31.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 31 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४७ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 31 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२९

जिस कार्य को करें उसमें लीन हो जाएं

सफलता प्राप्त होगी

भारत देश के प्रति मन में समर्पण का भाव रखें इन सदाचार वेलाओं से भक्ति शक्ति संयम विचार स्वाध्याय आदि गुण ग्रहण करें


हम विवेकशील मनुष्यों को संतों के आचरण का अनुसरण करते हुए संसार की अव्यवस्थाओं से विचलित न होकर, उसमें निहित सद्गुणों को पहचानना और अपनाना चाहिए  तथा दोषों से स्वयं को निर्लिप्त रखना चाहिए। यही सदाचार वेला का मूल विषय है और इसके आधार पर विचार करते हुए जब हम आचार करेंगे तो भ्रमित और भयभीत नहीं होंगे  किन्तु  भगवान् की कृपा अत्यन्त आवश्यक है

*अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥*

यदि हमें सद्संगति प्राप्त हो जाए और हम अपने विलक्षण ज्ञान-गौरव  अर्थात् भारत के अद्भुत आर्ष साहित्य से सम्यक् रूप से युक्त हो जाएं, तो जीवन में आनन्द ही आनन्द है। ऐसी अवस्था में चित्त निर्मल होता है, विचार परिष्कृत होते हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि विकसित होती है। तब समस्याएँ अपने आप गौण हो जाती हैं और उनके समाधान सहज रूप से प्रकट होने लगते हैं। अतः सद्संगति का कोई भी अवसर हमें  छोड़ना नहीं चाहिए और अपने आर्ष साहित्य में विश्वास करते हुए रुचि बढ़ानी चाहिए तब हम जो भी कार्य करेंगे उसमें दुविधाग्रस्त नहीं रहेंगे 

जिस कार्य में मन की सहभागिता नहीं, उसे यदि बार-बार किया जाए तो वह कर्तव्य नहीं, ढोंग बन जाता है। ऐसे कर्म में न तो आनंद होता है, न ही फल की शुद्धता।

इसीलिए शास्त्र कहते हैं—

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

इसके अतिरिक्त किसके लिए आचार्य जी ने कहा कि वह मनस्वी नहीं है उन्नाव के महाविद्यालय और दीनदयाल विद्यालय में अध्यापन में आचार्य जी ने क्या अन्तर रखा,औरास टाउन एरिया के राष्ट्रीय विद्यालय में आचार्य जी का क्या पद है, सई नदी का उल्लेख क्यों हुआ  जानने के लिए सुनें

30.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 30 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४६ वां* सार -संक्षेप

 अकेले तुम कैसे असहाय,

यजन कर सकते? तुच्छ विचार।

तपस्वी! आकर्षण से हीन,

कर सके नहीं आत्म-विस्तार।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 30 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२८

आत्मीय जनों की समस्याओं को हल करने का प्रयास करें

एकता प्रदर्शित करें




मनुष्य के लिए केवल अधिकाधिक ज्ञान अर्थात् अविद्या अर्जित करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि वह यह विवेक विकसित करे कि उसके जीवन के लिए वास्तव में क्या उपयुक्त, कल्याणकारी और सार्थक है। जैसे उसे यशस्विता की चाह रहती है l यह विवेक सहज रूप से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उसके लिए एक अनुशासित और सात्त्विक जीवन-पद्धति आवश्यक है। प्रातःकाल शीघ्र जागरण, शुद्ध आचार-विचार, संयमित दिनचर्या तथा सात्त्विक आहार-विहार के माध्यम से मन की निर्मलता और स्थिरता विकसित होती है।

ध्यान, धारणा और आत्मचिन्तन जैसे साधनों द्वारा व्यक्ति अपनी चंचल वृत्तियों को एकाग्र करता है और अध्ययन, स्वाध्याय तथा लेखन के माध्यम से अपने बौद्धिक संस्कारों को परिष्कृत करता है। किन्तु इन समस्त क्रियाओं का परम लक्ष्य केवल बाह्य कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि आत्मस्थ होने का प्रयास है अर्थात् अपने भीतर निवास करने वाली आत्मा से साक्षात्कार करना। जब मनुष्य बाह्य विषयों से हटकर स्वयं के सान्निध्य में बैठने की क्षमता विकसित कर लेता है, तब उसे एक अद्भुत, शान्त और आनन्दमय अनुभूति होती है।

यदि इस आन्तरिक अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करने की क्षमता भी विकसित हो जाए, तो वह अभिव्यक्ति केवल कहने वाले के लिए ही नहीं, अपितु सुनने वाले के लिए भी आनन्द और प्रेरणा का स्रोत बन जाती है। यही कारण है कि औपनिषदिक चिन्तन अत्यन्त विशिष्ट और विलक्षण है, क्योंकि वह मनुष्य को बाह्य ज्ञान से आगे ले जाकर आत्मज्ञान की ओर उन्मुख करता है ईशोपनिषद् का एक छंद है..

तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।

तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥


वह गति करता है और गति नहीं भी करता; वह दूर है और पास भी है,इस सबके भीतर है और इस सबके बाहर भी है।

मनुष्य की आन्तरिक प्रवृत्तियां और रुचियां जैसे-जैसे आकार लेती हैं, वैसे-वैसे वह स्वाभाविक रूप से उसी के अनुरूप वातावरण और संगति की आकांक्षा करने लगता है। जिस प्रकार की सोच, मूल्य और अभिरुचि व्यक्ति के भीतर विकसित होती है, उसी प्रकार के लोगों का साथ उसे सहज, उपयुक्त और प्रेरक प्रतीत होता है।यही आत्मविस्तार है l 


यही हमारे जीवन को समाज और राष्ट्र के लिए उन्मुख करता है l

हमारा सूत्र सिद्धान्त ही है *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः*

 और हम स्वयं में सुधार करते हुए दूसरे को सुधारने का प्रयास करते हैं l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने नचिकेता और यमराज का उल्लेख क्यों किया शिक्षा में क्या आवश्यक है जानने के लिए सुनें

29.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 29 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 29 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२७

भावनाओं, संकल्पों, विचारों के माध्यम से राष्ट्र-यज्ञ में तर्पण करें



धैर्य धारण करना तथा परस्पर विश्वास को अक्षुण्ण बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक है। जब आपसी विश्वास में दरार पड़ जाती है, तब संगठन /परिवार/समाज में गहन अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है। ऐसे समय में यह विश्वास दृढ़ रखना चाहिए कि हनुमान जी की कृपा और संरक्षण हमारे ऊपर है, अतः विषम परिस्थितियों को देखकर भयभीत अथवा विचलित नहीं होना चाहिए। वर्तमान में यूजीसी अधिनियम के कारण जो कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं, वे भी धैर्य, संयम और एकता से ही पार की जा सकती हैं। शिक्षा में  वर्तमान यूजीसी  अधिनियम जैसे सुधार अनुचित हैं l


“मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥” अर्थात् शिक्षा और संस्कार का स्वरूप धीरे-धीरे जीवन के परम उद्देश्य से हटकर केवल आजीविका और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित हो गया है, वर्तमान शिक्षा-पद्धति  अपने मार्ग से भटकती प्रतीत हो रही है। आज शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण, चरित्र विकास और जीवन-मूल्यों का संस्कार न रहकर मात्र फल-प्राप्ति तक सिमट गया है। उपदेशों में त्यागपूर्वक उपभोग करने, परधन के प्रति लोभ न रखने और नैतिक आचरण अपनाने की बात कही जाती है, किंतु व्यवहार में इन आदर्शों को उतारने का कोई वास्तविक आग्रह नहीं रहता। शिक्षा केवल अंक, पद और सफलता प्राप्त करने का साधन बनकर रह गई है, न कि जीवन को शुद्ध, संयमित और कर्तव्यनिष्ठ बनाने का माध्यम।

यही शिक्षा जब प्रशासनिक तंत्र में कार्यरत अधिकारियों को प्राप्त होती है, तो उसका प्रभाव शासन-व्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जब शासन चलाने वाले ही मूल्यों और आदर्शों से शून्य शिक्षा से निर्मित हों, तो शासन और प्रशासन की स्थिति कैसी होगी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इस प्रकार मूल्यविहीन शिक्षा अंततः समाज, शासन और राष्ट्र तीनों को ही दिशाहीन बना देती है।

इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि साधारण प्रतीत होने वाले व्यक्ति भी अपने कर्म, संकल्प और निरन्तर प्रयासों के बल पर इतिहास रच देते हैं। किंतु यदि केवल यह सोच लिया जाए कि हम इतिहास रचने जा रहे हैं और उसके अनुरूप पुरुषार्थ न किया जाए, तो कोई सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं होगा। इतिहास निर्माण का आधार मात्र विचार नहीं, अपितु धैर्य, परिश्रम, विश्वास और कर्तव्यनिष्ठ आचरण होता है।अतः हम पुरुषार्थ करें l हम चिर जवान हैं यह अनुभव करें l जवानी की उमंगें नये प्रतिमान बना देती हैं-


जवानी लक्ष्य के संधान की अनुपम कहानी है

शिखर से सिन्धु के तल की अमर पावन निशानी है

जवानी ने जगाया व्योम को पाताल को साधा

रही कोई न अग-जग में हटाई जो नहीं बाधा


इसके अतिरिक्त भैया वीरेन्द्र जी की क्या व्यथा थी,भैया पंकज जी क्या नित्य करते हैं जानने के लिए सुनें

28.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 28 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४४ वां* सार -संक्षेप

 जलते जीवन के प्रकाश में अपना जीवन तिमिर हटायें

उस दधीची की तपः ज्योति से एक एक कर दीप जलाएं l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 28 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२६

विषम परिस्थितियों में दिशा और दृष्टि प्राप्त करने के लिए गीता के १८ वें अध्याय के २० से ३५ तक के छंदों का अध्ययन करें

(सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।.....


न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।)


यदि हम प्रभातकाल जैसे पवित्र और जागरण के समय को विकारों और सांसारिक प्रपंचों में उलझकर व्यर्थ कर देंगे, तो यह हमारी अंतर्निहित शक्तियों का अनुचित अपव्यय ही होगा। इसलिए आवश्यक है कि हम इन विकारों से बचते हुए अपने आत्मिक स्वरूप की ओर अग्रसर होने का प्रयास करें। हमें निरन्तर यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है हमारा स्वरूप है “चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्” अर्थात् मैं चैतन्य और आनन्द स्वरूप परम सत्य हूँ।

प्रभातकाल में प्राप्त होने वाली स्वच्छ बुद्धि और नवचेतना का उपयोग कर हमें आत्मबोध की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और उस आनन्द को अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए, जो हमारे भीतर स्वभावतः विद्यमान है।

आचार्य जी इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से हमें आत्मबोध की दिशा की ओर ले जाने का निरन्तर प्रयास कर रहे हैं हमें अपने को सौभाग्यशाली समझना चाहिए l

भारतवर्ष की संस्कृति प्रेम और आत्मीयता के सुदृढ़ आधार पर विकसित हुई है। यही प्रेमभाव और परस्पर आत्मीयता हमारी सभ्यता की प्राणशक्ति रहे हैं। इसी  को हनुमान जी  के माध्यम से दीनदयाल विद्यालय में प्रविष्ट कराया गया  जिससे वहाँ का वातावरण सेवा, समर्पण और सौहार्द से अनुप्राणित हो सका।

अतः हमें वाद-विवाद, तर्क-वितर्क और बौद्धिक संघर्षों में उलझने, जैसा इस समय UGC Act के कारण हो रहा है, के स्थान पर प्रेम, सहयोग और सद्भाव के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए। क्योंकि बौद्धिक युद्ध से नहीं, अपितु आत्मीय संवाद और सांस्कृतिक समरसता से ही समाज का वास्तविक कल्याण संभव है।


प्राणियों की समस्त सृष्टि में मनुष्य को जो सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ है, उसका मूल कारण उसकी बौद्धिक क्षमता है। जब तक मनुष्य प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस विशिष्ट वरदान का सम्यक् एवं विवेकपूर्ण उपयोग नहीं करता, तब तक वह अपने मनुष्यत्व के वास्तविक अधिकार से वंचित ही रहता है।

महाभारत के युद्धभूमि में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को मानसिक उन्माद का परित्याग कर, एक वीर पुरुष के समान परिस्थितियों का स्वामी बनाकर जीवन जीने का उपदेश देते हैं। उस समय अर्जुन इतने अधिक भावुक एवं दुर्बल हो गये थे कि वह अपने तथा अन्य लोगों के शारीरिक संरक्षण की चिन्ता में कर्तव्य से विमुख होने लगे थे l भगवान् कृष्ण कहते हैं 

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।


तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।। 2.50 ।।


विद्वान् और किसान के बीच क्या है, किन्होंने गन्ने का चाटकर ही स्वाद लिया, ज्ञान का क्या आधार है,भैया अजय प्रताप जी की क्या बात आचार्य जी को अच्छी लगी, कचहरी शब्द क्या है जानने के लिए सुनें

27.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 27 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 27 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२५

UGC Act विषय को गम्भीरता से लें उसका अध्ययन करें अपने अधिकारों विचारों का प्रयोग करते हुए मार्ग निकालें

हम जो बैठकें करें उनमें  प्रेम आत्मीयता की अनुभूति के साथ कर्म चैतन्य, विचार, चिन्तन को भी स्थान दें



शिक्षा किसी सभ्यता की आत्मा का निर्माण करती है। वह केवल मनुष्य को जानकारी प्रदान करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना को संस्कारित करने का साधन है। शिक्षा ही वह आधार है जिसके माध्यम से विचार सत्ता से उतरकर व्यवहार की भूमि पर प्रतिष्ठित होते हैं। विचार यदि बीज है, तो शिक्षा उसकी वह भूमि है जिसमें वह अंकुरित होकर कर्मरूप वृक्ष बनता है।

मनुष्य के भीतर निहित शक्तियाँ बौद्धिक, मानसिक और नैतिक स्वतः कल्याणकारी नहीं होतीं, उन्हें दिशा देने वाला विवेक शिक्षा के माध्यम से ही विकसित होता है। शिक्षा  मनुष्य के भ्रमों का निवारण करती है उसे वह दृष्टि प्रदान करती है कि शक्ति का प्रयोग प्रभुत्व के लिए नहीं जो प्रेतत्व की अनुभूति कराए,अपितु धर्म, मर्यादा और लोककल्याण के लिए होता है,जैसा भगवान् राम ने प्रयोग किया l

किन्तु जब शिक्षा अपने तात्त्विक उद्देश्य से विमुख होकर केवल उपयोगिता, प्रतिस्पर्धा या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित हो जाती है, तब वही शिक्षा विकृति का रूप धारण कर लेती है। ऐसी शिक्षा समस्याओं का समाधान करने के स्थान पर उन्हें जन्म देती है क्योंकि उसमें ज्ञान तो होता है, पर विवेक नहीं, क्षमता तो होती है, पर संवेदना नहीं।

इसके विपरीत, उचित शिक्षा मनुष्य को आत्मबोध की ओर उन्मुख करती है। वह तत्त्व शक्ति विचार विश्वास श्रद्धा कर्म-चैतन्य आदि की अनुभूति कराती है l प्रेम, आत्मीयता, परिवार भाव का बोध कराती है l हमारे चिन्तकों विचारकों अध्येताओं ज्ञानियों ऋषियों ने  सुशिक्षा पर अत्यधिक ध्यान दिया है l वह व्यक्ति और समाज के विकास का पथ प्रशस्त करती है हमें जाग्रत करती है


जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक ।

व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक ।।


इसके अतिरिक्त संहिताएं क्या हैं  समय की क्या मांग है जानने के लिए सुनें

26.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 26 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४२ वां* सार

 आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।

त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥29॥


सूर्यदेव का दर्शन कर और  ऋषि अगस्त्य द्वारा बताए गए आदित्यहृदय स्तोत्र का जप करके भगवान् राम ने परम हर्ष का अनुभव किया। इसके पश्चात् उन्होंने तीन बार आचमन किया, स्वयं को शुद्ध किया और तत्पश्चात् वे अपने पराक्रमी धनुष को हाथ में लेकर युद्ध के लिए उद्यत हुए।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 26 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२४

लक्ष्य- प्राप्ति के लिए संगठन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है प्रेम आत्मीयता के आधार पर उसके विस्तार में जुटे रहें


लक्ष्य न ओझल होने पाए, कदम मिलाकर चल ।

मंजिल तेरे पग चूमेगी, आज नहीं तो कल ॥


हमारे भीतर यह स्वाभाविक जिज्ञासा बनी रहती है कि आज आचार्य जी अपने उद्बोधन में कौन-सा विषय प्रस्तुत करेंगे। यदि उस विषय को हम आत्मसात् कर लें, तो निश्चय ही उससे हमें वास्तविक लाभ प्राप्त होगा। तो आइये आचार्य जी से लाभान्वित होने के लिए प्रवेश करें आज की वेला में



आत्मा अजर और अमर है। वह न कभी जन्म लेती है और न कभी नष्ट होती है। उसे न कोई अस्त्र छेद सकता है और न जल, अग्नि अथवा वायु किसी प्रकार से प्रभावित कर सकते हैं । यही शाश्वत आत्मा कर्म करने के प्रयोजन से इस संसार में देह धारण करती है और अस्थि-मज्जा से निर्मित इस जड़ शरीर को चेतना प्रदान कर उसे पवित्र करती है। वास्तव में आत्मा के बिना शरीर केवल निर्जीव पदार्थ है l आत्मा की शक्ति अवर्णनीय है l आत्मा, जिसे प्राणस्वरूप भी कहा गया है, उसी में परमात्मा का निवास है  और परमात्मा के रहते हम दुःखी कैसे रह सकते हैं हमें अपनी अन्तर्निहित शक्तियों की अनुभूति होनी चाहिए  हम उस दिव्य, प्रकाशस्वरूप, पापनाशक परमात्मा का ध्यान करें, जो समस्त लोकों को प्रकाशित करने वाला है। वह हमारी बुद्धि को सद्बुद्धि की ओर प्रेरित करे, हमारे विचारों को शुद्ध, सत्य और कल्याणकारी बनाए, तथा हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करे। परिस्थितियां अत्यन्त विषम हैं आकर्षणों से भटकें नहीं हम अपने राष्ट्रभक्त जनों के भय भ्रम को दूर करें उन्हें शक्ति सामर्थ्य की अनुभूति कराएं 


इसके अतिरिक्त क्या आचार्य जी ने जाग मछंदर गोरख आया का उल्लेख किया भैया विभास जी, भैया प्रदीप जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ उपनिषद् का क्या अर्थ आचार्य जी ने बताया जानने के लिए सुनें

25.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 25 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४१ वां* सार -संक्षेप

 मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया l

 को जग जाहि न ब्यापी माया॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 25 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२३

भगवान् राम का ध्यान करते हुए हम अपने कर्म करें


आचार्य जी का अनुभव जीवन की तपस्या से उपजा हुआ है, उनका विश्वास सत्य और साधना में दृढ़ है सनातन धर्म में अडिग है,  उनके विचार लोककल्याण राष्ट्रकल्याण की दृष्टि रखते हैं और इन सबका मूल स्रोत उनके शुद्ध भाव हैं l 

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।


भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।17.16।।



यदि हम उस भाव-प्रधान दृष्टि को ग्रहण कर सकें, तो हमारी सोच में स्थिरता आएगी, आचरण में शुद्धता उत्पन्न होगी और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन सम्भव होगा।

 आचार्य जी की भावनात्मक, वैचारिक और अनुभवजन्य शक्ति का अल्पांश भी हमारे लिए महान् लाभ का कारण बन सकता है तो इसी लाभ को प्राप्त करने के लिए अपने समय का सदुपयोग करते हुए आइये प्रवेश करें आज की सदाचार वेला में


आचार्य जी नित्य हमें स्मरण कराते हैं कि हम अपने राष्ट्र को सर्वोच्च वैभव और गौरव की स्थिति तक ले जाने में समर्थ होने का प्रयास करें उस दिशा में इस दृष्टि को सामने रखते हुए चलते जाएंगे तो हमें इस कलियुग में यशस्विता की प्राप्ति निश्चित रूप से होगी हम चर्चित होंगे

और यह कलियुग कैसा 

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार।

गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥102 क॥


कलियुग दोषों से परिपूर्ण है—अधर्म, कपट, लोभ और पतन इसमें प्रबल हैं। किन्तु इसके साथ ही इस युग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ साधना कठिन नहीं है। भक्ति, नाम-स्मरण और सद्भाव मात्र से ही मनुष्य भव-बन्धन से मुक्त हो सकता है।

अतः कलियुग को केवल पतन का युग मानना एकांगी दृष्टि है; वस्तुतः यह करुणा और सहज मोक्ष का युग भी है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार रूपी समुद्र से तर जाता है l

राम जी के गुण अर्थात् उनके विलक्षण कर्मों का हम ध्यान करें उनसे हमें शक्ति सामर्थ्य की अनुभूति होगी हमें संगठन का महत्त्व समझ में आयेगा l युग -भारती हमारा संगठन है हम उसके विस्तार पर ध्यान दें प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 


"युगभारती"  माँ भारती की आरती का स्वर,

कि संयम शक्ति सेवा साधना  का दीप है भास्वर l


इसके अतिरिक्त नरेन्द्र मोदी के साथ भगवान् विष्णु को आचार्य जी ने कैसे संयुत किया,भैया पंकज जी भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ आता और पाता में क्या अंतर है जानने के लिए सुनें

24.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 24 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६४० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 24 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६४० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२२

विद्यालय की भावनाओं को अपने भीतर प्रवेश कराते हुए कर्मयोगी बनें


इन सदाचार वेलाओं का अस्तित्व अध्यात्म के सोपानों पर क्रमशः आरोहण करने का और  संसार के मालिन्य के क्रमशः विनाश का एक अद्वितीय अवसर  है हमें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए 


मन पछितैहै अवसर बीते।

दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥१॥


दुर्लभ देह, मन, बुद्धि और विचारों के समन्वय से हमें प्राप्त यह मनुष्य-जीवन ईश्वर की एक अद्भुत रचना है।  हममें से प्रत्येक  के भीतर अनन्त शक्तियाँ निहित हैं, किंतु विस्मृति के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाते। जब मनुष्य आत्मबोध की ओर अग्रसर होता है और अपने सत्य स्वरूप का आंशिक भी अनुभव कर लेता है, तब वह अनुभूति शब्दों से परे हो जाती है। अद्भुत अवतरित महापुरुष आदि शङ्कराचार्य द्वारा उद्घोषित “चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्” इसी आत्मानुभूति का द्योतक है, उस परम आनन्द की अनुभूति को वास्तव में वही जान सकता है जिसने उसे प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त किया हो।

विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किंतु संत रूपी हंस दोष रूपी जल का परित्याग कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं

महान् जनों, ऋषियों, तपस्वियों, शूरों की हम चर्चा तो करते हैं किन्तु इनके भावों का अपने भीतर प्रवेश नहीं करा पाते इनका अंश धारण नहीं कर पाते  किन्तु इससे हमें व्यथित नहीं होना चाहिए हम आत्मस्थ होने का प्रयास करें अविद्या के लोक में विद्या का प्रवेश कराएं तो तात्त्विक प्रकाश से प्रकाशित होते हुए इस आत्मानुभूति के आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता l


१०८ उपनिषद ज्ञान खंड का उल्लेख क्यों हुआ, किसने आचार्य जी से कहा मेरे साथ रहो, हिमालय यात्रा की चर्चा क्यों हुई, डा सुनील जी  के साथ भैया शुभेन्दु जी का उल्लेख क्यों हुआ,अधिवेशन के लिए आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें

23.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 23 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३९ वां* सार -संक्षेप

 बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 23 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२१


मन्दिर भाव, विचार और क्रियाओं के जाग्रत स्वरूप बनें 

 वहां  राष्ट्रभक्तों के एकत्रीकरण भजन गान प्रवचन होने चाहिए l



हमारे भारत देश की भूमि पर वेदों का उद्भव हुआ, जहाँ अनुभूति को ही ज्ञान का मूल माना गया। यहाँ ऋषियों ने केवल सुना-समझा नहीं, अपितु आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से सत्य का अनुभव किया और उसे अभिव्यक्ति का स्वरूप प्रदान किया। अद्भुत है यह ऋषित्व l ऋषित्व का अर्थ मात्र तपस्या नहीं था, बल्कि तत्त्व के सूक्ष्म बोध, शक्ति की साधना और विचार की परम शुद्धता का समन्वय था। इसी कारण यज्ञमयी भारतीय परम्परा में ज्ञान सैद्धान्तिक न होकर जीवन से संयुत हुआ और व्यवहार में उतरा l

किन्तु विडम्बना यह है कि इस विराट् वैचारिक और आध्यात्मिक विरासत के होते हुए भी हम उसके वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाए। वेद, उपनिषद्, दर्शन और साधना-पद्धतियाँ हमारे पास होते हुए भी हम उन्हें केवल ग्रन्थों तक सीमित मान बैठे, जबकि वे जीवन को दिशा देने वाले जीवंत सूत्र हैं। हमारे दृष्टिकोण को संकुचित करने के अनेक कारण रहे हैं किन्तु अब उनसे हम विचलित न हों l

यदि हम अपनी परम्परा को केवल अतीत की धरोहर न मानकर वर्तमान जीवन में उतारें, तब हमें यह अनुभव होगा कि हमारे देश में जो कुछ हुआ है, वह केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज भी मानवता के लिए अत्यन्त लाभकारी है l अतः हम अपने अद्भुत साहित्य का मन लगाकर अध्ययन करें ग्रंथों को क्लिष्ट न मानें परिश्रम करते हुए उन्हें आत्मसात् करें स्वाध्याय करें फिर यही हम वर्तमान  पीढ़ी को भी समझाएं l उसे दुर्दशा से बचाएं l भ्रम से दूर करें l


इसके अतिरिक्त राष्ट्रयज्ञ के विलक्षण होता आचार्य जी ने औरास में चल रहे यज्ञ की चर्चा की जिसमें  एक सज्जन अंकित मूल्य से आधे मूल्य पर पुस्तकें बेच रहे थे जहां से आचार्य जी ने सामवेद संहिता नामक पुस्तक क्रय की l 


भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ विद्यालय में मन्दिर निर्माण के पीछे बूजी का क्या उद्देश्य रहा होगा जानने के लिए सुनें

22.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 22 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 22 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १२०


आचार्य जी की भावनाओं का आदर करते हुए उनसे प्राप्त मार्गदर्शन का यथासंभव अधिक से अधिक सदुपयोग करना चाहिए। उनकी भावनाएँ हमारे लिए केवल स्नेह का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली अमूल्य धरोहर हैं उन्हें अपने आचरण और कर्म में उतारना ही उनका सच्चा सम्मान है।




भारत  अर्थात् एक ऐसा देश जहाँ जीवन का परम लक्ष्य अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर होना है।


अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्


न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥


यही कारण है कि भारत की परम्परा में ज्ञान,जो हम लोगों के लिए अपार श्रद्धा का पात्र होना चाहिए,को सर्वोच्च स्थान दिया गया—चाहे वह वेदों का ब्रह्मज्ञान हो, उपनिषदों का आत्मबोध, गीता का कर्मयोग हो या संत-परम्परा का लोकबोध l यहाँ शिक्षा केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि आत्मोन्नति और समाज-कल्याण का माध्यम रही है। शक्ति का पर्याय और संयम की गाथा यह शिक्षा सिखाती है कि हमें यह मनुष्य योनि ईश्वर की विशेष अनुकम्पा से प्राप्त हुई है। उन्होंने हमें इस संसार में कर्म करने के उद्देश्य से भेजा है। जब हमारे भीतर यह दृढ़ विश्वास स्थापित हो जाता है कि कर्म करना ही हमारा धर्म है,तब हम प्रत्येक कार्य को पूर्ण मनोयोग, निष्ठा और उत्तरदायित्व के साथ संपन्न करते हैं। ऐसे निष्काम और एकाग्र प्रयासों का फल अवश्य प्राप्त होता है, क्योंकि सच्चे भाव से किया गया कर्म कभी निष्फल नहीं जाता।

दीनदयाल विद्यालय जो पं दीनदयाल जी की अधूरी साधना का चुनौतीपूर्ण पथ था के पूर्व छात्र अर्थात् युगभारती 


"युगभारती"  माँ भारती की आरती का स्वर,

कि संयम शक्ति सेवा साधना  का दीप है भास्वर l

के सदस्य होने के कारण हमें अपने कर्तव्य की अनुभूति होनी चाहिए  हमने जो चार आयाम शिक्षा स्वास्थ्य स्वावलंबन सुरक्षा निर्धारित किए हैं उनके अनुसार कार्य करें हमें अपने राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाना है हर राष्ट्रभक्त के भीतर अन्तर्निहित शक्तियों की हम उन्हें अनुभूति कराएं


इसके अतिरिक्त *वो बात तो मैं भी नहीं जानता* किसने कहा था भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

21.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 21 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३७ वां* सार

 व्यालारिरिव निर्भीकः स योद्धा युद्धे विजयी भवति।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 21 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११९

 लक्ष्य चाहे कितना ही महान् क्यों न हो,उसकी वास्तविक सफलता निरंतर, सुविचारित और अनुशासित प्रयासों से ही प्राप्त होती है।

हर छोटा पग आगे बढ़ने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग होता है इसलिए लक्ष्य को सदैव दृष्टि में रखते हुए, प्रत्येक कर्म को पूर्ण निष्ठा और विवेक के साथ करना ही सच्ची साधना है।




ईश्वरीय लीला का एक भाग बने ये संप्रेषण हम विश्वासी भक्त लोगों के जीवन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाल रहे हैं। इनके विचार केवल बौद्धिक न होकर हमारे अंतर्मन में उतरकर हमारे आचरण को उचित सात्विक दिशा दे रहे हैं। समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत कर रहे हैं।

इस प्रकार, भावनापूर्ण एवं ज्ञानसम्पन्न  ये सदाचारपूर्ण संदेश केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं  बल्कि हमारे चरित्र निर्माण और जीवन-मूल्यों की स्थापना का सशक्त माध्यम बनते जा रहे हैं इसी कारण ये अत्यन्त प्रभावकारी, उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध हो रहे हैं हमें बिना भ्रम इनका लाभ उठाना चाहिए l तो आइये प्रवेश करें आज के संप्रेषण में


बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥89 क॥

इसकी व्याख्या में आचार्य जी स्पष्ट कर रहे हैं कि गुरु, जो शक्तिसम्पन्न सामर्थ्यवान् भी हो, के बिना ज्ञान संभव नहीं, वैराग्य के बिना भी ज्ञान संभव नहीं अर्थात् जिस विषय पर हम केन्द्रित हैं उसके प्रति हमारा पूर्ण ध्यान रहे और शेष से विराग रहे तो वह विषय हमें स्पष्ट हो जाएगा और हरि की भक्ति, जिसका एक स्वरूप आत्म-दीप्ति है,से निश्चित रूप से सुख प्राप्त होगा l 

गीता के १७ वें अध्याय का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने तीन प्रकार के तप बताए


देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुष का पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है। जो वाक्य उद्वेग उत्पन्न करने वाला नहीं है, जो प्रिय, हितकारक और सत्य है तथा वेदों का स्वाध्याय अभ्यास वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।।

मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह और भावों की शुद्धि -- इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बबूल के नीचे दिया वाला कौन सा प्रसंग बताया भैया त्रिलोचन जी ने किस समस्या का उल्लेख किया जानने के लिए सुनें

20.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 20 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३६ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 20 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११८

महापुरुषों की जीवनियों का अध्ययन करें क्योंकि इनके अध्ययन से शक्ति बुद्धि कौशल विचार आदि की प्राप्ति होती है


प्रेम, आत्मीयता,अनुशासन, नियमितता,यशस्विता से रहित कर्म में प्रवृत्त रहने की वृत्ति आदि अनेक जो गुण हमें प्राप्त हुए हैं यह आचार्य जी के कारण ही संभव हुआ है हमें इन्हें कभी नहीं त्यागना चाहिए 


सत् का विस्तार करना और असत् का नाश करना संसार में किया जाने वाला वह कर्म है, जो केवल मनुष्य योनि में ही संभव है। यदि हम लाभ और लोभ से मुक्त होकर शांत चित्त से विचार करें, तो यह स्पष्ट होता है कि  हमें जो मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है उसे निष्क्रियता, प्रमाद या स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों में नष्ट कर देना बुद्धिमत्ता नहीं है।हमारे पास शक्ति, बुद्धि और विचार का जो सामर्थ्य है, उसका सदुपयोग करना हमारा कर्तव्य है। भगवान् राम की कथा में भी यही स्पष्ट किया गया है l



कठिन संसार से पीछा छुड़ाकर मुक्त विचरण है

कठिन वाणी विभव से मुक्त अन्तर्भाव धारण है

कठिन तप त्याग सेवा साधना की जिंदगी जीना

कठिन संकल्पमयता के सहित जग आचरण भी है


हम तप त्याग सेवा आदि के लिए संकल्पित हों जो लोग अपने आत्मतत्त्व को नहीं जानते, उनके लिए यह संसार और परलोक दोनों ही प्रकाशहीन हो जाते हैं। ऐसे लोग जीवन का वास्तविक उद्देश्य न समझ पाने के कारण स्वयं का ही विनाश करते हैं। मृत्यु के बाद वे भी उसी घोर अज्ञान और अन्धकार से भरे लोकों को प्राप्त होते हैं।


 यह सत्य है कि संगठन में रहना आवश्यक है, क्योंकि संगठित शक्ति ही समाज और राष्ट्र को दिशा दे सकती है, किन्तु केवल संगठन पर्याप्त नहीं है। संगठन के साथ विचारशीलता, विवेक भी अनिवार्य है। बिना विचार के किया गया कर्म दिशाहीन हो जाता है हमें अपने आचरण, चिंतन और कर्म के माध्यम से संसार को यह अनुभूति करानी चाहिए कि हम केवल संख्या मात्र नहीं हैं, बल्कि  सत् की स्थापना और असत् के विनाश के लिए सजग रूप से सक्रिय हैं

आचार्य जी ने यह भी बताया कि कीर्तन भजन आदि का उद्देश्य है कि हमारा मन जंजालों से मुक्त हो जाए

भावना से विचार में और विचार से व्यवहार में प्रवेश करना अनिवार्य है 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अधिवेशन की चर्चा क्यों की भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ  प्रशंसा किए जाने पर गोस्वामी तुलसीदास जी क्या करते थे जानने के लिए सुनें

19.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 19 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३५ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 19 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११७

सहव्यक्तित्व,  जिसका आधार प्रेम आत्मीयता और विश्वास है, की चर्चा अत्यन्त आवश्यक है 


आचार्य जी अपनी दिशा और दृष्टि सुस्पष्ट रखते हुए गहन अनुभवों के आधार पर हमारे भीतर प्रवेश करने की चेष्टा यह कहते हुए कि


मैं मानव की मानवता का परिचायक हूँ,

वंचित शोषित पीड़ित का भाग्य विधायक  हूँ, 

भ्रम भय से ग्रस्त जवानी का उन्नायक हूँ, 

भारती मूल स्वर का मंगलमय गायक हूँ ॥



करते हैं ताकि  हम केवल भौतिकता में जीवन न बिताएं   भयभीत  समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने के लिए कर्म फल में आसक्ति से रहित कर्मयोगी बनें, परिस्थितियों के अनुसार वाणी व्यवहार करें और हमारे ऐसे व्यक्तित्व का उत्कर्ष हो सके जिसमें समाजोन्मुखता के साथ देशभक्ति का भाव भी समाहित हो 

देशभक्ति का भाव हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि यही भाव हमें अपने देश, समाज, संस्कृति और परम्पराओं के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाता है। देशभक्ति केवल भावनात्मक उद्गार नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर जीवन जीने की प्रेरणा है। इससे त्याग, सेवा, अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है, जो राष्ट्र के समग्र विकास के लिए अत्यन्त अनिवार्य है।

आचार्य जी का उद्देश्य है कि हम राष्ट्र की सेवा को अपना परम कर्तव्य समझें क्योंकि सशक्त राष्ट्र का निर्माण केवल शासन या संस्थाओं से नहीं, बल्कि चरित्रवान्, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों से होता है। इसी कारण उनके लिए व्यक्ति-निर्माण, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना महत्त्वपूर्ण है ताकि हम अपने आचरण और कार्यों के माध्यम से राष्ट्रहित में योगदान दे सकें।

आचार्य जी ने भारत की यज्ञमयी संस्कृति की चर्चा करते हुए बताया

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।


यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।3.14।।

समस्त प्राणी अन्न से जीवित रहते हैं। अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ की उत्पत्ति कर्म से होती है।


यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से किया गया धर्मयुक्त कर्म है। जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन लोककल्याण की भावना से करता है, तो प्रकृति संतुलित रहती है और समाज में समृद्धि आती है।


इसके अतिरिक्त मणिकर्णिका घाट का उल्लेख क्यों हुआ आचार्य श्री जगपाल जी की क्या बात आचार्य जी को याद आई भैया मुकेश जी को क्या परामर्श दिया गया पूर्ण संन्यास क्या है जानने के लिए सुनें

18.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३४ वां* सार -संक्षेप

 मैं सत्य सनातन चिन्तन जीवन दर्शन हूं 

संपूर्ण जगत का एकमेव आकर्षण हूं



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 18 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११६

सनातनत्व के अभ्यस्त होने का प्रयास करें हम शरीर नहीं हैं हम तत्त्व हैं यह अनुभव सदैव करते रहें शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति करें 


यदि प्रातःकाल सदाचार से युक्त विचारों और उपदेशों का श्रवण किया जाए, तो हमें पूरे दिन के छल-प्रपंचों और विकारों से बचने की दिशा मिल जाती है। इससे हमारे जीवन का मूल सार सुरक्षित रहता है और कठिन एवं विषम परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति तथा उचित मार्ग प्राप्त होता है। तो आइये इसी उचित मार्ग को प्राप्त करने के लिए प्रवेश करें आज की वेला में


जब हम अपने अवतारों के कार्य व्यवहार का एकाग्र चित्त होकर अवलोकन करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि उन्हें अपने शौर्य पराक्रम  शक्ति का पूर्ण बोध था। उन्हें अपने वास्तविक तत्त्व और स्वरूप की स्पष्ट पहचान थी। उन्हें ज्ञात था कि वे परमात्मा का अंश हैं अंश हैं तो स्वयं परमात्मा ही हैं 

(हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।

बूँद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ॥)

इसी आत्मबोध और सामर्थ्य की चेतना के कारण वे दुष्ट शक्तियों का विनाश कर सके और धर्म की स्थापना कर सके


जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।

हमारा राष्ट्र विश्वशान्ति का साधन है,क्योंकि इसके मूल में समरसता, धर्म, न्याय और मानवमात्र के कल्याण की भावना निहित है किन्तु जो शक्तियाँ अधर्म, अत्याचार और विनाश का मार्ग अपना रही हैं उनके विनाश के लिए भी हम सज्ज हैं इसके लिए हम अपनी अंतर्निहित शक्ति को पहचानें और उसे भक्ति, विवेक तथा युक्तिपूर्ण व्यवहार के साथ जोड़कर सज्जित करें, ताकि वह धर्म और राष्ट्रहित के लिए सजग एवं तैयार रह सके।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी भैया पवन जी के किस कार्य की सराहना की बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना     का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

17.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

 मैं व्यक्ति नहीं अपने कुटुम्ब की थाती हूं 

हर संकट का हल और वज्र की छाती हूं


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 17 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११५


अध्ययन स्वाध्याय में रत हों


जब मनुष्य अंतर्मुख होकर अपनी अंतरात्मा की वाणी को सुनता है, तब उसे यह साक्षात्कार होता है कि उसका वास्तविक स्वरूप केवल यह नश्वर शरीर या सीमित व्यक्तित्व नहीं है। उसे अनुभूति होती है कि मूलतः वह तत्त्व है शक्ति है विश्वास है वह तो अनन्त वैभव है

हम भी इसी तत्त्व शक्ति की अनुभूति करें हम अनुभव करें कि हम अनन्त वैभव हैं और गर्व करें कि हम उस महान् भारतीय सनातनधर्मी समाज की थाती हैं अर्थात् उसकी परम्पराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक हैं हमारा अस्तित्व व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित नहीं, बल्कि अपने कुटुम्ब रूपी समाज की रक्षा, सेवा और उन्नति से संयुत है।

जब समाज पर संकट आयेगा तब हम समाधान का संकल्प लेकर आगे चलेंगे धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर अडिग रहकर प्रत्येक चुनौती का उत्तर देंगे अधर्म और दुष्ट प्रवृत्तियों के समक्ष हमारा हृदय न भयभीत होगा न विचलित l यह संभव है भावना के समर्पण से  l इसके लिए प्रातः काल का जागरण अनिवार्य है l हम अध्ययन स्वाध्याय संपर्क में रत हों किसी सार्थक विषय को केंद्र में रखकर बैठकें करें

किसी भी क्षेत्र में धनार्जन कर रहे हों अपनी परंपराओं को जानें अपने मूल को जानें l अतीत का ज्ञान हमें उसके सम्मान के लिए सक्षम बनाता है l भविष्य के लिए संकल्प करें l देश दर्शन से अपने देश की विविधता विचित्रता की जानकारी होगी l अतः देश का भ्रमण अवश्य करें l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भाईसाहब के पूर्त कार्य की चर्चा की,उन्नाव विद्यालय के लिए हम क्या कर सकते हैं, भैया पुनीत जी,भैया अमित गुप्त जी,भैया बलराज जी,दादा गुरु, प्रेमानन्द, निर्मल बाबा का उल्लेख क्यों हुआ सोनी जी के किस भाषण की आचार्य जी ने चर्चा की जानने के लिए सुनें l

16.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३२ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 16 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११४

शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति आवश्यक है उत्साहपूर्वक उत्थित होने की आवश्यकता है

एकांत में बैठकर अंतर्निहित ऊर्जा की अनुभूति करें


जो व्यक्ति इस संसार के सत्य को नियमपूर्वक, तर्क और विवेक के आधार पर भली-भाँति समझ लेता है, वही वास्तव में भारत माता का सच्चा सेवक कहलाने योग्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतर्निहित शक्ति का बोध करना आवश्यक है। शारीरिक, मानसिक और नैतिक दुर्बलता राष्ट्र और समाज की प्रगति में बाधक होती है, अतः शक्ति के शैथिल्य से बचकर आत्मबल, साहस और संकल्प को सुदृढ़ बनाए रखना चाहिए।

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विराट् रूप इसलिए दिखाया ताकि अर्जुन के मन में उत्पन्न संशय, मोह और भय का पूर्णतः निवारण हो सके तथा वह सत्य, कर्तव्य और परम शक्ति को प्रत्यक्ष रूप में समझ सके। अर्जुन को प्राप्त हुई यह शक्ति की दृष्टि उसके लिए अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुई l


नई पीढ़ी को सत्य का बोध कराने के प्रयास निरंतर किए जा रहे हैं। उनके मन में व्याप्त भय, संशय और भ्रम को दूर करने का कार्य चल रहा है तथा उन्हें यह समझाया जा रहा है कि भारतीय जीवन-दर्शन, उसके विचार और संकल्प न तो समाप्त हुए हैं और न ही लुप्त हुए हैं। वे आज भी जीवंत हैं और हमारे समाज में गहराई से विद्यमान हैं।

भारतीय संस्कृति में जीवन को देखने की एक समग्र और संतुलित दृष्टि है, जो सत्य, कर्तव्य, आत्मबल और समर्पण पर आधारित है।



डा एम. वी. गोविन्दस्वामी जो अखिल भारतीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान (AIIMH) के संस्थापक-निदेशक थे, जिसे बाद में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS), बैंगलोर के रूप में जाना जाने लगा का उल्लेख क्यों हुआ,भारतीय संगीत ऊर्ध्वगामी होने के कारण क्यों महत्त्वपूर्ण है  भैया प्रशान्त बोडस जी भैया संदीप बोडस जी भैया सौरभ राय जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

15.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 15 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 15 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३१ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११३

*मैं चिर युवा हूं* इसकी सदैव अनुभूति करें क्योंकि कर्म (सत्कर्म) के लिए यह अत्यन्त आवश्यक भाव है



राष्ट्रमन्दिर का पुजारी मुक्ति का कामी नहीं हूं...

आचार्य जी सेवा और समर्पण में रत एक ऐसे पुरोहित हैं जो किसी भी स्वार्थ या भेदभाव के बिना राष्ट्र की सेवा समाज की सेवा को ही अपने जीवन का उद्देश्य मानते हैं। जिस प्रकार एक पुजारी मन्दिर में निष्ठा, श्रद्धा और पवित्र भाव से पूजा करता है, उसी प्रकार आचार्य जी राष्ट्र की भलाई, उन्नति और अखण्डता के लिए अपने विचार और कर्म समर्पित करते हैं l 


आचार्य जी कहते हैं वे मुक्ति के कामी नहीं हैं क्योंकि जो मुक्ति प्राप्त कर लेता है उसे इस सृष्टि से कोई प्रयोजन नहीं रहता वह सृष्टि के संचरण से मुक्त रहता है

और आचार्य जी को तो सृष्टि से प्रयोजन है l हमें भी सृष्टि से मतलब रखना चाहिए हमें अपने सनातनधर्मी बन्धुओं के भय और भ्रम का निवारण करना चाहिए और उन्हें आश्वस्त करना चाहिए कि क्रूरता करने वाले दुष्टों को कुचलने के लिए हमारे समीप पर्याप्त शक्ति है अपने लक्ष्य की प्राप्ति में मार्ग में आ रही चमचमाहट से हमें विचलित नहीं होना चाहिए आत्मबल, विश्वास, संकल्प या ईश्वरीय कृपा जो भी जीवन-मार्ग में आवश्यक  ऊर्जा है वह हमारे भीतर विद्यमान है इसको हमेशा अनुभव करते रहें l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि संसार के जंजालों से दूर आत्मानन्द में विचरण करने के लिए लेखन,जो एक अत्यन्त प्रभावशाली साधन है, अवश्य करें क्योंकि लेखन न केवल विचारों को स्पष्ट करता है, बल्कि वह अन्तर्मन के द्वार खोलकर आत्मा के स्पर्श का अवसर देता है। जब हम अपने विचारों, अनुभूतियों और भावनाओं को शब्दों में रूपान्तरित करते हैं, तब भीतर का बोझ हल्का होता है और मन शान्ति की ओर अग्रसर होता है। यही शान्ति, आत्मानन्द का द्वार है।

कल त्रयोदशा कार्यक्रम सम्पन्न हुआ जिसमें १९७५ बैच से भैया शशि शर्मा जी भैया राजेश मल्होत्रा जी भैया विनय अजमानी जी १९७६ से भैया सुनील जैन जी भैया बलराज पासी जी १९७८ से भैया अरविन्द तिवारी जी १९८२ से भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया मलय चतुर्वेदी जी १९८३ से भैया अतुल मिश्र और प्रवीण अग्रवाल १९८४ से भैया आलोक जी, भैया प्रदीप त्रिपाठी जी भैया मनोज अवस्थी जी १९८५ से भैया समीर राय जी भैया अरुण जी भैया पुनीत श्रीवास्तव जी १९८६ से भैया मोहन कृष्ण जी १९८८ से भैया विनीत मेहरोत्रा जी, भैया तरुण सक्सेना जी, भैया आलोक सांवल जी,  भैया जय सिंह जी, भैया नरेंद्र सिंह जी,  भैया मनीष कृष्णा जी

१९८९ से भैया अमित गुप्त जी बैच १९९२ से भैया रत्नेश तिवारी जी

१९९६ से भैया पवन जी, भैया रामेंद्र जी २००१ से भैया संदीप जी उपस्थित रहे

भैया डा नरेन्द्र जी,भैया विभास जी, भैया दुर्गेश जी, श्री मुकेश जी श्री हरमेश जी आदि भी उपस्थित थे

14.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 14 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६३० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 14 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६३० वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११२

अपने भीतर छिपी दिव्य शक्तियों को पहचानें


विश्वास मनुष्य के भीतर छिपी हुई वह दिव्य शक्ति है जो उसे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी डगमगाने नहीं देती। यह आत्मबल का स्रोत है, जो जीवन में आगे बढ़ने, संघर्ष करने और लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता करता है। परंतु यह विश्वास स्वतः स्थिर नहीं होता, इसे नियमित अभ्यास, आत्मचिंतन, सत्संग, अध्ययन और सकारात्मक अनुभवों के माध्यम से सशक्त बनाना पड़ता है। श्री रामचरित मानस का अध्ययन विश्वास को सुस्थिर करने का एक उत्तम उपाय है विषम परिस्थितियों में इसे रचकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने हम सनातनधर्मियों में विश्वास का संचार किया हमें शक्ति की अनुभूति कराई हमें संगठित होना सिखाया प्रेम का अखंड व्रती बनाया अन्यथा भय भ्रम लालच लोभ से हम लोगों का विश्वास डगमगा रहा था और हम धर्म परिवर्तन के लिए विवश हो रहे थे

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥1॥

नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥




रावण को रथ पर और भगवान् राम को बिना रथ के देखकर भगवान् राम के भक्त विभीषण सशंकित हो गए क्योंकि विचारों के प्रति वे समर्पित नहीं थे उनमें विकार भरे हुए थे

भगवान् राम उनके भ्रम का निवारण करते हुए कहते हैं 

सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥2॥

 वीरता और धैर्य उस रथ के पहिए हैं, सत्य और शील (सदाचार) उसकी ध्वजा और पताका हैं। शक्ति, विवेक, इंद्रियनिग्रह और परोपकार उसके चार घोड़े हैं, जो आत्मनियंत्रण और जनकल्याण के प्रतीक हैं। क्षमा, कृपा और समता वे रस्सियाँ हैं, जिनसे घोड़े जुड़े हैं।


ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है l

( यह रथ एक आदर्श जीवन जीने की दिशा दिखाता है—जिस पर आरूढ़ होकर मनुष्य जीवन की कठिनाइयों को पार कर सकता है और धर्म का पालन करते हुए सफलता प्राप्त कर सकता है।)

आज भी विषम परिस्थितियां हैं हमें इस ओर चिन्तन करना चाहिए और  अपनी क्षमताओं की अनुभूति कर कर्मरत होना चाहिए


जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे आचार्य जी श्री ओम शंकर त्रिपाठी जी के अग्रज भाईसाहब  श्री राम शंकर त्रिपाठी जी ३ जनवरी को ब्रह्मलीन हो गए थे आज उनका त्रयोदशा कार्यक्रम है l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने ट्रम्प का उल्लेख क्यों किया भारतभ्रमण क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें

13.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 13 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 13 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२९ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १११

हम १००० वाट के बल्ब हैं यह अनुभूति कर अपनी शक्तियों को पहचानें हम समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने में अत्यन्त सक्षम हैं


हमारे लिए अपने सांसारिक जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिए गंभीर चिन्तन आवश्यक है। यद्यपि वर्तमान जीवनशैली के दृष्टिकोण से यह बात हममें से कुछ लोगों को असामान्य प्रतीत हो सकती है कि हमें प्रातःकाल शीघ्र उठना चाहिए, किन्तु वस्तुतः यह अत्यन्त स्वाभाविक और हितकारी है प्रातःकाल जागरण न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त है, अपितु यह मानसिक शुद्धता और जीवन में अनुशासन के विकास का भी माध्यम है इसे प्रायः हर मनीषी चिन्तक विचारक कहता है l आचार्य जी भी यही कह रहे हैं हम युगभारती के सदस्यों का कर्तव्य है कि हम इस ओर अवश्य ध्यान दें l

 हमारे भीतर कुछ विशिष्ट तात्त्विक शक्तियाँ सदा विद्यमान रहती हैं जो हमारे आत्मबल के रूप में काम करती हैं। किन्तु हम उन्हें पहचान नहीं पाते क्योंकि हमारा ध्यान बाह्य भोगों और विकर्षणों में अधिक रहता है। इसमें हमारी शिक्षा का भी दोष है l यदि हम अपने जीवन को सत्प्रवृत्तियों और तात्त्विक चिन्तन से जोड़ें, तो वही शक्तियाँ हमारे जीवन को सार्थक दिशा देने में उसे संयमित करने में सहायक बन सकती हैं। विवशता हमें कुंठित करती है अतः हमें विवशता से बचना चाहिए l जीवन में आ रहे अवरोधों को शमित करने के लिए हमारे निर्णयों में स्पष्टता,विचारों में स्थिरता,कर्म में निरंतरता और लक्ष्य में दृढ़ता हो l इसके लिए गहन अध्ययन भी आवश्यक है l अविद्या के साथ विद्या को भी जानना आवश्यक है l

इसके अतिरिक्त शोभन सरकार की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की? कामधेनु तन्त्रम् का उल्लेख क्यों हुआ?

युगभारती कार्यकारिणी समिति के लिए आचार्य जी ने क्या सुझाव दिए?हम सामूहिक रूप से आधुनिक काल का समाज को किस प्रकार विचार दे सकते हैं? संविधान क्या है? जानने के लिए सुनें

12.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२८ वां* सार -संक्षेप

 जो भाव अत्यधिक मूल्यवान् होते हैं उन्हें उचित स्थान पर प्रयोग करना चाहिए....


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 12 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२८ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ११०

 हम विचारों से आगे बढ़कर कर्म के पथ पर चलें l


हमें प्रेरित करने के लिए इस वेला में आचार्य जी के मन में जो  समाजोन्मुखी और राष्ट्र के लिए अत्यन्त हितकारी स्वयं हमारे लिए भी अत्यधिक लाभकारी सद्विचार उत्थित होते हैं उन्हें वे प्रसरित करते हैं l हमें उनका मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है यह तो हमारा सौभाग्य है l

यह मानव जीवन अत्यन्त दुर्लभ है, इसे हम व्यर्थ न गवाएँ।  

संपत्ति, परिवार और सुख–सब नश्वर हैं, अंत समय में ये साथ नहीं देंगे।  

अतः हम ईश्वर भक्ति में लगें, मिथ्या आशाओं और विषय-भोगों को त्यागकर l किन्तु यह ध्यान रखते हुए कि 


ज़िन्दगी पौरुष पराक्रम शील संयम की कहानी,

ज़िन्दगी आदर्श पूरित शौर्य विक्रम की निशानी l

हमें उच्च गुणों के साथ जीवन जीना चाहिए और भावी पीढ़ी को भी यही शिक्षा देनी चाहिए उसे भ्रम भय से मुक्त करना चाहिए क्योंकि आधुनिक शिक्षा, जो भावों और संस्कारों से रहित है, उसका यह अत्यन्त गंभीर अपराध है कि वह नई पीढ़ी को न तो सही दिशा दे पा रही है और न ही उन्हें नैतिकता, संवेदनशीलता व जीवन-मूल्यों से जोड़ पा रही है।  

फलस्वरूप, भावी पीढ़ी मार्ग से भटक रही है, उसका आचरण बिगड़ रहा है और वह जीवन के सच्चे उद्देश्य से विमुख होती जा रही है।  

इसलिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जो ज्ञान के साथ साथ चरित्र, संस्कृति और संवेदना का भी विकास करे।



कर्म के सिद्धान्त जब व्यवहार बनकर दीखते हैं,

तब भविष्यत् के सभी अंकुर सहज ही सीखते हैं।

और जब सिद्धान्त केवल सूत्रवत् रटवाये जाते, 

तभी प्रवचन मन्त्र सारे व्यर्थ यो हीं

फड़‌फड़ाते।

इसलिए व्यवहार को आदर्श का जामा पिन्हाओ,

नयी पीढ़ी को सनातन धर्म की लोरी सुनाओ।

गुनगुनाओ गीत पुरखों के पराक्रम शौर्य वाले,

नोचकर फेंको मनों पर चढ़ चुके सुख-स्वार्थ जाले।

"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।" -स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीय युवा दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं l


इसके अतिरिक्त मस्तिष्क का खेल कौन खेलता है, कबीरी ज्ञान किसके मन में आता है जानने के लिए सुनें

11.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 11 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२७ वां* सार -संक्षेप

 यह जीवन रचनाकर्ता की एक अनोखी  अमर कहानी 

इसमें रोज बिगड़ते  बनते हैं दुनिया के राजा रानी

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 11 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२७ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०९

अपनी भावनाओं की रक्षा करते हुए अपने लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए कर्मानुरागी बनें


यह संसार प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है। इसके विविध प्रपंच, मोह और आकर्षण सतत रूप से जीवन को उलझाए रखते हैं। तथापि, प्रत्येक जीव के अंतर्मन में एक विशेष तत्त्व,एक दिव्य शक्ति निहित होती है, जो प्रायः सुप्त अवस्था में रहती है। जब परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है, तब यह सुप्त शक्ति जाग्रत होती है और व्यक्ति उस दिव्य तत्त्व का विस्तार अपने जीवन में करने में समर्थ हो जाता है। इस जागरण से वह संसार के प्रभावों से ऊपर उठकर आत्मबोध, कर्तव्यबोध की ओर अग्रसर होता है। परमात्मा की कृपा महत्त्वपूर्ण है l



सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥


सगुणोपासकों के लिए भगवान् संसार में आकर उनका संबल बनता है  उनकी छत्रछाया बनकर उनकी रक्षा करने में समर्थ होता है 

अव्यक्त ब्रह्म का न रूप है, न रेख, न गुण है, न जाति। मन वहां स्थिर ही नहीं हो सकता। सब प्रकार से वह अगम्य है, इसे ही स्पष्ट करते हुए सूरदास सगुण ब्रह्म श्रीकृष्ण की लीलाओं का ही गायन करना ठीक समझते हैं और कहते हैं 

रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।

सब बिधि अगम बिचारहिं, तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥

हम भी सगुणोपासक हैं

सगुणोपासना में भी तत्त्च है-

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥

करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥

ये काव्यात्मक अभिव्यक्तियां अद्भुत हैं यह जगत् ही काव्यात्मक है भावों से परिपूर्ण सभी व्यक्ति कवि हैं कवित्व भावना से उद्भूत होता है इसी कारण भावों के रक्षण पर बल दिया जाता है


केवल प्राणों का परिरक्षण जीवन नहीं हुआ करता है

जीवन जीने को दुनिया में अनगिन सुख सुर साज चाहिए......

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए हम युगभारती के सदस्यों का कर्तव्य है कि हम अपने लक्ष्यों पर ध्यान दें 

हमारे लक्ष्यों में  है राष्ट्र को उसकी सर्वोच्च उन्नति और गौरव की ओर ले जाना , राष्ट्र- भक्त समाज में व्याप्त भय और भ्रम का निर्मूलन आदि

इसके अतिरिक्त आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं युगभारती किस प्रकार के झंझटों से मुक्त रहे जानने के लिए सुनें

10.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 10 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 10 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२६ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०८

इन वेलाओं का श्रवण कर हम उत्साहित आनन्दित और संकल्पित होने का प्रयास करें



हम सभी को चाहिए कि अपने ज्ञान, बुद्धि, शक्ति, विचार और कौशल का उपयोग समाज के हित में करें, ताकि हम पूर्वकाल में जो सामाजिक सौहार्द, सहयोग और आनन्द अनुभव करते थे, उसे पुनः प्राप्त कर सकें। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है, बल्कि सत्य है कि समाज केवल हमसे अपेक्षा ही नहीं करता, बल्कि समय आने पर हमारी रक्षा भी करता है। अतः समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना और उन्हें निभाना हमारा उत्तरदायित्व है।

ईश्वर को समर्पित होकर,निःस्वार्थ भाव से कर्म करने वाला व्यक्ति कर्मों से बंधता नहीं है। यही जीवन का आदर्श मार्ग है – सक्रिय रहकर धर्मपूर्वक जीवन जीना।

जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का अपने कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।


हम कब आशंकित होते हैं,भैया अरुण जी भैया आशुतोष जी भैया नरेन्द्र जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

9.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 9 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 9 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२५ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०७

शक्ति, बुद्धि,भावना, विचार, संकल्प, संयम को उनकी आवश्यकतानुसार उपयोग करते हुए प्रयोग करते हुए अपने जीवन को देश और समाज के हित में उपयोगी बनाएं


परमात्मा ने जो यह सृष्टि रूपी लीला-धाम रचा है, उसमें हम सब उसके लीला-पात्र हैं परमात्मा का आनन्द ही इस सृष्टि का मूलस्वर है, और वही आनन्द जीवात्मा का भी स्वाभाविक लक्ष्य है । जब हम इस लीला को समझते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि जन्म और मरण ( जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करता है। यह शिक्षा हमें मृत्यु से भयमुक्त करती है और जीवन के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है ),निर्माण और विनाश, सब उसी दिव्य विधान के अंग हैं इसलिए जीवन की घटनाएँ चाहे जैसी हों, वे केवल परिवर्तनशील हैं, परन्तु उनके मूल में स्थित परम आनन्द अपरिवर्तनशील और सनातन है।

हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ll


भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

(ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 89, मंत्र 8)


हे देवगण!

हम अपने कानों से मंगलमय वाणी सुनें, हमारी आँखें पुण्यदर्शी हों,  

हमारे अंग स्थिर और सबल हों,  

और हम, बलशाली शरीर के साथ, आपके लिए योग्य आयु तक जीते हुए यज्ञ और सत्कर्म करते रहें।यह मंत्र एक आदर्श मानव जीवन की कल्पना करता है — जहाँ इन्द्रियाँ संयमित, शरीर स्वस्थ और जीवन ईश्वर व समाज के कल्याण में समर्पित हो।


*ऐसा अद्भुत आधार है हमारी शिक्षा का l*


हम प्रायः कहते हैं

ॐ सह नाववतु।

सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु।

मा विद्‌विषावहै॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः  कहना वेदों और उपनिषदों की परंपरा में एक अत्यंत गूढ़ और शुभ प्रार्थना है। इसे त्रिविध तापों' से मुक्ति की कामना के रूप में बोला जाता है 

शान्ति, सद्भावना आदि व्यक्ति को समस्याओं से मुक्ति प्रदान करते हैं शान्ति की कामना मनुष्य का मनुष्यत्व है

और शान्ति बिना शक्ति के संभव नहीं 

हिंदु युवकों आज का युग धर्म शक्ति उपासना है ॥

इसके लिए संगठन आवश्यक है और संगठन का आधार है प्रेम और आत्मीयता


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने डा जी एन वाजपेयी जी की चर्चा क्यों की, morning glory का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

8.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 8 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२४ वां* सार -संक्षेप

 ज्ञान का सम्मान करना ही हमारा धर्म है 

 मूलतः अमरत्व  के स्वर का यही शिव मर्म है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 8 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२४ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०६

लेखनअवश्य करें क्योंकि यह साधना का एक सूत्र है


जब हम सात्विक संसार में प्रविष्ट होते हैं, तब यह अनुभूति उत्पन्न होती है कि हम पुरुष हैं और इस संसार में पुरुषार्थ करने हेतु आए हैं।  


यद्यपि हमारे भीतर निराशा, कुंठा, व्यथा, ईर्ष्या, दम्भ, लोभ, मोह आदि विकार उपस्थित होते हैं, किन्तु सात्विक दृष्टिकोण के कारण वे हमें व्यथित नहीं करते l हम उन्हें देखते हैं, समझते हैं, किन्तु उनके प्रभाव में नहीं आते।

कभी उत्साह का उत्सव  निराशा की कहानी हूं 

जगत की साधना -सरिता -समय का दिव्य पानी हूं

स्वयं को भूलकर जड़ विन्ध्य जैसा विस्तरण होता

स्वयं को याद कर कैलाश जैसा दिव्य ज्ञानी हूं


मनुष्य के भीतर जड़ता और दिव्यता दोनों की संभावनाएँ हैं  आत्मबोध से ही वह शिवतत्त्व को प्राप्त कर सकता है।ईश्वर की कृपा, भाग्य और इस जीवन की साधना के द्वारा व्यक्ति आनन्द का उपासक हो जाता है वह निराश नहीं रहता l


विषमतम परिस्थितियों को भोगते हुए भगवान् की कृपा और हनुमान जी की सहायता से अद्भुत अखंडव्रती भक्त तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका के रूप में एक अद्भुत ग्रंथ  जो मानस की तरह भक्तों का कंठहार है रच डाला जिसके अंतिम पद का मुख्य भाव पूर्ण समर्पण है। तुलसीदास जी यहां आत्मनिवेदन करते हैं कि उन्होंने संसार से नाता तोड़कर केवल प्रभु राम को अपना सर्वस्व मान लिया है। अब वे प्रभु की शरण में हैं और उनकी रक्षा केवल श्रीराम ही कर सकते  हैं यही विनय पत्रिका का मूल संदेश है -ईश्वर की शरण ही अंतिम और सर्वोत्तम मार्ग है।


संसार नाम और रूपों का संघर्षमय क्षेत्र है। यदि कोई मनुष्य इस जीवन-संग्राम में अमर होना चाहता है, तो उसे निरन्तर निःस्वार्थ भाव से प्रखर कर्म करना होगा। 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने स्वाध्याय, समर्पण, संयम, साधना, सेवा आदि तत्त्वों को शिक्षा में समाहित होने की आवश्यकता पर बल दिया l 

भैया प्रदीप वाजपेयी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

7.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 7 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२३ वां* सार -संक्षेप

 समय की शिला पर मधुर चित्र कितने

किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए।


किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी

किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूँद पानी

इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के

गई घुल जवानी, गई मिट निशानी।

विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने

धरा ने उठाए, गगन ने गिराए। (शम्भुनाथ सिंह )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 7 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२३ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०५

हमें अपने जीवन को सत्कर्मों और सात्त्विक चिन्तन के माध्यम से परिशुद्ध करते रहना चाहिए, जिससे हम स्वयं भी उन्नत हों देश और समाज के लिए भी प्रेरणा बन सकें।



मनुष्य का जीवन केवल भोग-विलास अथवा सांसारिक प्रयोजन के लिए नहीं है, अपितु यह आत्म-विकास, आत्मशुद्धि और परमात्म-साक्षात्कार के लिए प्राप्त हुआ है।


मनुष्य देह प्राप्त कर कभी न दैन्य को वरो l 

यह कर्म -योनि है स्वकर्म धर्म मानकर करो ll


 अतः हमें चाहिए कि हम अपने आचरण, विचार, व्यवहार और भावनाओं को शुद्ध बनाने का निरन्तर प्रयास करते रहें।अपने अंदर की दुर्बुद्धि, विकार, अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि दोषों का परित्याग करके  विद्या, तप, दान, सत्य, करुणा, प्रेम, क्षमा, संयम, सेवा, श्रद्धा,भक्ति, शक्ति, शौर्य, पराक्रम आदि गुणों का विकास करें।



येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।

ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति । ।


-चाणक्य नीतिशास्त्र [10.7]




यह प्रक्रिया एक दिन में नहीं होती, यह निरन्तर अभ्यास, आत्मनिरीक्षण, साधना और विवेक से ही संभव है। यही अवतारत्व है l हमने जो लक्ष्य बनाया है उसके अनुसार हम भारत राष्ट्र के जाग्रत पुरोहित हैं


"तू भारत का गौरव है¸

तू जननी–सेवा–रत है।

सच कोई मुझसे पूछे

तो तू ही तू भारत है॥46॥


तू प्राण सनातन का है

मानवता का जीवन है।

तू सतियों का अंचल है

तू पावनता का धन है॥47॥


यदि तू ही कायर बनकर

वैरी सiन्ध करेगा।

तो कौन भला भारत का

बोझा माथे पर लेगा॥48॥...


थक गया समर से तो तब¸

रक्षा का भार मुझे दे।

मैं चण्डी–सी बन जाऊं

अपनी तलवार मुझे दे।"॥52॥

हमें इसी अपने वास्तविक इतिहास को जानने की आवश्यकता है



इसके अतिरिक्त हमें भड़ैंती में क्या नहीं गंवाना चाहिए आचार्य श्री ठाकुर चन्द्रपाल जी का उल्लेख क्यों हुआ, हमें सफल अभिनेता क्यों बनना चाहिए जानने के लिए सुनें

6.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 6 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२२ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 6 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२२ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०४

आत्मदृष्टि और संसार -दृष्टि में सामञ्जस्य बैठाते हुए भयभीत न होते हुए समाज और देश के लिए कटिबद्ध हों  (जब हनुमान जी की कृपा छाया हमारे ऊपर है तो भय कैसा)


मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।


मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।7.7।।


भगवान् श्रीकृष्ण इस छंद में अपने परमात्म-स्वरूप को स्पष्ट करते हुए अर्जुन से कहते हैं कि इस सम्पूर्ण सृष्टि में उनसे परे कोई दूसरा परम तत्त्व नहीं है। सृष्टि में जो कुछ भी दृश्य-अदृश्य रूप में विद्यमान है, वह सब उसी एक परम तत्त्व में ही स्थित और उसी से जुड़ा हुआ है।


जिस प्रकार माला के प्रत्येक मोती एक अदृश्य धागे  से जुड़े होते हैं और वह धागा ही पूरे गहने को एक रूप देता है l 

 अर्थात् परमात्मा ही समस्त जगत् का आधार हैं। वे ही सर्वव्यापी, सर्वाधार और सर्वोच्च तत्त्व हैं।

हम सब लोग उन्हीं पर आश्रित हैं l उन्हें जानना ही अध्यात्म की पूर्णता है।


निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥

करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥


निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥2॥

अध्यात्म में इस प्रकार का प्रवेश हमें आनन्द की अनुभूति करा देता है l

अन्यथा सांसारिकता में हम व्यथित ही होते हैं l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने त्रयोदशी के विषय में क्या बताया जानने के लिए सुनें

5.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२१ वां* सार -संक्षेप

 क्या छोड़ूँ क्या पकड़ लूँ , आश्रय सभी अबूझ। 

ज्ञान अलभ्य सुदूर है, न ही भक्ति की सूझ ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 5 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२१ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०३

यह देश मेरा धरा मेरी गगन मेरा,

इसके लिए बलिदान हो प्रत्येक कण मेरा

इस भारत-भक्ति के पथ पर चलें यही सुपथ है


इस संसार के रहस्य अत्यन्त अद्भुत हैं अनेक ग्रंथों के माध्यम से इन्हें बताने का प्रयास किया गया है भगवान् कृष्ण अर्जुन को इन्हें कैसे कैसे समझाते हैं यह गीता में सुस्पष्ट किया गया है  इन्हें जानने से हमें निश्चित रूप से शक्ति प्राप्त होती है


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।


स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।।


जीवन में अपने स्वभाव और प्रकृति के अनुरूप  अपने धर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ है। भले ही उसमें कुछ त्रुटियाँ हों, फिर भी वही लाभदायक और कल्याणकारी होता है।

कामनारूप वैरी द्वारा ज्ञान आच्छादित हो जाता है अपने कल्याण की प्राप्ति के कारणरूप उस ज्ञान और विज्ञान को यह काम नष्ट करने वाला है अतः इसका परित्याग आवश्यक है

जब मनुष्य आत्मा की शक्ति को पहचानकर अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रण में रखता है, तब वह इस कठिन काम रूपी शत्रु को पराजित कर सकता है

इन छंदों के तत्त्व को जो व्यक्ति जान लेता है और उसे व्यक्त करने की क्षमता जिसमें आ जाती है वह प्रेम और आकर्षण का पात्र बन जाता है  तत्त्व है कि मैं न जन्मता हूँ, न मरता हूँ। मैं न कोई रूप रखता हूँ, न किसी रूप में बंधता हूँ। मैं तो केवल एक निर्विकल्प, निराकार, परम सत्य चैतन्य स्वरूप हूँ।


तन बिसार कर जगत में , जीता स्थितप्रज्ञ। 

गीताज्ञान अमोघ यह, पाए कैसे अज्ञ ॥


आचार्य जी ने महाराणा प्रताप और मानसिंह में क्या अन्तर बताया भाईसाहब को किस बात पर क्रोध आ गया था जानने के लिए सुनें

4.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६२० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज माघ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 4 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६२० वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०२

भावी पीढ़ी को अपने वास्तविक इतिहास से परिचित कराएं उसे मनुष्यत्व की अनुभूति कराएं


जो व्यक्ति सनातन धर्म को मानता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वी को ही अपने परिवार के रूप में देखता है। ऐसा व्यक्ति सच्चे अपनत्व की भावना से ओतप्रोत होता है और उससे विमुख रहना उसके स्वभाव में नहीं होता।  


दुःख की घड़ी में जब अपने समीप होते हैं, तो वह दुःख कुछ कम प्रतीत होता है  और सुख की अवस्था में अपनों की उपस्थिति उस सुख को और अधिक बढ़ा देती है। यह सनातन धर्म की आत्मीयता प्रधान, संवेदनशील और सहृदय दृष्टि है।  


हम, जो सनातन धर्म के अनुयायी हैं और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण हैं, केवल आत्मसम्मान से जीना जानते हैं। हम किसी के आगे झुकते नहीं, अपितु अपने सत्य और धर्म के तेज से अन्याय को झुकाते हैं।जब अत्यन्त कठिन परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तो हम चाहे किसी दीवार में चुन दिए जाएँ, फिर भी अपने धर्म, कर्तव्य और विचार से समझौता नहीं करते। यह भारत भूमि, जो सनातन संस्कृति की जननी है, न केवल अपने मूल्यों की रक्षा करती है, अपितु जो भी शरण में आता है, उसकी भी पूरी निष्ठा से रक्षा करती है। यही इसकी महानता है।


मैं तेज पुंज, तमलीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश।

जगती का रच करके विनाश, कब चाहा है निज का विकास?

शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन दे कर।

विश्वास नहीं यदि आता तो साक्षी है यह इतिहास अमर।

यदि आज देहली के खण्डहर, सदियों की निद्रा से जगकर।

गुंजार उठे उंचे स्वर से 'हिन्दू की जय' तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!

 वीरत, ज्ञान, भक्ति,वैराग्य,समर्पण, साधना की शिक्षा हमारा भारतवर्ष ही दे सकता है जिस जिज्ञासु को इन्हें प्राप्त करना है उसे सनातन धर्म अपनाना ही होता है

दुःखद यह है कि हमारे वास्तविक इतिहास को विदीर्ण करने की चेष्टा की गयी 

इसी कारण शौर्य प्रमंडित अध्यात्म महत्त्वपूर्ण हो जाता है

हमें इसी का ध्यान रखना है हमें विभिन्न विकारों से दूर रहना है

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भाईसाहब का जीवन परिचय दिया जो कल हमारे बीच नहीं रहे

3.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६१९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 3 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१९ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १०१


हे परमात्मा! मुझे इतनी शक्ति प्रदान करें कि मैं संसार के तत्त्व को

 जानकर उसका आचरण करने योग्य बन सकूं । संसार को न तो त्याज्य मानना चाहिए, न ही सर्वस्व अपितु इसे साधन मानकर विवेकपूर्वक जीना ही संसार के तत्त्व को समझना है।



इस भाव-जगत् में जो व्यक्ति अपनी आन्तरिक शक्ति, बुद्धि, विचार और चैतन्य को संतुलित ढंग से बनाए रखते हुए परिस्थितियों में उचित प्रकार से रहना और सहना जान लेता है, वह न केवल संसार के तत्त्व को समझ पाता है, बल्कि उसे सुलझाने में भी समर्थ होता है।


संसार का तत्त्व यह है कि यह नश्वर, परिवर्तनशील और क्षणिक है  इसमें कुछ भी स्थायी नहीं है। यह सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मरण, मिलन-वियोग जैसे द्वन्द्वों से युक्त है। परन्तु यह तत्त्व केवल व्यवहारिक जगत् का पक्ष है।


गहराई से देखें तो संसार आत्मा के अनुभव, कर्मफल और मोक्ष की यात्रा का माध्यम है। इसका उद्देश्य आत्मा को साधना, विवेक, त्याग, प्रेम, करुणा और आत्मबोध के मार्ग पर आगे बढ़ाना है। जब कोई व्यक्ति संसार को केवल भोग का स्थान न मानकर साधना का क्षेत्र मानता है, तभी वह इसके वास्तविक तत्त्व को समझ पाता है।


देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।


तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.30।।


आत्मा नित्य, अविनाशी और अजर-अमर है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा को कोई मार नहीं सकता। इसलिए किसी के मरने पर या शरीर छोड़ने पर शोक करना उचित नहीं है l

2.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६१८ वां* सार -संक्षेप स्थान : ग्राम सरौहां

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१८ वां* सार -संक्षेप

स्थान : ग्राम सरौहां

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १००

हम विश्वास करें कि भक्ति में शक्ति होती है उस भक्ति का आधार लेकर समाजोन्मुखी कार्य करते रहें


रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।

 रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:॥...


इस मंत्र का नियमित और श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मनुष्य को अत्यन्त शांति और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है। यह मंत्र भगवान् राम के विविध स्वरूपों का स्मरण कराता है और साधक के हृदय में भक्ति, विनय और धर्मभावना को जाग्रत करता है। इसके जप से मन स्थिर होता है, चिंताओं का नाश होता है और जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। यह मंत्र साधक को भगवान् राम और माता सीता की कृपा का पात्र बनाता है जिससे जीवन में स्थितियाँ अनुकूल होने लगती हैं। इस मंत्र के प्रभाव से व्यक्ति के भीतर मर्यादा, संयम और कर्तव्यबोध की भावना सुदृढ़ होती है,उसे शक्ति की अनुभूति होती है जो जीवन को सफल और सार्थक बनाती है।भगवान् राम हमें सचेत करते हैं कि जीवन में विश्राम की जो धारणा है, वह एक भ्रम है। यह संसार निरन्तर परिवर्तनशील है, इसमें कहीं स्थायित्व नहीं। जब हम सोचते हैं कि अब सब स्थिर है, सब शांत है, वही हमारी सबसे बड़ी भूल होती है जीवन का सत्य तो सतत प्रयास है। विश्राम की प्रतीति हमारे पुरुषार्थ को शिथिल करती है।

आचार्य जी ने बताया कि जिसकी जितनी पात्रता होती है देवता उसको उतना ही देता है l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सौरभ राय जी, भैया समीर राय जी, भैया राजेश मल्होत्रा जी,भैया अमित गुप्त जी,भैया सुनील पांडेय जी,श्री उत्तम जी, श्री राम कुमार जी की चर्चा क्यों की, हनुमत् कवच का उल्लेख क्यों हुआ,किनकी पौरुषेय वाणी से आचार्य जी प्रभावित रहे, रुदन-मण्डल में क्या होता था जानने के लिए सुनें

1.1.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६१७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 1 जनवरी 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१७ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९९

अपने कर्तव्य में फल का व्यामोह नहीं होना चाहिए और  हमें साधना ऐसी करनी चाहिए जो सिद्धिमुक्त हो


जीवन जगत संसार दुनिया नाम रूपों का समर 

जिस किसी ने भी रचा यह नाम उसका है अमर ll

इस समर में उतर कर नर को अगर होना अमर

सतत निस्पृह भाव से संघर्ष करना है प्रखर ॥

इस प्रखर संघर्ष को ही कर्म गीता ने कहा 

और यह भारत-धरा पर ज्ञान-रस बनकर बहा ॥

ज्ञान का सम्मान करना ही हमारा धर्म है 

 मूलतः अमरत्व  के स्वर का यही शिव मर्म है ॥



आत्मज्ञानी व्यक्ति को शरीर के त्याग में दुःख नहीं होता क्योंकि आत्मा तो अमर है, केवल शरीर रूपी आवरण गिरता है।  ऐसा व्यक्ति मृत्यु को त्याग नहीं, एक सहज परिवर्तन मानता है। यह भी पराक्रम का एक प्रकार है l मानस में आये निम्नांकित उदाहरण को देखिये जो निश्चित रूप से हमें बल देगा


राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग। सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥10


बालि जो पहले भगवान् राम के विरोध में था, मृत्यु के क्षणों में प्रभु के चरणों में प्रेमपूर्वक समर्पित हो गया। उसने तन का त्याग सहजता से किया, जैसे कोई हार अपने आप गले से उतर जाए और धारण करने वाला उसे महत्त्वहीन समझे।

और स्वधर्म का पालन, भले ही दोषयुक्त लगे, त्याज्य नहीं है। त्याग, आत्मसंयम और आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करने वाला व्यक्ति ज्ञान के चरम स्तर तक पहुँच सकता है और अन्ततः ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है।

कर्म ज्ञान भक्ति उपासना आदि का मूल तत्त्व यही है कि परमात्मा जो भी करता है सब अच्छा ही करता है हमें प्रयास करना चाहिए कि ऐसा भाव विचार हमारा सतत बना रहे

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों किया आज आचार्य जी की कहां जाने की योजना है जानने के लिए सुनें