20.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 20 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६७ वां* सार -संक्षेप

 सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 20 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४९

सद्ग्रंथों का अध्ययन प्रारम्भ करें ध्यान धारणा स्वाध्याय करें जिससे हमारे भीतर की दुर्बलता दूर होगी 


यदि जीवन पूर्णतः समरूप और निष्कम्प हो जाए, उसमें न कोई चुनौती रहे और न किसी प्रकार का परिवर्तन, तो न पुरुषार्थ का जागरण होगा और न ही विकास सम्भव होगा। अतः हमें जीवन में आने वाले संघर्षों और कष्टों से विचलित नहीं होना चाहिए, अपितु उन्हें धैर्य, साहस और दृढ़ संकल्प के साथ स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहिए।

जब मनुष्य केवल भौतिक सुख, प्रतिष्ठा, स्पर्धा और बाह्य आकर्षणों में ही उलझा रहता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। यही विस्मृति उसे उसकी आन्तरिक शक्ति से दूर कर देती है। किन्तु भावुक भक्त ज्ञान की सीमा का संस्पर्श करते हुए कहता है सोऽहं 

*सोऽहं* एक अत्यन्त गूढ़ और महत्त्वपूर्ण वैदिक महावाक्य है। अर्थात् “मैं उसी परम शक्ति का अंश हूँ।”

हमारे ग्रंथ केवल ज्ञान के भंडार ही नहीं, अपितु शक्ति के भी अक्षय स्रोत हैं। यदि हम उनका नियमित अध्ययन और स्वाध्याय करें, तो हमारे भीतर राष्ट्रभक्ति का भाव स्रष्टा के प्रति अनुराग स्वाभाविक रूप से जाग्रत होगा।

सद्ग्रंथ केवल शब्दों का संग्रह नहीं होते, वे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं। उनके अध्ययन से मनुष्य के भीतर श्रेष्ठ भावनाएँ जाग्रत होती हैं। 


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने वृक्ष के रूपक को किससे संयुत किया, भैया विनय वर्मा जी की क्या विशेषता बताई, विदुर ने युधिष्ठिर को क्या समझाया था  संगठन में आनन्द की अनुभूति कैसे होगी जानने के लिए सुनें

19.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 19 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 19 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४८

"युगभारती"  माँ भारती की आरती का स्वर,

कि संयम शक्ति सेवा साधना  का दीप है भास्वर l




दीनदयाल विद्यालय अन्य विद्यालयों के सदृश किसी साधारण उद्देश्य से नहीं, बल्कि एक पुनीत और राष्ट्रोद्धारक भावना से प्रारम्भ किया गया था। इसका ध्येय केवल विद्या प्रदान करना नहीं, अपितु ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना था जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल, आत्मविश्वासी और कभी पराजित न होने वाले सिद्ध हों। इस विद्यालय की व्यवस्था अत्यंत सुविचारित थी। यहाँ यह उद्देश्य रखा गया कि छात्र शक्ति, भक्ति, युक्ति, संयम, सद्विचार,स्वास्थ्य और स्वाध्याय के क्षेत्र में उच्चतम स्तर तक पहुँचे।

विद्यालय का वातावरण ऐसा निर्मित किया गया था कि विद्यार्थी केवल शैक्षिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और चारित्रिक दृष्टि से भी सुदृढ़ बनें। आचार्यों द्वारा विद्यार्थियों को प्रेम, आत्मीयता और मार्गदर्शन का स्नेहमय परिवेश प्रदान किया जाता रहा । जब शिक्षा के साथ ऐसा पवित्र और प्रेरणादायी वातावरण जुड़ जाता है, तब विद्यार्थियों के भीतर उत्कृष्ट भावों का उदय स्वाभाविक रूप से होता है और जहाँ उत्कृष्ट भाव जाग्रत होते हैं, वहाँ श्रेष्ठ परिणाम अवश्य प्राप्त होते हैं।और श्रेष्ठ परिणाम आये भी l

आज भी परम आदरणीय आचार्य श्री ओम शङ्कर जी हमारे भीतर उत्कृष्ट भावों को जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि हम शक्तिसंपन्न बनें साधना के चरम पर पहुंचने वाला मार्ग पकड़ लें उन्हें दुष्ट शक्तियों को पराजित करने वाले रामत्व की अनुभूति से युक्त राष्ट्रभक्त मिल सकें इसका वे सतत प्रयत्न कर रहे हैं 


स्थान के प्रभाव से किस प्रकार का मनोभाव उत्पन्न हो जाता है इसके लिए आचार्य जी ने एक कथा सुनाई 

एक बार श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को काँवर में बैठाकर तीर्थयात्रा करा रहे थे। मार्ग में एक स्थान से गुजरते समय उनके पैरों में पीड़ा होने लगी। शरीर थक गया। उसी क्षण उनके मन में क्षणिक विचार आया 

“कैसा भारी बोझ है!”

माता-पिता ने तुरंत उनके मन की स्थिति भाँप ली कि उस स्थान का प्रभाव श्रवण के मन को विक्षुब्ध कर रहा है। “वृद्ध माता-पिता ने करुण स्वर में कहा — ‘पुत्र श्रवण! यदि संभव हो तो हमें थोड़ा और आगे ले चलो; हमारे मन में अभी यात्रा पूर्ण करने की आकांक्षा शेष है।’”

इसके पश्चात् जैसे ही वे उस स्थान से आगे बढ़े, उनका मन पुनः निर्मल और प्रसन्न हो गया। उन्हें माता-पिता का भार फिर कभी बोझ नहीं लगा।


रामानंद के बारह शिष्यों के नाम,  एक प्रसिद्ध दोहे के अनुसार हैं:

अनंतानंद, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि। पीपा, भावानंद, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि॥


जिनमें सेन की चर्चा आचार्य जी ने  क्यों की ,भैया प्रखर श्रीवास्तव जी ( श्री जे पी जी के पौत्र )का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

18.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६५ वां* सार -संक्षेप

 वह बुझने वाली आग नहीं, रग-रग में उसे समाए हूं।

यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 18 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४७

प्रेम आत्मीयता के आधार पर संगठित रहें, संगठन का विस्तार करें, शक्ति प्रदर्शित करने में भ्रमित न रहें 


आचार्य जी निरन्तर यह प्रयास करते हैं कि इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से हम उत्साहित, उत्थित, उद्बोधित और जाग्रत हो सकें। उनका उद्देश्य है कि हम केवल बाह्य ज्ञान तक सीमित न रहें, अपितु जीवन के सार और असार दोनों का यथार्थ विवेकपूर्वक बोध प्राप्त करें।


भारतवर्ष 

जिसे केवल भौगोलिक भूमि नहीं, बल्कि सृष्टि के आदि क्षण से जुड़ी हुई, देश-काल से परे, विस्तृत और दिव्य चेतना वाले राष्ट्र के रूप में निम्नांकित पंक्तियां चित्रित कर रही हैं 



*भारतवर्ष हमारा है, यह हिंदुस्तान हमारा है।*

*जिस दिन सबसे पहले जागे, नव-सिरजन के स्वप्न घने,*

*जिस दिन देश-काल के दो-दो, विस्तृत-विमल वितान तने,*

*जिस दिन नभ में तारे छिटके, जिस दिन सूरज-चाँद बने,*

*तब से है यह देश हमारा, यह अभिमान हमारा है।*


की प्रकृति आदिकाल से ही ऐसी रही है कि वह दुष्ट प्रवृत्तियों का उन्मूलन कर उन्हें भी मानवता के पथ पर अग्रसर करने का प्रयास करती है। जिन दुष्ट व्यक्तियों या शक्तियों में विध्वंस की प्रवृत्ति रही है, भारत की संस्कृति ने उन्हें संस्कारित कर मनुष्यत्व की ओर उन्मुख करने का प्रयास किया है। किन्तु इस महान् कार्य के लिए शक्ति का संग्रह अत्यन्त आवश्यक है। संसार में व्यवस्था, शांति और धर्म की स्थापना संगठित शक्ति से सम्भव होती है। अतः भारत राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और समर्पण रखने वाले हम लोगों के लिए संगठित रहना अत्यन्त आवश्यक है। संगठन प्रेम, आत्मीयता,सद्व्यवहार और  विश्वास के आधार पर ही स्थिर और प्रभावी बनता है। जहाँ परस्पर विश्वास होता है, वहाँ शक्ति का संचय होता है और जहाँ शक्ति संगठित होती है, वहाँ धर्म, न्याय और व्यवस्था की स्थापना सहज सम्भव हो जाती है।अतः आवश्यक है कि हम प्रेम और आत्मीयता के सूत्र में बंधे रहते हुए अपनी संगठित शक्ति युगभारती के विकास में सहायक बनें   उसे लोकमंगल के कार्यों में नियोजित करते रहें दुष्टों के विध्वंस में भ्रमित भयभीत न रहें 


आचार्य जी ने समुद्र के खारेपन से किसकी तुलना की, हिन्दुत्व को कैसे व्याख्यायित किया,Indian Jews in Israel पुस्तक का उल्लेख क्यों हुआ, आचार्य जी को चीनी डाक्टर के पास कौन भैया ले गए थे जानने के लिए सुनें

17.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 17 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४६

सत्कार्य तल्लीन होकर करें 


आचार्य जी का नित्य प्रयास रहता है कि हमारे मनों में सद्भावों और सद्विचारों का सतत मंथन होता रहे, जिससे हमारे आचरण में शुद्धता और वाणी /व्यवहार में सौम्यता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगे l 

हम जब उच्च आदर्शों में स्वयं को समर्पित करते हैं , तभी हमारा व्यक्तित्व विकसित होता है।

आचार्य जी का यह भी प्रयत्न रहता है कि हम आत्मस्थ होने की भी चेष्टा करें  आत्मस्थ होने पर  ज्ञात होता है कि मैं न क्षरणशील हूं न मरणशील मैं तो हूं 

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्

अर्थात् मैं सीमित देह नहीं, बल्कि अजर-अमर, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त आत्मस्वरूप हूँ। यही अवस्था परमात्मा से एकत्व की अनुभूति है। इस अनुभूति से हम न भ्रमित रहते हैं न भयभीत l

हम जो भी करें, पहले उसके उद्देश्य को समझें, फिर पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ उसमें तल्लीन हों इस कारण हमारे प्रयास अद्भुत और सार्थक परिणाम प्रदान करेंगे।

हम यह मानकर चलते हैं कि हमारा राष्ट्र परमात्मा की लीला का केंद्र है। अतः हम राष्ट्र की सेवा को उपासना के समान मानते हैं। इस महान् ध्येय की पूर्ति के लिए हमें अनेक ऐसे राष्ट्रभक्तों की आवश्यकता होती है, जिनके हृदय में देश के प्रति निष्कलुष प्रेम और समर्पण का भाव हो। ऐसे राष्ट्रभक्त अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हैं। वे देश के लिए जीते हैं, देश के लिए कार्य करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने को भी तत्पर रहते हैं।

इसी प्रकार के समर्पित और आदर्श नागरिकों से राष्ट्र सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली बनता है।



सुरेश सोनी जी में क्या विशेषता है, लेखन किसे कहते हैं,  *हमारी प्रार्थना और प्रतिज्ञा* किस लेखक की है,किसने operation के समय मूर्छित न करने का आग्रह किया,पाकिस्तान की ओर से समर्थित कबायली लड़ाकों द्वारा कश्मीर पर हमले की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की जानने के लिए सुनें

16.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६३ वां* सार -संक्षेप

 जो समाज के लिए जिंदगी जीते हैं 

परहित में विष-प्याला हँसकर पीते हैं। 

आजीवन समाज-हित करते रहते हैं, 

मस्त मगन संन्यस्त भाव में बहते हैं ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 16 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४५


हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपने भावों विचारों को पवित्र रखें और अपनी भक्ति को निष्काम बनाएं 


विश्व भारतवर्ष की अनुकृति करेगा 

तब विधाता विश्व का संकट हरेगा

संसार में विविध प्रकार के संकट सदा से रहे हैं और आगे भी रहेंगे । जीवन संघर्ष का नाम है। परिस्थितियाँ कभी अनुकूल होती हैं तो कभी प्रतिकूल किन्तु उनसे जूझने का सामर्थ्य पुरुष में ही होता है


पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो।

पुरुष क्या, पुरुषार्थ हुआ न जो;


हृदय की सब दुर्बलता तजो।

प्रबल जो तुममें पुरुषार्थ हो—


सुलभ कौन तुम्हें न पदार्थ हो?

प्रगति के पथ में विचरो उठो;

 पुरुषार्थी मनुष्य वह है जो साहस, धैर्य, विवेक और परिश्रम से युक्त हो। भारतीय संस्कृति में ‘पुरुषार्थ’ का विशेष महत्त्व है l

हमारा भाव, हमारे विचार, हमारी भक्ति और हमारा विश्वास सदा इस महान् संस्कृति से संयुक्त रहें—इसी उद्देश्य से आचार्यजी निरंतर प्रयासरत रहते हैं। वे जानते हैं कि भारतीय संस्कृति केवल बाह्य आडंबर या परंपराओं का नाम नहीं है, अपितु वह जीवन को उच्च आदर्शों से जोड़ने वाली एक दिव्य अनुभूति है। भारत की संस्कृति मूलतः यज्ञमयी है। यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र या वैदिक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और परोपकार की भावना है। यज्ञमयी जीवन का तात्पर्य है स्वार्थ का परित्याग कर लोकमंगल के लिए जीना। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है कि जीवन का वास्तविक मूल्य उपभोग में नहीं, अपितु अर्पण में है।

इस संस्कृति में असार और सार का स्पष्ट विवेक कराया गया है। संसार के भौतिक आकर्षण, क्षणभंगुर सुख और बाह्य उपलब्धियाँ असार हैं, क्योंकि वे नश्वर और परिवर्तनशील हैं। इसके विपरीत सत्य, धर्म, प्रेम, करुणा और आत्मज्ञान ही जीवन के सार तत्व हैं, जो शाश्वत और कल्याणकारी हैं।

भारतीय दर्शन यह भी प्रतिपादित करता है कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। शरीर नश्वर है, परन्तु आत्मा सनातन है। इसी सत्य का बोध होने पर मनुष्य जीवन को उच्च दृष्टि से देखता है और मोह, भय तथा आसक्ति से मुक्त होने का प्रयास करता है।

अतः आचार्यजी का सतत प्रयास यही है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपने विचारों को पवित्र रखें, अपनी भक्ति को निष्काम बनाएं और अपने विश्वास को सनातन सत्य पर आधारित करें। जब हमारा जीवन भारतीय संस्कृति के इन मूल्यों से अनुप्राणित होगा, तभी हम व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों स्तरों पर सच्चे अर्थों में समृद्ध और संतुलित जीवन जी सकेंगे।


इसके अतिरिक्त यक्ष प्रश्न क्या है,युगभारती के संविधान की चर्चा क्यों हुई, भैया मोहन जी,भैया वीरेन्द्र जी, भैया विभास जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

15.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 15 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६२ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 15 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४४

ईश्वरत्व तक पहुंचने के प्रयास में विघ्न बाधाओं से भयभीत न हों और लक्ष्य प्राप्ति तक रुकें नहीं


आचार्यजी निरन्तर यह प्रयास करते हैं कि वे स्वयं भी और हम सब भी भय, विघ्न तथा बाधाओं से सुरक्षित रहें। हम सबकी मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होती रहे, तथा हम पुरुषार्थपूर्वक सतत प्रयत्नशील रहें।

वे चाहते हैं कि हमारा अध्ययन केवल शब्दों तक सीमित न रहे, अपितु पढ़ा हुआ ज्ञान हमारे जीवन में प्रकाश, विवेक और सद्बुद्धि का संचार करे, हमारे आचरण को उत्कृष्ट बनाए, हमें समाजोन्मुख और राष्ट्रोन्मुख करे,हम जान लें कि हमारा वास्तविक अस्तित्व शाश्वत है  नाश केवल देह का होता है, आत्मा का नहीं क्योंकि जब यह अनुभूति हो जाती है कि “मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ”, तब जीवन में धैर्य, साहस और समत्व का भाव उत्पन्न होता है।

हम लोग स्वदेशभक्त हैं  यह अनुभूति जब स्वभाव बन जाती है तो  हम अपने देश को माता कहकर पुकारते हैं हम संपूर्ण प्रकृति से भी आत्मीय भाव प्रदर्शित करते हैं 


हमारा वैदिक साहित्य अद्भुत है यजुर्वेद में यज्ञीय विधान हैं और उसमें पद्यात्मक के साथ गद्यात्मक मंत्र भी मिलते हैं यज्ञ हमारे जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं यह कोरोना काल में भी सिद्ध हुआ 


यदि हम केवल इन्द्रियसुख और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों में ही लिप्त रहेंगे, तो मनुष्य जन्म पाकर भी मनुष्यता के वास्तविक आनंद से वंचित रह जाएंगे।अतः हमें मनुष्यत्व की अनुभूति करनी चाहिए l

एषां न विद्या न तपो न दानं

ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।

ते मृत्युलोके भुवि भारभूता

मनुष्यरूपेण मृगाः चरन्ति॥


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने इन्द्रप्रस्थ और लखनऊ की बैठकों की चर्चा क्यों की भैया मोहन जी और भैया वीरेन्द्र जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें

14.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 14 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 14 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४३

हमें सद्विचारों के माध्यम से आत्मशक्ति अर्जित करने का सतत् प्रयास करना चाहिए, ताकि हमारे भीतर उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो। उत्साह से परिपूर्ण होकर ही हम किसी भी कार्य की रूपरेखा स्पष्ट रूप से निर्धारित करने तथा उसे सुव्यवस्थित ढंग से क्रियान्वित करने में सक्षम बन सकते हैं



आचार्य जी नित्य हमें प्रेरित कर रहे हैं ताकि हम अपने वास्तविक स्वरूप और मनुष्यत्व का बोध कर सकें। इसके लिए वे आर्ष साहित्य के अध्ययन में रुचि जाग्रत करने तथा सनातन परम्परा के आचरण में शिथिलता न आने देने का अद्भुत प्रयास कर रहे हैं। उनका उद्देश्य यह है कि हमारा मानस दासत्व की मानसिकता से मुक्त रहे और समाज में विकृतियाँ परम्परा का रूप न धारण कर लें। वे हमें सजग, आत्मगौरवयुक्त और सांस्कृतिक रूप से जाग्रत रहने की शिक्षा दे रहे हैं। इस प्रकार की प्रेरणा को वे हनुमत् कृपा का ही प्रसाद मानते हैं।


भारत में सत्य और असत्य का  संघर्ष निरंतर चल रहा है  

‘भारत’ शब्द का अर्थ  है जो ‘भा’ अर्थात् प्रकाश, ज्ञान और चेतना में रत हो। यद्यपि समय-समय पर दुष्ट प्रवृत्तियों ने अज्ञान और अंधकार को फैलाने का प्रयास किया है, तथापि इस राष्ट्र की विशेषता अद्वितीय रही है। हमारी परम्परा, सांस्कृतिक चेतना और आत्मशक्ति इतनी समर्थ है कि जब भी अधर्म या अंधकार बढ़ा है, तब किसी न किसी महापुरुष का उदय हुआ है, जिसने प्रकाश, सत्य और धर्म के माध्यम से उसका निवारण किया है। यही हमारे देश की जीवंतता और आध्यात्मिक सामर्थ्य का प्रमाण है।

वैदिक ज्ञान को विकृत करने का कुचक्र चला उसे हम स्वीकरते गये 

हम उसे विकृति से बचाने के लिए सक्रिय नहीं हुए, केवल दर्शक बने रहे।

कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे..

हम भावुक हो जाते हैं किन्तु उस भावुकता को सुरक्षित नहीं कर पाते आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि उसे सुरक्षित करने हेतु समय सारणी बना लें l 



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने श्री सुरेश सोनी जी का उल्लेख क्यों किया, आज कौन सी दो बैठकें हैं,एक सूत्र में बंधने का क्या उपाय है, हम अधिवेशन क्यों करते हैं, भगिनी निवेदिता के किस लेख की चर्चा हुई जिसके अनुसार  एक उपाय से राष्ट्र के पुनरुत्थान की गति अनन्तगुणित हो जाएगी  शिक्षा में क्या आवश्यक है जानने के लिए सुनें

13.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 13 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६६० वां* सार -संक्षेप

 [13/02, 07:23] Praveen: तुलसिदास प्रभु ! कृपा करहु अब , मैं निज दोष कछू नहिं गोयो ।


डासत ही गइ बीति निसा सब , कबहुँ न नाथ ! नींद भरि सोयो ॥४॥


मन की चंचलता,अहंकार और अंतर्मन के विकारों के कारण गहरी शांति नहीं मिली



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 13 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४२

हम लोग व्यक्ति से व्यक्तित्व  की यात्रा में रत रहें समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी भाव के साथ



हमारी शिक्षा मनुष्य को भीतर से गढ़ने की प्रक्रिया थी l शिक्षा का केंद्र मन, बुद्धि, चित्त और चरित्र था, केवल सूचना, कौशल या उपार्जन नहीं।

प्राचीन भारतीय दृष्टि, जिसका सुस्पष्ट निरूपण तैत्तिरीय उपनिषद्

(ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।

ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।   आदि )


 जैसे ग्रंथों में मिलता है, शिक्षा को आत्म-विकास की साधना मानती है। वहाँ पढ़ना मात्र जानना नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को पहचानना, उन्हें दूर करना और श्रेष्ठ गुणों को जाग्रत करना था l विद्यार्थी को सत्य, धैर्य, विनय, सेवा और संयम की ओर प्रवृत्त किया जाता था। मन को चंचलता से स्थिरता की ओर ले जाना शिक्षा का भाग था।तर्क, विवेक, उचित अनुचित की पहचान विकसित की जाती थी, ताकि व्यक्ति विषम परिस्थितियों में उचित निर्णय ले सके l ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, लोभ जैसे विकारों को कम करना और करुणा, मैत्री, कृतज्ञता जैसे भावों को बढ़ाना सिखाया जाता था।जो सीखा, वह व्यवहार में उतरे—यही कसौटी थी। ज्ञान का मूल्य चरित्र से आँका जाता था। विद्या का उद्देश्य यह समझना था कि मनुष्य केवल शरीर या बुद्धि नहीं, बल्कि एक चेतन सत्ता है। इस बोध से जीवन में संतुलन और शांति आती है।

इस प्रकार शिक्षा बाहर से जानकारी भरने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि भीतर छिपी संभावनाओं को तराशने की कला थी जैसे शिल्पी पत्थर को तराशकर मूर्ति प्रकट करता है। शिक्षा उसी शिल्प का नाम थी, जो मनुष्य के भीतर छिपे श्रेष्ठ स्वरूप को उजागर कर दे।

दुर्भाग्य से ऐसी विलक्षण शिक्षा से हम वंचित रह गये l

[13/02, 07:41] Praveen: तुलसिदास प्रभु ! कृपा करहु अब , मैं निज दोष कछू नहिं गोयो ।


डासत ही गइ बीति निसा सब , कबहुँ न नाथ ! नींद भरि सोयो ॥४॥


मन की चंचलता,अहंकार और अंतर्मन के विकारों के कारण गहरी शांति नहीं मिली



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 13 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६६० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४२

हम लोग व्यक्ति से व्यक्तित्व  की यात्रा में रत रहें समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी भाव के साथ



हमारी शिक्षा मनुष्य को भीतर से गढ़ने की प्रक्रिया थी l शिक्षा का केंद्र मन, बुद्धि, चित्त और चरित्र था, केवल सूचना, कौशल या उपार्जन नहीं।

प्राचीन भारतीय दृष्टि, जिसका सुस्पष्ट निरूपण तैत्तिरीय उपनिषद्

(ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं बह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम । अवतु वक्तारम् ।

ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः ।   आदि )


 जैसे ग्रंथों में मिलता है, शिक्षा को आत्म-विकास की साधना मानती है। वहाँ पढ़ना मात्र जानना नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को पहचानना, उन्हें दूर करना और श्रेष्ठ गुणों को जाग्रत करना था l विद्यार्थी को सत्य, धैर्य, विनय, सेवा और संयम की ओर प्रवृत्त किया जाता था। मन को चंचलता से स्थिरता की ओर ले जाना शिक्षा का भाग था।तर्क, विवेक, उचित अनुचित की पहचान विकसित की जाती थी, ताकि व्यक्ति विषम परिस्थितियों में उचित निर्णय ले सके l ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, लोभ जैसे विकारों को कम करना और करुणा, मैत्री, कृतज्ञता जैसे भावों को बढ़ाना सिखाया जाता था।जो सीखा, वह व्यवहार में उतरे—यही कसौटी थी। ज्ञान का मूल्य चरित्र से आँका जाता था। विद्या का उद्देश्य यह समझना था कि मनुष्य केवल शरीर या बुद्धि नहीं, बल्कि एक चेतन सत्ता है। इस बोध से जीवन में संतुलन और शांति आती है। उस शिक्षा से हम अपने को जानने में समर्थ हो जाते थे l

इस प्रकार शिक्षा बाहर से जानकारी भरने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि भीतर छिपी संभावनाओं को तराशने की कला थी जैसे शिल्पी पत्थर को तराशकर मूर्ति प्रकट करता है। शिक्षा उसी शिल्प का नाम थी, जो मनुष्य के भीतर छिपे श्रेष्ठ स्वरूप को उजागर कर दे।

दुर्भाग्य से ऐसी विलक्षण शिक्षा से हम वंचित रह गये l वर्तमान शिक्षा हमें भौतिकता में उलझा देती है आनन्द से दूर कर देती है l इस कारण शिक्षा पर चिन्तन मनन अत्यन्त आवश्यक है l


आचार्य जगपाल जी द्वारा गाये गीत *तरुण तेरे तेज का आह्वान है* को सुनकर कौन से  अध्यापक रोने लगे थे,धर्मसभा में विवेकानन्द किस प्रकार भिन्न थे, आचार्य जी ने कुर्ते का कपड़ा क्यों नहीं लिया,संकटों में मुस्कराने के हम कैसे अभ्यासी हो जाते हैं जानने के लिए सुनें

12.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 12 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४१

शिक्षा पर गम्भीर चिन्तन आवश्यक है


आचार्यजी, जो हमारे लिए अत्यन्त श्रद्धेय हैं, के भीतर हम लोगों को प्रेरित करने का विलक्षण सामर्थ्य विद्यमान है। उनके अनुसार यह सामर्थ्य निश्चय ही हनुमानजी की कृपा का प्रसाद है।अत्यन्त प्रभावकारिणी अभिव्यक्तियों द्वारा आचार्य जी हमारे भीतर उत्साह,ऊर्जा, श्रद्धा और सद्प्रेरणा जाग्रत करने का हमारे व्यक्तित्व को राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी करने का जो सतत प्रयत्न कर रहे हैं, हमें उसका यथोचित लाभ उठाना चाहिए।


आगामी राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए हमने शिक्षा को ही मुख्य विषय के रूप में निर्धारित किया है, क्योंकि वर्तमान समय में शिक्षा की दशा और दिशा दोनों ही गंभीर चिंतन की अपेक्षा रखती हैं। आज की शिक्षा-पद्धति हमें अपने बच्चों के माध्यम से प्रत्यक्ष अनुभव में आती है और इसी अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि उसमें अनेक सुधारों की आवश्यकता है।

हम स्वयं भी अनेक बार अशांत और व्याकुल अनुभव करते हैं, हम धन के पीछे अंधाधुंध दौड़ लगाते हैं

यह सत्य है कि धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है, परंतु जब वही साधन लक्ष्य बन जाता है, तब मनुष्य निरंतर उसी की प्राप्ति के पीछे दौड़ता रहता है। इस दौड़ में वह मानसिक शांति, संतुलन, संबंधों की मधुरता और आंतरिक संतोष जैसे महत्त्वपूर्ण मूल्यों की उपेक्षा करने लगता है।धन की बुभिक्षितता उचित नहीं है


त्यजेत् क्षुधार्ता महिला स्वपुत्रं खादेत् क्षुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् ।

बुभुक्षितः किं न करोति पापं क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति ॥ ६० ॥


जब बुभिक्षितता अर्थात् भूख अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है, तब वह स्वाभाविक ममता, करुणा और नैतिकता को भी पराजित कर सकती है। जैसे एक भूखी स्त्री अपने पुत्र का त्याग कर सकती है, और भूखी सर्पिणी अपने अंडों को खा सकती है, वैसे ही अत्यधिक भूखा मनुष्य ऐसा कोई भी अनुचित कर्म कर सकता है, जो सामान्य अवस्था में वह कभी न करता। अभाव और दुर्बलता की स्थिति में मनुष्य की संवेदनाएँ क्षीण हो जाती हैं।


 हमारी  वर्तमान शिक्षा ने हमें जीवन के संतुलन, धैर्य और आंतरिक स्थिरता का समुचित संस्कार नहीं दिया। अतः शिक्षा पर गंभीर विचार-विमर्श कर उसके उद्देश्यों, पद्धति और मूल्यों का पुनर्मूल्यांकन करना अत्यंत आवश्यक है।


प्राचीन भारतीय शिक्षा यह बताती है कि शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि जीवन का परिष्कार है। गुरुकुल व्यवस्था और उपनिषदों के उपदेशों ने ऐसे व्यक्तित्व गढ़े, जिनके कारण भारत ज्ञान, संस्कृति और मूल्यबोध में अग्रणी रहा।

इसी आदर्श को समझना और वर्तमान शिक्षा में उसके तत्वों का समावेश करना,जिससे व्यक्ति समाज और राष्ट्र की समस्याओं को परखे,सुलझाए

 आज उतना ही आवश्यक है।


दत्तात्रेयी वृत्ति क्या है भैया कृष्ण कुमार तिवारी जी भैया पुनीत जी भैया अरविन्द जी भैया मोहन जी का उल्लेख क्यों हुआ, दीनदयाल जी के साहित्य के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें

11.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष नवमी/ दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 11 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५८ वां* सार

 कविं पुराणमनुशासितार


मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।


सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप


मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।8.9।।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष  नवमी/ दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 11 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १४०


११ फ़रवरी की स्मृति हमें पं दीनदयाल जी के जीवन-मूल्यों

सरलता, सेवा, नैतिकता और राष्ट्रनिष्ठा को पुनः स्मरण करने का अवसर देती है। उनके विचार आज भी हमें समाजहित देशहित और आत्मानुशासन की दिशा में प्रेरित करते हैं। हम अपने घरों में कार्यस्थलों में दीनदयाल जी का चित्र, अखंड भारत का चित्र अवश्य लगाएं


आचार्य जी नित्य प्रयास करते हैं हमें प्रेरित करने के लिए ताकि हम व्याकुलता, पीड़ा और चिंता से ग्रस्त न रहें हम अपने भीतर स्थित वास्तविक तत्त्व, अर्थात् आत्मस्वरूप का दर्शन करने का प्रयास करें। प्रातःकाल का समय इस आत्मचिंतन और आत्मजागरण के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है।जब हम शांत चित्त से अपने अंतर्मन का अवलोकन करेंगे, तब हमें अपने भीतर की शक्ति, शांति और स्पष्टता का अनुभव होने लगेगा l

ऐसी अवस्था में  हम साधक अपने संकल्पों की सिद्धि की दिशा में सफल प्रयास कर सकेंगे l


अर्जुन  साधक की वास्तविक समस्या को सामने रखते हुए कहते हैं।


चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।


तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।6.34।।


 मन की प्रकृति ही गति, परिवर्तन और विषयों की ओर दौड़ना है। वह कभी एक स्थान पर नहीं ठहरता। वह हमें स्मृतियों, इच्छाओं, भय, कल्पनाओं और वासनाओं में उलझाकर स्थिर नहीं रहने देता।

तो भगवान्  मोहांध अर्जुन का मार्गदर्शन करते हुए कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।हम भी अभ्यास और वैराग्य द्वारा अपने मन को वश में करें l


कुछ स्मृतियाँ समय की धूल से ढँक जाती हैं, पर कुछ ऐसी होती हैं जो हर वर्ष किसी दिन मन के द्वार पर आकर धीरे से दस्तक देती हैं। ११ फ़रवरी एक वेदनापूर्ण तिथि के रूप में स्मरण की जाती है। सन् १९६८ में इसी दिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का पार्थिव शरीर मुगलसराय (अब दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन) के समीप पाया गया था। दीनदयाल जी अपने अत्यंत सौम्य, सरल और मृदुभाषी स्वभाव के लिए विख्यात थे। वे सत्ता, पद या व्यक्तित्व प्रदर्शन से दूर रहकर विचार और आचरण की शुचिता को अधिक महत्व देते थे। उनका जीवन सादगी, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण का उदाहरण माना जाता है।

उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन प्रस्तुत किया, जिसमें व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन की बात कही गई। उनके लिए राजनीति केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक संवेदना पहुँचाने का साधन थी—जिसे वे “अंत्योदय” के भाव से व्यक्त करते थे।


इसके अतिरिक्त भैया विनय अजमानी जी, भैया सुधीर अवस्थी जी, भैया कृष्ण कुमार तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ,आचार्य जी ने विद्यालय में ११ फरवरी की स्मृतियों का चित्रण जो हमें भावुक कर देता है करते हुए क्या कहा,जानने के लिए सुनें

10.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी/ नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 10 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५७ वां* सार -संक्षेप

 शरीर है कुटी कि या महल महान है 

समय के साथ साथ यह चलायमान है 

शरीर भर नहीं कि हम वो आत्मतत्व हैं 

ज्ञान भक्ति शक्ति युक्त नित्य सत्व हैं।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी/ नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 10 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३९

युगभारती हमें ऐसी साधनाशक्ति दे कि हम कर्म में प्रवृत्त हों ताकि समाज को हमसे आश्वासन मिल सके उसे भय भ्रम न रहे, हम धर्म को समझें और मर्म तक की यात्रा का उपाय करें


हमारे कल्याण के लिए हमें शक्ति भक्ति बुद्धि तप त्याग समर्पण आदि गुणों से संपन्न बनाने के लिए  हमें यह अनुभव कराने के लिए कि हमारे भीतर परमात्मा विराजमान है तो हमें भय और भ्रम नहीं होना चाहिए, आचार्य जी नित्य अद्भुत भावों के साथ हमें प्रबोधित कर रहे हैं यह भगवान् की कृपा है 

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ।।


हम विश्वास के साथ प्रार्थना करते हैं कि जैसे भगवान् राम और लक्ष्मण ने राक्षसों का संहार कर धर्म की रक्षा की, वैसे ही वे हमारी भी रक्षा करें।


जब भी हम भगवान् राम का स्मरण करते हैं, तो हमारे मन में उनका वनवासी रूप ही अधिक सजीव होकर उभरता है। राजसिंहासन पर विराजमान राम से अधिक प्रभावशाली वह राम हैं, जिन्होंने वन की कठोर परिस्थितियों में रहते हुए भी मर्यादा, धैर्य, करुणा, त्याग,शौर्य, पराक्रम और धर्म का अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया।

वनवास का जीवन किसी राजकुमार के लिए अत्यंत कष्टकर हो सकता था, किन्तु श्रीराम ने इसे कर्तव्य और धर्मपालन का अवसर मानकर सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने पिता की आज्ञा और वचन की मर्यादा की रक्षा के लिए राज्य, वैभव और सुख-सुविधाओं का परित्याग किया। यह त्याग केवल व्यक्तिगत नहीं था, अपितु समस्त मानवता को यह संदेश देने वाला था कि धर्म के लिए सुखों का त्याग भी छोटा है।

भगवान् राम के परम भक्त हनुमान जी सदैव कर्म में निरत रहने वाले हैं। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण सेवा, परिश्रम और समर्पण का आदर्श प्रस्तुत करता है। वे किसी भी परिस्थिति में निष्क्रिय नहीं रहते, अपितु अपने आराध्य के कार्य को ही जीवन का परम उद्देश्य मानकर सतत प्रयत्नशील रहते हैं।

उनके भीतर न भय का स्थान है, न भ्रम का। भय इसलिए नहीं कि उन्हें अपने सामर्थ्य और प्रभु-कृपा पर अटूट विश्वास है  और भ्रम इसलिए नहीं कि उनका मन लक्ष्य के प्रति पूर्णतः एकाग्र है।

इसके अतिरिक्त

प्रेमानन्द जी महाराज के साथ दो कथावाचकों वाला क्या प्रसंग था,

ज्यादा जोगन मढ़ी उजाड़ि(Too many cooks spoil the broth) का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

9.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 9 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५६ वां* सार -संक्षेप

 संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥

निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥4॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 9 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३८

परिस्थितियाँ अनुकूल हों या प्रतिकूल,हम अपने प्रयत्नों में शिथिलता न लाएं। इन्द्रप्रस्थ में होने जा रहे अधिवेशन के लिए जुट जाएं l


हमारी आर्ष परम्परा अद्भुत है जो कहती है कि हमें अपने जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि विकारों का त्याग करते हुए अपने मन को शुद्ध और संयमित रखना चाहिए। इसके साथ-साथ उत्तम, कल्याणकारी और विवेकपूर्ण विचारों को अपनाकर निरंतर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए l हम अपने कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा से करे, किंतु कर्मों के फल में आसक्ति न रखें। सफलता और असफलता, लाभ और हानि, मान और अपमान से ऊपर उठकर समभाव बनाए रखते हुए कर्म करें l हमें परमात्मा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का सजग भाव से अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए तथा अपने आचरण, विचार और साधना के द्वारा स्वयं को उन शक्तियों का योग्य पात्र बनाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने एक मार्मिक प्रसंग जैन धर्म के महान् संत आचार्य श्री १०८ शांतिसागर जी महाराज (1872–1955) जिन्होंने २०वीं शताब्दी में दिगंबर जैन मुनि परंपरा को पुनर्जीवित किया था, का बताया वो प्रसंग क्या था भैया मनीष कृष्णा जी भैया पंकज जी भैया शुभेन्दु जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

8.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 8 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी /अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 8 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३७

हमारे ऋषि-कुल का अनुपम संविधान संपूर्ण संसार स्वीकारे इसके लिए हम अपनी सोच को सकारात्मक रखते हुए प्रयास करते रहें



जब अपने इष्ट की कृपा होती है, तब हमारे अंतःकरण में स्वाभाविक रूप से शुभ भावनाएं, सात्त्विक विचार और कल्याणकारी प्रेरणाएं जाग्रत होती हैं। यह कृपा निरंतर एक-सी नहीं बनी रहती, कभी उसका अनुभव प्रखर होता है, तो कभी क्षीण  l अतः जिन क्षणों में हम अपने भीतर ऐसी दिव्य प्रेरणा, शुद्ध भाव और उत्तम विचारों का उदय अनुभव करें, उन क्षणों का हमें पूर्ण सदुपयोग करना चाहिए।

ऐसे पवित्र भाव और सद्विचार हमें निष्क्रिय नहीं रहने देंगे, बल्कि हमें कुछ सार्थक, कल्याणकारी और लोकहितकारी कार्य करने की प्रेरणा दे देंगे । इन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर हम अपने जीवन को अर्थपूर्ण बना लेंगे और समाज/राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। जब कर्म सात्त्विक भावों से प्रेरित होते हैं, तब उनकी सार्थकता केवल व्यक्तिगत सीमा तक नहीं रहती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक होकर समस्त समाज और संसार में प्रतिष्ठित होता है।

भगवान् श्रीराम का जीवन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके समक्ष भी विविध प्रकार की विषम परिस्थितियां थीं, संसार की जटिलताएं थीं, बाधाएं थीं,तथापि उन्होंने तप, त्याग, शौर्य, धैर्य और धर्मनिष्ठा का जो अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया, वह युगों-युगों तक स्मरणीय और अनुकरणीय बना हुआ है। उनके जीवन की महिमा इसी में है कि उन्होंने हर परिस्थिति में अपने दिव्य भावों को कर्म में परिणत किया, अपने लक्ष्य को ओझल नहीं किया

अतः जब भी हमारे भीतर शुभ भावों की प्रेरणा जाग्रत हो, उसे केवल अनुभव तक सीमित न रखकर कर्म में परिणत करना ही अपने इष्ट का, आचार्य जी का वास्तविक सम्मान और सदुपयोग है।  क्योंकि आचार्य जी भी नित्य इन वेलाओं के माध्यम से हमें जाग्रत करने का प्रयास कर रहे हैं हमें मोहांधता भय भ्रम त्यागने के लिए कह रहे हैं हमें ज्ञान भक्ति उपासना की अनुभूति करा रहे हैं हमारे भीतर की प्रच्छन्न शक्तियों को जगाने का कार्य कर रहे हैं हमें अपने उस वास्तविक इतिहास, *जिसमें आत्मबल ज्ञानबल और शौर्यबल का अद्भुत संगम है जिसके विचारों में प्रकाश है आचरण में दृढ़ता है और संकटों के बीच भी उठ खड़े होने की क्षमता है जो यह दर्शाता है कि अनेक आक्रमणों विपत्तियों और चुनौतियों के बावजूद सांस्कृतिक चेतना कभी मंद नहीं हुई*,को जानने का उत्साह दे रहे हैं यही मार्ग हमें भी जीवन की सार्थकता की ओर अग्रसर करता है।

इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी से किस विषय पर कल आचार्य जी की वार्ता हुई, भैया आशीष जोग जी का उल्लेख क्यों हुआ, कवि चिराग जैन के काव्यपाठ के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा, मेघनाथ का क्या दुर्भाग्य रहा जानने के लिए सुनें

7.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 7 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५४ वां* सार -संक्षेप

 आत्मज्ञान आत्मशक्ति के बिना अधूरा सदा

आन बान शान शौर्य शक्ति की निशानी है,

भौतिक शरीर ही न बलवान हो सका तो

दुनिया जहान सब व्यर्थ की कहानी है।

ज्ञानी चक्रवर्तियों की पुण्य भूमि भारती माँ

कहती रही कि शक्तिहीन नहीं ज्ञानी है,

किन्तु आज की दिशा विहीन दासभाव बुद्धि

शौर्य शक्ति वृत्ति को बना रही मसानी है।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 7 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३६

वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, सूत्र, स्मृति,पुराण आदि  गूढ़ ग्रंथों को ऐसे सरल, सुबोध और सरस रूप में समझा जाए कि सामान्य व्यक्ति भी उनके मर्म को ग्रहण कर सके l  इस प्रकार  यह अद्भुत ज्ञान व्यापक रूप से जनसामान्य तक पहुँच सके हम इसका प्रयास करें


हम सबके बीच एक अत्यन्त मधुर अवर्णनीय भावनात्मक संबंध है l उन्हीं भावनाओं से उद्भूत विचारों को आधार बनाकर हम आगे बढ़ रहे हैं यह भगवान् की कृपा है

 आचार्य जी चाहते हैं कि हमारे हृदय में देशप्रेम, बुद्धि में कुंठा नैराश्य त्यागते हुए आत्मबल का चिंतन और व्यवहार में संगठन करने की योजनाबद्ध कार्यशैली हो। इन तीनों का सामञ्जस्य अद्भुत परिणाम देगा l

हमारे भीतर समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित उन्मुखता सदैव रही है l अपना भारत विविध ऋतुओं के वरदान, अनेक प्रकार की उर्वर मृदाओं, विशाल पर्वतों, पावन नदियों और बहुभाषिक सांस्कृतिक समृद्धि से परिपूर्ण अद्वितीय देश है। इस अनुपम वैभव पर हमें स्वाभिमान होना चाहिए। हमें अपने वास्तविक इतिहास का सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तथा आत्मविश्वास के साथ यह स्मरण रखना चाहिए कि हम सदैव संघर्षशील रहे हैं हम कभी पराजित नहीं रहे l

आचार्य जी ने सुदर्शन चक्र जी, प्रो अमरेन्द्र सिंह जी,भैया मनीष जी, भैया पंकज जी, भैया प्रभाकर जी का नाम क्यों लिया,लोकतंत्र की वर्तमान दशा को वैदिक लोकतन्त्र की आकांक्षा के साथ आचार्य जी ने किस कविता में व्यक्त किया  भैया पवन जी को क्या करना चाहिए जानने के लिए सुनें

6.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 6 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५३ वां* सार

 “शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषामिति।

वेदाङ्गानि षडैतानि वेदस्याहुर्मनीषिणः॥”


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 6 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३५

आचार्य जी हम लोगों में नित्य प्रेम का प्रवाह प्रविष्ट करा रहे हैं अतः हम मानसपुत्रों का कर्तव्य है कि भारतराष्ट्र को सांस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक और सामाजिक उत्कर्ष से युक्त करने के प्रयास हम करते रहें l


यह संसार विषय-वासनाओं और विविध आकर्षणों का विस्तृत क्षेत्र है। हमारे सम्मुख असंख्य विकल्प उपस्थित रहते हैं—कुछ ऐसे, जो हमें ऊर्ध्वगामी बनाते हैं, और कुछ ऐसे, अधोगति की ओर ले जाते हैं। जो विषय मन, बुद्धि और आचरण को संयम, शुद्धता और विवेक की दिशा में प्रेरित करें, वे उन्नतिकारक हैं और जो विषय चित्त को चंचल, आसक्त तथा अविवेकी बनाएं, वे पतनकारक हैं।हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों के लिए  आवश्यक है कि हम विषय-चयन में सावधान रहें। हम ऐसे विषयों को ग्रहण करें जो आत्मबल को पुष्ट करें, ज्ञान-विवेक को प्रखर बनाएं और चरित्र को सुदृढ़ करें l समाज और राष्ट्र के लिए हितकारक हों l हमारे राष्ट्र की विशेषता रही है कि उसने ऋषियों द्वारा प्रतिपादित, अनुभूत और अभिव्यक्त किए गए दिव्य ज्ञान-साहित्य को युगानुकूल रूप देकर समाज के प्रत्येक स्तर तक पहुँचाया। वेद, उपनिषद्, स्मृतियाँ, दर्शन, महाकाव्य, पुराण और लोकाचार—सभी में आर्ष परम्परा का सुस्पष्ट प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है। यहाँ ज्ञान केवल बौद्धिक साधना न होकर आत्मोन्नति और लोककल्याण का साधन बना l रामचरित मानस ने अद्भुत ढंग से लोककल्याण किया है l उसकी रचना-शैली, भाषा-प्रवाह, भाव-गाम्भीर्य और शास्त्रीय आधार को देखकर सहज ही अनुमान होता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने विविध शास्त्रों, पुराणों, उपनिषदों तथा लोकपरम्पराओं का अत्यन्त गंभीर अध्ययन किया था। उनके काव्य में जहाँ एक ओर दार्शनिक गहराई है, वहीं दूसरी ओर लोकजीवन की सहज सरसता भी विद्यमान है। यह समन्वय केवल व्यापक अध्ययन और दीर्घ साधना से ही संभव है तुलसीदास के अंतःकरण में बाल्यावस्था से ही रामकथा के प्रति गहरी आस्था और अनुराग विद्यमान था। ऐसा प्रतीत होता है कि रामकथा उनके जीवन में बाह्य ज्ञान के रूप में नहीं, अपितु आन्तरिक संस्कार के रूप में प्रविष्ट हुई थी। उसी संस्कार ने परिपक्व होकर ‘रामचरितमानस’ जैसे अमर ग्रन्थ का रूप लिया l

भैया पंकज अवस्थी जी की चर्चा क्यों हुई,

वो सज्जन कौन थे जो गणित के प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ होने पर अपना पर्स लेने चले गये,तुलसीदास जी को किसने मानसपुत्र माना था  भैया पंकज श्रीवास्तव जी ने सरल भाव में क्या लिख लिया है जानने के लिए सुनें

5.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५२ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 5 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५२ वां* सार

 -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३४

हर परिस्थिति में अन्याय के प्रतिकार, धर्म की रक्षा और अपने दायित्व के निर्वाह के लिए मानसिक, नैतिक और शारीरिक रूप से तैयार रहें सिद्धि को विस्मृत कर निर्लिप्त भाव से साधनारत हों



राष्ट्र-प्रेम की उदात्त भावना के साथ राष्ट्र की विभूतिमत्ता में अभिवृद्धि का संकल्प लेते हुए हम लोगों को सन्मार्ग पर चलाने का आचार्य जी का संकल्पित प्रयास प्रतिदिन इन सदाचार वेलाओं से परिलक्षित हो रहा है  हम साधकों को संघर्षों में अडिग रहने की प्रेरणा मिल रही है यह भगवान् की कृपा है l


आचार्य जी प्रायः इंगित करते हैं कि जब भी आश्रय खोज रहे हों कोई विषय सुस्पष्ट न हो रहा हो हम विषम परिस्थितियों में घिरे हों तो हमें रामचरित मानस का आश्रय लेना चाहिए l


रामकथा के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी, जिनमें  रामभक्ति के प्रति अनुरक्ति की पराकाष्ठा रही, ने हम सबको प्रबोधित किया है क्योंकि वे भी अनेक विषम परिस्थितियों को झेलकर भाव और भक्ति में रमे हैं लेकिन उनके भाव और उनकी भक्ति शक्ति से कभी दूर नहीं रही 

भगवान् राम का धनुष सदैव सन्नद्ध रहा है भगवान् राम का रामत्व अद्भुत है उनकी व्यापकता विलक्षण है हमें उनकी भक्ति और शक्ति को आत्मसात् करना चाहिए

निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह


छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना॥

कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥


 आचार्य जी ने इस ओर भी संकेत किया कि जीवन की घटनाओं को तटस्थ भाव से देखना ही शान्ति और आध्यात्मिक परिपक्वता का मार्ग है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या स्वप्न देखा  किसके लिए सब कुछ नया है, भैया वीरेन्द्र जी और भैया गोपाल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

4.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५१ वां* सार

 साधको! सिद्धि के लिए न व्याकुल हो बिल्कुल, 

साधना जिंदगी का आनन्द अनोखा है। 

अपने साधक ऋषियों का जीवन याद करो,

दुनिया के अँधियारे का अद्भुत ओखा* है ॥


(*प्रकाश आने वाला झरोखा)


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 4 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३३

जगत में ऐसा कोई भी कार्य नहीं जो हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्त न कर सकते हों यह अनुभूति निर्भय होकर करें और राष्ट्र की विभूतिमत्ता को वृद्धिंगत करने की दिशा में अपने पग बढ़ा लें


हमारा राष्ट्र विलक्षण है। 

जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

यहाँ सत, रज और तम तीनों गुणों का सूक्ष्म विवेचन और संतुलित समन्वय हुआ है। मानव जीवन की पवित्र और दिव्य आचार-संहिता का निर्माण इसी भूमि पर हुआ। यहाँ नश्वर और शाश्वत, असार और सार के भेद का स्पष्ट ज्ञान कराया गया है।

इस परंपरा में कर्तव्यपालन को ही कर्म का स्वरूप और धर्म का आधार माना गया है। संतोष,तप, त्याग, तपस्या, साधना, विश्वास, सद्भाव, समन्वय और परस्पर सहयोग से युक्त जीवन को ही सत्कर्म का मार्ग समझा गया है। धर्माधारित आचरण को श्रेष्ठ जीवन का मानदंड स्वीकार किया गया है। संयम को जीवन का कवच माना गया है, जो व्यक्ति को पतन से बचाकर उत्थान की दिशा देता है।

हम जड़ जगत में भी चैतन्य के दर्शन करते हैं और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना को अपने विचारों में स्थान देते हैं। यह अनुभूति हमारे भीतर दृढ़ है कि समस्त अस्तित्व एक ही तत्त्व की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।

साथ ही हमारे देश की संस्कृति में शौर्य और शक्ति को अलंकार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इन्हीं गुणों की दिव्य अनुभूति से प्रेरित होकर भगवान् श्रीराम ने असंख्य दुष्टों का विनाश किया l हम इसी रामत्व की अनुभूति करें। यह भाव हमें निर्भय, धैर्यवान्, सत्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण बनाएगा। जब यह रामत्व हमारे अंतःकरण में जाग्रत होगा,जब हम यह अनुभव करेंगे कि हम तत्त्व हैं उसी परमात्मा के अंश हैं तब हमारे भीतर से भय, भ्रम और दुर्बलता आदि दुर्गुण स्वतः दूर हो जाएंगे, और हम धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित होंगे l

इसके अतिरिक्त कलयुग पुनः आ गया किसने कहा,दादागुरु की चर्चा क्यों हुई, मञ्जूषा में असंख्य ब्रह्मा किसने देखे जानने के लिए सुनें

3.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६५० वां* सार -संक्षेप

 आंधियां जोर की चलती हों 

उल्काएं रूप बदलती हों 

धरती अधैर्य धर हिलती हो 

अपनों की सुमति न मिलती हो 

तब जय श्रीराम पुकार उठो 

पुरखों का तेज निहार उठो 

हनुमन्त तेज को धार उठो

जय जय का स्वर उच्चार उठो


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 3 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६५० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३२

भारत अद्भुत विभूतिमत्ता को प्राप्त करे इसके लिए हमें निर्लिप्त भाव से प्रयास करते रहना है


चन्द्रगुप्त गढ़ने की साधना में रत आचार्य जी नित्य हमें प्रेरित करते हैं यह हमारा सौभाग्य है  जीवन में जब भी प्रचंड विपत्तियाँ उपस्थित हों, परिस्थितियाँ अस्थिर और भयावह प्रतीत हो रही हों और स्वजन समझ-बूझ का साथ न दे रहे हों तो भी ऐसे विषम समय में धैर्य खोने के स्थान पर हम देशभक्तों को आत्मबल को जाग्रत करना चाहिए। हनुमान जी के अदम्य बल, निष्ठा और उत्साह को धारण कर, विजय और उत्साह का स्वर स्वयं में और वातावरण में भर देना चाहिए l हमें कभी भ्रमित नहीं होना चाहिए  क्योंकि हम ईश्वर के ही अंश हैं और ईश्वर


ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥


गीता के अठारह अध्याय के समान ही हैं ईशोपनिषद् के अठारह छंद 

इस उपनिषद् में बताया गया है कि जीवन संपदा का उपभोग मर्यादा पूर्वक करें विभूतियों और संपदाओं के अभिमान से मुक्त रहें l निर्लिप्त भाव से कार्य करें l

इसके अतिरिक्त हमारी साधना क्या है समाधि स्वर क्या है आचार्य जी की किससे भाव भरी वार्ता हुई जानने के लिए सुनें

2.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज फाल्गुन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३१

राष्ट्र के हम जाग्रत पुरोहित बनें और इसके लिए संगठित अवश्य रहें


हम जिस काल को भूलवश *गुलामी का काल* कह देते हैं, वस्तुतः वह हमारे निरंतर संघर्ष का काल था। हम कभी  पराधीन हुए ही नहीं, हम सदैव संघर्षशील रहे। अनेक झंझावातों और विपत्तियों से गुजरने के उपरान्त भी हमारा सनातन धर्म जीवित बना रहा।

किन्तु खेद का विषय है कि वह आज पूर्णतः जाग्रत नहीं है। आचार्य जी निरंतर प्रयत्नशील हैं कि हम सब अपने पुरुषार्थ की जड़ता समाप्त करें,समर्पित हों,निज सुख त्यागें,हम अपनी भावनाओं का ज्वार प्रकट करें,सनातन धर्म के जागरण का संकल्प लें और उसके पुनरुत्थान का दायित्व अपने हाथों में उठाएँ। 

जाग्रत न होने का कारण यह है कि हम दुविधा में रहते हैं भयभीत और भ्रमित रहते हैं पंडित दीनदयाल जी की यह अभिलाषा थी कि समाज में व्याप्त भय और भ्रम का निवारण हो तथा जनमानस सत्य, स्पष्टता और आत्मविश्वास की दिशा में उन्मुख हो। किन्तु उनकी जघन्य हत्या के कारण यह साधना अपूर्ण रह गई। अपनी दुविधा का निवारण कर यह तथ्य हमारी स्मृति में सदैव अंकित रहना चाहिए कि उस साधना को पूर्णता तक पहुँचाना हमारा परम लक्ष्य है।


आचार्य जी ने बूजी को मध्यमवर्गीय क्यों कहा, युगभारती केन्द्रीय कार्यकारिणी, जो युगभारती का मेरुदंड है, के लिए आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया, ७. ६. ११ का उल्लेख क्यों हुआ, भैया अशोक त्रिपाठी जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें

1.2.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४८ वां* सार -संक्षेप

 हम अंधेरे को भगाने का उपक्रम कर रहे थे 

क्यों अचानक भा गयी तुमको अमावस

हम बसंतोत्सव की तैयारी में निरत थे

तुम्हें क्यों अच्छा लगा दलदली पावस


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 1 फरवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १३०

हम अपना जीवन निष्ठा के साथ हिन्दू समाज के संगठन, उसके प्रबोधन एवं सामाजिक-जातिगत विषमताओं को समाप्त करके एकरस समाज के निर्माण के लिए समर्पित करें

प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 

परिवार भाव विकसित करें जिससे भारतवर्ष की प्रतिष्ठा वृद्धिंगत हो



जातिगत ऊँच-नीच एवं अस्पृश्यता को समाप्त करने की दिशा में  एक अद्भुत समरसता मंत्र है

 

“हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्.

मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता..”

 

अर्थात् समस्त हिन्दू परस्पर सहोदर हैं; उनमें कोई भी न तो नीच है और न ही पतित माना जा सकता है। हिन्दुओं की रक्षा करना मेरा दृढ़ संकल्प है और समानता ही मेरा मूल मंत्र है। हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं है, अतः हमें सभी के साथ समभाव और सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

हमारी विशेषता इस तथ्य में निहित है कि हम एक परिवार की भावना से संयुत हैं, जबकि अन्य देशों में यह पारिवारिक आत्मीयता प्रायः नहीं दिखाई देती, जिसके कारण वहाँ के लोग अधिकतर मानसिक व्याकुलता और चिन्ता में रहते हैं। वे समूह में तो रहते हैं किन्तु परिवार के रूप में नहीं रहते l उनमें विश्वास का अभाव रहता है l यह परिवार का भाव विचार बोध विश्वास भारतवर्ष की प्राणशक्ति है l हम भारतवर्ष की, अपने युगभारती परिवार की परिवार भावना को सुरक्षित रखने के लिए संकल्पित हों l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कुम्भ मेले का उल्लेख क्यों किया भैया मनीष कृष्णा जी की चर्चा क्यों हुई *विषय को पढ़ते हुए क्यों हुए विषयी* से क्या तात्पर्य है  योग और परिवार क्या पर्यायवाची शब्द हैं जानने के लिए सुनें l