिक उथल-पुथल में भक्ति को स्थिर आधार बनाया।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि भैया मोहन जी को पथरी हो गई है और भैया मनीष जी को भी कष्ट है


आचार्य जी ने श्रद्धेय अशोक सिंघल जी की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें