31.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 31 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१६ वां* सार -संक्षेप

 यह जन्म जीवन मरण का अद्भुत अनोखा खेल है, 

संसार का यह सत्य पर सच कहूँ---बहुत अझेल है, 

ज्ञानी मनस्वी भक्त सब व्यामोह से जकड़े हुए 

कोई न कोई शान्ति-सुख लोभी जतन पकड़े हुए। 

इस जतन को ही स्यात ज्ञानी "साधना" कहकर गए, 

औ भक्त शायद इसी को आराधना भजते भये ॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 31 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१६ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९८

समाज को सुखी करने और राष्ट्र की आराधना करने वाले अपने लक्ष्यों को कभी ओझल न करें


प्रातःकाल की शुभ वेला आत्मविकास के लिए उपयुक्त होती है, जहाँ मन शांत, वातावरण निर्मल और एकाग्रता सहज होती है। आज के अत्यन्त व्यस्त समय में चिन्तन, मनन, अध्ययन, स्वाध्याय एवं लेखन जैसे सत्कार्यों की साधना तभी संभव है जब हमें प्रातःकाल शीघ्र जागने का परमात्मा द्वारा वरदान प्राप्त हो।

छोटी-छोटी चीजें जैसे कष्टों को सहन कर लेना, समस्याओं को धैर्यपूर्वक झेल लेना आदि को वास्तव में उनका वरदान ही समझना चाहिए क्योंकि इन्हीं के माध्यम से वे हमारी सहनशीलता, दृढ़ता और आंतरिक शक्ति को जाग्रत करते हैं वे हमारी प्रत्येक परिस्थिति में हमारी परीक्षा लेकर हमें सशक्त और परिपक्व बनाते हैं इसलिए जो भी दुःख या कष्ट जीवन में आता है, उसे परमात्मा की योजना का भाग मानकर स्वीकार करना ही सच्चा आत्मबोध है हमें जितना प्राप्त हुआ है, उसे ही अधिक मानकर उसके प्रति परमात्मा का आभार व्यक्त करना चाहिए। उनकी शक्ति सीमित नहीं, वह अनन्त है, और उनकी इच्छा के बिना कुछ भी घटित नहीं होता। गीता में उनका विराट् स्वरूप अर्जुन को यह अनुभव कराने के लिए दिखाया गया कि वे कोई साधारण मनुष्य नहीं, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्मांड के नियंता और धर्म के पालक हैं।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व


जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।


मयैवैते निहताः पूर्वमेव


निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।11.33।।


इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो। इसी प्रकार दंभी रावण परमात्मा की शक्ति को अनुभव नहीं कर पा रहा है तो असुरों के राजा मयासुर और अप्सरा हेमा की पुत्री विदुषी मन्दोदरी उसे समझाने का प्रयास करती है 


अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। 

मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥

हमें ऐसे परमात्मा की भक्ति का आश्रय  विश्वासपूर्वक लेना चाहिए भक्ति का आश्रय *स्व* के लिए तो है ही  *पर* अर्थात् समाज हेतु भी हो तो अतिउत्तम 

क्योंकि तब हम समाज को सुखी देखना चाहेंगे इसी कारण हम राष्ट्र की आराधना करते हैं संगठन निर्मित करते हैं


आचार्य जी ने उस प्रसंग की ओर भी संकेत किया जिसमें भगवान् राम के वनगमन के पश्चात् गुरुजन और परिवारजन भरत से अयोध्या के शासनभार को ग्रहण करने का आग्रह कर रहे हैं। इस प्रसंग के माध्यम से नेतृत्व में विनय, त्याग और आदर्श आचरण का महत्त्व रेखांकित हुआ है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया मनीष जी का उल्लेख क्यों किया लोटपोट का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

30.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 30 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 30 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१५ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९७

अविद्या और विद्या दोनों को जानें 



कविं पुराणमनुशासितार


मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।


सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप


मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।8.9।।


हमारे लिए ध्यान के योग्य परमात्मा वह है जो वैविध्य भरी सृष्टि का मूल है, जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है और जो ज्ञेय होकर भी ज्ञान से परे है। उसका स्मरण हमें आत्मोन्नति और परम शान्ति की ओर ले जाता है  और जो हमें

भ्रम, अज्ञान,मोह,भय, निराशा से दूर करता है

केवल ज्ञान या साधना ही नहीं, अपितु भक्ति, चित्त की स्थिरता और योगबल का समन्वय आवश्यक है। जो मृत्यु के क्षण में भी परमात्मा का ध्यान स्थिर मन से करता है, वह जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त करता है।

भगवान् कृष्ण कहते हैं

वेद के जानने वाले विद्वान् जिसे अक्षर कहते हैं रागरहित यत्नशील पुरुष जिसमें प्रवेश करते है जिसकी इच्छा से (साधक गण) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं - उस पद (लक्ष्य) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।।


इन्द्रियों के  सम्पूर्ण द्वारों को रोककर मन का हृदय में निरोध करके और अपने प्राणों को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ जो 'ऊँ' इस एक अक्षर ब्रह्म का  उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़कर जाता है, वह परमगति को प्राप्त होता है।



आचार्य जी ने बताया कि हम संसार की समस्याओं के समाधान खोजते हुए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करें

जैसे हमारा लक्ष्य है राष्ट्र-निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष

अपने राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाना भी एक लक्ष्य है

आनन्द की अनुभूति होती रहे यह भी एक लक्ष्य है


आचार्य जी ने भगवान् राम की कृपा को भक्ति के रूप में स्पष्ट किया

भगवान् गौतम बुद्ध का कौन सा प्रसंग आचार्य जी ने बताया तरबूज वाला प्रसंग क्या था जानने के लिए सुनें

29.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 29 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१४ वां* सार

 जीवन में स्वार्थ को दोष की दृष्टि से नहीं, बल्कि उसे ऊर्ध्वगामी बनाकर परमार्थ की दिशा में ले जाने की आवश्यकता है। तभी जीवन सार्थक होता है......


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 29 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१४ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९६

परमात्मसत्ता की भक्ति किसी भी रूप में करें


जब ज्ञान किसी जटिलता में उलझकर आगे नहीं बढ़ पाता तब मनुष्य की चेतना किसी गहरे समाधान या मार्गदर्शन के लिए एक और मार्ग अपनाती है, और वह है भक्ति l

भक्ति ज्ञान को पीछे नहीं छोड़ती, बल्कि जब ज्ञान बाधित हो, तब भक्ति उसे आगे ले जाती है l

अर्जुन कम ज्ञानी नहीं हैं वे ज्ञानी होने के साथ सांसारिक कलाविद, युद्धविद्या विशारद,अध्येता,तपस्वी, जयस्वी हैं किन्तु मोहांध हो गये जिसके कारण उनकी स्थिति अत्यन्त विषम हो गयी ऐसी स्थिति में भगवान् कृष्ण उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं तो भी अर्जुन को समझ में नहीं आता तब वह अपना विराट् स्वरूप दिखाते हैं तब उन्हें समझ में आ जाता है इसका अर्थ हुआ कि संसार जब शक्ति के स्वरूप का दर्शन करता है तो वह संसार के असारत्व को पार कर जाता है भक्ति और ज्ञान एक स्थान पर आदर्श स्वरूप में जब विराजमान् हो जाते हैं तब आनन्द की अनुभूति होती है


अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।

जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥

यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।...


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि रामचरित मानस के सारे तत्त्वों को जानना अत्यन्त दुष्कर है और उन्होंने कठपुतली का उल्लेख भी किया


भैया डा अमित जी भैया डा अजय जी भैया डा मधुकर वशिष्ठ जी भैया शैलेन्द्र दीक्षित जी, भैया रामेन्द्र जी, भैया वीरेन्द्र जी का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें

28.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 28 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 28 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१३ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९५

व्यक्तिगत लक्ष्य *मोक्ष* जिससे हम प्रफुल्लित रहें और समाजगत लक्ष्य *राष्ट्रोत्थान* दोनों का ध्यान रखें


ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।


मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।


भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह जीवात्मा इस संसार में मेरा ही अंश है और वह सनातन अर्थात् शाश्वत है। यह जीव, मन और पाँच इन्द्रियों सहित प्रकृति में स्थित होकर विषयों की ओर आकर्षित होता है तथा उनके प्रभाव से खिंचता और संघर्ष करता है।


भगवान् यह समझा रहे हैं कि  बद्ध जीव का असली स्वरूप दिव्य और शाश्वत है, परन्तु मन और इन्द्रियों के प्रभाव में आकर वह स्वयं को सीमित मानने लगता है। इसलिए आत्मबोध और आत्मसंयम द्वारा ही यह बंधन समाप्त किया जा सकता है और आत्मा अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर सकता है।

आत्मबोध व्यक्ति को यह विवेक देता है कि शरीर परिवर्तनशील है, कष्ट उसे हैं, परंतु उसका वास्तविक स्वरूप तो अजन्मा, अमर और अविकार है।

इस संसार के सार का अनुभव विलक्षण  परिणाम देता है l


तपस्वियों का फल क्या है

बैच २००० का कार्यक्रम आचार्य जी को कैसा लगा रामकृष्ण परमहंस क्यों पूजे जाते हैं  भैया सौरभ 'लल्लनटाप' की चर्चा क्यों हुई  जानने के लिए सुनें

27.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 27 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१२ वां* सार

 प्रभात है प्रभात में प्रभा बिखेरने उठो, 

शरीर-कष्ट भूल कर कलुष निबेरने उठो 

उठो शरीर साध कर

कि मन विचार बाँध कर 

स्व इष्ट को अराध कर 

कि नित्य धर्म याद कर 

सुबंधु टेरने उठो 

शरीर-कष्ट भूलकर कलुष निबेरने उठो ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 27 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१२ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९४

भगवान् राम के जीवन से शिक्षा ग्रहण करने हेतु अनेक तत्त्व हैं हम उन्हें  प्राप्त करने के लिए प्रयास करते रहें


शक्ति का संघोष धीरज की धरा हूं 

गगन का संतोष जलनिधि की त्वरा हूं...

और क्या हूं बहुत कुछ अवशेष अब भी...

यह संसार का सत्य है तत्त्व है इसे स्पष्ट करते हुए भगवान् शङ्कराचार्य कहते हैं 

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्

जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है यह आत्म-ज्ञान की चरम स्थिति का उद्घोष है जो बताता है कि हम शरीर, मन, विचार या कर्म नहीं हैं, बल्कि शुद्ध, मुक्त, चेतन आत्मा हैं जो न आदि है, न अंत; न भय है, न दुःख। यही सोऽहम् का बोध है कि मैं वही परम ब्रह्म हूँ।


छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥2॥


प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥

उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥3॥


बालि के परम धाम जाने पर विदुषी तारा को भगवान् राम समझा रहे हैं कि अनित्य संसार में नित्य को लेकर हम चलते हैं इस सार को जानने के लिए और सार का संसार के साथ सामञ्जस्य बैठाने के लिए आवश्यक शक्ति की अनुभूति हेतु भक्ति अत्यन्त अनिवार्य  है भक्ति की विलक्षणता अवर्णनीय है l भक्ति में शक्ति है l यह संकट में भी सहायक है l

हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसके रहस्य को  भौतिक दृष्टि से जानना अत्यन्त दुष्कर है l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी भैया पवन जी भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी का उल्लेख क्यों किया Geyser की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

26.12.25

प्रस्तुत है *भयकारक धुंधलके की धमक के रूप में विख्यात आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 26 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६११ वां* सार -संक्षेप

 धुंध छाया है अभी यह भी छटेगा 

जगत है शुभ अशुभ सब इसमें घटेगा

धैर्य-धन को साथ ले बढ़ते रहो 

जो कसाला आ गया वह भी कटेगा ॥


प्रस्तुत है *भयकारक धुंधलके की धमक के रूप में विख्यात आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 26 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६११ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९३

संयम श्रद्धा और साधना का मूल मन्त्र अपने भीतर रखकर अपने भारत राष्ट्र को परम वैभव सम्पन्न करने हेतु छोटे छोटे प्रयास करते रहें


हमें यह अनुभूति करनी चाहिए कि यह हमारा शरीर केवल पंचमहाभूतों से निर्मित एक तुच्छ भौतिक संरचना नहीं है, अपितु इसमें ईश्वरप्रदत्त एक विशिष्ट दिव्य ऊर्जा भी विद्यमान है। हमें इस सत्य का बोध होना चाहिए कि हमारा वास्तविक स्वरूप यह नश्वर शरीर नहीं है, वरन् वह चेतन तत्त्व है जो अजन्मा, अविनाशी, अमर और अनन्त है। यह आत्मबोध ही जीवन का सार है, जो हमें मृत्यु के भय से मुक्त कर आत्मशक्ति और दिव्यता की अनुभूति कराता है। मैं उस अंशी का अंश हूं यह आत्मबोध अद्भुत और दिव्य है जिससे हममें से वो प्रत्येक व्यक्ति संयुक्त रहता है जिसे भारतीय मनीषा का वरदान प्राप्त है


मैं मरणधर्मा जगत का जागरण हूं

और संसारी जलधि का संतरण हूं..


इसके अतिरिक्त भैया डा अमित जी के किस संदेश की आचार्य जी ने चर्चा की भैया डा पंकज जी क्या संकलित करते हैं बचपन में कवि दिनकर की भूमिका कौन करते थे?

 जानने के लिए सुनें

25.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 25 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६१० वां* सार -संक्षेप

 धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः सः पन्थाः ।।१७।।


वास्तव में धर्म का मर्म तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है । ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसे *अपने आचार्य जी* जिस मार्ग को अपनाते हैं वही अनुकरणीय है


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 25 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६१० वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९२

संसार के साथ सार के महत्त्व को समझते हुए

सद्विचारों को संकलित करें और प्रसरित करें


मनुष्य को यह दुर्लभ शरीर केवल भोग के लिए नहीं, अपितु श्रेष्ठ कर्मों के संपादन हेतु प्राप्त हुआ है। जीवन का मूल धर्म भी कर्म है, और वही धर्म, सच्चे अर्थों में, जीवन का धन है। यदि इस धन को हम प्रातःकाल अपने विचारों में जाग्रत और सन्नद्ध करें, तो यह मानसिक दिशा पूरे दिन हमारे आचरण को प्रभावित करेगी परिणामस्वरूप, चाहे दिनभर में कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न आएं, समाधान की ओर उन्मुखता बनी ही रहेगी  ब्रह्मवेला ब्राह्मी भाव को प्रस्तुत करने में सक्षम रहती है अतः उस वेला का हमें अवश्य लाभ उठाना चाहिए

अन्यथा

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।


सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।....

 


 विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

किन्तु वशीभूत अन्तःकरण वाला कर्मयोगी साधक रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होने पर साधक के सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्त वाले साधक की बुद्धि निःसन्देह अत्यन्त शीघ्रता से परमात्मा में 

स्थित हो जाती है  अनेक महापुरुषों  ने सनातन संस्कृति और उसके आदर्शों की रक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। उनके त्याग, तपस्या और बलिदान के कारण ही आज भी यह धर्म जीवित है, प्रज्वलित है और हमें सत्कर्म, समर्पण व आत्मबोध की प्रेरणा देता है।


इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम भी अपने आचरण, विचार और कर्मों द्वारा इस सनातन परम्परा की गरिमा बनाए रखें और इसे आने वाली पीढ़ियों तक अक्षुण्ण रूप में पहुंचाएं। अंग्रेजों ने जो व्यामोह उत्पन्न किया उससे बचें l



इसके अतिरिक्त आदर्श यथार्थ कैसे होता है भैया मनीष कृष्णा जी, डा सुनील जी का उल्लेख क्यों हुआ, विवेकानन्द महादेवी वर्मा आदि मोक्ष क्यों नहीं चाहते थे जानने के लिए सुनें

24.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 24 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०९ वां* सार -संक्षेप म

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 24 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०९ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९१

जो अनुचित, अहितकारी और पतनकारक है, हमें उसका परित्याग कर देना चाहिए और जो उचित, हितकारी तथा उत्थानकारक है, उससे स्वयं को युक्त करना चाहिए  यही सदाचार है।


भारत की संस्कृति कोई एक विचार या भावना पर आधारित नहीं है, यह अनेक दिव्य भावों और आध्यात्मिक अनुभूतियों का समन्वित स्वरूप है।  

भारत मां का भाव हमारी मातृभूमि के प्रति सम्मान, श्रद्धा और समर्पण की भावना को व्यक्त करता है। यह भूमि मात्र भौगोलिक क्षेत्र नहीं, अपितु एक चेतन शक्ति मानी गई है, जिसकी रक्षा, सेवा और आराधना करना हम जैसे प्रत्येक नागरिक का धर्म है।ईश्वर का भाव हमें जीवन में आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है। शिव, राम और कृष्ण इन तीनों के भाव भारतीय मानस में आदर्श चरित्र और जीवन-पथ के प्रेरणा-स्रोत हैं।  

गायत्री, सावित्री, काली, सरस्वती और दुर्गा के भाव हैं इन सभी भावों के समावेश से जो जीवन-दृष्टि विकसित हुई, वही भारतीय संस्कृति का आधार बनी जो कहती है

जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक।

 इस भाव और भक्ति के साथ भारतवर्ष का साहित्य प्रसारित हुआ

और इसी भाव और भक्ति के साथ विद्या के जो आलय प्रारम्भ हुए वे अजर और अमर हैं ऐसा ही एक विद्यालय हमारा है पं दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय जिसका प्रारम्भ १८ जुलाई १९७० को  धनार्जन की वृत्ति के कारण से नहीं हुआ  अपितु शिक्षा के साथ मातृभूमि के प्रति परमपिता परमेश्वर के प्रति समाज के प्रति प्रेम और श्रद्धा को पल्लवित करने के लिए भी हुआ


जहाँ भाव, भक्ति, विश्वास और संकल्प उपस्थित हों, वहाँ जीवन का उद्देश्य उच्च होता है और इस कारण हमारे आचरण को मर्यादित होने की आवश्यकता है। उत्तम विचारों के अनुरूप आचरण करना अनिवार्य हो जाता है जब व्यक्ति भाव और भक्ति से युक्त होता है, तब वह केवल अपने लिए नहीं, अपितु समाज और सृष्टि के हित में सोचता है और ऐसे व्यक्ति को व्यसनों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि व्यसन (जैसे – क्रोध, लोभ, मद्यपान,द्यूत आदि) मन की स्थिरता को नष्ट कर देते हैं और आत्मिक बल को क्षीण कर देते हैं।



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया विनय अजमानी जी की विशेष चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें

23.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 23 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०८ वां* सार -संक्षेप

 (किं भूषणाद्भूषणमस्ति शीलं

तीर्थं परं किं स्वमनो विशुद्धम् ।

किमत्र हेयं कनकं च कान्ता)

श्राव्यं सदा किं गुरुवेदवाक्यम् ॥ ८॥


प्रश्न :- सदा(मन लगाकर) सुनने योग्य क्या है ?


उत्तर:- वेद और गुरु का वचन |


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 23 दिसंबर 2025 का  *गुरु- वचन*

  *१६०८ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ९०

पुरुषार्थ करें समाजोन्मुखता पर ध्यान दें


यद्यपि दशरथ  एक पराक्रमी, धीर और तपस्वी राजा थे, फिर भी वे उस स्तर की यशस्विता को नहीं प्राप्त कर सके जो भगवान् राम को प्राप्त हुई। इसका कारण यह था कि दशरथ की दृष्टि सीमित थी  वे रावण की विनाशकारी शक्ति के प्रभाव को नहीं पहचान सके, जो संपूर्ण देश को धीरे-धीरे क्षति पहुँचा रही थी। उनका शासन अयोध्या तक ही केंद्रित रहा, जबकि भगवान् राम ने नर-लीला करते हुए पूरे देश और जनमानस की चेतना को स्पर्श किया। उन्होंने रावण के विनाश के माध्यम से केवल लंका ही नहीं जीती, बल्कि अधर्म, अत्याचार और भय के वातावरण को समाप्त कर भारत को धर्म, नीति और न्याय का आधार दिया। इसीलिए उनका अद्भुत रामत्व कालजयी, लोकप्रेमी और सर्वस्वीकार्य बन गया।


हमें भी अपने मनुष्यत्व का बोध होना चाहिए। मनुष्य का शरीर केवल देह नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, प्राण और आत्मा का सम्यक् सामञ्जस्य है। हमारे भीतर परोपकार की भावना विद्यमान होनी चाहिए। यही मनुष्य जीवन की गरिमा और कर्तव्य है।


आचार्य जी ने मणिरत्नमाला की चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि यह संसार एक गहन और भयानक समुद्र के समान है, जिसमें डूबते हुए प्राणियों के लिए विश्वपति परमात्मा के चरणकमल ही एकमात्र सुरक्षित आश्रय रूपी जहाज हैं। 

जो व्यक्ति विषय-वासनाओं में आसक्त है, वह वास्तव में बंधनों से जकड़ा हुआ है। यह मनुष्य-शरीर यदि विकारों और तृष्णाओं में डूबा रहे, तो वह नरक के समान है। परंतु जब तृष्णा का नाश होता है, तभी जीवन में स्वर्गतुल्य स्थिति प्राप्त होती है। 


जो मनुष्य पुरुषार्थहीन है, वह यद्यपि जीवित है, फिर भी वह मृतक के समान है। इसलिए विवेक, भक्ति और पुरुषार्थ से युक्त जीवन ही सत्य अर्थों में सार्थक है।

किसने कहा हमारे दुःख कभी दूर न करना भैया पंकज जी को क्या अच्छा लगा भैया वीरेन्द्र जी ने आचार्य जी को कल क्या प्रदान किया जानने के लिए सुनें

22.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 22 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०७ वां* सार -संक्षेप

 राम-नाम छाँड़ि जो भरोसो करै और रे ।


तुलसी परोसो त्यागि माँगे कूर कौर रे ॥५॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 22 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०७ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८९


आदित्य हृदय स्तोत्र जो भगवान् सूर्य की स्तुति है,  और जो श्रीराम को रावण से युद्ध में विजय दिलाने के लिए ऋषि अगस्त्य द्वारा बताया गया था का पाठ करें; यह स्तोत्र सूर्य देव के अनेक नामों (जैसे ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तेज, नक्षत्रों के स्वामी) का स्मरण करते हुए उनकी कृपा मांगता है, जिससे सभी विघ्न दूर होते हैं, संकट कटते हैं और जीवन में विजय प्राप्त होती है, साथ ही स्वास्थ्य अच्छा रहता है



तुलसीदास जी, जो ऋषितुल्य कवि माने जाते हैं, उन्होंने श्री रामचरितमानस के माध्यम से संसार (माया, व्यावहारिक जीवन) और सार (परमार्थ, ईश्वरतत्त्व) को अत्यंत सुंदर ढंग से संयुत किया है कलियुग में  जिसमें धर्म का क्षय और अधर्म की प्रवृत्तियाँ प्रबल हैं केवल राम का नाम जप ही जीवन का आधार है।


राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे ।


घोर-भव नीर-निधि नाम निज नाव रे ॥१॥


एक ही साधन सब रिद्धि सिद्धि साधि रे ।


ग्रसे कलि रोग जोग संजम समाधि रे ॥२॥


 यह नाम न केवल आत्मा को शुद्ध करता है, बल्कि संसार रूपी भवसागर से पार उतारने का भी सामर्थ्य रखता है। जो व्यक्ति श्रद्धा से इसका जप करता है, वह अपने जीवन में मानसिक शांति, आंतरिक शक्ति और परमात्मा से एक विशेष संबंध की अनुभूति करता है

भगवान् राम का जप हम भावपूर्ण ढंग से करेंगे तो हमारा कल्याण होगा

 रामचरितमानस से हमें यह शिक्षा प्राप्त होती है कि हम संसार में जहां की समस्याओं से हम जूझते रहते हुए भी राम नाम के सहारे, समाजोन्मुख  होते हुए जीवन को सारयुक्त बना सकते हैं।  इसमें लेशमात्र भी भ्रम नहीं है कि समाज की समस्याओं को हल करना अत्यन्त आवाश्यक है अन्यथा हमारा जीवन ही संकट में  पड़ जाएगा यही तुलसीदास जी की भक्ति और दर्शन का सार है।


भैया दिनेश जी भैया मनीष कृष्णा जी भैया विनय अग्रवाल जी भैया अजय अग्रवाल जी का उल्लेख क्यों हुआ, बूजी ने क्या बदला था,  कुमार विश्वास की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

21.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा /द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 21 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०६ वां* सार -संक्षेप

 शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।


ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।18.42।।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा /द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 21 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०६ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८८

चूंकि कर्म ही धर्म है अतः अपने कर्म को सुचारु रूप से करें उदाहरणार्थ अपने राष्ट्र भारत को परम वैभव पर पहुंचाना हमारा कर्म है (  शिक्षक धर्म का निर्वाह करते हुए आचार्य जी नित्य हमें प्रेरित करने के लिए यह सदाचार संप्रेषण रूपी कर्म कर रहे हैं )


गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान।

 जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान ॥६॥


बाह्य वैभव और भौतिक सुख-सुविधाएं अंततः क्षणिक और अस्थायी हैं। जीवन की सच्ची संपत्ति संतोष है, जो न केवल मन की शांति देता है, बल्कि आत्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। अतः संतोष ही ऐसा धन है, जो सभी प्रकार की संपत्तियों से श्रेष्ठ और स्थायी है।इसी प्रकार आशा और विश्वास  भी अत्यन्त गहन और मूलभूत तत्व हैं, ये सब मानव जीवन को दिशा और दृढ़ता प्रदान करते हैं। ये केवल मानसिक अवस्थाएँ नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर से उत्पन्न होने वाले ऐसे प्रेरक तत्त्व हैं, जो मनुष्य को निराशा, भय, संशय और कठिन परिस्थितियों से उबारते है l यदि हम इन्हें अपने जीवन का केन्द्र बनाकर उनका ध्यान करें, तो हमारा चित्त शुद्ध और ईश्वर की ओर उन्मुख होता है। जब मन ईश्वर की ओर उन्मुख होता है, तब हम अपने जीवन के उद्देश्य को समझने लगते हैं। यह उद्देश्य कोई साधारण कर्म नहीं, बल्कि वही कार्य है जिसके लिए स्वयं ईश्वर ने हमें इस संसार में भेजा है अर्थात् हमारा धर्म, हमारा कर्तव्य, और हमारा जीवन-मूल्य।


यदि हम आशा और विश्वास के साथ उस कार्य को पूरे मन, शक्ति और निष्ठा से करते हैं, तो हमारा आत्मिक विकास होता है lजहाँ कार्य करना विवशता बन जाता है, वहाँ जीवन भी बोझस्वरूप प्रतीत होने लगता है।


स्वयं हम ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र सब कैसे हैं इसे आचार्य जी ने स्पष्ट किया 

इसके अतिरिक्त भैया डा अमित जी भैया डा अजय कटियार जी चर्चा में कैसे आये भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी कल क्यों चिन्तित हुए  पश्चिम का जीवन खंड खंड कैसे है जानने के लिए सुनें

20.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 20 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०५ वां* सार -संक्षेप

 राम कहत चलु , राम कहत चलु , राम कहत चलु भाई रे ।


नाहिं तौ भव - बेगारि महँ परिहै , छुटत अति कठिनाई रे ॥१॥


बाँस पुरान साज सब अठकठ , सरल तिकोन खटोला रे ।


हमहिं दिहल करि कुटिल करमचँद मंद मोल बिनु डोला रे ॥२॥


बिषम कहार मार - मद - माते चलहिं न पाउँ बटोरा रे ।


मंद बिलंद अभेरा दलकन पाइय दुख झकझोरा रे ॥३॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 20 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०५ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८७

हम अपने चिन्तन मनन विचार आदि का सामञ्जस्य करें और अन्य जो ऐसा करें उनके साथ संगठित होएं जिससे शक्ति वृद्धिंगत हो सके


भारतवर्ष एक विलक्षण और दिव्य राष्ट्र है, जिसकी प्रकृति अत्यन्त अद्भुत है। इसके इतिहास में समय-समय पर उत्थान और पतन की घटनाएँ घटित होती रही हैं, जो इसकी जीवंतता और गतिशीलता के प्रमाण हैं। परन्तु जो लोग केवल बाह्य दृष्टि से इसे देखते हैं, वे इसके क्षणिक पतन से व्याकुल हो उठते हैं। इसका कारण यही है कि वे भारत की आत्मा, इसके गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप को नहीं पहचानते।


यदि भारतवर्ष की केवल भौतिक रचना को देखा जाए, तो कभी-कभी यह दुर्बल और संकटग्रस्त प्रतीत हो सकता है। किन्तु जब इसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि भारत की आत्मा सदैव जाग्रत है। ऐसा प्रतीत होता है कि जब सब कुछ बुझने को होता है, उसी क्षण भीतर की तेजस्विनी ज्योति पुनः प्रज्वलित हो उठती है। यही भारत की सनातन चेतना है, जो इसे युगों-युगों तक अक्षुण्ण रखती है।


इसलिए हमारे लिए आवश्यक है कि हम भारत को उसकी मूल आत्मा के साथ समझें। केवल संकट देखकर हताश न हों, अपितु भारत की गहराई और सामर्थ्य में विश्वास रखते हुए, अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखें। यही जागरूकता और आशा का भाव हमें भारत के निर्माण में सहभागी बनाएगा।


परम विद्वान् भक्त विचारक चिन्तक समाजसेवक तपस्वी गोस्वामी तुलसीदास जिनसे उस समय की सत्ता भी भयभीत रहती थी भारत के निर्माण में सहभागी बने वे राम के रामत्व में रमने वाले उनके शक्ति-तत्त्व को पहचानने वाले एक अद्भुत भक्त बन गये

 ऐसे भक्त और भगवान् के सामञ्जस्य को समझना अत्यन्त कठिन है 


सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥



इसके अतिरिक्त टेढ़ी खीर का प्रचलन कैसे हुआ बेगार क्या है जानने के लिए सुनें

19.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 19 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 19 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०४ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८६

 जब भी प्रेरणा प्राप्त करने की आवश्यकता आपको लगे तो आचार्य जी से उचित समय देखकर  संपर्क करें

मो नं ९९३५३६८३५३


हमने अपना उद्देश्य निर्धारित किया है *राष्ट्र-निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष*

 इसका तात्पर्य है कि हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व राष्ट्र के प्रति समर्पित हो, और वह ऐसा हो जो समाज के लिए उपयोगी, प्रेरणादायी और मार्गदर्शक बने।


इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हमारा चिन्तन, मनन, विचार तथा विश्वास सभी राष्ट्र की सेवा और उत्थान में लगें। यह समर्पण केवल भावनात्मक न होकर व्यवहारिक एवं कर्मप्रधान होना चाहिए। जब हम सत्कर्म  करेंगे — जैसे सेवा, सहयोग आदि कार्य — तो समाज हमें पहचानेगा


 और सत्कर्मों के लिए भाव जाग्रत होगा संत समागम आदि द्वारा 


गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।

बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥125 ख॥


हे गिरिजे! संत समागम के समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह संत समागम श्री हरि की कृपा के बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं॥125 (ख)॥




मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥

तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥2॥

श्रीरामचरित मानस की फलश्रुति का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं

जो कान और मन लगाकर इस कथा को सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म (शरीर) से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं

ऐसी अद्भुत है रामकथा 

इसी में एक प्रसंग है 


पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥

कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥2॥


पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी (अँगुली से) उतारी। कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। 


केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए


उसने कहा- हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी॥


ऐसी अद्भुत है रामकथा जिसका नित्य पाठ करने से जिसे आत्मसात् करने से समाज का कलुष दूर हो सकता है जाति भेद समाप्त हो सकता है 

इस कथा में भगवान् राम का जो रामत्व प्रदर्शित किया गया है वह अप्रतिम है 


राम का रामत्व एक उच्चतम आदर्श का प्रतीक है। यह एक ऐसा दिव्य गुण-संपन्न स्वरूप है, जिसमें मर्यादा, करुणा, शौर्य, धर्म, नीति, दया, त्याग, भक्ति, कर्तव्यनिष्ठा एक साथ समाहित हैं।


 इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने किसे परमेश्वर स्वरूप कहा जानने के लिए सुनें

18.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०३ वां* सार -संक्षेप

 सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 18 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०३ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८५


संसार का समुचित संचालन कर्म पर ही आधारित है—हर प्राणी, हर व्यवस्था कर्म से जुड़ी हुई है। यदि हम मनुष्य अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाए, तो जीवन का संतुलन ही बिगड़ जाएगा। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने धर्मानुसार कर्म करें, जिससे न केवल हमारा जीवन सार्थक बने, बल्कि समाज और संसार भी सही मार्ग पर अग्रसर हों।



गरुड जी की शंका (  प्रसंग :भगवान् राम का नागपाश में बंधना )का समाधान करते हुए कागभुषुण्डि जी कहते हैं कि

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥1॥


वह ब्रह्म मैं हूँ यह जो अखंड  वृत्ति है, वही उस ज्ञानदीपक की परम प्रचंड दीपशिखा  है।इस प्रकार जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है


तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस।

हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥118 क॥


इस प्रकार ज्ञान दीपक के बुझ जाने पर तब फिर जीव अनेक प्रकार से जन्म-मरण आदि के क्लेश पाता है। हे पक्षीराज! हरि की माया अत्यंत दुस्तर है, वह सहज ही में तरी नहीं जा सकती

ज्ञान का मार्ग कृपाण की धार के समान है। हे पक्षीराज! इस मार्ग से गिरते देर नहीं लगती। जो इस मार्ग को निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परमपद को प्राप्त करता है


संत, पुराण, वेद आदि यह कहते हैं कि कैवल्य रूप परमपद अत्यंत दुर्लभ है, किंतु हे गोसाईं! वही (अत्यंत दुर्लभ) मुक्ति श्री राम जी को भजने से बिना इच्छा किए भी आ जाती है


 जिन राम के कार्य और व्यवहार को देखकर आप आशंकित हो गये थे उन्हीं के पद पंकज भजिए क्योंकि वो परम पिता परमेश्वर हैं और नर लीला इस कारण उन्होंने की क्योंकि उनको सृष्टि का कल्याण करना था

भक्ति की शक्ति अद्भुत है वह जीवन के कष्टों को सहने का अंतर्बल, कर्म करते हुए स्थिरता और परमात्मा से एकत्व की अनुभूति देती है।

मानसिक वेदनाओं को दूर करती है

इसके अतिरिक्त किसकी गले की शल्य चिकित्सा हुई भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी का उल्लेख क्यों हुआ संगठन क्यों टूटता है जानने के लिए सुनें

17.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०२ वां* सार -संक्षेप

 बनते मिटते भूगोल सदा इतिहास बनाया करते हैं 

पौरुष रण करते -करते भी मधुमास मनाया करते हैं


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 17 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०२ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८४


(करु बहियां बल आपनी, छोड़ बिरानी आस।

जाके आंगन नदिया बहै, सो कस मरै पियास।।)


(कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को अपनी शक्ति पर भरोसा रखना चाहिए, न कि दूसरों की आशा में बैठना चाहिए। जिस व्यक्ति के आँगन में स्वयं नदी बहती हो, वह यदि प्यासा मर जाए तो यह उसकी मूर्खता है। इसका तात्पर्य है  जिसके पास स्वयं साधन-संपत्ति, ज्ञान या अवसर हों, वह यदि फिर भी अभाव की बात करे, तो वह अपने पुरुषार्थ का उपयोग नहीं कर रहा। अतः) हम अपने पुरुषार्थ का उपयोग करें अपने मनुष्यत्व की अनुभूति करें


हमारी संस्कृति, साहित्य, विचार और चिन्तन इस सृष्टि में अद्वितीय एवं श्रेष्ठ हैं। किंतु यह वैभव आज अस्त-व्यस्त प्रतीत होता है, क्योंकि हमने अध्यात्म को केवल एक पक्ष त्याग, तप और वैराग्य  तक सीमित कर दिया, उसे एकांगी रूप में ग्रहण किया। इस एकांगिता के कारण जीवन का संतुलन बिगड़ा और समाज में निष्क्रियता बढ़ी। इन सदाचार वेलाओं, जो हमारे कल्याण का एक उपक्रम हैं, का मूल उद्देश्य इसी एकांगिता को समाप्त करना है। ये हमें  नित्य स्मरण कराती हैं कि अध्यात्म केवल ध्यान और त्याग का नाम नहीं, बल्कि उसमें शौर्य, शक्ति, कर्म और पराक्रम भी समाहित होने चाहिए। जब अध्यात्म शौर्य से प्रमंडित होता है, तभी वह समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनता है।


इसलिए आज आवश्यकता है एक ऐसे संपूर्ण अध्यात्म की, जो अंतर्मुखी साधना के साथ-साथ बहिर्मुखी सेवा, संघर्ष और रक्षण के गुणों को भी आत्मसात् करे। यही पूर्ण सनातन दृष्टिकोण है।

भगवान् राम ने मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर न केवल संयमित जीवन जिया, बल्कि अन्याय और अधर्म के विरुद्ध युद्ध कर राक्षसों का संहार भी किया।उन्होंने यह दिखाया कि अध्यात्म का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ जीवन और साहसपूर्ण कर्म है।

भगवान् कृष्ण ने युद्धभूमि में गीता का उपदेश देकर अर्जुन को मोह से मुक्त किया और यह बताया कि जब धर्म की हानि हो, तो केवल साधना नहीं, शस्त्र भी उठाना आवश्यक होता है।

आचार्य जी ने स्वरचित "गोमुख से पूछ रही गंगा" कविता सुनाई

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने संसार की तुलना गणित के प्रश्न से कैसे की गीता के किन छंदों का आज उल्लेख किया भैया मनीष कृष्णा जी किसमें जुटे हैं भैया संतोष मल्ल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

16.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०१ वां* सार -संक्षेप

 अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्‌ विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्‌।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम‍उक्तिं विधेम ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 16 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०१ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८३

अध्यात्म के अधिकारी होने के लिए  ताकि समाज में प्रशंसा के पात्र बनें और कालान्तर में वन्दित भी हो सकें अपने शरीर को साधें उचित खानपान पर ध्यान दें  आचरण विनम्र होना भी अनिवार्य है



अध्यात्म तब ही प्रभावी होता है जब उसमें शौर्य का संग हो। बिना शौर्य के अध्यात्म निष्क्रिय और केवल आत्मकेन्द्रित हो सकता है, जबकि शौर्ययुक्त अध्यात्म समाजोन्मुखी और राष्ट्रोपयोगी होता है। अतः अध्यात्म को सशक्त और सक्रिय बनाने के लिए शौर्य की अनिवार्यता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शौर्य में शक्ति सामर्थ्य पराक्रम और उपाय आदि बहुत कुछ समाहित है


मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है। समय रहते ईश्वर भजन, सत्कर्म और विनम्र आचरण ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। अहंकार, धन-संपत्ति और दिखावे अंततः व्यर्थ सिद्ध होते हैं।


मन पछितैहै अवसर बीते।

दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥१॥

सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते।

हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥२॥


जब समय बीत जाएगा तब मन पछताएगा, इसलिए समय रहते इस दुर्लभ मनुष्य शरीर को पाकर भगवान् के चरणों का स्मरण, कर्म, वाणी और मन से करना चाहिए।सहस्रबाहु, रावण जैसे बलशाली राजा भी काल के प्रभाव से नहीं बच सके। जिन्होंने 'मैं-मैं' करके बहुत धन-संपत्ति और वैभव जुटाया, वे अंत में सब यहीं छोड़कर खाली हाथ ही चले गए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने महानाटक किसे कहा भैया नीरज जी का उल्लेख क्यों हुआ सृष्टि कैसे चल रही है  एक विशाल यज्ञ कहां और कब करने की योजना है जानने के लिए सुनें

15.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 15 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१६०० वां* सार

 निर्बल बकरों से बाघ लड़े

भिड़ गये सिंह मृग छौनों से

घोड़े गिर पड़े, गिरे हाथी

पैदल बिछ गये बिछौनों से...

हय रुण्ड गिरे, गज मुण्ड गिरे

कट कट अवनी पर शुण्ड गिरे

लड़ते लड़ते अरि झुण्ड गिरे

भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 15 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१६०० वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८२

लेखन-योग अपनाएं ताकि  जब निराश हताश हों  तो आशा की किरण दिखे


उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।


आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।


मनुष्य का उत्थान  जो मनुष्यत्व की पहचान है या पतन स्वयं उसके अपने हाथ में है। आत्म-संयम, आत्मचिंतन और आत्मबल के द्वारा वह महान् बन सकता है, अन्यथा वह स्वयं को नीचे गिरा सकता है। यही आत्मदर्शन का गूढ़ संदेश है। तो आइये अपने उत्थान के लिए, आत्म -बल आदि प्राप्त करने के लिए  और संसार में रहते हुए विचारों को सुरक्षित संवर्धित  और संप्रेषित करने की विधि जानने के लिए प्रवेश करें आज की वेला में



मनुष्य का संकल्प यदि अडिग हो, तो कोई भी कठिनाई उसे अपने लक्ष्य से विमुख नहीं कर सकती।शारीरिक बाधाएं भी मन की दृढ़ता के सामने पराजित हो जाती हैं।जैसे 

भारत की पूर्व वॉलीबॉल खिलाड़ी *अरुणिमा सिन्हा* को २०११ में ट्रेन से फेंक दिया गया था, जिससे उनका एक पैर कट गया। किंतु उन्होंने हार नहीं मानी। कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने २०१३ में माउंट एवरेस्ट फतह कर, ऐसा करने वाली विश्व की पहली दिव्यांग महिला बनने का गौरव प्राप्त किया।

 परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, यदि आत्मबल और उद्देश्य स्पष्ट हो तो असंभव को भी संभव किया जा सकता है हमारा जीवन संघर्ष, आत्मविश्वास और जिजीविषा का अद्भुत उदाहरण बन सकता है


अलमस्त फ़कीर कभी करते परवाह नहीं

काँटों जैसी ही फूलों की भी चाह नहीं

उत्साह उमंगों के आगे नग बौने हैं

सिंहों से आँख मिलाते मृग के छौने हैं

बस इसीलिए दुनिया की दुनियादारी से

जूझता रहा, टूटा भी, मगर निराश नहीं ॥ ५ ॥

यह विश्वास करें कि परमात्मा हमारे भीतर विद्यमान है वह परमात्मा हमारे लिए सब कुछ है 

इसके अतिरिक्त युगभारती की प्राणिक ऊर्जा क्या है भैया संजय गौड़ जी का उल्लेख क्यों हुआ, कलियुग की रक्षा के लिए किसे कार्यभार सौंपा गया जानने के लिए सुनें

14.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 14 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५९९ वां* सार -संक्षेप

 अहर्निशं किं परिचिन्तनीयं

संसार मिथ्यात्वशिवात्म तत्त्वम् ।


प्रश्न :- रात-दिन विशेष रूप से क्या चिन्तन करना चाहिए ?


उत्तर:-संसार का मिथ्यापन और कल्याणरूप परमात्मा का तत्त्व  |


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 14 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५९९ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८१

हमें कर्तव्य करते हुए भी भीतर से शांत और आनंदमय रहना चाहिए


श्री शंकराचार्य जी की  प्रश्नोत्तर-मणिमाला बहुत ही उपादेय पुस्तिका है  | इसके प्रत्येक प्रश्न और उत्तर पर  मनन पूर्वक विचार करना आवश्यक है | संसार में स्त्री, धन और पुत्रादि पदार्थों के कारण ही मनुष्य विशेष रूप से बन्धन में रहता है, इन पदार्थों से वैराग्य होने में ही कल्याण है l

अपार संसार समुद्र मध्ये

निमज्जतो मे शरणं किमस्ति ।

गुरो कृपालो कृपया वदैत-

द्विश्वेश पादाम्बुज दीर्घ नौका ॥ १॥


प्रश्न :- हे दयामय गुरुदेव ! कृपा करके यह बताइये कि अपार संसाररूपी समुद्र में मुझ डूबते हुए का आश्रय क्या है ?


उत्तर :- विश्वपति परमात्मा के चरणकमलरूपी जहाज |




बद्धो हि को यो विषयानुरागी

को वा विमुक्तो विषये विरक्तः ।

को वाऽस्ति घोरो नरकः स्वदेह-

स्तृष्णाक्षयः स्वर्ग पदं किमस्ति ॥ २॥


प्रश्न :- वास्तव में बँधा कौन है  ?


उत्तर:- जो विषयों में आसक्त है |


प्रश्न :- विमुक्ति क्या है?


उत्तर:- विषयों से वैराग्य |


प्रश्न :- घोर नरक क्या है ?


उत्तर:- अपना शरीर |


प्रश्न :- स्वर्ग का पद क्या है ?


उत्तर:- तृष्णा का नाश होना |


यह संसार संबंधों का एक जटिल तानाबाना है। इन संबंधों में निकटता और दूरियाँ, मेल-मिलाप और मतभेद आते रहते हैं। मनुष्य जीवन में सम्बन्ध स्वाभाविक रूप से बनते हैं, परंतु उन्हें निभाना और सुरक्षित रखना ही सच्ची बुद्धिमत्ता और संवेदनशीलता है।संबन्धों की मधुरता को बनाए रखने के लिए विश्वास, त्याग, सहनशीलता और संवाद आवश्यक है। यदि हम इन्हें संभालकर न रखें, तो जीवन में अकेलापन, कटुता और विघटन आ सकता है। अतः हमें चाहिए कि अपने संबंधों को स्नेह, श्रद्धा और आत्मीयता से सींचते रहें, तभी हमारा जीवन संतुलित और सुखद बन सकता है।


संसार एक ऐसा मंच है जहाँ समस्याएँ भी हैं और उनके समाधान भी। यह कष्ट भी देता है और साथ ही आनंद भी प्रदान करता है।यदि हम संसार में पूरी तरह लिप्त हो जाते हैं, उसमें डूब जाते हैं, तो हम निरंतर दुख, आशा-निराशा और व्यग्रता में फँसे रहते हैं। परन्तु यदि हम संसार से अलिप्त रहते हुए उसमें अपने कर्तव्य निभाते हैं तो हमारे भीतर  निरन्तर आनंद रहता हैl

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अपनी रचित एक कविता सुनाई 


आज मेरा मन व्यथित है 

चाहता कहना मगर लगता कि पहले से कथित है...

इसके अतिरिक्त आचार्य जी की भैया मनीष कृष्णा जी से क्या अपेक्षा है आचार्य श्री चन्द्रपाल सिंह जी आचार्य श्री शेंडे जी आचार्य श्री प्रयाग जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

13.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 13 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५९८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 13 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५९८ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ८०

अपने भीतर के गुरुत्व को जगाएं


पुरुषार्थ की पहचान बने नित्य उद्बोधन रूपी सुकरातीत कार्य में रत आचार्य जी हमें प्रेरित करते हैं यह हमारा सौभाग्य है इस आधार पर भी हम कह सकते हैं कि कलियुग में भी सतयुग निवास कर रहा है हमें इसका लाभ उठाना चाहिए


 विषम से विषम परिस्थितियों में भी यदि हमारा भाव सुस्पष्ट रहे कि मेरा वास्तविक स्वरूप ईश्वर से अलग नहीं, मैं उसी का अंश या प्रतिबिंब हूं(सोऽहम् ) तो शरीर, मन,बुद्धि, विचार,निराश हताश करने वाली परिस्थितियां, झंझट शमित हो जाते हैं हमें प्रकाश प्राप्त होता है और उसी प्रकाश से हमें आनन्द की अनुभूति होती है हम विभिन्न प्रकार के संकट झेल लेते हैं और तब हम कर्मानुरागी बनने की दिशा में चल सकते हैं

श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥3॥


निम्नांकित कविता में आचार्य जी युगभारती संस्था को एक दिव्य, जाग्रत और रक्षक शक्ति के रूप में चित्रित कर रहे हैं जो वर्तमान सामाजिक, मानसिक और नैतिक अव्यवस्था के समय में आशा की किरण है। आज का समाज विश्वासहीनता, भय और निष्क्रियता से ग्रस्त है।राष्ट्र की भावनाओं में अभावों का बोलबाला है यह संस्था ईश्वरीय योजना का अंग है जो भौतिकता में उलझे शिक्षा-जगत को दिशा दे रही है।


विश्वास आँखें खोल-मूँद रहा विवश, 

भावाग्नि भय से ग्रस्त कोने में खड़ी ।

पौरुष पराक्रम गहन निद्राग्रस्त है, 

कर्मानुरागी वृत्ति शर्तों पर अड़ी ॥

    इस हाल में सद्धर्म वर्म भ्रमित चकित,

    अपनत्व-चौखट की सभी चूलें हिलीं। 

     भारतीभावों में अभावों का चलन, 

      लुच्चों लफंगों सभी की बाछें खिलीं ॥


ऐसे समय युगभारती माँ भारती की टेर है, 

है देर ईश्वर के यहाँ बिल्कुल नहीं अंधेर है।

युगभारती कर्मानुरागी शक्ति का विस्तार है, 

अध्यात्म के शौर्याग्नि मंडित सत्य का संसार है ॥...


युगभारती हनुमान जी महाराज का वरदान है, 

भौतिक भँवर में जूझते शिक्षा-जगत का त्राण है

इसके अतिरिक्त Power House से आचार्य जी का क्या तात्पर्य है जानने के लिए सुनें

12.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५९७ वां* सार -संक्षेप

 संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।

होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥ 45॥


हे प्रभो! संत लोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनि भी यही बतलाते हैं कि गुरु के साथ छिपाव करने से हृदय में निर्मल ज्ञान नहीं होता॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 12 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५९७ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७९


अपनी भावी पीढ़ी में अपने  सांस्कृतिक रत्नों, जैसे कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत एवं अन्य ग्रंथों के प्रति श्रद्धा एवं रुचि जाग्रत करने का हम प्रयास करते रहें


भाव -जगत का विस्तार अद्भुत है इन वेलाओं के माध्यम से हमें अपने भाव-जगत में प्रवेश करने का सतत प्रयास करना चाहिए, जिससे हम अपने सनातन धर्म की विशेषताओं को भली-भाँति जान सकें यह आत्मचिंतन हमें अनेक प्रकार के भ्रमों से मुक्त करता है और हमारे भीतर अपने ही सांस्कृतिक रत्नों, जैसे कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत एवं अन्य ग्रंथों के प्रति श्रद्धा एवं रुचि जाग्रत करता है।  


इस भावभूमि पर स्थित होकर हम चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, लेखन एवं आत्मविकास की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। यही प्रवृत्ति हमें अपने वास्तविक स्वरूप की ओर उन्मुख करती है और धर्म, ज्ञान तथा साधना से युक्त जीवन का पथ प्रशस्त करती है।

तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में 


हे राम! करो उद्धार ज्ञान की शक्तिदायिनी किरणों से। 

हम भटक रहे मृगवारि बीच 

विभ्रमित पियासे हरिणों से ॥

ऐसे ही विभ्रमित मुनि भरद्वाज भी हो गये थे 


एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥

जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥


एक बार पूरे मकर भर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमों को लौट गए। किन्तु परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनि को चरण पकड़कर भरद्वाज ने रोक लिया क्योंकि वे अपनी शंकाएं दूर करना चाहते थे


एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥

नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥


एक राम तो अवध नरेश दशरथ के कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्री के विरह में अपार दुःख उठाया और क्रोध आने पर युद्ध में रावण को मार डाला।

दो विद्वान्  जब मिलते हैं तो एक प्रकार का संगम निर्मित हो जाता है जिसमें उनकी भावभक्ति सरस्वती नदी की तरह अप्रत्यक्ष रहती है जहां यमुना संसार के समान और गंगा मैया,जो बौद्धिकता भावनाओं विचारों विश्वासों का सम्मर्द ही है और जिसका स्वरूप पानी नहीं ब्रह्म-द्रव है,सार के समान है

इसके अतिरिक्त 

बद्रीनाथ से संबन्धित कौन सी कहावत गांव में प्रचलित थी, भैया वीरेन्द्र जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

11.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 11 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५९६ वां* सार -संक्षेप

 जगत जंजाल जंगल जो कहें अद्भुत कहानी है, 

समंदर की सदा के साथ रहता आग-पानी है, 

कि, काँटे और कोंपल साथ रह पाटल खिलाते हैं, 

बुढ़ापे का सहारा बन खड़ी रहती जवानी है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 11 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५९६ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७८

कर्म करते हुए सफलता का चिन्तन करें मात्र सफलता का चिन्तन और कर्म का त्याग किसी प्रकार उचित नहीं है  लक्ष्य प्राप्ति तक विश्राम न करें l


आशा और विश्वास जीवन की आधारशिला हैं। आशा वह शक्ति है जो कठिनतम परिस्थितियों में भी मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। विश्वास वह संबल है जो उसे अपने लक्ष्य की ओर अडिग बनाए रखता है।  


इन दोनों के बल पर मनुष्य जीवन के  बड़े से बड़े संघर्षों को पार कर लेता है। ऐसे संघर्षों से उत्पन्न हुआ इतिहास केवल अतीत नहीं रहता, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाता है।  


भारत इस आशा और विश्वास का अद्भुत प्रतीक है एक ऐसा देश जिसने असंख्य सुख-दुःख, पराजय-विजय, और उत्थान-पतन को सहते हुए भी मोक्ष, मुक्ति और आत्मकल्याण की कामना को सर्वोच्च स्थान दिया है। यह जाज्वल्यमान ध्रुवतारा बनकर सम्पूर्ण विश्व को प्रेरणा देता आया है।मोक्ष का अर्थ है सारे जंजालों से मुक्ति l किन्तु संसार का सत्य है कि लालसा बनी रहती है और इससे संघर्ष का नाम तत्त्व है l


किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।


तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।4.16।।

 

कर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषय में विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ संसार-बन्धन से मुक्त हो जायगा।


भैया अखिलेश तिवारी जी भैया वीरेन्द्र जी भैया डा अमित जी भैया प्रदीप श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ  मार्ग से दूर होने पर क्या होता है मार्ग कैसे आनन्द देता है अधिवेशन कैसा स्वरूपहोता है धुरन्धर की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

10.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 10 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५९५ वां* सार -संक्षेप

 खुद पे हौसला रहे, बदी से ना टले ।

दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करे ||


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 10 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५९५ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७७

अपनी त्रुटियों दोषों की समीक्षा करें जब समय मिले आत्मस्थ होने का प्रयास करें


प्रार्थनाओं

जैसे

हे प्रभु आनंददाता, ज्ञान हमको दीजिए ।

शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए ।

लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बने ।

ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीरव्रतधारी बने ।....


 में एक अद्वितीय शक्ति निहित होती है। जब जीवन में विषम, जटिल या कठिन परिस्थितियाँ आती हैं, तब यही प्रार्थनाएँ हमारे भीतर धैर्य, संतुलन और सम्बल का संचार करती हैं। वे मानसिक दृढ़ता प्रदान करती हैं l 

सारा संसार आशा और विश्वास पर ही आधारित है। यही दो तत्व व्यक्ति को निराशा में भी आश्वस्त रखते हैं और जीवन की गति को बनाए रखते हैं। प्रार्थनाएं इन दोनों की पोषक होती हैं। प्रार्थनाएं मनुष्य को विषमताओं में भी जीवित और जाग्रत बनाए रखती हैं। परमात्मा की कृपा एक मूल तत्त्व है  उसकी शरण अद्भुत है  उसके स्मरण के उपाय के लिए हम श्रीमद्भग्वद्गीता,श्रीरामचरित मानस आदि ग्रंथों की शरण में जा सकते हैं क्योंकि ये हमें अत्यधिक शक्ति सामर्थ्य बल प्रदान करते हैं जिसके आधार पर हम तात्त्विक आत्मबल आत्मभक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं 


एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥

रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥3॥


तुलसीदास जी कहते हैं  इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री राम जी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए l


इसके अतिरिक्त भैया डा प्रवीण सारस्वत जी भैया डा अमित जी भैया आलोक सांवल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

9.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष पञ्चमी/षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 9 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५९४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७६

इस जग में सुख दुख सभी, आते जाते भोग। 
कभी वही सुखप्रद लगे, कभी कष्टप्रद रोग ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष पञ्चमी/षष्ठी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 9 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण
  *१५९४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७६
देश संकट में है इस कारण हमें संगठित रहने की अत्यन्त आवश्यकता है


जब शरीर अस्वस्थ होता है, तब स्वाभाविक रूप से मन भी उदास या विचलित हो जाता है। किंतु यदि ऐसी स्थिति में भी मन प्रसन्न, शांत और प्रफुल्लित बना रहे, तो यह एक विशिष्ट और दुर्लभ अनुभव है। यह केवल परमात्मा की कृपा से ही संभव होता है।ऐसी अवस्था में व्यक्ति को अपने शारीरिक कष्ट की अनुभूति होते हुए भी उसका मानसिक भार नहीं लगता।यही उस परमात्मा की अद्भुत लीला है कि वह हमें हमारे ही शरीर के दुःख से कुछ समय के लिए अलग कर देता है और आनन्द की अनुभूति कराता है। यह अवस्था आध्यात्मिक उन्नयन की ओर संकेत करती है 
 गीता में १८वें अध्याय में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र के स्वाभाविक कर्म बतलाए गये हैं ब्राह्मण अर्थात् जो ब्रह्मत्व को प्राप्त हैं  (ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से ही ब्राह्मण नहीं  ) के कर्म इस प्रकार हैं


मन का निग्रह करना इन्द्रियों को वश में करना; धर्मपालन के लिये कष्ट सहना जिस प्रकार गुरु गोविन्द सिंह, गुरु तेग बहादुर आदि ने कष्ट सहे; बाहर-भीतर से शुद्ध रहना; दूसरों के अपराध को क्षमा करना; शरीर, मन आदि में सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदि का ज्ञान होना; यज्ञविधि को अनुभव में लाना; और परमात्मा, वेद आदि में आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।18.42।।

इसी प्रकार अन्य के कर्म हैं l
बाह्य और आन्तरिक दोनों स्तरों पर शुद्ध रहना ही सनातन धर्म का मूल चिन्तन है। 

यह विचार केवल बाहरी स्वच्छता या शारीरिक पवित्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धता को भी सम्मिलित करता है सनातन धर्म हमें यही सिखाता है कि केवल क्रियाएँ नहीं, बल्कि भावनाएँ भी निर्मल हों, तभी जीवन सच्चे अर्थों में धर्ममय बनता है।

इसके अतिरिक्त कर्मभोग क्या है भैया डा अमित जी का उल्लेख क्यों हुआ सोना माटी किस कारण हुआ जानने के लिए सुनें

8.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 8 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५९३ वां* सार

 संकट कठिन कराल हो,अथवा सुखमय सेज।

दोनो में सम सहजता, यही स्वत्वमय तेज    ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 8 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५९३ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७५

 समय समय पर स्वयं की समीक्षा अवश्य करते रहें


कार्यक्रम किसी एक निश्चित लक्ष्य को लेकर आयोजित किए जाते हैं, और वह लक्ष्य होता है—मूल कार्य का विस्तार करना। यह मूल कार्य कुछ भी हो सकता है जैसे स्वधर्म का पालन करना, स्वदेशभाव को जाग्रत करना, समाज में जागरूकता फैलाना, समाज की विद्रूपताएं समाप्त करने का प्रयास करना आदि।


ये कार्यक्रम केवल औपचारिक आयोजन या बाह्य प्रदर्शन नहीं होते, अपितु आत्मदर्शन के भी सशक्त माध्यम होते हैं। इनका उद्देश्य आत्ममूल्यांकन, आत्मपरिष्कार और जीवन के उच्च आदर्शों को समाज में व्यक्त करना होता है।


इस प्रकार के आयोजन हमारे आंतरिक विश्वास, विचारधारा और राष्ट्रीय-धर्म के प्रति आस्था को जाग्रत करते हैं। अतः ऐसे प्रत्येक कार्यक्रम को गम्भीरता और समर्पण से देखने की आवश्यकता है, क्योंकि यही हमारे आत्मिक उत्थान और सामाजिक कर्तव्यबोध का माध्यम बनते हैं।

इसी प्रकार का एक कार्यक्रम २८ दिसंबर को होने जा रहा है तो इससे अनुस्यूत किसी अन्य कार्यक्रम में स्वैराचार अर्थात्

ऐसा मनमाना आचरण जो नैतिक, धार्मिक, सामाजिक आदि नियमों या बंधनों की उपेक्षा करके किया जाय (= उच्छृंखलता)

  का स्थान कैसे हो सकता है

स्वतन्त्रता और स्वैराचार में अन्तर है हमें सुसंस्कृत और सुसभ्य ही रहना चाहिए ताकि समाज में भी सम्मान मिले  हनुमान जी ने भारत मां की सेवा के लिए हमें  युगभारती के रूप में एकत्र किया है

भारत मां हमारे सत्कार्यों को देखकर प्रसन्न होती हैं और हमारी हीनता को देखकर दुःखी होती हैं

दूसरों का उत्कर्ष देखकर प्रसन्न होने  वाले कम होते हैं किन्तु होते हैं

जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हि जल पाई॥

सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥7॥


संसार में तालाबों और नदियों के समान ही मनुष्य भी अधिक हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं अर्थात्‌ अपनी उन्नति से प्रसन्न होते हैं। समुद्र जैसा तो कोई एक बिरला ही सज्जन होता है, जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर अर्थात् दूसरों का उत्कर्ष देखकर) उमड़ पड़ता है


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने राजनीति प्रधान चिन्तन का उल्लेख क्यों किया भैया रत्नेश जी भैया मनीष जी क्यों चर्चा में आये दिल्ली अधिवेशन के लिए क्या परामर्श है किसने स्व पर ध्यान दिया और पर का ध्यान नहीं किया जानने के लिए सुनें

7.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 7 दिसंबर 2025 का उपदेश *१५९२ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 7 दिसंबर 2025 का उपदेश

  *१५९२ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७४

हम सब अपने संगठन में प्रेम और आत्मीयता के विस्तार का यथासंभव प्रयास करें



यदि परिवार के किसी एक सदस्य को कष्ट होता है और शेष सभी सदस्य उसके दुःख को अपना दुःख मानकर उसकी चिन्ता करते हैं, उसे दूर करने का प्रयास करते हैं, तो यही भाव 'परिवार-भाव कहलाता है। इसमें सभी सदस्य एक दूसरे के सुख दुःख के सहभागी होते हैं। कोई भी कष्ट अकेले नहीं झेलता सभी मिलकर उसका समाधान ढूंढते हैं। यही सच्चा पारिवारिक जीवन है जहाँ आत्मीयता, सहयोग और सहानुभूति का सामूहिक भाव होता है। यह भाव केवल रक्त-संबंधों से नहीं आता, बल्कि आपसी समझ, समर्पण और संवेदना से विकसित होता है। यही भाव परिवार को एकजुट और सशक्त बनाता है। हमें अपने संगठन युगभारती को इसी भाव के साथ सशक्त बनाना हैl

संगठन में शंका का अंकुर अत्यन्त भयानक होता है हम सब मिलकर प्रयास करें कि यह उपज न पाये l

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।

बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥ 57(ख)॥


यह सोरठा प्रेम की सच्ची प्रकृति और उसकी कोमलता को अत्यन्त सूक्ष्मता से समझाता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि जल और दूध  दोनों एक साथ होते हैं, तो कोई अंतर कर पाना कठिन होता है। यही स्थिति सच्चे प्रेम की होती है जहाँ दो आत्माएँ या दो व्यक्तित्व इतनी आत्मीयता से जुड़ जाते हैं कि भेद ही मिट जाता है किन्तु यदि इन दोनों को अलग करने का प्रयास किया जाए जैसे दूध और जल को अलग किया जाए  तो स्वाद चला जाता है, प्रेम की मिठास समाप्त हो जाती है। इसका संकेत यह है कि प्रेम में भेद की भावना आती ही नहीं, और यदि आ जाए तो उसकी आत्मा नष्ट हो जाती है lअतः हम सबका सामूहिक प्रयास हो कि भेद की भावना न आ पाए l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया डा अमित जी  भैया डा मनीष वर्मा जी भैया सूर्यांक जी आदि का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें

6.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 6 दिसंबर 2025 का उपदेश *१५९१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 6 दिसंबर 2025 का उपदेश

  *१५९१ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७३

अपने शरीर अपने परिवार का ध्यान रखते हुए समाज और राष्ट्र के हित हेतु कार्य करें


प्रभातकालीन यह अद्भुत वेला केवल एक नियमित दिनचर्या का भाग नहीं, अपितु गम्भीर चिन्तन का अमूल्य अवसर है ये क्षण हमारे जीवन की जटिलताओं व समस्याओं को सुलझाने हेतु अन्तःप्रेरणा देने के लिए हैं हमारा अन्धकार दूर करने के लिए हैं संसार के रहस्य को जानने का प्रयास हैं। यह वेला हमारे भीतर सदाचारमय, सात्त्विक एवं राष्ट्र-निष्ठ विचारों का सिंचन करती है ताकि हमारा व्यक्तित्व आत्मोन्मुख न रहकर समाजोन्मुख बने। ऐसे विचार जब हमारे आचरण में उतरते हैं, तब हमारा जीवन राष्ट्र और समाज के लिए उपयोगी, प्रेरणादायी एवं संस्कारमय बनता है।


सनातन जीवन-दृष्टि हमें यह सिखाती है कि मनुष्य को अपने भीतर की दिव्यता को पहचानते हुए सक्रिय और जागरूक जीवन जीना चाहिए।सनातन धर्म यह नहीं कहता कि मनुष्य एकांगी जीवन जिए, केवल तप-जप करता रहे और संसार की समस्याओं से मुँह मोड़ ले। यदि हम केवल ध्यान-साधना में लगे रहें और दुष्ट आक्रमण करते रहें, तो यह धर्म के विरुद्ध है।

यह धर्म संतुलित जीवन का आह्वान करता है जिसमें आध्यात्मिक साधना भी हो और सामाजिक सक्रियता भी। यही इसकी युगानुकूल विशेषता और सार्वकालिक प्रासंगिकता है।भगवान् राम इसी शौर्य -प्रमंडित अध्यात्म की प्रासंगिकता को सिद्ध करते हैं वे पुरुषत्व को धारण कर नर -लीला करते हुए पुरुषोत्तम हो गये वे परिश्रम, विक्रम और शील  से संयुत शौर्य का स्वर हैं वे तो असंख्य सद्गुणों का निकर हैं


इसके अतिरिक्त प्रभाकर जी और शास्त्री जी का उल्लेख क्यों हुआ, मानव धर्म और सनातन धर्म एक कैसे हैं, सावित्री मन्त्र क्या है जानने के लिए सुनें

5.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 5 दिसंबर 2025 का उपदेश *१५९० वां* सार -संक्षेप

 स्वतंत्रता के भीषण रण में

लखकर जोश बढ़े क्षण क्षण में

काँपे शत्रु देखकर मन में

मिट जावे भय संकट सारा

झंडा ऊँचा रहे हमारा


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज पौष कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 5 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५९० वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७२

जनमानस में राष्ट्र -भक्ति, सनातन धर्म के प्रति अनुरक्ति की भावना जाग्रत हो जाए

हम इस जागृति के लिए हर संभव प्रयास करें


 प्रभात काल की इस अद्भुत वेला का चिन्तन समस्याओं को सुलझाने के लिए है हमें प्रेरणा देने के लिए है हमें सदाचारमयी विचारों से आप्लावित करने के लिए है ताकि हमारे राष्ट्र-निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व  का उत्कर्ष हो सके तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में


केवल प्राणों का परिरक्षण जीवन नहीं हुआ करता है

जीवन जीने को दुनिया में अनगिन सुख सुर साज चाहिए......


यह जीवन रचनाकर्ता की एक अनोखी  अमर कहानी 

इसमें रोज बिगड़ते  बनते हैं दुनिया के राजा रानी

जीवन सुख जीवन ही दुःख है जीवन ही है सोना चांदी

जीवन ही आबाद बस्तियां जीवन ही जग की बरबादी

जीवन तीन अक्षरों का अद्भुत अनुबन्ध हुआ करता है 

केवल प्राणों का..



परमात्मा की कृपा से ही हमें मनुष्य का जीवन प्राप्त हुआ है

इसमें प्रतिदिन परिस्थितियाँ परिवर्तित होती रहती है चिरस्थायी कुछ नहीं होता l यह जीवन सुख और दुःख  दोनों का समन्वय है। मनुष्य का जीवन केवल जीवित रहने की क्रिया नहीं, बल्कि उसे ऊँचे आदर्शों, संवेदनाओं, रसों और सर्जना के माध्यम से पूर्णता देना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है यह जीवन ईश्वर की एक अनुपम  दिव्य रचना है। हमें इसकी अनुभूति होनी चाहिए अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन लेखन भारत मां के भक्तों के मध्य प्रेम आत्मीयता सद्भाव के वातावरण के निर्माण द्वारा हम इसका सदुपयोग कर सकते हैं

हम अपने उद्देश्य का ध्यान रखें राष्ट्र को वैभवशाली बनाना हमारा कर्तव्य है l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया नीरज कुमार जी का उल्लेख क्यों किया

वह कौन था जो पहले स्वर्ग में तुंबुरु नामक एक गंधर्व था।जो रंभा नाम की अप्सरा पर मोहित हो गया था और उचित मर्यादा का उल्लंघन करने के कारण जिसे शाप मिला था। जिस शाप के फलस्वरूप वह राक्षस योनि में जन्मा जो भगवान् श्रीराम द्वारा  वध किए जाने पर  अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त हुआ जानने के लिए सुनें

4.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 4 दिसंबर 2025 का उपदेश *१५८९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष  शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 4 दिसंबर 2025 का उपदेश

  *१५८९ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७१

हम जो भी अपने कार्य कर रहे हैं उनमें मन लगाएं


संसार स्वभावतः अपूर्ण है—यहाँ इच्छाएँ अनंत हैं और परिस्थितियाँ परिवर्तनशील। मनुष्य जीवन भर इन्हीं अपूर्णताओं को पूर्ण करने का प्रयास करता रहता है परंतु यह अधूरापन अंतहीन है। उसे पूरा करने की चेष्टा में ही जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत हो जाता है।


प्रातःकाल के जागरण ध्यान अध्ययन स्वाध्याय लेखन भजन पूजन व्यायाम से एक प्रकार से नये जीवन का प्रारम्भ होता है  इसमें अतिशयोक्ति नहीं कि नित्य नया जीवन है और नित्य ही इस जीवन का समापन है 

 जीवन तो एक संग्राम की भांति विविध संघर्षों और चुनौतियों से भरा हुआ है। इन संघर्षों में सफलता प्राप्त करने के लिए केवल ज्ञान या भावना पर्याप्त नहीं होती, अपितु शौर्य, शक्ति और पराक्रम जैसे गुणों की आवश्यकता होती है यदि इन गुणों का अभाव हो, तो जीवन में आने वाले विघ्नों, अन्यायों और बाधाओं को पार करना कठिन हो जाता है। अतः जो व्यक्ति या समाज इन गुणों से युक्त होता है, वही संसार रूपी युद्धभूमि में विजयी हो पाता है। यही शौर्यप्रमंडित अध्यात्म है जिसे तुलसीदास जी ने मानस में अनेक स्थानों पर प्रकट किया है 

मुनि सुतीक्ष्ण से जब भगवान् राम कहते हैं 

अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना॥13॥

तुम प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, विज्ञान और समस्त गुणों तथा ज्ञान के निधान हो जाओ।॥

तो मुनि कहते हैं 

अनुज जानकी सहित प्रभु *चाप बान धर राम*।

मन हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम॥ 11॥॥

हे प्रभो! हे राम! छोटे भाई लक्ष्मण और सीता सहित *धनुष-बाणधारी* आप निष्काम (स्थिर) होकर मेरे हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा की भाँति सदा निवास कीजिए॥ 11॥

भगवान् राम का धनुष बाणधारी होना हमें शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराता है यह रामत्व अद्भुत है जिसमें ऋषित्व सम्मिलित है इसी ऋषित्व ने भगवान् राम को अपने सिद्धान्तों और आध्यात्मिक शक्तियों के प्रयोग हेतु धनुष बाण सहित दर्शाया

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों किया बड़ा ही C I D है वो

नीली छतरी वाला

हर ताले की चाबी रखे

हर चाबी का ताला.. गाने की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

3.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 3 दिसंबर 2025 का उपदेश *१५८८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष  शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 3 दिसंबर 2025 का उपदेश

  *१५८८ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ७०

प्रातः काल शीघ्रोत्थान अत्यन्त आवश्यक है ताकि हमारा मानस उपदेशों के लिए सज्ज रहे


अरण्यकाण्ड में उपदेशों की  एक लम्बी श्रृंखला है जो अत्यन्त सारगर्भित और जीवनोपयोगी है। इसमें विविध पात्रों के माध्यम से जो संवाद हुए हैं, वे केवल कथानक को आगे ही नहीं बढ़ाते, बल्कि गहन शिक्षाएँ भी प्रदान करते हैं।  उदाहरणार्थ नारद द्वारा जयंत को, अनसूया माता द्वारा मां सीता को,अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान् राम को,शूर्पणखा द्वारा रावण को,भगवान् राम द्वारा लक्ष्मण जी और मां सीता को, रावण द्वारा मारीच को उपदेश दिए गये हैं ये केवल संवाद नहीं, बल्कि नीति, धर्म, मर्यादा, विवेक, नारीधर्म, पराक्रम और जीवनदृष्टि के व्याख्यान हैं इन उपदेशों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि यह सम्पूर्ण संसार जहां जीव वियोग झेलता है और जिसे इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है कि

*संसार समंदर एक अबुझ आकर्षण है*

*उसको, जो दूर सुरक्षित छाया तट पर हो* 

*पर जो लहरों को झेल रहा हो किसीलिए*

*उसको वह भीषण भयद जटिल संघर्षण है*


 एक गुरु-शिष्य रूप व्यवस्था है जहाँ प्रत्येक पात्र, परिस्थिति और घटना किसी न किसी रूप में ज्ञान, जागरण का कारण बनती है 

अरण्यकाण्ड केवल वनगमन का कथानक नहीं, अपितु यह मानव जीवन की विविध जटिलताओं में मार्गदर्शन करने वाले उपदेशों का अमूल्य भण्डार है, जो हर युग में प्रासंगिक और प्रेरणादायक है। वर्तमान परिस्थितियों में तो इन उपदेशों की और अधिक महत्ता है l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी को यात्रा करते समय किस प्रकार की बाधा का सामना करना पड़ा, केरल, कन्याकुमारी और पुरी का उल्लेख क्यों हुआ, अरण्य कांड और माया का क्या सम्बन्ध है बाजा बजाता कौन घूम रहा है जानने के लिए सुनें

2.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 2 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५८७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष  शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 2 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५८७ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ६९

जिस पद पर आप हैं उसकी प्रतिष्ठा का सदैव ध्यान रखें


भगवान् राम का व्यक्तित्व अत्यन्त व्यापक, बहुआयामी और आदर्शों से परिपूर्ण है। वे जीवन के प्रत्येक पक्ष में एक महान् उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने रघुकुल की मर्यादा का पालन करते हुए प्रजावत्सल, धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय शासन दिया। उनका राजधर्म इतना उच्च था कि आज भी रामराज्य को आदर्श शासन-प्रणाली के रूप में स्मरण किया जाता है। उन्होंने पिता के वचन की मर्यादा रखते हुए राजसिंहासन का परित्याग कर वर्षों तक वनवास का कठोर जीवन जिया उनका जीवन भोग से नहीं, त्याग और तप से प्रकाशित हुआ।वे वनवास काल में विभिन्न ऋषियों के आश्रमों सहित अनेक स्थानों में धर्म-प्रसार, संवाद और प्रेरणा के स्रोत बने। उन्होंने अन्याय, अत्याचार और अधर्म के विरुद्ध युद्ध किया  उनका प्रत्येक निर्णय विवेकपूर्ण, यथार्थवादी और धर्मसम्मत रहा। वे नीति, मर्यादा और सत्य के गहन ज्ञाता थे।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस सहित अपने अनेक ग्रन्थों में यह भाव स्पष्ट किया है कि भगवान् राम  भगवान् विष्णु के अवतार  नहीं, अपितु स्वयं परम ब्रह्म परमात्मा के पूर्ण स्वरूप हैं।


आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥1॥


उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥

सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानि देहिं बर बाटा॥2॥


आगें रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें॥

उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥1॥


भगवान् राम का अवतरण उस समय हुआ जब संसार में अधर्म, अन्याय और अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुके थे। उस युग में जो शक्तिशाली योद्धा थे, वे आत्ममुग्ध हो चुके थे और समाज की उपेक्षा कर रहे थे। जैसे कि राजा दशरथ और जनक l वे  किसी न किसी रूप में समाज से विमुख होकर व्यक्तिगत मोक्ष या आत्मकल्याण की साधना में लीन थे।


ऐसे समय में भगवान् राम ने अवतरित होकर यह प्रतिपादित किया कि केवल आत्मकल्याण पर्याप्त नहीं, अपितु समाज की रक्षा, धर्म की पुनःस्थापना और मर्यादा के पालन हेतु पुरुषार्थ, पराक्रम और अध्यात्म का संगठित समन्वय आवश्यक है उनका जीवन यही सिखाता है कि धर्म एकांत साधना में नहीं, अपितु समाज के लिए समर्पित कर्म में  प्रकट होता है। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से स्पष्ट किया कि वह अध्यात्म, जो पराक्रम  से रहित है, अधूरा है। अर्थात् शौर्य -प्रमंडित अध्यात्म अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l


भगवान् राम की आवश्यकता इस कारण थी कि रावण वरदानी और अभिशप्त दोनों था इस विषय को आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया राम का रामत्व कैसे देश में व्याप्त है भारत का स्वभाव क्या है

भैया अभिषेक जी, भैया सिद्धनाथ गुप्त जी, भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ, हमारे विद्यालय के आचार्यों से हमारा आत्मीय सम्बन्ध भारत-भक्ति की भूमिका कैसे थी जानने के लिए सुनें

1.12.25

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 1 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण *१५८६ वां* सार -संक्षेप

 भुजदंडों में बल करतल पर कर्म बिराजे 

यह तन आजीवन रग रग में पौरुष साजे

सजे भाव में देशभक्ति का अनुपम उत्सव 

कण कण में उत्साह सुधा का सागर गाजे...



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज मार्गशीर्ष  शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 1 दिसंबर 2025 का सदाचार संप्रेषण

  *१५८६ वां* सार -संक्षेप


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ६८

इन सदाचार वेलाओं के तत्त्वों को समझने की चेष्टा करें 



मनुष्य का जीवन अमूल्य है अमूल्य का अर्थ है जिसका कोई मोल लगा ही नहीं सकता l मनुष्यत्व अद्भुत है l परमपिता परमेश्वर के मानस में जब मनुष्यत्व जाग्रत होता है तो कहता है एकोऽहं बहुस्याम् l

वह परमेश्वर वह ब्रह्म जो निराकार है, वह ही भक्तों की कृपा के लिए सगुण होकर श्रीराम रूप में अवतरित होता है 


उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥

सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानि देहिं बर बाटा॥2॥

राम ब्रह्म हैं लक्ष्मण जीव हैं और बीच में माया हैं जब ब्रह्म और जीव माया से अनुस्यूत होते हैं तभी संसार निर्मित होता है और जब तीनों का सामञ्जस्य होता है तभी संसार का तत्त्व सत्त्व ज्ञात भी होता है और आनन्द भी आता है यही शौर्य प्रमंडित अध्यात्म है


भगवान् राम का जीवन समग्र रूप से लोकमंगलकारी आदर्शों की प्रतिमूर्ति है। उनके जीवन का प्रत्येक कण, प्रत्येक क्षण धर्म, मर्यादा, संयम, करुणा, शौर्य और सत्य की दिव्य गाथा से ओतप्रोत है। वे मानवता के चरम उत्कर्ष का प्रतीक हैं। स्थान-स्थान पर उन्हें यशस्विता प्राप्त हुई किन्तु उनके मन में अहंकार कभी नहीं आया l परिस्थितियां भांपकर आदेशों को सहज रूप से स्वीकारते रहे l

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥

जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना॥1॥


 बाल्यकाल से लेकर राज्यत्याग, वनगमन, रावणवध और राज्याभिषेक तक उनका सम्पूर्ण जीवन मर्यादाओं की सीमाओं में रहते हुए अवर्णनीय पुरुषोत्तमत्व का दिग्दर्शन कराता है।

भगवान् राम का जीवन न केवल भावात्मक श्रद्धा का विषय है, अपितु व्यावहारिक अनुकरणीयता का प्रतीक भी है। उनका जीवन एक जीवित ग्रन्थ की भाँति है, जिसका प्रत्येक पृष्ठ जीवन साधना का पथ बताता है।


जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी॥

ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे॥3॥



इसके अतिरिक्त रामलीला  क्या है अदीनत्व क्या है अखंड भारत हमारे लिए क्या है  विश्वामित्र राष्ट्र के हितैषी कैसे हैं जानने के लिए सुनें